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हर हकीकत दबाई जाती है
जब सफाई दिखाई जाती है
झूठ को सच करार देने को
सरपरस्ती निभाई जाती है
आग लगती नहीं है उड उडकर
आग प्यारे लगाई जाती है
आने वाले खुदा का रस्ता साफ
हर निशानी मिटाई जाती है
सुन उसूलों की जंदगी तेरी
रोज खिल्ली उडाई जाती है
बाप तक से मियाँ सियासत में
सांस अपनी छिपाई जाती है
देवता शाद, देवियाँ आबाद
भेंट क्या-क्या चढाई जाती है
2
ये सेहरा झूठ तेरे सर रहा है
मेरा सच रफ्ता-रफ्ता मर रहा है
ये सच, सच पे परे का सच नहीं है
ये दम कानून हरदम भर रहा है
अगर वह आइने का बाप है तो
पुराने पाप से क्यों डर रहा है?
मुझे आगाह करती है हुकूमत
अरे, मुँहजोर, यह क्या कर रहा है?
है नगमा एक भुतहे खण्डहर का
कभी यह रौशनी का घर रहा है
सफाई पेश करती है सचाई
जमाना आज भी शक कर रहा है
निहायत अजनबी लगता है घर में
ये दिल बरसों-बरस बाहर रहा है
3
जलते हुए शहर की कोई कैफयत नहीं
वहशत के देवता की कोई शख्सयत नहीं
हर लम्हा दिल के ख्ाून में डूबी निगाह में
बहते हुए लहू की कोई अहमियत नहीं
वह कत्ले-आम था कि महज इन्तकाम था
ख्ाबरों के पार सच की बहुत हैसियत नहीं
अम्नो-अमन के ढोल का हुल्लड है दूर-दूर
असली अमन की घर में कडी खैरियत नहीं
बेशक शहीद हो गया एहसान-जाफरी
रोई खुदा के नाम पर इन्सानियत नहीं
क्या चमचमा रहा है शराफत का हर बयान
जिसकी सचाइयों में कहीं असलियत नहीं?
क्यों शाइरी से नींद सियासत की हो हराम
शायर के ख्वाब में तो कोई सल्तनत नहीं
दिन-रात की गरज के तकाजे का मैं गुलाम
मेरा वजूद भी तो मेरी मिल्कियत नहीं
तारीक-शब में जलती हुई अपनी रूह से
हैरान हूँ कि मेरी कोई वाक्फयत नहीं
ई-७/२२, चार इमली, भोपाल-४६२०१६
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