KhbarExpresswww.khabarexpress.com

Free online form to add company in Raj2b.com - Business Directory of India

Welcome Guest Sign In New user! Sign Up Now
Search Photo  
RSS Wednesday, February 15, 2012



Vartmaan Sahitya ::October, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner

सप्तमान कला कौशल
More Articles

laदहपुर से वंशधर का अब कोई संबंध नहीं रहा। हर नयी पीढी उसके बारे में क्रमशः कम जानने लगी है। अब तो गृहोत्सव पर मूल, गोत्रा और कुलदेवों के गुहार के बहाने परम और पितरों के अतीत को जानने की रस्म भी समाप्त होती जा रही है। परिवार बदल रहा हैं, परम्पराएँ टूट रही हैं। यह टूटना और बदलना इस तरह और इतनी तेजी से हो रहा है कि सम्भव है कल संदहपुर से उसके वंशागत जुडाव के बारे में कोई कुछ नहीं जाने।
बंशधर पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर गया अतः उसका मुंडन संस्कार होना अनिवार्य था। माँ के गर्भ से आये केश अब बडे होकर चोटी बन गये थे। इस बार यदि उसे बिद्धपूर्वक नहीं मूडा गया तो उसके जीवन में छठे वर्ष का प्रवेश हो जायेगा, जो उसके लिए वर्जित वर्ष था। सैकडों साल पूर्व संदहपुर से चला आ रहा यह खयाल आज भी उनके बीच वजूद में था कि पूर्णांक स्थिति में किसी शुभ कार्य का श्री नहीं होना चाहिए। एक ऐसा योग जिसमें दो से अंकों का पूर्ण विभाजन हो जाए ऐसा एकपरिया रास्ता होता जो सर्वथा ठेसयुक्त माना जाता था। शुभद हमेशा कंटकों के मध्य रहता है। अतः लोकोक्ति के अनुसार वे पौने सवा और डेढ से कार्यारम्भ किया करते थे। ये त्रिाक उन कंटकों की तरह माने जाते थे जो शुभद की रक्षा करते हैं, इसे वे ’कागा‘ भी कहा करते थे।
इस वर्ष फसल अच्छी नहीं हुई थी पर वंशधर के जीवन में काग वर्ष का प्रवेश हो चुका था।
अक्सर जब जाडे की धुंध को छांट कर धूप गर्म होने लगती थी तभी से दादी पांत की औरतें मिट्टी की कोठी बनाने में लग जाती थीं। गांव के चौमुख से मुट्ठी भर रजकण लाकर पवित्रा मिट्टी में मिलाया जाता था। फिर मांड से लथपथ मिट्टी में तुष (धान की भुसी) और सन के संश्लिष्ट रेशे को गूँथ कर तीन खंडों में कई कोठियां बनाई जाती थीं। जब घर में अनाज आता था, उस दिन गेहूँ-अन्न को कोठी में रखने से पहले हलवाहे की पूजा होती थी। हलवाहा महतो को नेवता जाता था। उनके आने से पहले ही सहन को लीप पोत कर चिक्कण कर दिया जाता था। उनके आने पर माई पाँत की औरतें उनकी आरती उतारती थीं, उन्हें दही के तिलक लगाए जाते थे और पिता पाँत के पुरूष उन्हें हल्दी से रंगी लंगोटी पहनाते थे। फिर होता था अंशबलि का मुहूर्त। इसमें हलवाहा महतो खेत जोतने की मुद्रा में खडे होते थे और घरबैया चाभा बाँस की नयी टोकरी से उस पर जौ, जनेरा, कोदो, कौनी, सामा, चीना, मेथ, मकई, बूट, बाजरादि तब तक डालते थे जब तक कि हल का फार ढंक न जाय।
अन्त में घरबैया हाथ जोडकर उन्हें विदा करते थे। ’’हे वाहा महतो! जिस तरह हमने हल की इज्जत को ढंका है, आप भी कृषि कार्य में हमारी पत रखना।‘‘
इस बार फसल अच्छी नहीं हुई थी पर वंशधर का मूडना अनिवार्य था, वरना उसे अगले काग वर्ष के लिए पूरे एक वर्ष का इंतजार करना पडता।
अतः मूडने की तैयारी शुरू कर दी गयी थी। हफ्ते भर ’सीरा‘ में संझाबाती दी जाती। फिर पुरूष जन कुल्ला-आचमन कर सीराघर में गा-बजा कर अपने सीरा-पीरा को प्रसन्न करते थे। उसके बाद माँ, बहिन और दादी पाँत की औरतें अपने गीतों से वही कार्य करतीं। वे नौ, ग्यारह, तेरह, पन्द्रह, सत्राह, उन्नीस या इक्कीस की संख्या पूरी करती थीं। लोगों के उत्साह का क्रम बढता जाता और सातवें दिन वह गृहोत्सव का रूप ले लेता था। बडे से बच्चे तक सभी साफ कपडे पहनते और ढोल, झांझ, मजीरे से अपने उत्साह का इजहार करते थे।
गर्भ से आए संजो कर रखे गये पाँच वर्षों के केशों को मूडने से पहले सप्तमान की पूजा होती थी। समय बीतता गया और इन चीजों को मानने वाले लोग भी घटते गये। संदहपुर से चली आ रही ये परम्पराएं और पूजाएं भी सिमटने लगीं। पर वंशधर के बालमन में सप्तमान के वे अजीबोगरीब किस्से और लोरियां परिपक्व होते गये। अतः उसने सप्तमान के अनुयायियों के स्मृति-कोषों को टटोलना शुरू किया। उन्हें झिंझोरा और उनसे झरती हुई पराकथाओं को झाड-पोंछकर सहेजता गया।
***
कालिदास एक लम्बी जीवनयात्राा पूरी कर अब सांध्य बेला में पडे थे। उनके चहुंदिस प्रियजनों की पांत खडी थी। परिवार की बुनियाद में पहली शिला रखनेवाला शख्स आज आश्वस्त हो जाना चाहता था कि अन्तिम क्षण तक वह आबाद रहेगा। इसलिए आज वे अपना पूरा अतीत बता देना चाहते थे। सबकी आँखें नम थीं और एक संस्थापक अपनी बोली बन्द हो जाने के पहले अपना सारा अनुभव बता देने को उद्यत था।
संदहपुर में सात भाइयों का एक परिवार रहता था। उनमें एक का ही लग्न हुआ था और बाकी अविवाहित रह गये थे। उन दिनों अविवाहित रह जाना एक आम बात थी। एक तो कन्या पक्ष किसी निर्धन से अपनी बेटी का गेंठीजोड कराने के बजाय किसी धनवान् की दूसरी या तीसरी या और भी ’रखनी‘ हो जाना ज्यादा पसन्द करते थे।
दूसरी बात उन दिनों अधिक से अधिक जमीन और जन रखना बडप्पन माना जाता था। अतः कई बार ऐसा भी होता था कि घर के अनेक भाइयों में किसी एक का लग्न कराकर जमीन जन को बंटने से बचा लिया जाता था। ऐसे में कभी-कभी अविवाहित भाई वंश की यशकीर्ति फैलाने देश-देशान्तर भ्रमण पर निकल जाते थे। कालिदास किन कारणों से संदहपुर से दूर हुए थे, यह वंशधर को कहीं पता ना चल सका।
कालिदास संदहपुर से चलने के बाद वर्षों घूमते रहे थे। प्रकृति के असीम पसार में रहस्यों के अद्भुत दर्शन करते हुए वे आगे बढ जाते। उस जमाने में इस तरह के घुमक्कड अनेक हुआ करते थे, जो प्रकृति से सीधा संवाद करते हुए एक प्रकार की विशेषज्ञता हासिल कर लेते थे। चूँकि, कालिदास किसी ज्ञान और कर्म के निमित्त नहीं निकले थे अतः बहते पानी की तरह अनन्त दिशाओं में बढते जाते। बढते हुए,वे एक निरन्तर प्रवहमान नदी के तट पर पहुंचे थे। असीमित मानवीय आकांक्षाओं से अतिक्रमित एक जल लकीर आज भी वहाँ मौजूद है जिसे लोग बाया कहते हैं। शायद बाया कभी समृद्ध दशा में रही हो, जहाँ कालिदास ने पडाव डाला था।
बाया के तीर में एक छोटा-सा टोला था भिट्ठा। जहाँ की अधिकांश आबादी मुसलमानों की थी। कुछ गैरद्विज भी उनकी गोडी में बसे थे। उसी टोले में एक उस्ताद हाजी मीर अली वाकी रहते थे। जिन्हें लोग संक्षेप में मीरां साहब के नाम से भी पुकारते थे। वे इस्लाम के आधिकारिक विद्वान् माने जाते थे। अक्सर वे मगरिब की नमाज के बाद धर्म के नैतिक पक्ष पर इज्तिमा किया करते थे। यद्यपि, उनके बीच किसी के जाने की मनाही नहीं थी, पर वे अपने जमाती लोगों के बीच सहिष्णुता और सह-अस्तित्व पर सदा बल देते रहे। इसके लिए वे कुरान शरीफ से ढेरों मिसालें देकर लोगों को कायल कर देते थे। एक दिन उन्होंने कुरआन (५ः४८) की एक आयत की व्याख्या करते हुए कहा था-’’तुम में हर एक के लिए हमने एक नियम और एक मार्ग नियत कर दिया है। अगर अल्लाह की मर्जी होती तो तुम (हिन्दू, इसाई, मुसलमानादि) सबको वह एक ही जन-समुदाय बनाता। और वह उसी में तुम्हारा इम्तेहान ले सकता था जो तुम्हें उसने दिया। इसलिए अच्छे कामों में एक-दूसरे से आगे बढने की कोशिश करो।‘‘
मीरां साहब अपने उदात्त विचारों के कारण प्रसिद्ध और पूजनीय होने लगे थे। दूसरे धर्म के लोग भी उनसे आशीर्वाद प्राप्ति के लिए आने लगे थे।
कालिदास को इस बाया अंचल में आये अब कई दिन होने को थे। अगल-बगल के गाँवों में घूम-घूमकर लोगों के जय-जयकार से जो कुछ मिल जाता, वही खाना, रेत के विशाल प्रस्तर पर सोना और उसी तीर पर वरूण की जलझुर्रियों से क्रीडामय भास्कर को प्रणाम कर भक्तिमय हो जाना, यही उनका दिन-वृत्त था। ना पीछे का पछतावा ना आगे की चिन्ता। एक ऐसे वर्तमान की साधना में निमग्न रहते कालिदास जो उन्हें अधिकाधिक प्रकृतिमय किए रहती थी। एक दिन वे पूर्व की भाँति भीखाना लिए टोले में घूम रहे थे। घूमते हुए जैसे ही उन्हें भूख मिटाने लायक सीधा की प्राप्ति हुई, वे लौट चले। रास्ते में उन्हें वह गर्त्त मिला था जिसके मुहाने पर बैठकर मीरां साहब अक्सर सद्वचन कहा करते थे। यदाकदा मीरां साहब उस खत्ते को खुद ही साफ किया करते थे। आज भी वे उसी निमित्त गड्ढे में बैठे थे। उन्हें उस रूप में देखकर कालिदास वहीं ठक हो गये थे। मीरां साहब जब उचककर खदरे से बाहर आये तो एक अनजानी सूरत को अपनी ओर इस कदर देखते हुए उत्सुक हो गये थे। दोनों की नजरे।मिलीं। पलभर दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर मीरां साहब अपनी देहकानी स्थिति का भान होते ही सहज होने की कोशिश करने लगे। एक परिव्राजक के उन्नत ललाट पर धैर्य शान्ति और ब्रह्मचर्य के तेज से अभिभूत होकर मीरां साहब ने उनका स्वागत किया था। दोनों का आपस में परिचय हुआ था।
कालिदास यह जानकर ताज्जुब में पड गये थे कि मजहबी खयालों के मीरां साहब शादी-शुदा, भरे-पूरे परिवार के एक जमाती आदमी हैं। जब से मक्का की जयारत कर लौटे हैं उन में एक जबरदस्त वैचारिक बदलाव आ गया है।
’’हर इंसान को अपनी उम्र पूरी कर एक दिन चले जाना है पर वह अपने चन्द रोजे जीवन में ना जाने कितनी मक्कारी और फरेब करता है। कितने जुल्मों और जुर्मों को अंजाम देता है और इस तरह वह गुनाहों का बुत बन जाता है। इसलिए उन्हने अपने लिए यह कब्र खोदकर रखी है ताकि नापाक इरादों के आते ही यह हमें ताकीद करती रहे कि खबरदार! बन्दे! तुम्हें इसमें एक दिन समा जाना है।‘‘
कालिदास ने इससे अपनी असहमति जताई थी। ’’श्रीमान! आपकी चिन्ता सही है । पर यह कब्र वाली बात कुछ जंचती नहीं। इससे मानव जीवन भीरू हो जाएगा। जीवन तो उत्तुंगता का नाम है। अन्ततः सारे बन्धनों से मुक्ति ही तो उसका ध्येय है।
अब जहां तक मानवीय भूलों, उसकी त्राुटियों और अहम् का प्रश्न है वह तो उसके आत्मसंयम, आत्मोत्सर्ग से नियंत्रिात हो सकता है। आत्म निरोध के कई तरह हो सकते हैं उसमें एक हमारा वैराग्य भी तो है।‘‘
’’नहीं-नहीं! जनाब आफ वैराग्य, सन्यास के लिए हमारे यहाँ कोई जगह नहीं। फिर जिन्दगी के आफ फलसफे इस वैराग्य से मेल भी नहीं खाते। मुझे लगता है यह एक-दूसरे का इखतिलाफ है। जिन्दगी को तो आप तभी समझ सकते हैं जब कुदरत के उसूलों के अनुसार आप उसके खुदमजाज रूपों को हमवार करेंगे। कहने की गर्ज यह कि बीवी, बच्चे, खानदान और समाज की जवाबदेहियों को उठाए बिना आप जिन्दगी को पूरा कैसे समझ सकते हैं?‘‘
मीरां साहब के प्रतिकार पर कालिदास चुप हो गये थे। मानो उनके शब्द फुर्र हो गये थे। पर खुली कब्र के नजारे उन्हें परेशान कर देते थे। ‘‘पर श्रीमान्! जीवन को जानकर उसे भलीभाँति भोग और भणन कर भी आप उसे इस तरह कमजोर क्यों करते हैं? अर्थात् आपकी यह खुदी कब्र जीते जी जीवन को अंगूठा दिखाना ही तो है। यह तो जीवन के प्रति एक प्रकार की कृतघ्नता है।‘‘
’’क्या यही सारी बातें आफ वैराग्य पर असर पजीर नहीं होतीं?‘‘ मीरां साहब ने अपने मेहमान से और ज्यादा बहस करना मुनासिब ना समझा। अतः अपने मनपसन्द खजूर की सौगात देकर उन्हें रूखसत किया।
यह तार्रुफ धीरे-धीरे बढते हुए एक गहरी दोस्ती में बदल गया था। फिर दोनों एक दूसरे से खुलते हुए दिल्लगी और मसखरी तक पहुँच गये थे। एक दिन मीरां साहब ने एक शादाब हंसी घोलते हुए कहा था-’’मोहतरम! आप कबतक यूँ गर्दिश में टूटते-बिखरते रहेंगे? क्यों नहीं, शादी-सम्बन्ध बढाकर परिवार बसा लेते?‘‘
वैराग्य पर दिए गये उनके अकाट्य तर्क से पहले ही कालिदास का विरक्ति भाव छंटने लगा था। उन्होंने भी उसी खुलेपन से कहा- ’’श्रीमान्! यदि आप जीवन पर विहंसती इस कब्र को सपाट कर द तो मैं परिवार बसाने के आफ प्रस्ताव पर अमल कर सकता हूँ।‘‘
दोनों ने एक बार फिर जोरदार ठहाके के साथ एक-दूसरे की गंभीर चुनौती को कबूल किया था। पर कालिदास के इस नए कोण से मीरां साहब एक अजीब असमंजस में फंस गये थे। दिन बीतते गये पर वे कोई फैसला नहीं कर पा रहे थे। उनकी बेचैनी बेहद बढ गयी। उस बेचैनी के सबब उन्होंने सोते में एक ख्वाब देखा था। देखा कि उनकी कब्र के पायताने से एक आवाज आ रही है। मानो कोई कह रहा हो, ’तुम्हारी कब्र कालिदास के वैराग्य की तरह ही एक बकवास है।‘
इस ख्वाब के आते ही उनकी नींद काफूर हो गयी थी। घबराकर वे उस दरम्यानी रात में कब्र की तरफ बढने लगे थे। पर वहाँ उन्हें अपनी परछाईं के सिवा कुछ नजर नहीं आया। उनकी कई दिनों की बेचैनी आज परकाष्ठा पर थी। तभी हवा के हिंडोले पर विहार करती रातरानी की खुशबू ने आगे बढकर उन्हें तसलीम कहा था।’’ जनाब मीर बाकी! इस निश्चिन्त रात में आप कहाँ भटक रहे हैं? अभी तो नींद का मजा लेने का वक्त है। जाइए, अपने ख्वाबों को दिन की गवाही में गुनिएगा।‘‘
मीरां साहब चौंककर चक्राकार घूम गये। उन्हें लगा जैसे किसी फरिश्ते ने आकर उनके ख्वाबों का समर्थन किया हो। उन्होंने सर झुका कर उसके हुक्म को कबूल किया और अपने बिस्तरे पर चले गए। पर यह निगोडी नींद इस तरह पायताने में जाकर सहमी पडी थी कि उनका मन उचट गया। वे करवटें बदलने लगे और फिर थक कर उठ बैठे। शमा जलाई और ताखे पर रखे पंचसूरे को सर-आँखों से लगा लिया।‘‘ या अल्लाह यह कैसा इम्तेहाने आतिश है?‘‘ पंचसूरे को पढने से पहले कहा था-’बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम।‘
सुबह हुई। दिन हुआ, शाम हुई और फिर रात के साये ने संसार को अपने आगोश में समेट लिया। पर मीरां साहब लगभग एक-सी ऊहापोह की स्थिति में पडे रहे थे। ’’किससे मशविरा करें? भला कौन मेरी इस नादानी पर हंसे बिना नेक सलाह देगा?‘‘ यह भ्रम उन्हें किसी के आगे खुलने भी नहीं दे रहा था। इसी तरह कई दिन और बीत गये, रातें भी। पर वे किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहे थे और ये हजरत (कालिदास) मानों इधर का रास्ता ही भूल गए थे। हार कर मीरां साहब ने खुद ही उनके तट की ओर रूख किया था।
शाम का समय था। गगन कुछ लोहित हो चला था और सूर्य मानो शान्त हो रहे अंगारे की तरह राख की परतों को ओढता चला जा रहा था। कालिदास प्रकृति का यह अद्भुत नजारा बाया के दर्पण में अवलोक रहे थे। तभी मीरां साहब चुफ से जाकर उनके पीछे खडे हो गये थे। झुक कर देखा तो पानी में झिलमिलाता आफताब उन्ह बडा अजीम लगा। मीरां साहब ने एक बेतकल्लुफ ठहाके के साथ अपनी हथेली उनके कंधों पर रख दी। उनके बीच की झिझक और दूरियां मिट चुकी थीं। उन दोनों ने गल

Discuss this topic on KhabarExpress Forum 


Post Your Comments to this Article Posting Rules
Name*:
Comment*:
 


October, 2006 <br> Sponsered by : Decor Home, BikanerOctober, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
January, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJanuary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
February, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerFebruary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
March, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMarch, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
April, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerApril, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
May, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMay, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
June, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJune, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 

All right reserved by Khabarexpress.com
Contact Us | Archives | Sitemap | Can't see Hindi ? | News Ticker
Special Edition: Lakshchandi Mahayagya, Camel Festival 2007, Vartmaan Sahitya, Nagar Ek - Nazaare Anek, Bikaner Udyog Craft Mela
Our Network rajb2b.com | khabarexpress.com | uniqueidea.net | PelagianDictionary.com | hindinotes.com
Developed & Designed by Pelagian Softwares