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साहिरः आओ कि कोई ख्वाब बुनें
विजय शर्मा

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”प्यासा“ फिल्म हिन्दी सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर है, गुरूदत्त की उत्कृष्ट निर्देशन क्षमता, विजय के किरदार में उनका मंजा हुआ अभिनय, गुलाब के रूप में वहीदा की बेहतरीन अदाकारी, फिल्म की थीम, सब चरम पर हैं। गुलाब की भूमिका में उनकी प्रेमपगी आंखें विजय के साथ-साथ दर्शकों के हृदय में भी गहरे उतर गयीं। प्यासा की हताशा-निराशा में भी इन आंखों की चमक से प्रवाहित प्रेम के कारण आशा की किरणें फूटती हैं। फिल्म का ओपनिंग सीन जहां नायक कवि विजय चिंतामग्न लेटा हुआ है, उसके ऊपर सरसराती हवा बह रही है, भौंरे फूलों पर मंडरा रहे हैं, रोमांस और बेबसी का सुंदर संगम, आंसू, प्रेम, हताशा, राग-रंग और राख का बेजोड समन्वय। इसी फिल्म का एक और दृश्य जब वहीदा रहमान का पर्दे पर प्रथम पदार्पण होता है। वह विचारमग्न नायक को लुभाती घूम-घूमकर उसे देखती हुई, आमंत्राण देती हुई लगती है। दृश्य थोडा अजीब सा लगता है, गुलाब का बाजारू औरत की भांति नायक को लालायित करना।
माना कि हिन्दी सिनेमा में गीत जानबूझकर बेवजह ठूंसे जाते हैं पर जरा कल्पना की जिए इन दोनों दृश्यों की बिना इनके गीतों के अथवा गीतों के स्थान पर लम्बे-चौडे संवादों की। कैसी उजाड दुनिया होती प्यासा की, बिना इसके गीतों के। ओपनिंग सीन का गीत
ये हंसते हुए फूल ये महका हुआ गुलशन
ये रंग और ये रूप में डूबी हुई राहें
ये फूल का रस पी के मचलते हुए भौंरे
मैं दूँ भी तो क्या दूँ तुम्हें ऐ शोख् नजारो
ले दे के मेरे पास कुछ आँसू हैं कुछ आहें।
आत्मा है यह गीत फिल्म की। गीत की पंक्तियां जादू का काम करती हैं और दृश्य सजीव हो उठता है। पूरी फिल्म के उद्देश्य को चंद सतरों में स्पष्ट करते हुए उसे सार्थकता प्रदान करता है। यह एक बहुअर्थी, बहुआयामी फिल्म है। दुविधापूर्ण स्थिति को व्यंजित करने वाली, स्वतंत्राता के तुरन्त बाद मध्यमवर्ग के टूटते हुए ख्वाबों की दुनिया को पेश करने वाली। एक ओर उजडता हुआ अतीत है, दूसरी ओर रोमांटिक दृश्यावली, खुमारी का टूटना बेबसी को इससे ज्यादा माकूल शब्दों में पकडना असम्भव नह तो कठिन अवश्य है। दूसरे दृश्य में वहीदा का सरल सौन्दर्य, उसके हृदय की स्वच्छता, उसकी नजरों का आग्रह सब एक साथ गीत की कडयों में मुखर हो उठते हैं-’जाने क्या तू ने कही, जाने क्या मैंने सुनी..., नयन झुक-झुकके उठे,...जुल्फ शान से उठी, कैसी खुशबू सी उडी।‘
और दर्शक इस खुशबू से सराबोर हो उठता है। फिल्मों में जान डाली है साहिर लुधियानवी के कमाल के गीतों ने। साहिर ने अपने ३१ वर्षों के फिल्मी सफर में बेहिसाब नग्में दिये हिन्दी सिने प्रेमियों को। कई पीढयां एक साथ झूमती आयी हैं उनके गीतों पर और आगे भी झूमेंगी। ८ मार्च १९२१ को पूर्वी पंजाब के लुधियाना में एक जागीदार परिवार में फजल मोहम्मद तथा सरदार बेगम की एकमात्रा औलाद अब्दुल हयी का जन्म हुआ, जिसने बादमें अपना तखल्लुस साहिर लुधयानवी रखा। जमाने के अनुरूप जमींदार फजल मोहम्मद एक ऐय्याश थे, जिनकी कई बीवियां थीं। सरदार बेगम उनकी चौथी बीवी थीं मगर आखिरी नहीं। लेकिन वे दूसरी औरतों से जुदा थीं। उन्हें पति की रंगरेलियां और जुल्म की दुनिया रास न आयी। जब वे सब उपाय करके हार गयीं तो उन्होंने अपने पति से अलग होने की ठान ली। उस जमाने में ऐसे फैसले-शादीशुदा औरत का अपने पति के खिलाफ जाना-न तो सुना जाता था, न ही आसान था। परन्तु सरदार बेगम ने यह अभूतपूर्व कदम उठाया। १९३४ में न केवल वे अपने शौहर से अलग हो गयीं बल्कि अपने साथ अपने किशोर होते बेटे को भी लेती गयीं। उन्होंने अर्थिक कठिनाइयों की परवाह नहीं की। कठिनाइयों के बीच उन्होंने अपने बेटे का पालन-पोषण किया। साहिर के मन में अपनी माँ की इस संघर्ष भरे जीवन की तस्वीर जरूर रही होगी जब उन्होंने ये पंक्तियां लिखी होंगी
’औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया।
’बेकस की तबाही के सामान हजारों हैं ‘
’तेरे बचपन को जवानी की दुआ देती हूँ‘
’ऐ मेरे नन्हें गुलफाम मेरी नींद तेरे नाम‘
अवश्य ही सरदारी बेगम ने अपने नन्हें गुल्फाम को दुआ दी होगी। अपनी नींद उसके नाम कर दी होगी। ऐय्याश फजल को यह तौहीन कैसे बर्दाश्त होती कि एक औरत, वह भी उनकी अपनी बीवी उनकी हुक्म उदूली करे, इतनी ही नहीं उनकी औलाद को अपने संग ले जाये। बाप ने बेटे के लिए नालिश ठोंक दी। साथ में इस बात के सारे इन्तजाम कर दिये कि साहिर अपनी माँ के पास न रह सके। भले ही इस रस्साकशी में बच्चे की जान ही लेनी पडे। पर कहते हैं न कि ’जाको राखे सांइयां मार सके न कोय।‘ सरदारी बेगम के बंधु-बांधवों ने उनकी सहायता की। साहिर को बचपन की बेफक्री और खुलापन नसीब न हुआ। वे ननिहाल की कडी चौकसी और बन्दिश में पले। जान की सुरक्षा जी का जंजाल बना रहा। बडों की निगरानी के कारण शुरूआती दिन घुटन, बेबसी और बन्धनों में गुजरे। क्रूर पिता का खौफ, जान का ख्ातरा तथा आर्थिक तंगी के बीच साहिर बढने लगे। शायद इसी कारण वे बडे गुस्सैल थे। जमींदारी का घिनौना रूप शुरू से ही साहिर ने देख और उसकी बडी गहरी छाप उनके जीवन पर पडी। आगे चलकर इसी सोच के तहत वे माक्र्सवादी विचारों की ओर मुडे और प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य बने।
नौजवान साहिर १९३९ में खालसा स्कूल पास करके गवर्नमेन्ट कालेज लुधियाना में दाख्ाल हुआ। पढाई ठीक-ठाक चली पर कालेज में साहिर को उनकी दूसरी गतिविधियों के लिए जाना जाता था। को-करिकुलर ऐक्टीविटीज के लिए उनमें प्रतिभा थी। इसी दौरान अपनी एक फैन एक सिक्ख लडकी से उन्हें प्यार हो गया। मनुष्य जिस वातावरण में बडा होता है उससे कभी उबर नहीं पाता। साहिर पर सदैव उनके बुर्जुआ बाप का साया मंडराता रहा। उन्हें प्यार हुआ लुधियाना के ही एक और धनी जमींदार खानदान की लडकी से। उस कच्ची उम्र में साहिर में यह माद्दा न था कि वे आगे बढकर लडकी का हाथ थाम लेते। उनका प्यार बिना खिले मुरझा गया। बिना परवान चढे। पर इस दफन प्यार का ख्ाामियाजा उन्हें भुगतना पडा। लडकी के पिता ने अपनी ताकत और रूसूख से उन्हें कालेज से निकलवा दिया। प्रेम कहानी की शुरुआत फिल्मी स्टाइल में हुई पर उसका अंत वैसा न हुआ। नायक समाज के शिकंजे को तोडकर, नायिका के पिता को परास्त करके नायिका को हासिल न कर सका। न ही फिल्मों की तरह नायिका के पिता का हृदय परिवर्तन हुआ। हाँ, गवर्नमेंट कालेज लुधियाना ने अपनी गलती का कुछ अंशों में प्रायश्चित किया, साहिर को विशिष्ट छात्रा का गोल्ड मेडल देकर। प्रथम प्रेम में मिली यह नाकामयाबी, यह हादसा शायर साहिर की अमानत बन गया। उनकी गीतों की बगिया का खाद-पानी बन गया। ’लाख आँधियां उठें, वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं।‘ कामयाबी सिर चढकर बोलती है, मगर इश्क की नाकामयाबी अलग गुल खिलाती है। दिल में दफन प्यार, नग्में, नजरें और गजल बन कर निकलते हैं। कहते हैं इसके पहले भी एक लडकी प्रेम चौधरी उनके प्यार में पड चुकी थी परन्तु उसकी बीमारी ने बहुत पहले उसे समाप्त कर दिया। साहिर ने ’ताजमहल‘ बना डाला, मगर यह शाहजहाँ के ताजमहल से जुदा था-
’’एक मलका वो कि जिसकी आख्ारी ख्वाहिश का नाम
जुम्बिशे आबरू का फरमान यानी ताज है,
लेकिन अपनी पहली ख्वाहिश भी जो कह नहीं सकती,
ऐसी कितनी रानियों का झोपडी में राज है।‘
१९ वर्ष की उम्र में कॉलेज के ऑलइंडिया मुशायरे में जब उन्होंने इसे सुनाया तो न केवल लुधियाना में बल्कि पूरे मुल्क में तहलका मच गया और रातों रात साहिर की ख्याति, उनका जादू फैल गया। साहिर का अर्थ जादूगर भी होता है।
इसी बीच तल्ख्ायाँ भी तैयार था। मगर प्रकाशक नहीं मिल रहा था। कॉलेज से निकाले जाकर काम की तलाश में वे लाहौर जा पहुंचे। वहाँ अदब-ए-लतीफ का सम्पादन करने लगे। बाद में शाकार और सवेरा का काम भी संभाला। तीनों ही उर्दू की प्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिाकाओं में गिना जाती हैं। १९४५ में तल्खियाँ प्रकाशित हुई इसके साथ ही साहिर शोहरत की बुलन्दी छूने लगे। १९८० में उनकी मृत्यु तक इसके तीस संस्करण छप चुके थे, न मालूम कितने पाइरेटेड एडीशन हुए होंगे।
’नग्म ओ शेर की सौगात किसे पेश करूँ‘, रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ‘। ’तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक है तुमको‘। ये केवल फिल्मी गीतों के बोल नहीं हैं-’तुम न जाने किस जहाँ में खो गये‘, ’लूट कर मेरा जहाँ छुप गये हो तुम कहाँ‘...‘, ’जाने वो कैसे लोग थे जिनको प्यार से प्यार मिला, हमने तो कलियां मांगी थीं कांटो का हार मिला।‘ इन गीतों में कहीं न कहीं उनका आपना दर्द बोलता है। यह आलेख उनके गीतों में उनके व्यक्तित्व को तलाशने की एक कोशिश है।
जब देश का बंटवारा हुआ साहिर दिल्ली में थे और उनकी माँ लाहौर में थीं। वे माँ को लेने वहां गये। दोस्तों और रिश्तेदारों के जोर देने पर वो वहीं ठहर गये। मगर उन्ह शीघ्र मालूम हो गया कि उनके क्रान्तिकारी विचार नये पाकिस्तान की बनी नई सरकार को रास नहीं आयेंगे। लीक से हटकर लिखे गये गीत और शायरी सरकार पचा न सकेगी। सवेरा में लिखे उनके विचारों को पाकिस्तानी सरकार ने काफी आपत्तिजनक माना। उनका नजरिया, उनकी तकरीरें किसी भी कठपुतली सरकार के लिए मुसीबतें खडी कर सकती थीं। गिरफ्तार होने के पहले ही वे दिल्ली लौट आये। कुछ ही महीनों में उन्होंने अपने दोस्तों से कहा ’बम्बई को उनकी जरूरत है‘ और वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपना एक नया सफर शुरू कर दिया। ३१ वर्षों के लम्बे सफर में उन्होंने करीब २०० गीत फिल्मों के लिए लिखे। इसके अलावा बहुत सारी गजलें, नग्में, और नज्में लिखीं। वे गीत हिन्दी जगत की थाती हैं। ’वक्त कितना भी सितम करे‘ वे गुनगुनाए जाते रहेंगे। साहिर ने ’तदबीर से बिगडी हुई तकदीर बना ली।‘ ’मैं बम्बई का बाबू नाम है मेरा अंजाना‘ का शायर अंजाना न रहा। १९७१ म भारत सरकार ने उन्ह पद्मश्री की उपाधि दी, १९७२ में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला।
बचपन और किशोरावस्था में खाये धक्कों ने उन्हें संघर्ष भरी जन्दगी के रू-ब-रू ला खडा किया। उनके प्रगतिशील विचार और माक्र्सवादी धारणा उनके इन गीतों में झलकती है-
साथी हाथ बढाना,
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।
’मुल्क की वादियाँ, घाटियाँ, खेतियाँ, औरतें बच्चियाँ
हाथ फैलाए ख्ौरात की मुंतजर हैं,
उनको अम्न और तहजीब की भीख दो।‘
और प्यासा का-
’जला दो, जला दो, इसे फूँक डालो, ये दुनिया...’
शंकर ने भी अपनी चौरंगी में इस दुनिया, इस सडी-गली दुनिया को नष्ट हो जाने का शाप दिया है। निराला भी इस जीर्ण-शीर्ण समाज को नष्ट कर डालना चाहते हैं। साहिर ने श्रम की, सामूहिकता की महत्ता जानी, वे अवाम की गिरती हालत से चिंतित थे। नारी के प्रति सम्वेदनशील थे वे। साहिर के गीत बहुआयामी है।
बम्बई आना उनके लिए नई राह खोल गया। १९५१ में नौजवान से पहले आज और कल, अमानत, चन्द्रकान्ता, दीदी, घूँघट, लाइट हाउस और मिलाप के गीत लिख चुके थे। पर साहिर के फिल्मी गीतों का असली सफर नौजवान के गीतों से शुरू होता है। ’ठंडी हवाएं, लहरा के आयें‘ ने दिलों में सिहरन पैदा कर दी। पर उन्हें वास्तविक सफलता उसी साल बनी बाजी से मिली। फिल्म निर्माण एक ’टीम वर्क‘ है जिसमें निर्देशक, नायक, नायिका, संगीतकार, गीतकार के अलावा और ढेर सारे लोगों का सहयोग होता है।
बाजी ने कई कस्मतों की बाजी पलट दी। १९५० में चेतन आनन्द के निर्देशन में नवकेतन की पहली फिल्म अफसर असफल हो चुकी थी। देवानंद सुरैया की हिट जोडी भी बॉक्स ऑफिस पर सफलता न दिला सकी। देवानंद ने बाजी का निर्देशन गुरूदत्त को सौंपा। बाजी गुरूदत्त के लिए नई राह खोल गयी। फिल्म की कहानी बलराज साहनी की थी। फिल्म निर्गाण के दौरान गानों के रचयिता और निर्देशक में काफी मतभेद रहा। मानते गुरूदत्त भी थे-’गीत फिल्म के भावनात्मक विकास में गम्भीर हानि पहुँचाते हैं, चाहे उनका साहित्यिक भाव कितना भी अच्छा हो और संगीत कितना भी रमणीय हो। मगर साथ में वे यह भी मानते थे कि ’गीत-संगीत भारतीयों के दैनन्दिन जीवन का अनिवार्य अंग हैं। अतः बहुत सारी फिल्मों के गाने हटा देना मुमकिन नहीं है। क्योंकि दर्शक भी मूलतः संगीत का चाहने वाला होता है। जाल में गुरूदत्त ने भरपूर गीत रखे और इन्हीं गीतों ने साहिर को इस लाइन में स्थापित कर दिया।
बाजी और जाल के गीतों ने धूम मचा दी। ’तदबीर से बिगडी हुई तकदीर बना ले, अपने पे भरोसा है तो फिर दाव लगा ले।‘ साहिर और एस.डी. बर्मन की जोडी ने देवानन्द स्टाइल के गीत चुन-चुनकर दिए। जाल का ये रात चाँदनी फिर कहाँ, टैक्सी ड्राइवर का ’जायें तो जायें कहाँ, हाउस नम्बर ४४ का ’तेरी दुनिया में जीने से बेहतर है, मुनीम जी का ’जीवन के सफर में राही‘, हमदोनों का ’मैं जन्दगी का साथ निभाता चला गया ‘। शम्मी कपूर की याहू शैली का श्रेय भी साहिर के गीतों को जाता है। ’यूं तो हमने लाख हसीं देखे हैं, तुम सा नहीं देखा‘। वहीदा का सौन्दर्य साहिर के गीतों में खिल-खिल पडता है। मुझे जीने दो का ’नदी नारे न जाओ श्याम पैयां पडूँ, रात भी है कुछ भीगी-भीगी, चाँद भी है कुछ मद्धम-मद्धम‘। प्यासा की गुलाबो (वहीदा रहमान) सीढी चढती है, मादम मिलन की मधुर पुलक से भरी हुई। लगता है स्वयं कविता ही साकार हो गयी हो। पृष्ठभूमि का भजन ’मेरी बाँह पकड लो मैं हूँ जनम जनम की दासी‘ इश्के मजाजी और इश्के इलाही का खूबसूरत संगम है। पर इसके साथ ही साहिर और सचिन की जोडी भी समाप्त हुई। दोनों ने फिर कभी एक संग काम नहीं किया।
साहिर बौद्धिक रूप से माक्र्सवाद के प्रति प्रतिबद्ध थे, पर संवेदना के स्तर पर रोमांटिक थे। उनके गानों में उनके इसी समन्वित जीवन-दर्शन का नजारा मिलता है। एक ओर भजन है ’मन रे तू काहे न धीर धरे, (चित्रालेखा), दूसरी ओर ’ये महलों ये तख्तों की दुनिया (प्यासा) है। बार-बार हुए इश्क और फिर उसमें बार-बार मिली नाकामयाबी ने उनसे इतने दर्द भरे, दिलकश नग्में लिखवाये।’क्या मिलिये ऐसे लोगों से जिनको फितरत छुपी रहे‘ और यह ’ जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला, हमने तो कलियां मांगी थीं कांटों का हार मिला।‘ शर्मिला, राजेश खन्ना और राखी की फिल्म दाग के इस गीत को किशोर कुमार ने गाया, मगर यह सच्चाई थी साहिर के जीवन की। हाँ, उन्हें पंजाब की प्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम से प्यार हुआ था और गायिका सुधा मल्होत्राा से भी। पर ये मुहब्बतें भी परवान न चढ सकीं। वे इस मामले में काफी नाकामयाब और मायूस रहे। दोनों के पिताओं को साहिर का दूसरे धर्म का होने पर उतना एतराज नहीं था, जितना उनके नास्तिक होने पर। साहिर ने इन अनुभवों को गीतों में ढाला। ’नफरतों के जहाँ में हमको प्यार की बस्तियाँ बसानी हैं ‘। नया रास्ता बनाने की उन्होंने बार-बार कोशिश की। साहिर और गुरूदत्त में यह एक समानता थी। वे हालात से लड न सके। उन्होंने खुद को हालात के हवाले कर दिया और होम हो गये। साहिर ने अपना और गुरूदत्त का मर्सिया बहुत पहले ही अपने एक गीत में लिख दिया था-’हालात से लडना मुश्किल था, हालात से रिश्ता जोड लिया, जिस रात की कोई सुब्ह नहीं, उस रात से रिश्ता जोड लिया। ‘
गीतकार जिसका हृदय दूसरों के लिए खून के आँसू रोता था, अपना ख्याल न रखता था। वे चेन स्मोकर थे। हर फिक्र को धुंएं में उडाते चले गये। पर क्या सच में कोई फिक्र को धुंएं म उडा सकता है? अमृता प्रीतम भी उनके प्यार में पागल थीं। इसका जक्र उनकी आत्मकथात्मक रचना ’रसीदी टिकट‘ में मिलता है। एक बार एक प्रेसकांफे्रंस के दौरान उन्होंने कागज पर सैकडों बार साहिर का नाम लिख डाला। अजीब था दोनों का प्यार, मिलते थे पर बात न करते, ’जाने क्या तू ने कही, जाने क्या मैंने सुनी,‘ साहिर सिगरेट पीते जाते, उनके जाने के बाद अमृता अधजली सिगरेट के टुकडों को जलाकर पीतीं।बडा गहरा था दोनों का प्यार। मगर मिलन न हुआ। धुएं में उडता रहा। साहिर ने लिखा-’दूर रहना कोई कमाल नहीं, पास आओ तो कोई बात बने‘। पर बात बनी नहीं। प्यार दोनों ओर था। अमृता की कोख में बच्चा आया तो उनके मन में इच्छा जागी। अगर मैं साहिर के चेहरे का हर समय ध्यान करूँ तो मेरे बच्चे की सूरत उससे मिल जायेगी....‘ और वे लिखती हैं-’दीवानगी के इस आलम में जब ३ जुलाई १९४७ को बच्चे का जन्म हुआ, पहली बार उसका मुंह देखा, अपने ईश्वर होने का यकीन हो गया। और बच्चे के पनपते हुए मुंह के साथ यह कल्पना भी पनपती रही कि उसकी सूरत सचमुच साहिर से मिलती है, और जब अमृता ने यह बात साहिर को सुनाई तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा, ’वेरी पूअर टेस्ट!‘ अमृता लिखती हैं-साहिर को जिन्दगी का एक सबसे बडा कॉम्प्लैक्स है कि वह सुन्दर नहीं है। इसी कारण उसने मेरे पूअर टेस्ट की बात कही। इन दोनों का प्यार इतना ईमानदार और पाक था। जब इसी बच्चे ने करीब तेरह साल की उम्र में अमृता से पूछा ’ममा! क्या मैं साहिर अंकल का बेटा हूँ?‘ माँ के न कहने पर उसने कहा, अगर हूँ तो बता दो! मुझे साहिर अंकल अच्छे लगते हैं। माँ का जवाब था, हाँ, बेटे मुझे भी अच्छे लगते हैं। पर यह अगर सच होता तो मैंने तुम्हें जरूर बता दिया होता।‘ आगे वे लिखती हैं-सच का अपना एक बल होता है, सो मेरे बच्चे को यकीन आ गया। अमृता की कल्पना का सच छोटा नहीं था। पर यह केवल उनके अपने लिए था। वे अपनी जीवनी रसीदी टिकट में लिखती हैं-’वह (कल्पना का सच) केवल मरे लिए था...इतना सच कि वह सच साहिर के लिए भी नहीं।‘ कितनों के नसीब में होता है ऐसा प्यार। ये प्यार ऐसा था कि जब कभी अमृता ’एक बार उसके हाथ को छूना चाहती थीं, पर उनके सामने उनके ही संस्कारों की एक वह दूरी थी जो तय नही होती थी...‘ आज के बदले हुए माहौल में बदले हुए समाज और संस्कारों में इस बात को समझना और पचा पाना आसान नहीं है। गुरूदत्त की भंाति ही साहिर में भी कहीं गहरी मुमूर्षा थी? लडने का माद्दा न था, विपरीत परिथितियों में तैरकर निकलने की फितरत न थी।
’जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं‘ प्रदीप कुमार बीना राय की जोडी पर फिल्माया ताजमहल (१९६३) का गीत हिट हुआ और साहिर को गीतकार के रूप में पहली बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। साहिर के गीत और रफी की आवाज ने हिन्दी सिनेमा को कई अनमोल गाने दिये।
’नग्मओ शेर की बारात किसे पेश करूँ?‘ जो एक बेहतरीन गजल है। भारतभूषण का बरसात की रात का गाना ’मैंने शायद तुझे पहले भी कहीं देखा है‘। बरसात की रात का टाइटिल संग-’जन्दगी भर नहीं भूलेगी ये बरसात की रात‘ रफी ने इसे राग यमन में गाया और फिल्म इज्जत का ’क्या मिलिये ऐसे लोगों से जिनकी फतरत छुपी रहे‘ साहिर के बोल और रफी के गले का कमाल है।
प्यासा क्लाइमेक्स है। प्यासा के बाद साहिर ने जयदेव, एन. दत्त, रौशन, खैय्याम, आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत, प्यारेलाल के साथ जोडी बनायी। ओ.पी. नय्यर को नया दौर से शोहरत मिली। आशा भोसले के गाये ’मांग के साथ तुम्हारा, मैंने मांग लिया संसार‘ के बोल साहिर के थे। आशा की ही आवाज में वक्त का गाना ’आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने न तू‘ एक मिसाल है,क्षणवाद का इससे सुन्दर नमूना शायद ही मिले।
१९३१ म सवाक फिल्म आलमआरा के साथ हिन्दी सिने गीतों की शुरूआत हो गयी थी। इंद्रसभा में ७१ गाने थे। पूरी फिल्म पद्यात्मक थी। फिर भी फिल्मी गीत को लोग साहित्य के अन्तर्गत नहीं मानते। उसे हाशिए पर रखने में भी हिचकिचाते हैं पर क्या वास्तव में ऐसा है? संगीतकार सलिल चौधरी ने बहुत पहले कहा था-हिन्दी फिल्म गीतों की दुनिया बहुत बडी है। इसे सबकल्चर कहकर आप नकार नहीं सकते हैं। प्रसिद्ध संगीतकार सी. रामचन्द्रन का मानना था कि फिल्म संगीत में गीतकार का स्थान प्रथम होता है। फिल्म संगीत में गीतकार के शब्द बडा महत्व रखते हैं। शब्द अच्छे हों तो संगीतकार बढया धुन बना सकता है सी. रामचन्द्र के अनुसार संगीतकार दूसरे नम्बर पर आता है और फिर इसके बाद तीसरे नम्बर पर गायक गायिका आते हैं। उन्हें तो बस गीतकार के शब्द और संगीतकार की धुन गानी होती है। शब्द और धुन बढया हो तो गाना भी बढया हो जाता है। साहिर धुन बनाने के वक्त खूब तन्मय होकर संगीतकार के साथ काम करते थे। एक-एक धुन पर खूब मेहनत करते और करवाते थे। कोई आश्चर्य नहीं कि उनके गीतों में शब्द के साथ-साथ ट्यून भी इतनी बढया हुआ करती थी। हिन्दी फिल्म के गाने उसकी जान होते हैं। उसकी आत्मा होते हैं। गीतों के द्वारा सिचुएशन क्रियेट की जाती है। कहानी आगे बढती है।
अभी कुछ दशकों पहले तक फिल्में मात्रा सिनेमाघरों तक ही सीमित होती थीं। तब गानों का आकर्षण कुछ और ही हुआ करता था। गाने एकाध बार देखे जाते थे पर सुने हजारों बार जाते थे। हजारों बार गाए-गुनगुनाए जाते थे। लोग अपना काम करते हुए रेडियो, रिकार्ड्स पर अपने मनपसन्द गीत सुना करते थे। उनपर झूमा करते थे। उनके तार गानों से जुडे रहते थे। रेडियो पर फरमाइशी गीत, बिनाका का बेसब्री से इंतजार करते थे। अपनी पसन्द का गाना कान में पडते ही समस्त इंदि्रयां, समस्त चेतनाश्रवणेन्दि्रयों में सिमट आती थीं। कहना मुश्किल है आज गानों की लोकप्रियता बढी है या घटी है। टी.वी. के तकरीबन सारे प्रोग्राम फिल्म और फिल्मी गीतों पर आधारित होते हैं। हाँ एक बात और जरूर है पहले के अधिकांश गीत कर्णप्रिय हुआ करते थे। कानफाडू गानों का इतना चलन नहीं था। शब्दों के चुनाव का खास ध्यान रखा जाता था। कहीं की ईंट कहीं का रोडा लगाकर गाने नहीं बनते थे।
१९५० से १९८० तक का समय हिन्दी फिल्म-गीत की दृष्टि से स्वर्णकाल कहा जा सकता है , यही समय था जब कैफी आजमी, आनन्द बक्षी, नीरज, हसरत के साथ साहिर भी गीत लिख रहे थे। धूल का फूल, गुमराह, बहू बेगम, हमराज, सीमा, सुजाता, आ गले लग जा से लेकर १९७६ में बनी कभी कभी फिल्म तक के गीतों को मात्रा फिल्मी गीत कहकर दर किनार नहीं किया जा सकता है। कभी कभी के गीत ’मैं एक पल का शायर हूँ, मैं पल दो पल का