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रोज-रोज अखबारों और पत्र-पत्रिाकाओं के पन्नों पर जहाँ-तहाँ दिखते बाखबर लेखकों और कवियों की विपुल भीड में साहित्य की ऐतिहासिक यात्राा उसके अमिट पडावों और उज्ज्वल अध्यायों का सच भी बेमानी साबित हो चुका है। साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएं भी स्मृति-ध्वंस की शिकार साबित हो रही हैं। अपने को परम्परा का नव्यतम, अद्यतन और अन्यतम आलोचक मानने वालों की बेईमान चुप्पियों से परम्परा, इतिहास ही नहीं, साहित्य की घटित सच्चाइयों का चेहरा भी लज्जित हो उठा है। समकालीन साहित्यिक बिरादरी साहित्य और राजनीति के गहरे और जटिल द्वन्द्व को चित्रिात करने के बजाय खुद साहित्य की राजनीति करने में इतनी मशगूल हो उठी है कि उसे यह दिखाई नहीं पड रहा है कि अकेले प्रेमचन्द, रामचन्द्र शुक्ल या फिर हजारीप्रसाद द्विवेदी से बीसवीं सदी के साहित्य का चेहरा पूरा नहीं होता। वह जैनेन्द्र और महादेवी वर्मा से भी नहीं होता। यदि ऐसा सोचा और किया जाता है तो मतलब साफ है कि हमें सिर्फ अपने देव-विग्रहों से मतलब है। बाकी सब रहें तो रहें या फिर जाएँ भाड चूल्हे में।
कथादेश के नये अंक सितम्बर २००६ के पृष्ठ ९७ पर रवीन्द्रनाथ त्रिापाठी मौजूदा समय को जन्म शताब्दियों का समय मानते हुए यह चिन्ता और आग्रह प्रकट करते हैं कि द्विवेदी जी (हजारी प्रसाद) को शताब्दी वर्ष में कैसे याद करें। उनकी स्मृति इतनी अस्वस्थ है कि १९०६ में वे सिर्फ कथाकार जैनेन्द्र को याद कर पाते हैं और २००६ में उनकी शताब्दी को रेखांकित करते हैं। श्री त्रिापाठी संभवतः यह मान बैठे हैं कि जैनेन्द्र के अलावा २००६ में किसी दूसरे महान हिन्दी लेखक की शताब्दी पडती ही नहीं जबकि अशोक वाजपेयी पूरे साल भर चिल्ला-चिल्लाकर न भी सही तो पुकार-पुकारकर लोगों से कहने की कोशिश करते रहे कि बीसवीं शताब्दी को, खासतौर से १९०६ को बगैर आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, याद नहीं किया जा सकता। आश्चर्य तो यह कि साहित्य अकादमी को याद दिलाने पर भी याद नहीं आ सका कि ये आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी कौन हैं।
इससे भी अचरज का अनुभव इस लेखक को तब हुआ जब हिन्दी आलोचना के कई उपमहारथियों ने अनुत्तरदायित्व भाव से यह कहा कि उन्होंने तो वाजपेयी को पढा ही नहीं है। मजा यह कि इनमें से कई छायावाद के ही आलोचक के रूप में अपनी पहचान बनाते हुए आगे आते हैं। साहित्य और समाजशास्त्रा के अभिन्न संबंधों को साहित्यिक आलोचना की श्रेष्ठ कसौटी मानने वालों ने अगर नहीं पढा और फिर भी वे विश्वविद्यालयों में अपने छात्राों को आलोचना और आलोचक पढा रहे हैं तो स्थिति की विडम्बना समझी जा सकती है। मैं इसे अज्ञान कहूँ या बेईमानी या साहित्यिक छल। साहित्य की पुरोहिती और पण्डागिरी। रवीन्द्र त्रिापाठी लिखते-लिखते यह सच तो लिख ही गए हैं कि ’हर लेखक की जन्मस्थली पर आयोजन संगोष्ठियों में वही बोलते हैं इसलिए किसी लेखक का पुनर्मूल्यांकन नहीं हो पाता।‘ पर उनका यह कहना कि ’द्विवेदी जी हिन्दी के जिन (उन) लेखकों में रहे जिनका उनके जीवनकाल में ही काफी सम्मान रहा।‘ जबकि खुद आचार्य द्विवेदी मरने से पहले के एक निबंध ’महिम को क्षमा नहीं किया गया‘ में लिखते हैं-’देश की दुर्दशा देखते हुए भी मैं कुछ कह नहीं रहा हूं, अर्थात् इस दुर्दशा के लिए जो लोग जिम्मेदार हैं उनकी भर्त्सना नहीं कर रहा हूं। यह एक भयंकर अपराध है। कौरवों की सभा में भीष्म ने द्रौपदी का भयंकर अपमान देखकर भी जिस प्रकार मौन धारण किया था, वैसे ही कुछ मैं और मेरे जैसे कुछ अन्य साहित्यकार चुप्पी साधे हैं। भविष्य इसे उसी तरह क्षमा नहीं करेगा जिस प्रकार भीष्म पितामह को क्षमा नहीं किया गया।‘
इसी निबंध में आचार्य द्विवेदी यह भी लिखते हैं कि- ’आजकल के लोगों को आप जो चाहे कह लें पुराने इतिहासकार इतने गिरे हुए नहीं होंगे कि पूरा इतिहास ही उलट दं। सो इस कल्पना से भी भीष्म की चुप्पी समझ में नही आती। इतना सच जान पडता है कि भीष्म में कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के निर्णय में कहीं कोई कमजोरी थी। वह अचित अवसर पर उचित निर्णय नहीं ले पाते थे। यद्यपि वह जानते बहुत थे, तथापि कुछ निर्णय नहीं ले पाते थे। उन्हें अवतार न मानना ठीक ही हुआ। द्विवेदी जी अपने ’समय‘ में लौटते हैं-’आजकल भी ऐसे विद्वान मिल जायेंगे, जो जानते बहुत हैं, करते कुछ भी नहीं। करने वाला इतिहास निर्माता होता है, सिर्फ सोचते रहने वाला इतिहास के भयंकर रथचक्र के नीचे पिस जाता है। इतिहास का रथ वह हाँकता है, जो सोचता है और सोचे को करता है।‘
द्विवेदी जी को अगर याद ही करना है तो इस सन्दर्भ में याद करना होगा। उन सन्दर्भों में नहीं जिनका जिक्र उन्होंने ’कुटज‘ निबंध में किया है। या फिर उसी निबंध के इन सन्दर्भों में याद करना ठीक होगा-’जीना भी एक कला है। लेकिन कला ही नहीं तपस्या है....दुनिया में त्याग नहीं है, प्रेम नहीं है, परार्थ नहीं है, परमार्थ नहीं है-है केवल प्रचण्ड स्वार्थ....ऐसा सोचना गलत ढंग से सोचना है। स्वार्थ से भी बडी कोई न कोई बात अवश्य है। जिजीविषा से भी प्रचण्ड कोई न कोई शक्ति अवश्य है। द्विवेदी जी प्रश्न उठाते हैं-कुटज क्या केवल जी रहा है... अपनी उन्नति के लिए अफसरों का जूता नहीं चाटता, दूसरों को अवमानित करने के लिए ग्रहों की खुशामद नहीं करता.... दाँत नहीं निपोरता, बगलें नहीं झांकता। जीता है और शान से जीता है-काहे वास्ते, किस उद्देश्य से? कोई नहीं जानता। बाहर की बात है।‘
स्वार्थ का यह दायरा अब काफी बडा सुसंगठित हो चुका है। ’चारु चन्द्र लेख‘-जिसका जक्र रवीन्द्र त्रिापाठी बहुत दुःख के साथ करते हैं कि-’हिन्दी का एक बेहतर उपन्यास आलोचकीय हृदयहीनता और नासमझी का शिकार बन गया। हिन्दी आलोचना ने इस तरह अपने ही हाथों अपने पैरों पर कुल्हाडी मार ली।‘ इसी उपन्यास में द्विवेदी जी सीदी मौला के बहाने से १९६२-६३ में यह कहते हैं-’सब भंड है। यहाँ राजा भंड है, मंत्राी भंड है, फकीर भंड है, रईस भंड है। सब स्वार्थ के चेरे हैं।... दिल्ली में गुलामों का राज्य है। सब के सब चुगलखोर, चरित्राहीन, क्रूर, गँवार।‘ सीदी मौला कहते रहे-’वह भारतीय जनता को दो भागों में बाँटना चाहता है-हिन्दू और मुसलमान। चाहता क्या है, उससे ऐसा ही हो रहा है।‘
यही दिल्ली जो १९६२-६३ की है उसमें दिन-दहाडे बलात्कार करने वाले भी शामिल हो गए हैं, आतंकवादी भी। इसी दिल्ली में प्रबुद्ध और प्रवर लेखकों, आलोचकों, पत्राकारों, मीडिया विशेषज्ञों की बिरादरी भी है और जेसिका लाल की हत्या करने वाले हत्यारे भी। प्रतिरोध जिन लोगों ने किया, वे सब कथित तौर पर गैर-प्रतिरोधवादी थे। युवा पीढी पर जितना असर आमिर खान की फिल्मों का दिखाई दे रहा है उतना उन लेखकों का नही, जो अपने को निराला, नागार्जुन या हजारीप्रसाद द्विवेदी या फिर महान प्रेमचन्द का वंशज मान रहे हैं। इन लोगों ने जिन मूल्यों के लिए संघर्ष किया, इन लेखकों के शताब्दी वर्ष में उन संघर्षों के दर्पण में हमें अपना ’चेहरा‘ भी देखना क्यों नहीं चाहिए?
१९५६-५७ में संभावित अमरीकी साम्राज्यवाद और सत्ता राजनीति की गलियों में पहलकदमी करते लेखकों के गिरोहों के खिलाफ आवाज बुलन्द करते हुए आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने लिखा था-’इन लेखकों का सरकारी क्षेत्राों में जाना और अर्थिक दृष्टि से निश्ंचत हो जाना इनके निजी जीवन के लिए भले ही हितकर हो, साहित्य की उच्चतर सृष्टि में सहायक नहीं हुआ।‘ वाजपेयी इससे आगे का दृश्य भी खींचते हैं-’दिल्ली में जो लेखक पहुँच जाते या रहने लगते हैं वे अपने को हिन्दी साहित्य का धुरीण मान लेते हैं। पाँच-सात आदमी मिलकर लेखकों के राष्ट्रीय संगठन के स्थानापन्न बन जाते हैं और रहनुमा बनकर उनके भाग्य का निपटारा करने लगते हैं।‘ वाजपेयी जी के कथनों की सच्चाई और प्रामाणिकता तब और भी समझ में आती है जब २००६ में हम असाधारण प्रतिभासम्पन्न कथाकार उदय प्रकाश की इस टिप्पणी से रू-ब-रू होते हैं। उदय प्रकाश ने कभी भी उन नामवर सिंह के पाँव न तो जे.एन.यू. कैम्पस और न उसके बाहर छुए जिनकी कलम की एक नोक से लोगों के साहित्यिक कैरियर बनते-बिगडते रहते हैं। संयोग आ पडा त उदय बराबरी से हाथ मिला यह जरूर पूछना और कहना चाहेंगे-’हेलो! चीपू! आप कौन हैं किस क्लासिकल सामंतवादी युग के? यही उदयप्रकाश उस साहित्य अकादमी की कथित स्वायत्तता का भी पर्दाफाश करते हैं जो अपनी जडता में डूबी हुई है और साहित्यिक मंडियों के दलालों, समझौतापरस्तों, इनाम कबाडू लेखकों से घिरी हुई भी। वाजपेयी लिखते हैं-’राजनीति का लक्ष्य जनसमाज के बाहरी जीवन के हितों को देखना उनकी रक्षा करना और उनका संबर्द्धन करना है, जबकि साहित्यिक का लक्ष्य समाज को ऐसी प्रेरणा देना है कि वे स्वयं अपने हितों और अधिकारों को समझ सकें और अपने दायित्व के प्रति सजग हो सकें। हम कह सकते हैं कि राजनीति का क्षेत्रा संघटित जन आन्दोलन का क्षेत्रा है जबकि साहित्य और कलाओं का क्षेत्रा समाज और व्यक्ति की भावनाओं के परिष्कार और उन्नयन का है। उन्हें उनके मानवीय गुणों का स्मरण कराने और उनकी सर्वांगीण उन्नति में योग देने का है।‘
वाजपेयी आगे भी लिखते हैं-’साहित्य एक अंतरंग प्रक्रिया है, जो जन-मन का संस्कार करती है, बौद्धिक विकास में योग देती है और समस्त मनुष्यों की समानता का उद्घोष करती है। साहित्यकार यह मानकर चलता है कि मनुष्य मात्रा में समान हृदय, समान बुद्धि और समान विवेक की संभावना है और इस समानता का अधिकार मनुष्य मात्रा को है।....सार्वजनिकता साहित्यिक प्रक्रिया के मूल में निवास करती है।‘‘
वाजपेयी राजनीति में घुसी चली आती ’स्वार्थपरता‘ को लेकर चिन्तित हैं साथ ही आजादी पूर्व के दिनों में की जाती भावपूर्ण राजनीति और साहित्य के अभिन्न रिश्तों की छिन्नभिन्नता को लेकर भी वे यह क्षोभ भरी टिप्पणी करने को विवश हो उठे हैं कि ’जो साहित्यिक राजनीति के समीप है, वे सच्चे अर्थों में साहित्यिक रह ही नहीं गए हैं।‘
अपने इस लेख ’साहित्यकार का दायित्व‘ में वे राजनेताओं को भी बख्शते नहीं-’स्वराज्य मिलने के पश्चात् देश में सहसा राजनीतिक शक्ति का इतना प्राधान्य हो गया है कि उसने सामाजिक जीवन के अन्य उदीयमान पक्षों को स्वतंत्रा रीति से बढने नहीं दिया। सामाजिक जीवन की विविध दिशाओं में जो कुछ कार्य हो, वह राजनीति का ’स्टैम्प‘ लगाकर ही हो और उसका श्रेय राजनीतिज्ञों को ही मिले-इस सर्वग्रासिनी वृत्ति ने राष्ट्रीय जीवन को एकांगी बना दिया है।...हमारी नई राजकीय सत्ता देश के सर्वतोन्मुखी जीवन को पूरी आजादी के साथ बढने का अवसर नहीं दे रही है। राजनीति के माध्यम से एक प्रतिबन्ध लगा हुआ है....हमारे राजनीतिक नेता और दल जनता द्वारा चुने जाने के कारण राष्ट्रीय जीवन के वास्तविक प्रतिनिधि हैं। दूसरे लोग जो राजनीति में नहीं आये या जो चुनाव नहीं लडे, वे राष्ट्रीय जीवन के प्रतिनिधि नहीं हैं। इस प्रकार की धारणा हमारे नवीन जीवन-विकास के लिए घातक है। यह राजनीति को सामाजिक विकास के अन्य साधनों से प्रधानता देने का एक छद्म प्रयोग है। इसे हम राजनीतिक स्वार्थपरता ही कह सकते हैं।‘ इसके बाद वाजपेयी अपनी चिन्ता और आशंकाओं का खुलासा करते हुए लिखते हैं ’जिस दिन अपने देश में प्रजातन्त्रा का यह आदर्श बन जायगा कि राजनीति के माध्यम से आगे बढे हुए लोग ही देश के सबसे बडे और सच्चे प्रतिनिधि हैं, वह दिन सचमुच महान् दुर्भाग्य का दिन होगा।‘
इस दुर्भाग्य का एक भयावह चित्रा कवि मुक्तिबोध ने अपनी कविता-’भूल-गलती‘ में कुछ इन शब्दों में खींचा है-
’’वो आँखें सचाई की निकाले डालता,
सब बस्तियाँ दिल की उजाडे डालता
करता हमें वह घेर
बे-बुनियाद, बे सिर-पैर....
हम सब कैद हैं उसके चमकते तामझाम में
शाही मुकाम में।।‘‘
रवीन्द्र त्रिपाठी इस भयावह सच का सबसे ताजा चेहरा देख पाते हैं जब वे यह कहते हैं कि-’केन्द्र सरकार ने प्रेमचन्द की सवा सौवीं जयन्ती मनाने में जो विशेष दिलचस्पी ली, उसका क्या हश्र हुआ हम सब देख चुके हैं। प्रेमचन्द कुछ लोगों के लिए सिर्फ व्यवसाय बनकर रह गये। ’ये कुछ लोग‘ कौन हैं, इनका चेहरा क्यों नहीं पहचाना और रेखांकित किया जाना चाहिए? रवीन्द्र त्रिापाठी इन चेहरों को सामने लाने में सहम क्यों गये? क्या ये ही चेहरे हजारी प्रसाद द्विवेदी की शताब्दी मनाने फिर आगे नहीं आयेंगे? क्या ये ही सरकार से फिर दिलचस्पी लेने का आग्रह नहीं करेंगे। और सरकार थोडा सा हिस्सा टुकडे के रूप में इनकी तरफ फेंक कहेगी, लो तुम भी मजा-मौज कर लो। ए.सी. या हवाई सफर कर लो। चार-पाँच सितारा में ठहर और खा लो। तुम्हारी साहित्य-साधना का इससे ज्यादा बडा लक्ष्य और है भी क्या?
२९, निराला नगर, दुष्यन्त मार्ग, भोपाल-३
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