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प्रेमशंकर रघुवंशी की तीन गद्य कविताएँ

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विषमता की थकान
   
तालियाँ लिए हर मर्तबा जाया करते उनकी सभा
जुलूसों में और हर बार लौट आते खाली तालियाँ
लिए अपने घर।
 
सभा जुलूसों में जितने जोरदार तरीकों से होती
झूठ की स्थापना उतनी ही जोरदार गडगडाती
तालियाँ, तब न तो सुनाई देती, घरों की कराह, न
भीख माँगते, पन्नियाँ बीनते, कबाड ढोते
बच्चों-स्त्रिायों-अपाहिजों की गिडगिडाहट,
न प्यासे खेतों के बारे में आते हैं कोई
विचार ना ही सताती आस पास पसरे
अभावों की चिन्ता।

सदियों से वजन ढोते थके हारे हम लोग
सभाओं जुलूसों में लाये जाते और पिटवाई
जातीं समताल पर तालियाँ हमसे।
  
और युगों युगों से विषमता की थकान लिए
अच्छे दिनों के आगमन की प्रतीक्षा में
आश्वस्त हमलोग-पीटते आ रहे समताल
पर तालियाँ-हर बार।


नफरत का स्याह रंग

पिराना से जब बाबा बदकशाह की दरगाह ने
चिकमंगलूर के बाबा बुडनगिरि की दरगाह शरीफ
से खैरियत जानना चाही, तब सदियों से मनाये
जा रहे दत्तात्रोय जयंती के महोत्सव को पूरा कर
उर्स की तैयारी में जुटी थी वह-जहाँ सूफियाना
मस्ती में खुले थे द्वार, सभी के लिए-
किन्तु फटकने तक नहीं दिया था सुल्तानों को
अपनी सीढयों तक उसने

आज वही दरगाह-वही लोकशाला, धर्मान्धता
की चपेट में है-यह जानकर पिराना की
दरगाह शरीफ भी सिसक उठी, और बोली-
हमने तो मोहब्बत को ही हमेशा, भगवान
माना है, और नफरत, चाहे वह राजगत
रही हो, या धर्मगत, या कि वर्ण-वण्र्ागत, उसे
पनपने ही नहीं दिया कभी-यहाँ तो आमजनों,
गरीबों, मुफलिसों और मुसीबतजदा बन्दों के
दुख दर्द, मुरादें सुनी जाती रही हैं और
सभी की खैरियत की होती रही है बरसात यहाँ
जिसकी बूंदों से छतनार होता रहा प्रेम का
बिरवा, जिसकी जडें भारत की सरजमीं पर
इस कदर गहरी हैं कि पाताल तक छू रही
हैं और छुगनी आसमान तक है, आज इसी पेड
को भारतीय संस्कृति के नाम पर जड से उखाडने
की मुहिम छेडी है जिनने वे मनुष्यता के सामने नंगे
खडे हैं, कौन समझाये इन्ह-
कि मोहब्बत के इस महावृक्ष के मिटते ही, मिट
जायेगा आदमी से आदमी का भरोसा, भाई-चारा
रिश्ते-नाते! काला कर देगा हमारे दामन को
नफरत का स्याह रंग तब अंग भंग समाज के
नागरिक होकर रह जायेंगे हम और हमारी संसद...??


गतराडा

एक शूल की तरह, बचपन से ही गढा है,
’गतराडा‘ शब्द जहन में इस शब्द का-
सर्वाधिक इस्तेमाल, अंग्रेज से ’सर‘ का
खिताब पाये नानाजी करते रहे, जो लगान
वसूलने वाले गाँव के मालगुजार हुआ करते
थे और जिनके हुक्के की आग कभी बुझती
नहीं थी।

हुक्के की चिलम में तम्बाखू या कण्डे की आग
के अनुपात में तनिक भी कमी होती या
कश खींचने वाली नली से गुडगुडाहट की लय
टूटती तो वे जोर से चिल्लाते-’’किस गतराडे ने
भरा है हुक्का‘‘। डाँट सुनते ही
हाथ जोडे भागता आता हीरू, जो गालियाँ
सुनता हुक्के की खिदमत में लग जाता।

तभी मालगुजार को सरकार सरकार कहते बैठक
मे ंआ बैठते लोग और बारी-बारी से हुक्का
गुडगुडाते सरकार की शान में बातें करते, ऐसे
वक्त मैं नानाजी की गोद में जा बैठता और उनसे
’गतराडा‘ का मतलब पूछता, तो वे ठहाके लगाते
देर तक-जिनके साथ ’सरकार सरकार‘ कहते
दरबारी भी निपोरते दाँत, और सरकार के नए
हुक्म की तामील को खडा हीरू देखता रहता
टुकुर टुकुर तब मैं समझता कि जो भरे दरबार
की मसखरी को हीरू खबास की तरह चुपचाप देखता-
सहता रहता है-शायद उसे ही गतराडा कहा जाता है

नानाजी स्वर्गवासी हुए तो मामाजी ने विरासत
की तरह अपना लिया जुबान पर यह शब्द लेकिन
उनके पास न तो मालगुजारी बची थी, न ’सर‘ का
खिताब, ना हीरू, वे तो खेतों के मालिक मात्रा रहे
और कामदारों से दिन रात काम करवाते हुए
बच्चे पैदा करते रहे।

अब मामाजी के बेटे बँटवारे की खातिर आपस
में झगडते हैं और एक दूसरे से भैया न कह
कर गतराडा कहते हैं और बात बात पर
हुक्के -सा मुँह लिए मालगुजारी की दुहाई
देते हैं और हीरू की खुशामद को उतावले रहते
हैं, जिसने अपने हाथों अपनी जमीन का रकबा,
मालगुजारी के हुक्के की चिलम पर अंगारों
पर अंगार रखते हुए, खासा बढा लिया है
इस तरह अपनी कर्मठ संतानों के साथ
उसने, ’गतराडा‘ कहने वालों को खुद ’गतराडा‘
बना दिया है।

अब जो भी जहाँ कहीं निकृष्टता या निकम्मेपन
के विचार से जनता को गुमराह करता है
अथवा अपने पावों चल रहे लोकतंत्रा की राहों
पर रथारूढ होकर तानाशाही हरकतें करता
है, उसे बडे जोर से मेरा मन; ’गतराडा‘
कहने को होता है।

 

 

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