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Vartmaan Sahitya ::October, 2006
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अतीश की खेती विजय गौड
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यह उस समय के दिन हैं जब राज्य नहीं बना था और राज्य आन्दोलन की आग से धुंआ उठने लगा। यूँ राज्य बनने के बाद भी आज तक कभी ऐसा अहसास हुआ हो कि राज्य बन गया, याद नहीं। टिहरी डैम की वजह से विस्थापन की लडाई लडने वाले लोग, लाता गांव में गौरा देवी के संघर्ष को जारी रखने वाले लोग, गंगी, गिंवाल, पिन्सवाड, माणा, गर्व्याग, कुटी, मुन्स्यारी, टकनौर के लोगों से ही नहीं बल्कि देहरादून, नैनीताल या ऐसी ही ऐशगाड के नजदीक रह रहे लोगों की बातचीच में भी इसे सुना ही जा सकता है। घुतु में रहने वाले लोग बता सकते हैं कि प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र का गांव को स्वस्थ रखने में कितना योगदान है जहां डाक्टर तो अक्सर होता ही नहीं दवाइयां तो दूर की बात है। जीप में घनश्याली से घुतु जाते वक्त बिशन सिंह से हुई बातचीत के दौरान मालूम हुआ था। गोद में बैठी हुई लडकी को देखकर सवाल सभी के भीतर उत्पन्न हुआ होगा।
’क्या हुआ इस बच्ची को?‘
’मालुम नी।‘ लडकी के गाल पर रूई को प्लास्टर से चिपकाया गया था।
’फोडा हो गया शायद।‘ साथी ने बीच में हस्तक्षेप किया।
’फोडा तो नहीं, किसी कीडे ने काट दिया, टिहरी का डाक्टर बता रहा था। वैसे घनश्याली में बैठा डाक्टर कह रहा था, फोडा है, चीरा लगाना पडेगा। इसलिए टिहरी ले जाओ।
बिशन सिंह ने जब जान लिया कि पूछने वाले सदिच्छा से ही पूछ रहा है तो विस्तार से बताने लगा।
’क्यों, घुतु में भी तो सरकारी अस्पताल है?‘
’हां, है तो। पर डाक्टर तो नहीं और फिर दवाइयां भी कहां होती हैं।‘

अपनी ढाई तीन साल की बच्ची को लेकर, जिसके गाल पर फोडा हो गया था, चीरा लगवाने टिहरी ले गया था। तीन दिन बाद उसे दुबारा जाना होगा टिहरी। यूं टिहरी भी ज्यादा दिनों तक नह रहने वाला है। टनलों में पानी रोकना शुरू हो चुका है। जल्द ही टिहरी को डूब जाना है। तब बिशन सिंह इलाज के वास्ते कहां जायेगा? इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं। पिलखी बाजार में बस के ऊपर मजबूरी से बैठकर यात्राा करने वाला यात्राी यदि वहां सडक के बीच तक फैले किसी पेड की शाखा से टकराने के बाद जान न गंवाये तो बता सकता है कि घनश्याली का बंगाली डाक्टर जो बिहार से रजिस्ट्रेशन कराकर वहां आया है, अपने हाथों से टांका लगायेगा। बावजूद भीड होने के भी उसकी सौम्यता मरीज को उससे मिलने पर ही ठीक कर रही होगी। तो भी राज्य निर्माण को लेकर और भविष्य में संसाधनों की उपयोगिता को लेकर गोष्ठियों का सिलसिला जारी था। देहरादून, नैनीताल, मसूरी या ऐसी ही अन्य जगहों पर गोष्ठियां होतीं, सेमिनार होते और बहसों में उलझे ही रहते। ऐसा नहीं कि इस बात का भान उन्हें नहीं रहा होगा कि अंग्रेजी शासन काल में भी इस तरह की बहस भले ही न हुई हो तो भी उस दौर के किसी पहाडी बुद्धिजीवी ने जब पहाडों के संसाधनों को जनता के हक में उपयोग करने की योजना कमिश्नर हेनरी रामजे के सामने रखी तो उस पर ध्यान देना तो दूर, उस कागज का जिसपर वह योजना थी, क्या हुआ, इतिहास में दर्ज नहीं। बल्कि जंगल का दोहन और संसाधनों की लूट का साम्राज्य अपनी पूरी आक्रामकता से चालू रहा। तो भी पहाडों के बुद्धिजीवी कहलाये जाने वाले कुछ मुट्ठी भर लोग जगह-जगह बैठकर बहसों में उलझते। हां, राज्य बन जाने के बाद बहसों में कुछ नये विषय जरूर और जुड गये।
एन.जी.ओ. का जाल उस वक्त इतना घना नहीं रहा होगा कि उनकी शाखाओं और उनके उद्भव को न जाना जा सके। तो भी कुछ ऐसे नवयुवक जो पहाडों को लेकर वास्तविक संवेदना रखते, आकर्षित होने शुरू हो चुके थे। ढेरों प्रोजेक्टों की योजनाएं एन.जी. ओ. के मालिकों के दिमाग में बनतीं, जिन्हें संचालक मंडल द्वारा जब कागजों पर उतारा जाता तो विदेशी एजेन्सियों के पैसों की नदियां बहनी शुरू हो जातीं। उन नदियों के मुहाने ग्लेशियरों पर नहीं बल्कि दुनिया की एक बहुत बडी आबादी के जमे हुए पसीने में होते। चालाक व्यवस्था का नायाब तरीका ही एन.जी.ओ. का रूप है, ऐसा मानने वालों की संख्या भी उस वक्त कम न रही होगी। जिसका बाहरी ढांचा इतना खूबसूरत होता कि उसे देखकर वे लोग जिनकी दिमाग की नसें दुनिया की तकलीफों को देखकर फूलने लगी हों, आकर्षित होते। पर भीतर की बुनावट इतनी उलझी हुई होती कि यथार्थ की ऐसी अस्पष्ट तस्वीर ही दिखाई देती जो गति के साधारण से नियम को जिसमें कार्यकारण संबंधों की पडताल की जा सके, छुपाने लगती और संवेदनाओं के हरे पत्तों को विचारों की हवाओं से दूर करने लगता। ऐसे ही मकडजाल में फंस चुके युवकों के रक्त संचार क्रूर और अमानवीय व्यवस्था को मानवीय चेहरा प्रदान करने लगते। मोतिया बिन्द के मरीजों के लिए, कुष्ठ रोगियों के लिए, नेत्राहीनों के लिए या फिर ऐसी ही ढेरों अन्य बीमारियों के इलाज के लिए संस्थानों का खोला जाना और कार्यकर्ताओं को गांवों में पहुंचाकर मरीजों को वहां तक लाना। मोबाइल फोन को दूर-दराज तक पहुंचाना, ई-गवर्नमेंट का नारा बुलन्द करना, स्पेशल इकोनामिक जोन कहां हो, उसकी संभावना व्यक्त करना जैसे ढेरों प्रोजेक्ट और ढेरों योजनाओं का मोटा पुलिन्दा कुकुरमुत्तों की तरह उग आये एन.जी.ओ. के पास होता। उनके व्यवहारिक पक्ष या मूलभूत कारणों की वहां कोई जरूरत न पडती। गांव में अतीश की खेती की जाये और आय के लाभांश को गंाव के और गांव वालों के विकास पर खर्च किया जा सके, ऐसी ही नायाब योजना का नुस्खा चालू था। इससे पूर्व जलसंग्रहण की योजना का प्रोजेक्ट पूरा हो चुका था और गंगी गांव में बने जल संग्रह टैन्क की मुंडेरें टूट चुकी थीं। पानी जो पहले गांव वालों द्वारा बनायी गूल से बहता हुआ जरूरत पडने पर खेतों को सींचने में काम आ सकता था, टूटी हुई मुंडेरों से बेकार बहता हुआ भिलंगना में मिलने लगा, जहां कि वैसे भी उसे मिलना ही होता।
गंगी गांव का भीम सिंह अपनी भेडों को चुगाना छोडकर अतीश पैदा करने में लगा हुआ था। गांव में दूसरे लोगों के खेत में मार्शा (चौलाई ) पकनी शुरू हो चुकी थी। जानवरों को खिलाई जाने वाली घास जो बर्फ पड जाने के वक्त जानवरों को खिलाई जानी होती, अपनी जवानी पर थी। जिसको काटने में सभी व्यस्त थे। तीखी ढलानों पर घास के चट्टे इकट्ठे होने लगे थे पर भीम सिंह के लिए घास काटना संभव नहीं रहा। चूल्हे में जलाई जाने वाली लकडी भर ही काट पाने की फुर्सत कभी कभार निकल रही थी। चूल्हें का न सुलगना तो हर दिन भूखा रहना ही हो जाता। दिन भर अतीश के पौधों की निराई-गुडाई करता। जानवरों को उजाड जाने से रोकता। मालिक ने कहा था-’भीम सिंह अतीश उगाओ, अतीश। बाजार में अतीश का रेट २००० रूपये किलो है। ‘भीम सिंह के लिए यह सूचना अचम्भित करने वाली थी। एक कुंटल मार्शा ७०० रूपये का और एक किलो अतीश २००० रूपये की। यह अतीश और मार्शा का संघर्ष था या कि मुद्रा का, वह समझ नहीं पाया तो भी उसे काम जंच गया। ऊँचे-नीचे पहाडी रास्तों से होता हुआ चौदह-पन्द्रह फुट ऊँचाइयों पर स्थित खतलिंग के पार चौकी के बुग्याल तक जाता, सहस्ताल जाता और अतीश के पौधों को लाकर अपने खेत में गाड देता। ऊपर से उसकी देख-रेख के वास्ते ७०० रूपये प्रतिमाह भी मालिक ने अपनी संस्था की ओर से बतौर चौकीदारी के लिए देना तय किया। हालांकि ७०० तो छोडो ७ रूपये भी कभी उसे नहीं मिले। यही वजह थी कि खेतों में लगाये गये अतीश के पौधे भीम सिंह के मनोभावों की तरह दबते और खिलते रहे। बीच-बीच में कई बार ऐसे मौके भी आये कि भीम सिंह डांवाडोल होता रहा। एक मन होता भेडों के साथ चौकी निकल जाय, जानवरों के लिए घास काट ले। पर संस्था के मालिक ने सितम्बर में आने को कहा था। भीम सिंह वायदा खिलाफी कैसे कर सकता है? वायदा खिलाफी भीम सिंह की परम्परा नहीं री। भीम सिंह कह बेइमानी पूरे पहाड की बेइमानी होगी। पूरे गंगी की बेइमानी होगी। इस सवाल से तो भीम सिंह ही नहीं उसके पूर्वज भी समय-समय पर टकराते ही रहे, पर डिगे नहीं। भले ही बेगार का बोझ कंधों पर लादते हुए वर्षों गुजार दिये। भले ही कमीण, सयाणचारी के जुए में जुते रहे। पर ऐसा नहीं हुआ कि कामचोरी की हो, बेइमानी की हो। संस्था का मालिक भी भीमसिंह की इस ऐतिहासिक परम्परा को जानता ही होगा। तभी तो सिर्फ पौधे लगवाये और निकल गया। दुबारा झांकने की कोशिश भी नहीं की। सिर्फ इतना भर कह गया कि सितम्बर में आयेगा। भीम सिंह की जुबान अंगूठे का छाप दे देन वाली जुबान थी। खेतों में अतीश के पौधे लगाकर उसकी देख-रेख करते हुए तीन महीने इसी बात के सहारे काट दिये।
धूप तेज पड रही थी। हालांकि सितम्बर अपने अन्त की ओर खिसक रहा था। शाम सुबह भले ही मौसम थोडा ठंडा लगे पर ठंड अभी शुरू नहीं हुई थी। उसका कारण भिलंगाना का किनारा होना भी हो सकता है या सर्दियों की आहट भी। तो भी घुतु से ऊपर आखिरी बस मार्ग को छोडकर जब वे आगे बढने लगे तो पीठ के भीतर बनियान में पसीने की वजह से गीलेपन का अहसास होता ही रहा। मार्ग के किनारे खेतों में काम कर रही देवलिंग गांव की स्त्रिायों की निगाहें उनकी ओर उठने लगीं। झुकी हुई कमर के साथ ही चार पावों वाले जानवरों की मानिन्द दिखायी देती उनकी उपस्थिति से वे दोनों ही वाकिफ थे। फिसलती ढलानों पर दौडते बच्चे उन्ही की ओर बढने लगे। भिलंगना पार के गांव जहां खेती में काम करती स्त्रिायां अपने वस्त्रा विन्यास के कारण तितलियां सी दिखाई देती, मेडूं और सिंवाल है-देवलिंग गांव के बच्चों से मालूम हुआ।
’क्या नाम है तेरे गांव का?‘
’देवलिंग।‘
’तेरे बूबा का?‘
’गुमान सिंह।‘
भिलंगना के इन दोनों किनारों पर का हरापन बच्चों के चेहरों से भी झलक रहा था। जब में रखी टाफियां निकाल बच्चों को पकडाईं और आगे बढ लिए। किलकारियां मारते बच्चे जैसे दौडते हुए उतरे थ, उससे कहीं ज्यादा तेज वापिस दौडने लगे।
देवलिंग के बाद घने जगलों से होकर गुजरना पडा। गंगी की ओर बढते हुए पहाड की मुख्य धारा का जन-जीवन देवलिंग में छूट गया। जंगल के बीच से गुजरते हुए भिलंगना का शोर उम्मीद जगाता रहा कि भले ही मार्ग में कोई दिखाई नहीं दे रहा है तो भी ’री‘ में तो कोई न कोई होगा ही। गंगी के रास्ते पर ही री यात्रिायों का पडाव भी होता। जब गंगी में बर्फ पड जाती उस वक्त री, नलान, द्वैखुरी और लूडी ही गंगी वालों के ठौर होते। यानी एक घर गंगी और दूसरा घर री, नलान, लूडी या द्वैखुरी कहीं भी हो सकता। छः महीने अपने इन गांवों में रहते हुए भी वे गंगी वाले ही कहलाते। भिलंगना के बहाव के विपरीत ऊंची नीची पगडंडियों पर आगे बढते रहे। घने जंगल के बीच से गुजरना रोमांचकारी लगता पर कहीं घाट पर पानी पीने के बहाने पहुंचा जानवर हमला कर दे तो? सोचने भर से ही शरीर में झुरझुरी उत्पन्न होती। यह तो जंगल है, रामनगर के आस-पास या चमोली की तहसील गोपेश्वर में बाघ के हमलों की ढेरों खबरें आये दिन समाचार पत्राों के पृष्ठ में होतीं ही। री से आगे चढाई इतनी कठिन कि दो कदम चलना भी आसान नहीं। शरीर टूटने लगता। सांस फूलती। तीखी पडती हुई धूप में विश्राम भी नहीं किया जा सकता। नदी के उस पार घना जंगल। बस मार्ग होता तो धूप से बचा ही जा सकता। लेकिन कब तक बचेगा वहां भी जंगल जबकि कटान जारी है। जम्मू के एक व्यक्ति से मुलाकात के वक्त जाना था। गंगी की तरफ से आते हुए व्यक्ति की वेशभूषा को देखकर यह कह पाना कठिन था कि आदमी गंगी का होगा। स्वाभाविक उत्सुकतावश संवाद स्थापित करने का मोह झलक ही पडा।
’कहां से आ रहे हो भय्या?‘
’ऐसे ही।‘
थोडे से शब्दों में दिये गये जवाब को सुन उसकी भाषा के लोच से अंदाज लगाया जा सकता था कि जम्मू-कश्मीर का निवासी होना चाहिए। अनुमान सही था, डोडा का रहने वाला अनवर पेड चीरने के वास्ते आया हुआ था।
’अभी कहां जा रहे हो?‘
’जाना कां है साबजी, यां तो कुछ बी नी। उस्ताद के वास्ते बीडी माचिस लेने घुतू जा रहा हूं।‘
एक सिगरेट निकाल कर पकडाई तो कृतज्ञ भाव से थोडी आना-कानी करते हुए पीने लगा। बस सिगरेटभर का विश्राम ही किया होगा।
’और आप लोग कां जा रे साबजी?‘
’गंगी।‘
’गंगी। किसलिए साबजी?‘ गंगी कहते ही वह चौंक गया।
’गंगी वालों से मिलने।‘
’क्यों मजाक कर रहे हैं साबजी? गंगी वालों से मिलकर क्या करोगे? उनकी तो बात भी आप लोगों को समझ नीं आयेगी। एक मेना हो गया, आज तक हमें तो कुछ समझ नीं आया। अच्छा आप लोग जब पोंछोगे तो मेरी बात याद रखना। ‘
कटे हुए पेडों के लट्ठे भिलंगना के बहाव में हरिद्वार तक पहुंचेंगे। पिछले दो सौ सालों से पहाडों के पेड और पेड सरीखे लोग ही इस व्यवस्था को संभालते रहे पेडों को काटकर स्लीपर बने जो रेल बिछाने में काम आये। पेडों को काटने के लिए जंगलों पर कब्जा जरूरी था। सो हो गया। रंवाई के ढंडक अपने जंगलों से बेदखल किये लोगों के गुस्से के परिणाम ही तो हैं। जंगलों पर कब्जा करने वाले अंग्रेज और अंगजों के चाकरों को कैसे बरदाश्त होता। तभी तो निहत्थे गांव वालों को घेर-घेर कर गोलियों से भून दिया गया। जिन्हें गोलियां नहीं लगीं, जान बचाने के लिए भागते हुए यमुना में कूद-कूद कर जान गंवाते रहे। जंगलों पर कब्जे का परिणाम ही था कि लोगों का जानवर चुगाना, खेती योग्य भूमि का विस्तार करना ठप्प हो गया। नवयुवक बेराजगार होने लगे तो ब्रिटिश हुकूमत ने दो जोडी जुराब, एक बेल्ट, दो जोडी जूते, दो जोडी वर्दी और ऐसी ही छोटी-मोटी चीजों के दम पर उनका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। जो फौज में नहीं जा पाये वो भी कहां रूक पाये? गंगा के पानी की तरह पहाडों की सरहदों को पार करने लगे और लौट नहीं पाये। भले ही टिहरी महाराज को जंगलों का ठेका विल्सन को दे देने के बाद अंगज सरकार के इशारों पर उसपर निगरानी रखनी पडी हो कि कहीं विल्सन अपनी स्वतंत्रा सत्ता न चलाने लग जाये, तो भी विल्सन के दिमाग के तो अंगज कायल ही रहे। जिसने कस्तूरी और मोनाल पक्षी की खाल का व्यापार ही नहीं किया बल्कि स्लीपरों को गंगा में बहाकर हरिद्वार तक पहुंचाने की शुरूआत भी की।
कठिन चढाई और पतली पगडंडी-संभल-संभल कर ऊपर पहुंचे तो थोडा राहत मिली। आगे का मार्ग ऊपर से नीचे उतरती ढाल पर था। घुटनों पर पावों पर भले ह

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