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बंदूक
डॉ. तारिक छतारी
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शेख सलीमुउद्दीन इशा की नमाज के बाद हवेली के दालान में बैठे हुक्का पी रहे थे। उनका बेटा गुलाम हैदर भी मोंढा खींचकर उनके पास ही आन बैठा।
’’अब्बा हुजूर! इन दिनों फजा ठीक नहीं है। इत्तिलाअ (सूचना) मिली है कि बाजार में कुछ मशकूक (संदिग्ध) चेहरे आपका पीछा करते हैं। वो कस्बे से बाहर के लोग हैं। तेजपाल हलवाई से आफ बारे में पूछगछ कर रहे थे।‘‘
शेख्ा सलीम उसी तरह हुक्का पीते रहे जैसे कुछ सुना ही न हो।
’’इशा की नमाज घर पर ही पढ लिया कीजिए।‘‘
इस वाक्य पर आम हालात में वो बरस पडते लेकिन आज खामोश बैठे रहे। थोडी देर के बाद केवल इतना कहा ’सदर दरवाजा (मुख्य द्वार) बंद कर लो ...।‘
ये कहकर शेख्ा साहब उठे, हुक्के की चिलम उल्टी और अपने बिस्तर पर जाकर लेट गये।
शेख्ा सलीमुद्दीन के मिजाज और अख्ालाक से कस्बे के ही नहीं, पास-पडोस के लोग भी अत्यंत प्रभावित थे। प्रतिष्ठित घराना था। छोटा-बडा हर व्यक्ति उनका आदर करता था। वो सभी के दुख-दर्द में शरीक रहते। किसी को ख्ाबर भी न होती और जरूरतमंदों की आवश्यकताएं पूरी हो जातीं। वो लोगों की तरह-तरह से मदद करते। गरीब लडकियों की शादियां कराते, कारोबार शुरू कराने के लिए पैसों का इंतजाम करते, बच्चों की पढाई के लिए छात्रावृत्ति देते, तात्पर्य यह कि इंसानों के काम आने में उन्हें एक खास तरह के आनंद का एहसास होता। कस्बे में दूसरे प्रभावशाली घराने भी थे। कुंवर माजिद अली ख्ााँ क्या दबदबा था। मिर्जा अकबर अली ख्ााँबात-बात पर बंदूक निकाल लेते। डॉक्टर इब्राहीम पढे-लिखे थे, चिकित्सालय तो चलता नहीं था मगर कस्बे की सियासत में अच्छा ख्ाासा दख्ाल था। ये सब नेमतें तो शेख्ा साहब को प्राप्त थीं नहीं, हाँ एक चीज थी जिससे दूसरे लोग वंचित थे, और वो थी कस्बे के सभी लोगों की मुहब्बत। यही कारण था कि हर वक्त उनकी बैठक में लोग एकत्रा रहते। रमजान के महीने में रोजाना दस-बीस आदमी उनके साथ इफ्तार करते। कुछ लोग तो जगाने के बहाने आकर सहरी भी साथ ही किया करते। मंदिर में कथा हो, पंडित हरप्रसाद सबसे पहले चन्दा उन्हीं से वसूल करते। उनका ख्ायाल था कि अनुष्ठान शेख्ा साहब से हो तो चंदा अधिक मिलता है। रामलीला के लिए घर के सारे तख्त, जाजम और फर्श (दरी) पूरे दस दिन के लिए बडे मंदिर पहुंचा दिये जाते। क्या हिन्दू क्या मुसलमान सभी उनपर जान देते थे और आज उनका अपना खून कह रहा है कि लोग उनकी जान लेना चाहते हैं। पहली बार जब गुलाम हैदर ने ये बात कही थी तो वो चौंक पडे थे लेकिन तुरन्त ही संभल गये और अब तो जैसे वो सुनते ही नहीं हैं। कई रोज से गुलाम हैदर समझाने की कोशिश कर रहा है।
’’अब्बा हुजूर! बंदूक ख्ारीद लीजिए। बस्ती में सभी के पास है। कुंवर माजिद अली खाँ तो आजकल बगैर जरूरत ही बाजार में बंदूक लिये घूमते हैं ताकि लोग देख लें कि इनके पास...। और मिजार् साहब रोजाना शिकार पर जाने लगे हैं। डॉक्टर इब्राहीम ने सय्यद अनवार हुसैन को भी लाइसेंस दिलवा दिया है। मुकर्रम यार ख्ााँ अपने खलिहान पर खुद जाकर सोते हैं और साथ में बंदूक वाले दो पहरेदार भी होते हैं। हर शख्स वक्त के मिजाज को समझ रहा है, बस एक आप हैं कि....‘‘
’’गुलाम हैदर! मेरे पास भी बंदूक है। ‘‘
’’आफ पास?‘‘
’’तुमने अब तक नहीं देखी?‘‘
’’हैरत है!‘‘
’’हैरत तो मुझे तुम पर हो रही है।‘‘
’’लेकिन आपने आज तक कभी चलाई नहीं। आप तो बंदूक पकडना भी....।‘‘
’’ख्ौर छोडो इस बहस को....।‘‘ और दोनों ख्ाामोश हो गये। कई दिनों तक इस विषय पर चर्चा नहीं हुई। लेकिन जब पूरे इलाके में दंगा फैल गया तो शेख्ा सलीमुद्दीन का कस्बा निजामपुर भी इस से प्रभावित हए बगैर न रह सका। हवेली के मुख्य द्वार के मटे-मोटे किवाडों में ताला डाल दिया गया। गुलाम हैदर ने सूचना दी कि ’’हमारे सब लोग बस्ती छोडकर जा रहे हैं। कुंवर माजिद अली खाँ की कोठी जला दी गयी है। मिजार् अकबर अली खाँ को उन्हीं की बंदूक से हलाक (वध) कर दिया गया है। और...और सारा कस्बा ख्ााली हो गया है।‘‘
शेख्ा सलीम ने बहुत मुश्किल से अपने झुके हुए सिर को ऊपर उठाया और ख्ााली-ख्ााली नजरों से गुलाम हैदर का चेहरा घूरने लगे।
’’अब क्या होगा अब्बा हुजूर? हमारा तो कोई सहारा नहीं। न कोई अजीज (स्वजन) है और न रिश्तेदार। पूरे मुहल्ले में हमारा अकेला घर है। आप हैं कि....कहते हैं ’तुमने देखी नहीं‘...है कहाँ जो देखें?‘‘
गुलाम हैदर निरन्तर बोले जा रहा था और शेख्ा सलीम बिल्कुल ख्ाामोश थे। ये ख्ाामोशी किसी गहरे इत्मीनान का नतीजा नहीं थी बल्कि आज उनके चेहरे पर चिंता के चिह्व स्पष्ट थे। पहली बार उनके दाहिने हाथ की शहादत की उंगली में कंपन हुई जैसे ख्ायालों में बंदूक चलाने का अभ्यास कर रहे हों।
अंधेरा होता जा रहा था, सन्नाटा बढता जा रहा था और पूरी हवेली त्राास और भय की चादर में सहमी, सिमटी आसमान पर नजरें गडाये शेख्ा सलीमुद्दीन को कोस रही थी कि अचानक फाटक पर जाेरदार धमाका हुआ। शेख्ा साहब उछल पडे। गुलाम हैदर ने घर की औरतों और बच्चों को सुरक्षित कमरे में बंद कर दिया और खुद जीने पर चढकर पीछे के रास्ते से घर वालों को निकाल ले जाने की राह तलाश करने लगा।
’’मगर जायेंगे कहाँ? जिनके यहाँ जा सकते थे, वो सब तो मारे गये या कूच (प्रस्थान) कर गये।‘‘
’’गुलाम हैदर...गुलाम हैदर....‘‘ शेख्ा साहब ने अपने बेटे को इतनी धीमी आवाज में पुकारा कि गुलाम हैदर तो क्या सुनता, स्वयं शेख्ा साहब भी अपनी आवाज न सुन सके, लेकिन हैरत की बात तो ये है कि काफी दूरी पर होने के बावजूद गुलाम हैदर ने अपने बूढे पिता की आवाज सुन ली और करीब आकर बोला
’’आहिस्ता बोलिये अब्बा हुजूर...हवेली के पिछवाडे कुछ लोग जमा हैं‘‘ गहरी सांस ली और फिर बडबडाने लगा ’’लगता है सुबह होते-होते हम सब इसी हवेली में दफ्न कर दिये जायेंगे। बचने की कोई तद्बीर (उपाय) नहीं।‘‘
’’कोई तद्बीर नहीं तो फिर सदर दरवाजा खोल दो।‘‘
’’जरूर खोल देता अगर इस वक्त घर में बंदूक होती। कोई आपकी तरह भी जन्दगी गुजारता है? इतनी बडी जायदाद और...।‘‘
’’अच्छा हब्स (उमस) बहुत है, औरतों और बच्चों को जिस कमरे में बन्द किया है कम से कम वो तो खोल दो।‘‘
एक और धमाका हुआ, जैसे हवेली की ककइया ईंटों से बनी बरसों पुरानी दीवार गिरा दी गयी हो। सबके दिल धक से रह गये। औरतें मुंह पर दुपट्टे रखकर कांपने लगीं और घुटी-घुटी डरावनी आवाजें निकालने लगीं। शेख्ा सलीमुद्दीन ने महसूस किया कि औरतों वाले कमरे और हवेली के बाहर से आने वाली आवाजों में बडी हद तक समानता है। देर तक ये रहस्यमय आवाजें आती रहीं। उन्होंने अंदाजा लगाया कि जिस तेजी से दीवार गिरने, दरवाजा टूटने और जमीन खोदने की आवाजें आ रही हैं उस हिसाब से तो अब तक हमसब कत्ल करके दफ्न भी कर दिये जाते मगर... उन्होंने खुद को टटोला, गुलाम हैदर को देखा, औरतों की आवाजें सुनीं और गहरी सांस लेकर बोले
’’अल्लाह हिफाजत करने वाला है। अब तो सुबह होने वाली है। गुलाम हैदर मुअज्जन (नमाज को बुलाने के लिए अजान देने वाला) की कोई ख्ाबर मिली?‘‘
’’नहीं। कुछ पता नहीं चला।‘‘
’’ऐसा तो कभी नहीं हुआ‘‘
दोनों थोडी देर चुप बैठे रहे। फिर एक मनहूस आवाज दोनों ने सुनी। इससे पहले ऐसी आवाज अपनी जन्दगी में उन्होंने कभी नहीं सुनी थी। दिल में तीर की तरह चुभने वाली आवाज ’’ये किसी मनहूस परिन्दे की आवाज है‘‘ गुलाम हैदर ने कहा।
’’हाँ मुझे लगता है तुम ठीक कहते हो।‘‘
’’वो देखिये दीवार की मुंडेर पर।‘‘
’’हां वो बैठा है। मार दो‘‘। शेख्ा सलीम ने गुलाम हैदर से कहा।
’’मगर कैसे? क्या हमारे पास.....।‘‘
और फिर शेख्ा सलीमुद्दीन ने गहरी सांस ली ’’कभी सोचा भी नहीं था कि इस हवेली की दीवार पर एक रोज कोई मनहूस परिन्दा भी आ बैठेगा।‘‘
पौ फटने लगी थी, रोशनी फैलती जा रही थी, परिन्दा दीवार पर पूर्ववत् बैठा रहा और जब वो साफ दिखाई देने लगा तो शेख्ा सलीमुद्दीन और गुलाम हैदर ने एक दूसरे की तरफ देखा और नजरें झुका लीं। ये दरअसल उनका पालतू कबूतर था जिसे रात गुलाम हैदर बदहवासी में दर्बे में बंद करना भूल गया था। अब धूप की किरणें आंगन में उतर आयी थीं। मगर मुख्य द्वार का ताला अब तक खुला नहीं था। जब दोपहर होने को आई तो गुलाम हैदर ने कहा ’’आप कहें तो कोई इंतजाम करूं, जरूरी सामान के साथ हम लोग दोपहर में ही निकल चलते हैं। इस तरह और रातें गुजारने की अब हिम्मत नहीं।‘‘
शेख्ा सलीम ख्ाामोश रहे मगर गुलाम हैदर ने सुना कि वो कह रहे हैं ’’हां जल्दी से कोई इंतजाम कर लो।‘‘
सूरज डूब रहा था। सामने हजारों नुकीले पंजों वाला ऊबड-खाबड और टेढा-तिरछा भयानक रास्ता जमीन के सीने से चिमटा पडा था। गुलाम हैदर ने खुद को तसल्ली दी ’’खुदा का लाख-लाख शुक्र है, ख्ातरे से बाहर निकल आये। कोई और सवारी तो मिल नहीं सकी, भला हो रामरतन ऊँटगाडी वाले का कि अपनी शिकरम दे दी। रात होने से पहले ही नजीबगंज पहुंच जायेंगे। नवाब साहब की गढी बहुत मजबूत है। सुबह तक वहीं कयाम (निवास) करेंगे, उसके बाद‘‘
’’उसके बाद?‘‘और दोनों ख्ाामोश हो गये। शेख्ा सलीमुद्दीन ने गाडी पर रखे सामान से टेक लगाई ही थी कि गुलाम हैदर की नजर दाहिनी तरफ से आती भीड पर पडी और वो सहम गया।
’’अब्बा हुजूर...।‘‘
’’हां।‘‘
’’वो देखिये‘‘...
’’हां, कुछ धुआं सा उठ रहा है। शायद किसी के खलिहान में आग लगी है।‘‘
’’नहीं अब्बा हुजूर भीड हमारी तरफ बढ रही है। लगता है हमारी बस्ती के ही लोग हैं। नाला पार करके आये हैं। इसीलिए इतनी जल्दी...।‘‘
’’आहिस्ता बोलो, औरतें घबरा जायेंगी।‘‘
’’लेकिन वो लोग बहुत करीब आ चुके हें‘‘ ये कहकर गुलाम हैदर ने एक लम्बी लोहे की छड सामान से खींच कर हाथ में थाम ली। बेगम साहिबा ने जब ये देखा तो न वो चीख्ाीं और न घबराईं बल्कि इत्मीनान के साथ खिसक कर शेख्ा सलीमुद्दीन के करीब आ गयीं, बस इतना कहा
’’मैं कभी कुछ नहीं बोली, मगर आज....।‘‘
शेख्ा सलीमुद्दीन ने बेगम साहिबा की तरफ देखा और उनकी हैरानी चुप्पी में परिवर्तित हो गयी।
’’अगर आपने गुलाम हैदर की और हम सब की बात मानी होती तो आज...।‘‘
’’हां अब्बा हुजूर, आज अगर हमारे पास बंदूक होती तो ये लोग...।‘‘
’’इत्मीनान रक्खो।‘‘
’’अब भी आप ये कह रहे हैं। जबकि हमारी जानें ही नहीं, इज्जत भी ....।‘‘
’’नहीं गुलाम हैदर...बस अल्लाह को याद करो‘‘ ये कहकर शेख्ा सलीमुद्दीन कुछ पल के लिए चुप हो गये, फिर कुछ सोच कर बोले ’’गुलाम हैदर शायद तुम ठीक कहते हो।‘‘
देखते ही देखते भीड शेख्ा सलीमुद्दीन की गाडी के चारों ओर फैल गयी। शेख साहब ने देखा कि सामने वकील दयानंद कुछ लोगों के साथ खडे हैं।
’’अब्बा हुजूर वकील साहब भी।‘‘
’’ये कैसे हो गया गुलाम हैदर। वकील साहब भी उनके साथ हैं। ठीक तरह देखो, वकील साहब ही हैं?‘‘
ठीक तरह देखने की जरूरत ही नहीं पडी कि वकील दयानंद, सेठ देवीसरन और पंडित हरप्रसाद ने शेख्ा साहब के दोनों बाजू पकड लिये। गुलाम हैदर पिता को बचाने के लिए गाडी से उतरा कि कुछ लोगों ने उसे अपने घेरे में ले लिया और एक व्यक्ति ने ऊँट की नकेल अपने हाथ में थाम ली। गुलाम हैदर ने देखा कि उसके पिता शेख्ा सलीमुद्दीन कस्बे के सम्मानित व्यक्तियों के बीच बेबस और खंडित व्यक्ति के समान इस तरह खडे हैं जैसे खुद को पूरे तौर पर समय के हवाले कर चुके हों। वकील दयानंद ने उनकी बांहें छोड दीं और हाथ जोड कर खडे हो गये ’’शेख साहब ये आप क्या कर रहे हैं?‘‘
सेठ देवीसरन ने झुककर उनके घुटने पर हाथ रख दिया ’’हमारी और बस्ती की इज्जत आफ चरणों में है।‘‘
पंडित हरप्रसाद ने आहिस्ता से कहा ’’चलिये वापस, हम आपको इस तरह नहीं जाने देंगे।‘‘
शेख्ा सलीमुद्दीन ने आंखें बंद कर लीं।
’’अब्बा हुजूर‘‘
चौंक कर आंखें खोली ’’गुलाम हैदर‘‘ वो कुछ कहना चाहते थे लेकिन जबान से एक लफ्ज भी नहीं निकल सका। गुलाम हैदर भी ख्ाामोश था मगर उसकी आवाज जंगलों में, सहराओं में, गारों और वादियों में, मस्जिदों और मंदिरों में, कलीसाओं में, नाले के पार उजडे मकानों में और उसके पिता शेख्ा सलीमुद्दीन के कानों में गूंज रही थी। वह ख्ाामोश था मगर शेख्ा सलीमुद्दीन सुन रहे थे ।
’’हां अब्बा हुजूर मैंने देख लिया।‘‘
’’तुमने देख लिया गुलाम हैदर?‘‘
’’अब्बा हुजूर जिसे मैंने बचपन से अबतक नहीं देखा था, उसे आज देख लिया। आपकी बंदूक को। जो ऐसे वक्त काम आई, जिसने ऐसे मौकेे पर जान बचाई, जब सारी बंदूकें खुद अपने मालिकों को हलाक कर रही हैं। ‘‘
’’गुलाम हैदर चलो।‘‘
किसी ने आहिस्ता से कहा। नकेल थामे शख्स ने रस्सी खींची, ऊँट की गर्दन घूमी, शिकरम के अगले पहिये मुडे और गुलाम हैदर ने देखा कि सामने सीधा और हमवार रास्ता जमीन से गले मिल रहा है।
और फिर सब लोग अपने कस्बे निजामपुर की तरफ चल पडे
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