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संस्कारों का ह्रास गिरता जीवन मूल्य

04 Jan 2012      Add comment     Mail     Print     Write to Editor      Other Articles By This Writer

Author : Shyam Narayan Ranga भारतीय सभ्यता और संस्कर्ति अपने संस्कारों के लिए पूरे विश्व में जानी जाती है। भारतीय संस्कारों का ही परिणाम था कि एक समय भारत विश्व गुरू की पदवी धारण किए हुए था। यहाँ में लेखक होने के नाते यह स्पष्ट कर देता ह कि मेरा यहाँ संस्कारों से तात्पर्य सनातन धर्म के 16 संस्कारों से नहीं है वरन् दैनिक आचरण व जीवनशैली से जुडे उन संस्कारों से है जिनके चारों ओर हमारा जीवन जुडा हुआ है। हमारे देश की संस्कर्ति बहुधर्मी है और यहाँ एक कहावत प्रचलित है कि कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर वाणी परन्तु इसके बावजूद भी हम एक ऐसे सूत्र में पिरोए हुए हैं जो हम सबको भारतीय होने का गौरव प्रदान करता है और यह सूत्र संस्कारों से पिरोया हुआ है। 

 

 हमारे यहाँ एक समय ऐसा था जब अपने से बडों का आदर करना, गुरूजनों का सम्मान करना, पडसी पडसी में भाई भाई जैसा प्रेम, पूरे गॉव को एक ही परिवार के रूप में देखना आदि आदि ऐसी कईं दैनिक आचरण की बातें थी जो हमें पूरी दुनिया से अलग करती थी। किसी के बीमार हो जाने पर पूरे मौहल्ले का इकट्ठा हो जाना, महल्ले या गाँव में किसी की मृत्यु हो जाने पर पूरे गाँव में शोक का माहौल हो जाता था और किसी भी घर में खाना तक नहीं बनता था। इन सब उदाहरणों से मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि हम वसुधैव कुटुम्बकम् की जिस भावना की बात करते थे उस भावना के अनुसार अपना जीवन भी व्यतीत करते थे। हमारी कथनी और करनी में भेद नहीं था। जहाँ छोटे बडों का सम्मान करते थे वहीं बडे भी छोटों पर पूरा अधिकार रखते थे और उन्हें भटकाव से बचाने का पूरा प्रयास करते थे। अपनत्व का स्तर इतना था कि कोई भी बच्चा किसी परिवार का या व्यक्ति का नहीं वरन् महल्ले का और गाँव का माना जाता था, अमुक व्यक्ति कौन है तो उत्तर होता कि इस गाँव का है न कि इस कुल या परिवार का। छोटे बडे दोनों ही अपने अपने अधिकार व कर्तव्य से परिचित थे।

पिछले पिछले कुछ समय पर गौर करें तो यह बात सामने आती है कि यह सब बातें अब बीते समय की हो गई है। हम कहने को तो आज भी अपने आप को वैसा ही बताते हैं कि हम सब प्रेम से रहते हैं और हम मनुष्य मनुष्य में भेद नहीं करते परन्तु वास्तविकता कुछ और ही है। आज के इस भागदौड के जीवन में लोगों को अपने परिवार के लिए ही समय नहीं है और हालात ये है कि माता पिता अपने बच्चों से हफ्ते भर तक बात तक नहीं कर पाते। संयुक्त परिवार की टूटती स्थिति ने एकल परिवार की जिस संस्कर्ति को जन्म दिया है उससे संस्कारों का अवमूल्यन हुआ है। आज बच्चा साथ रहना नहीं सीखता तो वह कैसे अपने मौहल्ले को परिवार के रूप में आत्मसात करेगा। एक तरफ जहाँ उसके स्वयं के परिवार में परिवार जैसा माहौल नहीं है तो उससे कैसे उम्मीद की जाए कि वह पूरे शहर में परिवार के रूप में अपना सकेगा। आधुनिकता की दौड में हमने अंकतालिकाऍ तो अच्छी बना ली है और करोडों के सालाना पैकेज कैसे प्राप्त किए जाते हैं यह तो सीख लिया है लेकिन भाई भाई बनकर कैसे रहा जाए यह भूल गए हैं, हम भूल गए हैं कि कैसे हम अपने वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को जीकर लोगों के सामने आदर्श प्रस्तुत करें, अतिथि देवो भव की संस्कर्ति वाले इस देश में आज अतिथि के आने पर चेहरे पर सल उभर आते हैं और सोचते हैं कि अतिथि तुम कब जाओगे। भाई भाई में प्रेम नहीं रहा, बुजुर्गों का सम्मान समाप्त हो गया और हालात ये हो गए कि बुजुर्गों के सम्मान के लिए हमें कानून बनाने पडे। जिस देश में श्रवण कुमार की कहानियाँ सुनाई जाती थी जिसमें श्रवण कुमार के मरने की खबर सुनकर उसके माँ बाप ने तुरंत ही प्राण त्याग दिए वहीं आज इसी देश में माँ बाप के रिश्तों को तार तार करती नुपुर तलवार की खबरें सुर्खियों में है। संस्कर्ति के इस अवमूल्यन ने भारत की साख को हल्का कर दिया है। आज हमें किसी पर भी विश्वास नहीं रहा। भरोसे के रिश्ते समाप्त हो गए हैं। हम डर के माहौल में जी रहे हैं। संस्कर्ति की जडों के हिलने से हमारे खुशियों और परिवार व समाज की समृद्धि के फूल पनप नहीं रहे हैं। युवा पीढी भटकाव के दौर में है। रेव पार्टियों में खुले आम अश्लील व नशाखोरी की ताल पर नाचता युवा अपने पुरावैभव व पुरा संस्कर्ति से अपरिचित है। माँ बाप से जूठ बोलना, गुरूजनों का अपमान करना, पडौसी को पहचानना ही नहीं ओर हर किसी ओर लोभ लालच व अश्लील नजरों स देखने की प्रवृति ने हमारे अंदर के भारतीय गौरव को समाप्त कर दिया है। जहाँ युवाओं में भटकाव है वहीं उनको मार्गदर्शन देने वाला बुजुर्ग भी नजर नहीं आ रहा है, सुबह शाम की टहलने की प्रवृति ने मार्निंग वॉक की संस्कर्ति को जन्म दिया है। मार्गदर्शन के अभाव म समाज के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। 

आज जरूरत है अपने अतीत के गौरवशाली इतिहास से सांस्कर्तिक वैभव को अपनाने की ओर हम एक परिवार के रूप में रहना सीखे हम भाई भाई की तरह रहे, लालच को त्याग दे और जब पूरी वसुधा की हमारा घर हो जाएगी तो फिर क्या तेरा और क्या मेरा वहाँ तो सब सबका हो जाएगा। युवा अपने बडों का आदर करें, उनके अनुभव से सीखें और अपने बुजुर्गों को घर का महत्वपूर्ण व्यक्ति माने वहीं बुजुर्ग बच्चों को गलतियों पर टोके, उनका मार्गदर्शन करें ।आओ हम सब मिलकर एक ऐसे भारत के निर्माण का संकल्प ले जो पूरे विश्व के भाल पर तिलक की तरह चमके। 

 



श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ 
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर


Comments to this Article
very nice article and i think it is a very wise issue for this country and it's culture and we should aware for it .....thanks to author , anand sharma (2012-05-30 01:06:52)
very good articls .very danger
social problem in india but effect of modernization & westernization of over society nobody can safe any person that's . so good articles in present situation in indian society but new Gen ration are not accepted this article views so please aware new Gen ration . , shanker Meena (2012-06-07 03:10:26)
bahut achha likha hai bhai ranga g ne or aise article jab aate hai to samaj mai jagriti hoti hai or log jab aise article padhte hai to unko prerna milti hai so mai thanks kahta hu bhai ranga g ko or ummed karta hu ki aise article aage bhi padhne ko milte rahenge , chander harsh pushkarna (2012-06-20 10:02:04)

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