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Vartmaan Sahitya :: October, 2006 Sponsered by : Decor Home, Bikaner |
गजलें
हरिशंकर सक्सेना
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१
रोज जब रात को बर्फीली हवा होती है
लाखों मासूम चिरागों की विदा होती है।
चन्द लमहे भी जिन्हें मिल न सके हँसने को
मौत दिल खोलकर उन पे ही फिदा होती है
क्या वजह उनको मयस्सर नहीं दाना-पानी
जिनको अल्लाह से उम्मीद सिवा होती है
कैस को अब न मिला करती है लैला कोई
काँपते चिथडों से उल्फत भी जुदा होती है
भूख के रोग में मजहब की दवा देते हैं
रहबरे-कौम की क्या खूब दुआ होती है
२
जब कलम-हँसिया-हथौडा एकजुट हो जायेगा
आदमी सीधी कमर करके तभी चल पायेगा
एक अनुशासन अभी है भीड को रोके हुए
अन्यथा जुल्मों-सितम का यह कला ढह जायेगा
हाशिए पर आ चुका है सभ्यता का आचरण
कल यही इतिहास बनकर किस तरह भरमायेगा
तीरगी से लडते-लडते अब तो ऐसा लग रहा
रोशनी की जुस्तजू में ही सफर कट जायेगा।
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