Saturday, 24 August 2019
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भाजपा को धत्ता बता व्यापारी अग्रवाल ने बीकानेर न्यास अध्यक्ष पद ग्रहण किया


Shyam Narayan Rangaजब से वसु सरकार बनी है तब से कयास लगाए जा रहे थे कि बीकानेर में नगर सुधार न्यास का अध्यक्ष कौन होगा। समय समय पर इस पद के लिए नेपथ्य से आवाजे आती रही और बीकानेर से करीब छप्पन नेताओं व कार्यकत्ताओं ने इस पद के लिए अपनी दावेदारी जताई। इन नेताओं ने जयपुर से लेकर दिल्ली तक दौड लगाई और आस भी लगाई कि अध्यक्ष पद मिल जाए लेकिन हुआ वही जो राजनीति में होता है। एक बार फिर आर्थिक ताकतों के सामने जमीन से जुडा कार्यकर्ता धुल चाटता नजर आया और सारे संगठन के विरोध के बावजूद एक व्यापारी ने यह दौड जीत ली। वसुधरा राजे ने अपने भाजपा संगठन के पदाधिकारियों को किनारे कर एक व्यापारी श्रीगोपाल अग्रवाल को न्यास अध्यक्ष बना दिया। मुख्यमंत्री के इस निर्णय का जमकर विरोध हुआ और बीकानेर भाजपा संगठन के पदाधिकारियों ने इस निर्णय के विरोध में अपने इस्तीफे भी प्रदेश संगठन को भेज दिए लेकिन यह सारा विरोध मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की हठधर्मिता के सामने अपना कोई विशेष असर न छोड पाया और आज मुख्यमंत्री की हठधर्मिता फिर जीत गई और आम कार्यकर्ता का मनोबल टूट गया। इस सारे प्रकरण ने यह साबित कर दिया कि सरकार चाहे काँग्रेस की हो या भाजपा की धन्ना सेठों की नोटों की हरियाली के सामने कार्यकर्ता का वजूद कोई मायने नहीं रखता। जनता जानती है कि इसी प्रकार पिछली काँग्रेस सरकार ने भी एक व्यापारी को ही न्यास अध्यक्ष बनाया था और बरसों से कग्रेस पार्टी की सेवा कर रहे लोग इस दौड में पीछे छूट गए थे। यह बात इस तथ्य को साबित करती है कि सत्ता पर आर्थिक ताकतों का शिकंजा कितना मजबूत है और समय आने पर यह किस प्रकार प्रभावशाली बनकर सामने आता है। आज जब श्रीगोपाल अग्रवाल बीकानेर न्यास अध्यक्ष का पदभार ग्रहण कर रहे थे तो स्थानीय भाजपा के पदाधिकारी व कार्यकर्ता नदारद थे। शायद पार्टी ऑफिस में बैठकर वे यह सोच रहे होंगे कि शायद वे कार्यकर्ता न होकर कोई व्यवसायी होते तो आज इस जलसे में वे भी शामिल होते।
सही है राजनीति में राजनेताओं की अपनी मजबूरियाँ होती है और इसी कारण जब कार्यकर्ता की जरूरत पडती है तो वे र्काकर्ताओं के सामने गिडगिडाते नजर आते हैं और जब कार्यकर्ताओं का काम समाप्त हो जाता है तो धन्ना सेठों की पार्टीयों की शान को बढाना पडता है। आज भाजपा के वे वरिष्ठ नेता भी मौन थे जिन्होंने बरसों पार्टी की सेवा की है। उनके चेहरे पर यह स्पष्ट झलक रहा था कि अब समय बदल चुका है और जिसके पास पैसा है वही सबकुछ है।
अब वह जमाना नहीं रहा जब राममनोहर लोहिया को नेहरू राज्य सभा से लाते थे और उनके विरोध की जरूरत महसूस करते थे। अब तो जमाना उदारीकरण का है जहॉ हर चीज खरीदी जाती है चाहे वह पद हो या मान सम्मान।
मन में यह विचार जरूर उठता है कि पार्टी चाहे कोई भी हो अब वे कार्यकर्ता या वे नेता कहॉ जाए जो जनता के बीच में बैठते हैं और लोग उनसे पूछते है कि भाई साहब ये सेठ कौन है और आपकी पार्टी में इसका क्या कद है। क्या जबाब दे जनता को कि अब सत्ता जनता की नहीं रही अब सत्ता समय की हो गई है और समय हमेशा ताकत के साथ रहता है और ताकत अब जनता में नहीं रही अब ताकत पैसों में रही है।