KhbarExpresswww.khabarexpress.com

India Yellow Pages - rajb2b.com

Welcome Guest Sign In New user! Sign Up Now
Search Photo  
RSS Wednesday, February 15, 2012



Vartmaan Sahitya ::October, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner

शिकार बादशाह हुसैन रिजवी
More Articles

हसील मुख्यालय से कोई दो किमी. पहले स्थित कस्बे के चौराहे के पास बढनी तक जाने वाली सडक के किनारे चार खम्बों पर टिकी छप्पर की छत, एक बडा सा तख्ात, लम्बी सी बेंच और चन्द लकडी की कुर्सियां, यही है नेताजी का बैठका जो दूर से देखने पर किसी वकील का बैठका लगता है। यहीं से उनकी राजनीति चलती है। सुबह-सवेरे ही तैयार होकर वह घर से निकल पडते हैं और सडक पर पहुँचकर अपने आसन पर जम जाते हैं। कोई न कोई कलायन्ट पहुँच ही जाता है जो जिलेबी, समोसा और चाय से आदर-सत्कार करना अपना परम कर्तव्य समझता है। गांव की जनता उन्हें नेताजी कहती है पर वे स्वयं को सेवक ही कहते हैं।
राजनीति की चस्का उन्हें छात्रा जीवन से ही लग गया था। बी.ए. में पढ रहे थे तभी छात्रा राजनीति में बढ-चढकर हिस्सा लेने लगे थे। पढाई छूटने के बाद भी राजनीति ही उनका ओढना-बिछौना थी। जमाने ने कई बार करवट बदली। राजनीतिक उथल-पुथल में कई नेता पतझड के पत्तों की तरह इधर से उधर हुए, किन्तु जिस राजनीतिक दल का उन्होंने दामन पकडा, आज तक उसी से जुडे हुए हैं। छोटे-बडे, जिला, प्रदेश स्तर के राजनीतिक आन्दोलनों में बढ-चढकर हिस्सा लिया। पीठ पर डण्डे खाये। कई बार जेल भी गये। प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के कई बडे नेताओं तक पहुँच बना रखी थी उन्होंने। भाषण देने में उन्हें कमाल हासिल था। उनका शुमार जिले के अच्छे वक्ताओं में होता था। क्षेत्राीय जनता को उन पर और उन्हें अपनी जनता पर पूरा विश्वास था। क्षेत्रा के विधायक का चुनाव हो या सांसद का, वे अपने दल-बल के साथ जी-जान से जुट जाते। उनकी कर्मठता और सक्रियता देखकर पार्टी ने उन्हें जिला उपाध्यक्ष का पद सौंप रखा था। उनकी नजर अध्यक्ष पद पर थी, विधायकजी का भरपूर समर्थन प्राप्त था, लेकिन यहाँ भी पैसों के नाते वह मात खा गये और एक मुंबईया सेठ के भाई ने यह पद हथिया लिया। नेताजी इससे विचलित नहीं हुये। वह इस बात से सन्तुष्ट थे कि अध्यक्ष का व्यवहार उनके प्रति काफी अच्छा था। विधायक जी हर मामले में उन्हें तरजीह देते रहे हैं। अपना तहसील प्रतिनिधि भी उन्हें नियुक्त कर दिया था। विधायक जी की विशेष अनुकम्पा का ही बल था कि कस्बे में पांच कमरों का मकान बनवाने में वे सफल हो पाये। घर में सभी नगरीय सुविधायें उपलब्ध थीं। घर का खर्च कायदे से चल रहा था, दो लडके इलाहाबाद में पढ रहे थे। वह ऊपर वाले के आभारी थे देर-सवेर से उनका हर काम पूरा हो जाता था कभी कोई काम रुका नहीं।
इधर कई दिनों से नेताजी खोये-खोये से रहने लगे थे। कहीं मन नहीं लग रहा था। कुछ अच्छा नहीं लगता था। विधान सभा के चुनाव परिणामों को लेकर वे बहुत चिंतित और उदास थे।
वैसे तो उनके विधायक जी चुनाव जीत गये थे, किन्तु प्रदेश की सत्ता छिन गयी थी। जनादेश ने सबकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। सत्ता की दावेदार पार्टियों में से किसी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। उनकी पार्टी कैसे तीसरे स्थान पर पहुँच गयी यह गणित समझ में नहीं आ रहा था। तीनों प्रमुख दलों की संख्या में कोई विशेष अन्तर नहीं था। उनके दल के केवल चार और विधायक जीत गये होते तो उनका दल दूसरे स्थान पर होता। सत्ता की लडाई में दोनों बडी पार्टियां एडी-चोटी का जोर लगाये हुये थीं। निर्दलीय विधायकों की संख्या को जोडने के बाद भी कोई दल अपेक्षित आंकडा जुटाने में सफल नहीं हो पा रहा था। तोड-फोड की भी सारी कोशिशें विफल हो चुकी थीं। बिना उनकी पार्टी के समर्थन के सरकार का गठन संभव नहीं था। दोनों बडे दलों में से एक से तो उनकी पार्टी का सैद्धान्तिक विरोध था। उनके साथ जाने का कोई सवाल ही नहीं था। दूसरे दल की शर्तें हाईकमान को मान्य नहीं थीं। ऊहा-पोह की स्थिति में छः सप्ताह बीत गये थे। स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई थी। मीडिया में खबरें आ रही थीं कि राष्ट्रपति शासन के सिवा कोई विकल्प नहीं है। नेताजी इस खबर से बहुत चिंतित थे। इस दौरान वे मुस्तकल विधायक जी से मोबाइल पर सम्फ बनाये हुये थे। विधायक जी ने ही एक दिन बताया था कि दूसरे दल के साथ समझौता होने की प्रबल उम्मीद है। थोडा पार्टी प्रमुखों के इगों का प्रश्न है। वह भी जल्दी हल हो जाने की उम्मीद है।
पर जिस बात को विधायक जी हल्के ढंग से ले रहे थे वह उतनी आसान नहीं थी। बातचीत कई दिनों तक चली और कई चक्र बैठकें हुईं। आखिर काफी विचार-विमर्श के बाद कुछ राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के सक्रिय हस्तक्षेप से मिली-जुली सरकार का गठन संभव हो पाया। तय पाया कि संख्या के आनुपातिक आधार पर दोनों दलों के बीच मंत्राी पद बांट दिया जायेगा। उनकी पार्टी की शर्त थी कि उपमुख्यमंत्राी उनके दल का होगा और गृह मंत्राालय भी उन्हें मिलना चाहिये। पहली मांग पर कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन दूसरी मांग पर थोडी खींचा-तानी चली, अन्ततः उस पर भी रजामन्दी हो गयी। इस तरह कोई दो महीना पूरा होते-होते सरकार का गठन संभव हो पाया। जिस दिन लखनऊ में शपथ ग्रहण हुआ, नेताजी के पांव जमीन पर नहीं पड रहे थे। कई किलो लड्डू बांट दिया। रात में विधायक जी को तहे दिल से बधाई दी और देर तक बातें करते रहे।
मन्त्राी मण्डल के गठन के पहले चक्र में ही अपने विधायक जी के मन्त्राी बनने की प्रबल संभावना थी। लेकिन दुर्भाग्यवश बनते-बनते रह गये। शीघ्र ही मन्त्राी मण्डल के विस्तार की उम्मीद जताई जा रही थी और उसमें कैबिनेट मन्त्राी नहीं तो राज्य मन्त्राी का पद मिलना पक्का था।
इस राजनीतिक अस्थिरता और उथल-पुथल का अपने नेताजी की स्थिति में कोई विशेष अन्तर नहीं था। जरूरत भर का काम वह अपने स्तर पर निपटाने में सक्षम थे। गनीमत था कि उनका दल सत्ता में बराबर का भागीदार था। एक तरह से सत्ता का वजूद उन्हीं के सहयोग पर टिका हुआ था। यही कारण था कि अधिकारियों और बडे व्यवसायियों पर उनकी गिरफ्त बदस्तूर बनी हुई थी। उनकी आर्थिक स्थिति में भी कोई विशेष अन्तर नहीं आया था। उनका अपना कारोबार उसी अन्दाज में चल रहा था। पर इधर लडकी की शादी को लेकर वह काफी चिन्तित थे। अब तक जो कमाया, सब खर्च हो गया। कोई जमा-डिपाजिट नहीं था। रोज कुआं खोदना और पानी निकालना। इसमें जमा-पूंजी का सवाल ही कहाँ। वैसे काम तो अब तक कोई रुका नहीं था, यह भी निकल ही जायेगा। लडके के पिता ने तीन महीने बाद तिथि रख दी है। दो बार किसी न किसी बहाने टलवा चुके हैं। इस बार तो तिथि बदलना संभव नहीं होगा और वह कह भी नहीं सकते थे। उनके पास कुछ अच्छे केस थे जिनमें अच्छी कमाई हो सकती थी और आसानी से वह शादी को निपटा लेते, लेकिन उसमें कुछ अडचने थीं जिन्हें दूर करने के जुगाड में लगे हुये थे। विधायक जी भी लखनऊ में जमे हुए थे। वह यहाँ होते तो कोई जरूर निकाल देते।
नेताजी बडी देर से अपने बैठके में विचार-मग्न मुद्रा में बैठे सिगरेट फूँक रहे थे। विश्वस्त सूत्राों से उन्हें सूचना मिली थी कि कुआं खुद प्यासे के पास आने वाला है। उनके एक बहुत खास आदमी से पता चला था कि जिस विभाग से उन्हें काम कराना था, मन्त्राी जी पांच दिन बाद एक शादी में शिरकत करने आ रहे हैं। इस खबर से उन्हें बडी राहत महसूस हुई। मन्त्राी महोदय उन्हीं की पार्टी के थे। बिना समय गंवाये नेताजी ने जिला अध्यक्ष से सम्फ स्थापित किया और उन्हें बताया कि क्षेत्राीय जनता कस्बे के चौराहे पर उनका स्वागत करना चाहती है केवल पांच मिनट आप दिलवा सकें तो बडी कृपा होगी। अध्यक्ष तत्काल बोले, ’’मन्त्राी महोदय बहुत शार्ट विजट पर आ रहे हैं। बहुत व्यस्त कार्यक्रम है उनका। दो घण्टा तहसील के डाक बंगले में विश्राम करेंगे। फिर पार्टी के जिला पदाधिकारियों की छोटी सी मीटिंग करेंगे। वहाँ तो आप रहेंगे ही, इसकी सूचना तो आपको मिल ही गयी होगी।‘‘ यह बात वह सरासर झूठ बोल रहा था, उन्हें इस कस्म की कोई सूचना नहीं मिली थी, फिर भी प्रतिवाद नहीं किया बस चुप-चाप उनके चेहरे को देखते रहे। अध्यक्ष ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ’’मीटिंग के तुरन्त बाद वह नदी-पार तेनुआ गांव के बाबू साहब की लडकी की शादी में शिरकत के लिये जायेंगे। बाबू साहब उनके पुराने मित्रा हैं, शायद पहले से कोई रिश्तेदारी भी है। रात ही रात वह लखनऊ लौट जायेंगे। कल दस बजे मन्त्राी मण्डल की विशेष बैठक है जिसमें उनका पहुँचना बहुत जरूरी है। जरा भी गुंजाइश होती तो मैं पूरी मदद करता। इससे अच्छी और क्या बात हो सकती थी।‘‘ अध्यक्ष की बातों से उन्हें बडी निराशा हुई। चुपचाप लौट आये। अध्यक्ष के रूखे जवाब और रवैये से वे बहुत क्षुब्ध थे। केवल पांच मिनट की बात थी। साला मीठी छुरी है। मीटिंग की सूचना तक नहीं दी। कैसी ढिठाई से सफेद झूठ बोल रहा था। मसलहतन वह चुप रह गये वर्ना....।
फिलहाल जो सवाल उनके सामने था उसे लेकर बहुत परेशान थे। उनके चेहरे पर चिन्ता की रेखायें गहरी हो गयी थीं। पूरी तहसील में वे चर्चा कर चुके थे कि मन्त्राी महोदय उनके ’किसान कुटीर‘ (अपने बैठके को वे किसान कुटीर कहते थे) म कुछ देर रुक कर जलपान करेंगे। इसी बहाने उन्होंने खासा चन्दा भी जुटाया था। बिना रुके यदि सीधे निकल गये तो बडी फजीहत होगी। कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे। वैसे बहाने तो हजार हो सकते हैं। राजनीति में सब कुछ चलता है। फिर भी उनकी साख को बडा धक्का लगेगा। इसका उन्हें भारी मलाल था।
शाम ढल चुकी थी। अंधेरा गहरा हो रहा था। बैठके में जमा लोग अपने घरों को जा चुके थे। अपनी कुर्सी पर पीठ टिकाये तन्हा बैठे वह सडक पर भागती गाडयों को देख रहे थे या कहीं दूर क्षितिज में, कह पाना मुश्किल था। बडी देर तक वह उसी मुद्रा में बैठे सिगरेट पर सिगरेट फूंकते रहे। ’कुछ तो करना ही होगा‘ वह बुदबुदाये। सहसा एक विचार दिमाग में कौंधा और वह कुर्सी पर तकरीबन उछल पडे। वहाँ उस वक्त कोई मौजूद नहीं था, इसलिए उन्हें खुद अपनी पीठ थपथपानी पडी। इस समय विधायक जी का यहाँ न होना उन्हें बहुत खल रहा था।
लेकिन मौजूदा स्थितियों में विधायक जी का लखनऊ छोडना सम्भव नहीं था। दो-चार दिन में मन्त्राी मण्डल के विस्तार की सूचना थी। जबर्दस्त लाबिंग चल रही थी। उन्होंने हर तरफ से कील कांटा दुरूस्त कर लिया था। इसीलिए वह तमाम गतिविधियों पर सतर्कता पूर्वक नजर गडाये हुये थे। नेताजी जल्द से जल्द अपनी भावी योजना से उन्हें अवगत कराना चाहते थे। अभी तो साढे आठ बजे थे। दस बजे ही फोन करना मुनासिब होगा। बीच का डेढ घण्टा उन्होंने मुश्किल से गुजारा और ठीक दस बजे नेताजी ने अपने मोबाइल पर उनके मोबाइल का नम्बर मिलाया। संयोग से पहली कोशिश में ही सम्फ स्थापित हो गया। उन्होंने विस्तार से पूरी स्थिति और अपनी योजना से उन्हें अवगत कराया। इस ख्ाबर से विधायकजी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। मन्त्राी महोदय हाईकमान के अत्यन्त विश्वसनीय मन्त्राी ही नहीं उनके जबार और जाति-विरादरी के भी थे। अनजाने में नेताजी एक बहुत बडा काम करने जा रहे थे। इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है। उनके चुनाव क्षेत्रा में उनका भव्य स्वागत, वह भी उनकी अनुपस्थिति में। अति उत्तम। इससे बहुत अच्छा सन्देश जायेगा। बडे उपयुक्त समय पर नेताजी बहुत अच्छा काम करने जा रहे हैं। विधायकजी ने उत्साह भरे स्वर में कहा, ’’मेरी ओर से ऐडवांस बधाई। आपका हर प्रोग्राम शानदार होता है। देखिये यह आयोजन भी शानदार होना चाहिए। पैसों की चिन्ता मत करना। मैं हूँ न।‘‘
नेताजी की ओर से हरी झण्डी मिलने पर उनका उत्साह दोगुना हो गया। अपनी पूरी स्कीम उन्होंने अपने चेलों को समझा दी और पूरी ताकत से वे अपने काम पर लग गये। वह स्वयं भी दिन भर भूखे-प्यासे दौडते रहे। रात में भी वह अपने घर नहीं गये। वहीं अपने बैठके में लिट्टी-चोखा बना। सभी ने एक साथ खाया और फिर से काम पर लग गये। देर रात तक वे स्वयं भी अपने गणों के साथ पोस्टर और बैनर लगवाते रहे। उनके सहयोगियों ने रात ही में दो बडे गेट खडे करके बैनरों और रंगीन कपडों से सजा दिया था। ’किसान कुटीर‘ के पास भी एक ऊँचा सा गेट सजकर तैयार था। प्रवेश-द्वार से लेकर इस गेट तक करीब सौ-सवा सौ मीटर तक दोनों तरफ लगी झण्डियां हवा में फडफडा रही थीं। गेट के ऊपर लाल कपडे पर सुनहरे अक्षरों में ’स्वागतम्‘, मन्त्राी जी और हाईकमान के नामों के साथ सुनहरे अक्षरों में ’जन्दाबाद‘ लिखा हुआ था जो दूर से दर्शकों को आकर्षित कर रहा था। गेट के किनारों पर पार्टी के बडे-बडे झण्डे, गेट की शोभा को बढा रहे थे। सडक के दोनों तरफ चूने की छिडकाव और बीच-बीच में गेरु और चूने से अल्पना डिजाइन ने सजावट में चार चाँद लगा दिया था। हर एतबार से इन्तजाम में किसी प्रकार की कमी नहीं थी।
दिन के बारह बजे मन्त्राी महादेय के यहाँ से गुजरने की सूचना थी। सुबह सवेरे से ही ग्रामीण जनता का आना शुरू हो गया था। अनुपमा की चाय की दुकान से चाय का दौर पर दौर चल रहा था। भीड को इकट्ठा करने और रोके रखने के गुर से वह भलीभांति वाकिफ थे, इसीलिये रात ही में उन्होंने माइक का इन्तजाम कर रखा था और सुबह से ही रिकार्डिंग चालू करा दी थी। एक से एक फिल्मी और भोजपुरी गाने, कि कलेजा तर हो जाये। देखते-देखते अच्छी-खासी भीड जुट गयी थी। इनमें बच्चों की संख्या ज्यादा थी जो सब कुछ जिज्ञासा भरी आंखों से देख रही थी। नेताजी भीड को देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। खुशी उनके चेहरे से फूट रही थी।
घडी बारह बजा रही थी। नेताजी मन ही मन में मना रहे थे, इसी वक्त मन्त्राी महोदय की गाडी आ जाती तो मजा आ जाता। मोबाइल पर उनके किसी मित्रा ने जो सूचना दी थी उसके अनुसार उन्हें अब तक यहाँ पहुँच जाना चाहिये था। जैसे-जैसे घडी की सूइयां सरक रही थीं, नेताजी की बेचैनी बढती जा रही थी। जनता को रोके रखना मुश्किल हो रहा था। उन्होंने लोगों को समझाते हुये कहा हमारे कस्बे की ही नहीं पूरे क्षेत्रा की इज्जत का मामला है। मेरी अपनी आबरू का सवाल है। आप लोगों के लिये हर घडी उपस्थित रहता हूँ। थोडी देर की बात है। बस आ ही रहे होंगे। उनकी बात अभी पूरी नहीं हुई थी कि सामने से कारों का काफला आता दिखाई पडाð

Discuss this topic on KhabarExpress Forum 


Post Your Comments to this Article Posting Rules
Name*:
Comment*:
 


October, 2006 <br> Sponsered by : Decor Home, BikanerOctober, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
January, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJanuary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
February, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerFebruary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
March, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMarch, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
April, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerApril, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
May, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMay, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
June, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJune, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 

All right reserved by Khabarexpress.com
Contact Us | Archives | Sitemap | Can't see Hindi ? | News Ticker
Special Edition: Lakshchandi Mahayagya, Camel Festival 2007, Vartmaan Sahitya, Nagar Ek - Nazaare Anek, Bikaner Udyog Craft Mela
Our Network rajb2b.com | khabarexpress.com | uniqueidea.net | PelagianDictionary.com | hindinotes.com
Developed & Designed by Pelagian Softwares