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Vartmaan Sahitya ::October, 2006 Sponsered by : Decor Home, Bikaner ये बरेली है शेख साहिब
सुधीर विद्यार्थी
सुना है कि एक बार बरेली के बाजार में किसी सुंदरी का झुमका गिरा तो उसे तलाश करने के लिए हिन्दुस्तान भर से लोग आये। वह झुमका किसी को मिला तो नहीं, पर लोग बरेली के बाजार की चमक-दमक में ऐसे रमे कि अपना होश ही खो बैठे। कुछ लोग ’’सोने की सींक‘‘ से ’’हाशिम का सुरमा‘‘ आँखों में भर कर उस झुमके को खोजने में लग गए। लेकिन झुमके को तो नहीं मिलना था सो नहीं मिला। सोचता हूँ कि वह सुंदरी कैसी रही होगी जिसे बरेली के बाजार में इस बात का होश ही नहीं रहा कि झुमका कब और कहाँ गिरा। यह जरूर पता लगता है कि वह झुमका ’’हम दोनों की तकरार‘‘ में गिरा था। यह तकरार प्यार भरी भी हो सकती है और भरे बाजार में मियाँ की जेब खाली होने पर भी।
अगर आप बरेली के भीड भरे बाजार में सुंदरी के उस झुमके को तलाश करने जायें तो कचहरी के निकट थोडा ठहरिए। यही वह जगह है जहाँ एक दिन हिन्दी के सुपरिचित व्यंग्यकार रवीन्द्रनाथ त्यागी ’’श्री निरंकारदेव सेवक एडवोकेट‘‘ को काले कोट से लैस समझकर मुवक्किलों के बीच ढूंढते आ गये तो उन्हें निराश होना पडा। सेवक जी का घर कचहरी से सौ कदम पर जिला जेल के पास ही है जहाँ कभी साहित्यकारों की महफलें जुडा करती थीं। हरिवंशराय बच्चन उनके बहुत करीबी दोस्त थे। बच्चन जी ने एक समय इसी बरेली शहर में रहने का विचार बना लिया था। सेवक जी बालसाहित्यकार थे लेकिन वे एम.एन. राय के विचारों के सशक्त पक्षधर थे। ’’तीसरी इन्टरनेशनल‘‘ से जुडे रहे राय जब कम्युनिज्म के रास्ते से हटे तो इस शहर में कांग्रेस के एक अधिवेशन में उन्हें कांग्रेस का सदस्य बनाया गया था।
वैसे यह शहर राधेश्याम कथावाचक का है जिनकी ’’राधेश्याम रामायण‘‘ के साथ ही ’’तर्ज राधेश्याम‘‘ ने एक समय उत्तर भारत की शहरी और देहाती जनता को अपने में गहरे तक बाँध लिया था। पारसी थियेटर से जुडे रहे राधेश्याम कथावाचक ने रामायण के अलावा अपनी आत्मकथा भी लिखी, इसे कम लोग जानते है।। बरेली के ही एक उर्दू शायर ’बेताब बरेलवी‘ यानी जागेश्वरनाथ वर्मा ऐडवोकेट ने भी उर्दू रामायण की रचना की। उन्होंने एक बंगाली उपन्यास का हिन्दी अनुवाद भी किया था और ’’हिन्दुस्तान के चितेरे‘‘ किताब भी उर्दू में लिखी थी। पं. राधेश्याम कथावाचक के रामायण लिखे जाने के पूर्व उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध में बरेली की एक ’’आल्हखण्ड रामायण‘‘ (सती खण्ड) बहुत प्रसिद्ध थी जिसके रचयिता नारायण प्रसाद मुकुन्दराम थे। इसे बंबई टाइम्स में १८९८ में छपवाया गया था। पुस्तक के दोहों में उनकी दुकान का भी परिचय दिया गया है-
नारायण प्रसाद अरु राम मुकुंद सुनामा
प्रथम पुस्तकालय है बांस बरेली धामाड्ड
बरेली के कथावाचक कालीन कवियों में पं. गंगासहाय पाराशरी ’’कमल‘‘ भी हुए थे जिनकी कविताएं, कहानियां और लेख ’’माधुरी‘‘ तथा-’’सुधा‘‘ मासिक में प्रकाशित होते थे। बरेली में एक लेखक श्यामनारायण बैजल भी हुए थे जो मदारी गेट से ’एकांत‘ पत्रिाका निकालते थे। पुराने कवियों का लेखा-जोखा अब कौन करे या कौन बताये कि शायर मदनलाल -दाना‘ ने सम्पूर्ण बिहारी सतसई को उर्दू शेरों में बडे करीने से अनुवादित किया था और ’भ्रमर‘ पत्रिाका में यह अनुवाद धारावाहिक प्रकाशित होता था। इस शहर के उर्दू शायरों में एक किशनलाल ’साकब बरेलवी‘ भी थे। इन दिनों भाई नसीम बरेलवी का नाम दूर तक जाना जाता था। वे समन्दर पार भी कविताएं पढ आये हैं। गाते ऐसा हैं कि कविता का दुश्मन तक रीझ जाये और गलबहियां डाल दे। हिन्दी गीतकारों में मंच पर आपने किशन सरोज को सुना होगा। उन्होंने भी इस शहर को पहचान दी। हिन्दी की आधुनिक कविता के क्षेत्रा में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वीरेन डंगवाल और वंदना देवेन्द्र सुपरिचित हैं। वंदना एक समर्थ चित्राकार भी हैं। हिन्दी साहित्यकारों की चर्चा आई तो सुकेश साहनी का भी उल्लेख करना जरूरी है जिन्होंने कथाकार के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई। वे इस शहर से जनसुलभ पेपरबैक्स के नाम से हिन्दी साहित्य का अनोखा प्रकाशन चला रहे हैं जहां अल्प मूल्य पर पाठकों के लिए विशिष्ट कृतिय उपलब्ध होती हैं। हिन्दी समीक्षा के क्षेत्रा में एक बडा और सम्माननीय नाम मधुरेश का है जो बदायूँ में अपने प्राध्यापकी पशे से सेवानिवृत्त होकर अब पूरा समय साहित्य को दे रहे हैं। वे अत्यंत विनम्र और गैरविवादित आलोचक के रूप में हिन्दी जाने जाते हैं। कथाकार/कवि प्रियदर्शन मालवीय भी विगत कई वर्षों से इस महानगर में हैं। उर्दू में शेर करने का बहुत खूबसूरत ढंग धर्मपाल गुप्त ’शलभ‘ के पास भी है , पर आजकल वे विचार की दुनिया में हस्तक्षेप करते हुए निरन्तर लेखनरत हैं। उर्दू लिटरेचर और इस्लामी तहजीब के वे बहुत अच्छे जानकार हैं। यह दर्ज है कि प्रख्यात व्यंग्य लेखक के. पी. सक्सेना बरेली की ही पैदावार हैं। पर वे लखनऊ के होकर रह गये। उन्ह देखकर कभी-कभी सोचता हूँ कि उनसे कहूँ-यार के.पी., तुम्हारी मूंछ का कट बरेली का है या लखनऊ का। ये दोनों शहर तो जमाने के साथ तेजी से बदल रहे हैं पर तुम्हारी मूंछ जो है न, वह बहुत पुराने फैशन की लगती है। भई, बदलो इसे ताकि कोई यह न कह सके कि बरेली का के.पी. मूंछ के मामले में बडा बैकवर्ड है।
बरेली में लिखने वाले तो बहुत हैं-गोपाल विनोदी हैं जो कभी ’जय रोटी‘ का उद्घोष किया करते थे। महाश्वेता चतुर्वेदी हैं। भगवानशरण भारद्वाज ने कुछ दिन यहाँ से ’पाँचाल स्वर‘ और ’युवा मन‘ का संपादन व प्रकाशन किया था। दुनिया में जब कहीं वफा नहीं थी तो बरेली की जमीन पर ’वफा‘ के दर्शन हो जाया करते थे। ’वफा‘ यानी रघुनाथ सहाय ’वफा‘। पर अब वे नहीं हैं। जिस समझदारी और गहराई से वे शेर कहते थे वह देखते ही बनता था। हिन्दी एकांकी के जनक भुवनेश्वर की अनेक स्मृतियों को अपने सीने में छिपाये ’वफा‘ की रचनाओं में माटी की गंध थी। नये लेखकों में अंशुमाली रस्तोगी का नाम चमककर सामने आता है जो हिन्दी साहित्य के हलचल भरे संसार से जुडने के लिए प्रयत्नशील हैं।
यहाँ नाम गिनाना हमारा उद्देश्य नहीं। इसलिए आइये इस शहर के इतिहास में थोडा झांकने की कोशिश करें। इस शहर की स्थापना का समय सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध का है। कहा जाता है कि जगत सिंह कठेरिया ने जगतपुर नाम का गाँव बसाया जो आज जगतपुर मुहल्ले के नाम से जाना जाता है। जगतसिंह के दो बेटे थे-बासदेव और बरलदेव। उन्हीं के नाम पर शहर का नाम बास बरेली पडा। अकबर के शासनकाल में कठेरिया राजपूतों ने विद्रोह किया मगर वह नाकाम कर दिया गया जिसमें बास देव मारे गये और यहाँ मुगलों का राज्य कायम हो गया। फिर यहाँ अफगानों की तादाद बढती रही। सन् १६५७ में बरेली के फौजदार मकरंद राय के समय में शहर का तेजी से विकास हुआ। उन्होंने मुहल्ला मकरंदपुर, बिहारीपुर, मलूकपुर और काजी टोला बसाये। किला भी बनवाया जहाँ आज थाना किला है।
रोह से आये रूहेलों के कारण इस इलाके को रूहेलखण्ड कहा गया। अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अंग्रेजों की मदद से रुहेला सरदार हफीज रहमत खाँ का १७७४ में कत्ल किया। फिर यह क्षेत्रा नवाब अवध के कब्जे से निकलकर अंग्रेजों के हाथ में चला गया। मेरठ में जब सत्तावनी क्रांति की शुरुआत हुई तो खान बहादुर खाँ ने यहां अपनी हुकूमत कायम की और शोभाराम को दीवान बनाया। स्वतंत्राता संग्राम के दिनों में गांधी जी यहां दो बार आये। १९३६ में आचार्य नरेन्द्रदेव की अध्यक्षता में बरेली में कांग्रेस की कांफे्रन्स हुई जिसमें जवाहरलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टण्डन और रफी अहमद किद्वई पधारे। बरेली का केन्द्रीय कारागार स्वतंत्राता आन्दोलन के बडे सेनानियों और शीर्षस्थ क्रान्तिकारियों का केन्द्र बना। काकोरी काण्ड के क्रान्तिकारियों ने यहीं की जेल में रहकर अपनी मांगों के लिए लग्बी ऐतिहासिक भूख हडताल की जिसकी तब देश भर में चर्चा हुई। यहां के एक बडे क्रान्तिकारी दामोदर स्वरूप सेठ हुए। कचहरी के निकट एक पार्क में जब उनकी आवक्ष प्रतिमा लग गयी है, पर इस शहर के निवासी उनके मकान की खोजबीन नहीं कर सके। सेठ जी १९१२ के प्रसिद्ध ’बनारस षडयन्त्रा केस‘ में भी थे। १९१५ में उन्हें बरेली छावनी में विद्रोह कराने की बडी जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। वे १९२५ के काकोरी काण्ड में भी पकडे गये लेकिन बहुत बीमार पडने के कारण छोड दिये गये। उनकी लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि १९३० में इस शहर की सडकों पर एक नार गूंजता था-’’बांस बरेली का सरदार, सेठ दामोदर जन्दाबाद।‘ देश स्वतंत्रा हुआ तो सेठ जी को संविधान निर्मात्राी परिषद् का सदस्य बनाया गया, लेकिन संविधान का जो प्रारूप तैयार हुआ उस पर उन्होंने यह कह कर दस्तखत करने से मना कर दिया कि वे उसे समाजवादी नहीं मानते। सुना था कि अपने अंतिम दिनों में किसी के कहने पर सेठ जी ने अपनी आत्मकथा भी लिखी पर लखनऊ की गोमती नदी में आई बाढ में जब मोती महल जलमग्न हो गया तो वह उसमें नष्ट हो गयी। पूर्व प्रधानमंत्राी चन्द्रशेखर ने अपनी आपातकाल की जेल डायरी में कहीं सेठ जी की चर्चा की है। पं. कमलापति त्रिापाठी ने भी अपनी आत्मकथा म उन्ह स्मरण करके सम्मान प्रदान किया। काकोरी केस में वे और राजेन्द्र लाहिडी दो ही ऐसे क्रान्तिकारी थे जो जेल से अदालत जाते समय ’भारतीय प्रजातंत्रा की जय‘ के नारे लगाया करते थे। सेठ जी की प्रगतिशीलता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है।
ये जो पुरानी कोतवाली है यहीं खान बहादुर खां को ५ फरवरी १८६० को फांसी पर लटकाया गया था। उनकी कब्र जिला जेल में है जिसे अब १६४ साल बाद आजादी नसीब हुई। कमिश्नरी का ऐतिहासिक पेड इस बात का गवाह है कि सत्तावनी क्रान्ति में अनगिनत लोग फांसी पर लटकाये गये थे। इसलामियां मार्केट के सामने नौमहले की कब्रें गदर की याद ताजा करती हैं। १८५७ के युद्ध में ही बरेली कालेज के अध्यापक कुतुबशाह को भी देशनिकाला हुआ जो ख्ाान बहादुर ख्ााँ के प्रकाशक थे। बरेली कालेज के छात्रा रहे क्रान्तिकारी मोहम्मद अली उर्फ जेमिग्रीन का बलिदान भी भूलाने योग्य नहीं है जिसे कानपुर और लखनऊ के बीच फांसी दी गयी थी। एक फौजी अंग्रेज अधिकारी ने फांसी से एक दिन पहले उसकी कैफियत को अपनी डायरी में दर्ज किया था।
बरेली शहर में अंग्रेजों के एक वफादार कोतवाल थे लाला नानकचंद्र, जो ईस्टइंडिया कम्पनी के सहायक थे। सहारनपुर और मेरठ में १८५७ की क्रान्ति को दबाने में उनका बडा हाथ था। कंपनी सरकार ने उन्हें पुरस्कार स्वरूप पुलिस इंस्पेक्टर का पद दिया। इसके बाद बरेली में कोतवाली स्थापित होने पर वे पहले कोतवाल नियुक्त हुए। पर संयोग देखिए कि उनके बेटे मुंशीराम को बरेली में जब स्वामी दयानंद का सान्निध्य मिला तो वे श्रद्धानंद बन गये और स्वामी दयानंद के सच्चे शिष्यों में पहले नम्बर पर उनका शुमार हुआ। विचित्रा कथा है कि जब अपनी वफादारी के चलते नानकचन्द्र बरेली के कमिश्नर एडवर्ड के बहुत विश्वासपात्रा थे तब उन्होंने अपने बेटे को तहसीलदारी दिलाने की सिफारिश की। मुंशीराम को तीन महीने के लिए बरेली का नायब तहसीलदार बना भी दिया गया, लेकिन एक गरीब को सताये जाने की घटना पर वे अंग्रेज कर्नल से भिड गये। मामला तो रफा-दफा हो गया, पर वे नौकरी को लात मार कर अलग हो गये। इसके बाद बरेली में, १२५ वर्ष पहले जब स्वामी दयानंद सरस्वती और पादरी टीजी स्कॉट के बीच तीन दिन का शास्त्राार्थ हुआ तो वे अपने पिता के साथ स्वामी जी से क्या मिले कि उनके जीवन की धारा ही बदल गयी।
साम्प्रदायिक सद्भाव की बडी मिसाल है बरेली शहर। हिन्दू-मुस्लिम एकता की बुनियादें यहां बहुत गहरी हैं। जब यह अवध रियासत थी तो नवाब आसफुद्दौला ने अपनी प्रजा के लिए तुलसी स्थल पर एक शिवालय का निर्माण करवाया था। यह १५५९ की बात है। सेठ फजलुर्रहमान उर्फ चुन्ना मियाँ ने १९६० में श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर बनवाया जिसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने किया था। यह चुन्ना मियाँ के मंदिर के नाम से जाना जाता है।
इस शहर में जगह-जगह मजारें हैं जहाँ हिन्दू और मुसलमान समान भाव से पहुंचकर सिजदा करते और मिन्नतें मांगते हैं। नावल्टी सिनेमा के सामने पहलवान साहब का मजार , जन्नतनशीं हजरत ख्ााँ का मजार है। यह शहर बरेलवी सम्प्रदाय के अनुयायिओं का बडा केन्द्र है जिसे देशभर में जाना जाता है।
बरेली में जब पहले--पहल लडकों का इस्लामियां स्कल बना तो उसके बाद मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने लडकियों की शिक्षा की जरूरत महसूस की। मौलाना अब्दुल वदूद ’दर्द‘ और उनके मित्राों ने १९२८ में इस्लामियां गर्ल्स जू. हा. स्कूल की शुरुआत की। कहा जाता है कि दर्द साहब ने ही मुसलमानों को यहां शिक्षा के लिए जगाया। दर्द साहब की कोठी थी जिसका नाम ’रैन बसेरा‘ था। इसी में स्कूल शुरू हुआ और दर्द साहब उसके पहले मैनेजर हुए। इस स्कूल की पहली हेड मिस्ट्रेस उर्दू की प्रख्यात कथाकार इस्मत चुगतई थीं जो १९५० तक प्रिंसिपल रहीं।
१९७० में मशहूर नक्सलवादी नेता चारु मजूमदार यहां आये थे। शायद अप्रैल का पहला सप्ताह था। वह थोडी देर रूके। उनके साथ दो और लोग भी थे। बाद को वे रामपुर होते हुए काशीपुर चले गये जहां नैनीताल के घने जंगल उनका आश्रय-स्थल बने। इन जंगलों में २८ दिन तक नक्सलवादियों का कैम्प चला था।
बरेली में एक मिशन हॉस्पिटल है और चर्च भी। मूक-बधिर विद्यालय और मानसिक चिकित्सालय भी है। पुराना कुतुबखाना है पर इसके नाम पर किसी समृद्धशाली कुतुब यानी पुस्तकालय का ध्यान नहीं आता। विमको माचिस फैक्टरी और सुविख्यात पशु अनुसंधान केन्द्र भी इस शहर की पहचान है। रबर फैक्ट्री अब बन्द हो गयी है। पहाडों का टर्मिनल सिटी कहा जाने वाला यह शहर आज तेजी से फैल रहा है इसलिए विकसित होते महानगरों की समस्यायें भी यहां तल्खी के साथ मौजूद हैं बडी मिलिटरी छावनी है
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