Sunday, 01 November 2020

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उत्तर प्रदेश पुनः जाति आधारित ध्रुवीकरण की ओर


Writer - Nirmal Rani

भारतवर्ष, धर्म व जाति की राजनीति में दुर्भाग्यवश संभवतः अन्य देशों की तुलना में सबसे आगे है। ऐसी आशा की जा रही थी कि प्रगतिशील संसार तथा खुले दिमाग के लोगों की संख्या में बढोत्तरी होने के साथ-साथ जाति व सम्प्रदाय आधारित विद्वेष भी सम्भवतः धीरे-धीरे समाप्त नहीं तो कम तो जरूर हो जाएगा। परन्तु ऐसा होने के बजाए यह देखा जा रहा है कि यह विद्वेष तमाम कोशिशों के बावजूद निरंतर बढता ही जा रहा है। आधुनिकता की खोखली ढोल पीटने वाला समाज अपने आपको इस अंधकारपूर्ण बुराई से स्वयं को दूर नहीं रख पा रहा है। परिणामस्वरूप समाज में विघटन पैदा हो रहा है, परस्पर सहयोग का वातावरण बनने के बजाए जातिगत विद्वेषों के चलते असहयोग के परिणाम सामने आ रहे हैं। नतीजतन हमारा देश पीछे की ओर जा रहा है। सुरक्षा बलों, संसद व विधानसभाओं, प्रशासनिक अधिकारियों तथा अदालतों का वह बहुमूल्य समय जो अच्छे कामों में लगना चाहिए था वह जातिगत् एवं सम्प्रदायिक दुर्भावनाओं से उत्पन्न समस्याओं से निपटने व उन्हें शान्त कराने में लग रहा है।

वैसे तो लगभग पूरा देश ही इस ‘महामारी’ का शिकार है। परन्तु देश के तुलनात्मक दृष्टि से पिछडे समझे जाने वाले दो राज्य उत्तर प्रदेश व बिहार इस त्रासदी के कुछ ज्यादा ही शिकार हैं। इसी साम्प्रदायिक एवं जातिवादी वातावरण ने इन राज्यों का राजनैतिक समीकरण भी बदलकर रख दिया है। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का उदय से लेकर वर्तमान वर्चस्व तक का सफर जाति आधारित समीकरण की ही देन है। और यह नासूर अब लगता है समाज के प्रत्येक साधारण व असाधारण व्यक्ति के भीतर इस हद तक अपनी जगह बना चुका है कि समय, स्थान तथा मौके को देखे बिना समाज का एक अति जिम्मेदार व्यक्ति भी अपने मुंह से वह कुछ निकाल देता है जोकि कतई शोभायमान नहीं कहा जा सकता। इसमें कोई शक नहीं कि वर्तमान दौर से पीछे के दौर में तथा आज भी देहाती अथवा दूरदराज के क्षेत्रों में किसी व्यक्ति को उसकी जाति के नाम से सम्बोधित किया जाता है। तथाकथित उच्च जाति के लोग तो इस सम्बोधन में शायद गर्व ही महसूस करते हैं अथवा ऐसे सम्बोधनों को बुरा नहीं मानते। परन्तु दलित समाज के लोगों को उनकी जाति के नाम से सम्बोधित करना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। सभ्य समाज तो शुरु से ही इस बात का विरोधी था कि किसी भी व्यक्ति को उसके जातिसूचक नाम के साथ न पुकारा जाए। परन्तु अब भी कभी-कभी ऐसी घटनाएं घटित होती हैं तथा इसका परिणाम प्रायः अच्छा भी नहीं होता।
महेन्द्र सिंह टिकैत निश्चित रूप से उस बुजुर्ग किसान नेता का नाम है जो गत् तीन दशकों से निःस्वार्थ रूप से किसानों के अधिकारों के लिए निर्णायक संघर्ष करते चले आ रहे हैं। कभी भी और किसी भी सरकार से चाहे वह उत्तर प्रदेश की हो अथवा केंद्र में क्यों न हो टिकैत किसी भी सरकार से लोहा लेने से नहीं डरते। टिकैत के जनाधार का कारण किसी धर्म अथवा जाति पर आधारित राजनीति नहीं है। वे किसानों के हितों की लडाई निःस्वार्थ रूप से लडते हैं। इसमें वे किसी जाति विशेष के किसानों को शामिल नहीं करते बल्कि सभी अन्नदाता किसान उनकी भारतीय किसान यूनियन के झण्डे के नीचे बिना किसी साम्प्रदायिक विद्वेष आ खडा होता है। उत्तर प्रदेश अथवा केंद्र में मंत्री बनना, राज्यसभा का सदस्य होना, लोकसभा व विधानसभा का टिकट लेने जैसी बातें उनके बाएं हाथ का खेल है। टिकैत एक ऐसे लोकप्रिय नेता का नाम है जिसे कि प्रत्येक राजनैतिक दल अपने साथ जोडना चाहता है। परन्तु वे स्वयं अपने आपको राजनैतिक दलों के दलदल से दूर रखते हुए केवल और केवल किसानों के हितों के लिए ही संघर्ष करना चाहते हैं।   परन्तु इतने महान नेता द्वारा भी गत् दिनों उत्तर प्रदेश के बिजनौर जले में एक जनसभा में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के विरुद्घ जातिसूचक टिप्पणी कर दी गई। बेशक टिकैत को बाद में अपने मुंह से निकाले गए शब्दों के लिए शर्मिन्दगी भी हुई तथा उन्होंने मीडिया के समक्ष इसका इजहार भी किया परन्तु मुंह से निकला शब्द वापस नहीं आ सकता था। अतः टिकैत द्वारा की गई इस जातिसूचक टिप्पणी पर मुख्यमंत्री मायावती ने कार्रवाई किए जाने के आदेश दिए। इस घटनाक्रम को लेकर राज्य सरकार तथा किसानों के मध्य एक बडा टकराव होते-होते टल गया। टिकैत ने भी प्रशासन के साथ पूर्ण सहयोग की भूमिका निभाते हुए बिजनौर की अदालत से इस मामले में अपनी जमानत करवा ली।
यहां गौरतलब यह है कि क्या टिकैत अकेले ऐसे नेता है जिन्होंने जातिसूचक टिप्पणी कर कोई बडा अपराध कर डाला? या फिर चूंकि वह टिकैत जैसी कद्दावर शख्सियत द्वारा की गई टिप्पणी थी इसलिए उन्हें नीचा दिखाने के लिए मुख्यमंत्री मायावती ने उनके विरुद्घ कानूनी कार्रवाई किए जाने का फैसला किया? बात केवल इतनी ही नहीं रही कि टिकैत ने मायावती के विरुद्घ जातिसूचक टिप्पणी की हो और मायावती ने उन्हें अदालत में अपनी जमानत कराने तक के लिए बाध्य कर दिया हो। बल्कि टिकैत की टिप्पणी से लेकर उनकी जमानत होने तक के चार दिनों तक जाति आधारति राजनीति के विशेषज्ञों द्वारा जमकर राजनैतिक रोटियां सेकने के प्रयास किए गए। परन्तु दूरदर्शी टिकैत ने स्वयं को किसी राजनैतिक दल का मोहरा बनने देने के बजाए स्वयं अति विवेकपूर्ण एवं सूझबूझ भरा निर्णय लेते हुए किसी बडे टकराव को टालने में सफलता हासिल की।
बेशक तथाकथित उच्च जाति के लोगों द्वारा विशेषकर इन समुदायों के बाहुबलियों द्वारा दलित समाज के लोगों को नीचा दिखाने का हमेशा प्रयास किया जाता रहा है। मायावती इसे ‘मनुवादी’ व्यवस्था का नाम देती हैं। और यह एक कडवा सत्य भी है कि हमारे हिन्दू धर्म शास्त्रों ने जात-पात की जो खाई खोदी थी वह आज इतनी गहरी हो चुकी है कि इसे पाटना आज असम्भव सा प्रतीत होता है। अब तो हालत यह है कि राजनैतिक लोग इसी जातिवादी राजनीति पर स्वयं को पूरी तरह आश्रित कर चुके हैं। यहां तक कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी का तो वजूद ही जातिगत राजनीति पर आधारित है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में दलितों के नाम पर खडा होने वाला यह पहला राजनैतिक संगठन था तथा इसकी सोच बहुजन समाज पार्टी संस्थापक स्व. कांशीराम की थी।
बहुजन समाज पार्टी के सत्ता में आने तथा मायावती के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद क्या यह माना जा सकता है कि अब उत्तर प्रदेश में दलितों का राज हो चुका है तथा मायावती उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बडे राज्य की शक्तिशाली मुख्यमंत्री हैं? नहीं, अब उनकी मंजिल इसी रास्ते पर चलते हुए अथवा अवसरवादिता का परिचय देते हुए ब्राह्मण समाज जैसी कथित स्वर्ण जाति को जिन्हें कभी मायावती मनुवादी कहा करती थीं, को साथ लेकर दिल्ली के सिंहासन तक का सफर तय करना है। इसके लिए वे पूरे प्रयास में जुटी हैं। उत्तर प्रदेश में कई जिलों व नगरों के नाम दलितों के प्रेरणास्रोत नेताओं अथवा महापुरुषों के नाम पर रखकर वे स्वयं को देश के दलितों का सबसे बडा नेता व शुभचिंतक बताना चाह रही हैं। वे कई बार बातों-बातों में अपनी तुलना बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर व कांशीराम से भी करती रहती हैं। अपने जिन्दा देवी होने की बात तो वह कई वर्ष पहले ही कह चुकी हैं।
अभी एक ताजातरीन घटनाक्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मायावती की सैकडों करोड रुपए की एक ऐसी ही परियोजना पर रोक लगा दी है जिसके द्वारा वे दलित समाज में अपने आपको और अधिक मजबूती से पेश करना चाहती थीं। कुल मिलाकर चाहे वह दलित विरोधी विचारधारा से ग्रस्त तथाकथित उच्चजाति के राजनीतिज्ञों के दलित विरोधी हथकंडे हों या फिर दलितों के उत्थान व विकास के नाम पर की जाने वाली मायावती जैसे नेताओं की राजनीति हो। दोनों ही ओर से जातिगत भावनात्मक मुद्दों का भरपूर प्रयोग किया जा रहा है। जाति आधारित राजनीति करने वाले अपनी-अपनी जाति के लोगों के कल्याण हेतु शायद ही कुछ कर पाने की क्षमता रखते हों। प्रश्ा* तो यह है कि ऐसी तंग नजर सोच रखने वाले नेताओं से आखिर सम्पूर्ण भारत के सभी धर्मों व जातियों के वह लोग जो स्वयं को केवल भारतीय कहलाने में ही गर्व महसूस करते हैं, आखिर वे क्या उम्मीद रखें?

 


 

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