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तीर बने तुक्के

22 Feb 2010      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

एक गांव में चार मूर्ख रहते थे। एक दिन चारों परदेस के लिए रवाना हुए। रास्ते में भुख लगी। एक वट वृक्ष के नीचे विश्राम किया। भोजन के लिए अलग-अलग काम बांटा गया। रोटियां तैयार हुई। घी लाने का काम किसी को नहीं सौंपा। परस्पर तनातनी बढी। घी कौन लाए ? आखिर फैसला हुआ कि जो पहले बोलेगा उसे घी लाना पडेगा। चारों पालथी मार बैठ गए। इतने में दो कुत्ते आए। सारी रोटियां खा गए। कोई भी नहीं बोला। रात हो गई। दो चोर चोरी करने आए। वृक्ष के नीचे अपने थैलों को ठीक करने लगे। इतने में ही चोरों को सिपाही दिख गए। चोर दौड गए पर धन के थैले छोड गए। सिपाहियों ने धन देख उनसे पूछा- क्या तुम चोर हो ? घी लाने के डर से चारों मौन रहे। चारों को हथकडया डाल राजदरबार लाया गया। राजा ने चारों को चोर समझकर जेल भेज दिया। इतने में ही छोटे मूर्ख से रहा नहीं गया और वह जोर से बोला - हम चोर नहीं है। यह सुनते ही तीनों हल्ला करने लगे - घी तुम्हें लाना है, घी तुम्हें लाना है।
जेल वाले दंग रह गए। यह क्या बला है ? वे राजदरबार में आए। उन्होंने राजा को अवगत कराया। राजा के आदेश से चारों ही मूर्ख राजदरबार में हाजिर हुए। उन चारों की शक्ल देखकर राजा ने सोचा - ये लोग होने तो मूर्ख चाहिए, किंतु है किस्मत वाले। राजा ने किस्मत की परीक्षा करने के लिए चारों से प्रश्न किया- बोलो भाई ! मेरी बंद मुट्ठी में क्या है ? पहले मूर्ख को राजा की बात ही समझ में नहीं आई इसलिए उसने तुक्का लगाया और कहा - सब गोलमाल है। दूसरे ने तुक्के का अर्थ अनारदाना समझते हुए कहा - रंग लाल-लाल है। तीसरे ने कहा - और दानेदार है। चौथा समझ गया कि ये किसी फल की बात कर रहे है इसलिए उसने तुक्का लगाया- खोल मुट्ठी राजा हाथ में अनार है। चारों के तुक्के सच्चे निकलें। राजा खुश हुआ और उसने कहा - तुमने यह सब अंदाज कैसे लगाया ? चारों ने कहा - हमने सोचा कि एक तुक्के से दूसरा तुक्का जोडते जाएंगे और जोडने के काम में कभी किसी को नुकसान नहीं हुआ है। तोडने वाले काम से नुकसान होता है। राजा ने कहा -भाई, तुम्हारें तुक्के तो तीर बनकर सीधे निशाने पर लगे है। राजा ने चारों को इनाम दिया और वे चारों इनाम राशि लेकर उसी वृक्ष के नीचे जा पहुंचे। रातभर विश्राम किया। राजा से भेंट में मिले रूपयों को वृक्ष की जड में खुले ही रखकर सो गए। थोडी देर में नींद आ गई।
इधर कोतवाल चलता फिरता वहां पहुंच गया। दो हजार रूपयों को देखकर उसका जी ललचाया। रूपयों को लेकर वह अपने घर आ गया। सुबह चारों उठे। रूपए नहीं मिलने से चारों राजा के पास वापस आए। राजा ने कहा- तुम ही तुक्के लगाकर बताओ कि रूपए किसने लिए है ?
पहला बोला- आयो फिरतो फिरतो। दूसरा बोला- आयो घोडा चढतो। तीसरा बोला- हाथ में तलवार और चौथा बोला - चोर कोतवाल। कोतवाल ही हमारे रूपयों का चोर है। कोतवाल को दरबार में बुलाया गया। राजा ने सब बात पूछी। चारों के तुक्के सच थे। राजा फिर चारों के सही तुक्कों पर बडा खुश था। कोतवाल को सजा मिली और राजा ने चारों को एक-एक हजार रूपये का इनाम दिया।

 




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