शादी, बच्चे और गुब्बारेवाला
कुछ लोग
छप्पन भोग का
ले रहे होते हैं आस्वाद
तब बच्चे कर रहे
होते हैं डीजे पर डिस्को
या कि कूद रहे होते हैं
हाथी के पेट के भीतर
कुछ छोटे बच्चे
लौटते हैं अपने मां-बाप के साथ
वे लेना चाहते हैं गुब्बारा
पृथ्वी के आकार का
या कि रेलगाडी सा लम्बा
वे उसे पृथ्वी की तरह
आसमान में धकेलते हैं
आ-आ कह याचना करते हैं
लौट आने की।
गुबारे वाला बेच रहा होता है गुब्बारे
आती है याद उसे अपनी माँ की
जो जोह रही होगी बाट
उसके
घर आने की। उसे मां, जली रोटी
और नमक का स्वाद याद आता है।
लेकिन जब तक फूटेंगे नहीं
उसके
तमाम गुबारे
उसकी रोटी
आसमान में टंगी रहेगी
गोल पृथ्वी की तरह।
पितृजन्मा
मां और पिता
पृथ्वी तो नहीं हैं
रहने के लिये सदा
पृथ्वी भी कहते-
नहीं रहेगी एक दिन
मां और पिता भी
नहीं रहते सदा।
पर पिता ने अपने
जीते जी छंवाया था
अशोक का एक वृक्ष
वह उसी के साथ
बढी और पल्लवित हुई।
जब भी वह
आती है यहां
वह लिपट जाती है
फैला अपनी बांहें
कहती यह
पितृजन्मा भाई है मेरा।
प्रतापबंध
तीन पहाड की
तलहटी में बंद
नीला-कच्च
प्रताप-बंध!
सौ-सौ सूरज
चमकते दिनभर इसमें
रात डूब जाता जैसे
ब्रह्यराक्षस होकर कृश काय
तब चांदनी
नाचती है
दौडती हवा
दौडते
काली तुलसी के बिरवा
तेज गंध के साथ
लम्बी छाया लिये
थमें हैं अपनी जगह
धौक और पलाश
तारों की छांह ढले
कालिमा को चीर
आसमान में उभरती हैं
तिरछी
रेखाएं-लाल।
पनडुक्की कूदती हैं
पानी में सूरज के साथ
शुरू होता तब
दिनारंभ का आह्लाद।
संवेदना
कतार में खडा आदमी
न जाने कब
आखिरी हो जाये
बजना ही है नियत समय
हूटर को
उठ लेता है डाक्टर
टावल से हाथ पौंछ
उठ जाये डाक्टर
बैठा नहीं रह सकता मरीज
चलती सांस न जाने कब
रुक जाय
लेकिन
रुक नहीं सकता डाक्टर
समय की तरह
व्यवसायी दिनों में
कहां तलाशें भावनाएं।