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स्त्री और पुरुष समाज के दो स्तम्भ हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व अधूरा है, परन्तु भारतीय समाज की विडम्बना है कि उसने नारी को पुरुष के समकक्ष कभी नहीं रखा। समाज का वैधानिक दृष्टिकोण सदैव से ही स्त्रिायों के प्रति अल्पवयस्क रहा है। बाल्यावस्था में उसे माता-पिता के नियन्त्राण में रखा जाता था, युवती होने पर पति तथा वैधव्य प्राप्त हो जाने पर वह पुत्राों पर आश्रित हो जाती थी। इस प्रकार सदैव ही नारी के स्वतंत्रा अस्तित्व पर अंकुश लगाया गया। प्राचीन नीति-ग्रन्थों ने भी स्त्रिायों का स्तर, चाहे वह किसी भी श्रेणी की हो; शूद्र के समकक्ष रखा। पितृसत्तामक व्यवस्था ने नारी को पूर्णतः पुरुष के अधीन कर दिया। सामान्य धारणा है कि प्रारम्भ में नारी की स्थिति इतनी दयनीय नहीं थी। समाज में उसे पुरुष के समान अधिकार प्राप्त थे मगर यह सम्पूर्ण सत्य नहीं है, क्योंकि यह समानता कुछ ही क्षेत्राों में थी। वास्तव में पुरुष सत्तात्मक समाज में वह द्वितीय श्रेणी की नागरिक ही थी।
यद्यपि साहित्यिक ग्रन्थों ने यह सिद्ध करने की चेष्टा की है कि ऋग्वैदिक काल (१५०० ई. पूर्व से १०००ई. पूर्व) में नारी याज्ञिक कर्मकाण्डों में पुरुष को सहयोग प्रदान करती थी और बालकों के समान बालिकाओं का भी शिक्षा प्राप्ति हेतु ’उपनयन संस्कार‘ होता था। ’अथर्ववेद‘ में वर्णित है कि ’’ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने के पश्चात् ही कन्या युवा पति को प्राप्त करती है‘‘ (ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्, अथर्ववेद, ११/५/८ )। कुछ स्त्रिायों को वैदिक मंत्राों की रचयिता भी कहा गया है, जिनमें लोमशा, लोपामुद्रा, विश्ववारा, सिकिता, यमी, शची, श्ाृद्धा, सूर्या, ब्रह्मवादिनी जुहू, इन्द्राणी, अम्भृणपुत्राी वाकृ, घोषा, अर्चनाना, गौरवीति, अपाला, असंगभार्या, अंगिराकन्या शाश्वती के नाम गिनाये जाते हैं, परन्तु यह सूची अपवाद स्वरूप कुछ और नामों को छोडकर आगे नहीं बढती। आरम्भ में स्त्रिायों ने वैदिक मंत्राों की रचना भले ही की हो, पर बाद में उनसे वेदाध्ययन का अधिकार भी छीन लिया गया था। यहाँ तक कि ’’उत्तर ऋग्वैदिक काल ( १००० ई. पूर्व से ५०० ई. पूर्व ) में शूद्रों तथा स्त्रिायों द्वारा वैदिक मंत्राों का उच्चारण भी वर्जित कर दिया गया था। इस युग में विवाह के अतिरिक्त उनके सभी संस्कार वैदिक मंत्राों के बिना किये जाते थे ‘‘ (राजा कुमुद मुखर्जी, हिन्दू सभ्यता, पृष्ठ १७२ )। ’मनुस्मृति‘ में भी वर्णित है कि ’’स्त्रिायों का संस्कार मंत्राों से नहीं होता, यही शास्त्रा की मर्यादा है। स्मृति, धर्मशास्त्रा तथा किसी मंत्रा पर भी इनका अधिकार नहीं है। इसलिए ये झूठ के समान अशुभ हैं‘‘ (नास्ति स्त्राीणां क्रिया मन्त्रौरिति धर्मे व्यवस्थितिः। निरिन्दि्रया ह्यमंत्रााश्च स्त्रिायोऽनृतभिति स्थितिः।। मनुस्मृति ९/१८)। परन्तु, अपवादस्वरूप यदि स्त्रिायाँ शिक्षा प्राप्त करती भी थीं तो उसकी भी एक निश्चित सीमा थी, क्योंकि एक वादविवाद के दौरान याज्ञवल्क्य ने गार्गी से कहा था-’’हे गार्गी! यदि तुझे मरने की इच्छा न हो, तो अधिक प्रश्न न पूछ।‘‘ (अतो गार्गि मतिप्राक्षीः मर्तुचेत्रोच्छसि, वृहदारण्यकोपनिषद् तृतीयाध्याये, षष्ठं गार्गी ब्राह्मणम् )। ’’इस तरह याज्ञवल्क्य के निषेध करने पर मस्तक गिर जाने के भय से गार्गी मौन हो गयी ‘‘ (याज्ञवल्क्येन निषिद्धा मूर्धपातभायद, परता सती, वृहदारण्यकोपनिषद्, तृतीयाध्याये, अष्टमक्षर ब्राह्मणम्)।
नारी की सामाजिक स्तर पर हीन दशा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस युग में उसे पासे एवं सुरा के साथ-साथ तीन प्रमुख बुराइयों में गिना जाने लगा था। पुत्रा जन्म की लालसा अपनी सारी सीमाओं को पार कर गयी थी। ’ऐतरेय ब्राह्मण‘ के अनुसार पुत्राी सभी दुखों का कारण तथा पुत्रा परिवार का रक्षक होता है। इस समय तक कन्याओं को यज्ञ करने का अधिकार नहीं रहा था, यह कार्य अब समाज में पुरोहित वर्ग के रूप में उदित एक नये वर्ग ने सम्पादित करना शुरू कर दिया था। इस तरह समय के साथ-साथ नारी शिक्षा के क्षेत्रा में गिरावट आने लगी थी। अब कन्याओं का उपनयन संस्कार किया जाना बन्द हो गया था, उन्ह गुरुकुल भेजने की प्रथा भी समाप्त हो गयी थी। उन्ह घर पर ही पिता, भाई, चाचा के द्वारा शिक्षा दी जाने लगी थी। उनको दी जाने वाली शिक्षा का स्वरूप शास्त्रा से सम्बन्धित न होकर गृह से सम्बन्धित था, जिसका एक मात्रा उद्देश्य उन्हें गृह-सम्बन्धी कार्यों में निपुण करना था।
सम्पत्ति में भी नारी का कोई अधिकार नहीं माना जाता था। ’ऋग्वेद‘ के एक मंत्रा में कहा गया है-’’तान्व (औरस) पुत्रा के होने पर उसकी बहन रिक्थ (पैतृक सम्पत्ति) में कोई भाग प्राप्त नहीं करती‘‘ (न जामये तान्वो रिक्थमारैच्चकार गर्भसबितुर्निधनाम्। पिता यत्रा दुहितुः सेकमृन्जन्तसं शाभयेन भनसा दघन्ये।। ऋग्वेद ३/१३/२)। स्त्राी सम्पत्ति की अधिकारी तभी होती थी जब माता-पिता की सन्तान केवल कन्याएँ हों। भारतीय समाज में उसे सम्पत्ति की संरक्षिका तो स्वीकार किया गया स्वामिनी कभी नहीं। ’’गुप्त वंश के प्रतापी शासक चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की पुत्राी प्रभावती गुप्ता ने अपने पति की मृत्यु के पश्चात् अल्पवयस्क पुत्रा की संरक्षिका के रूप में शासन भार संभाला था‘‘ (वी.सी. पाण्डेय, प्राचीन भारत का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास,भाग-२, पृ. १६५)। इसी प्रकार, सम्राट हर्ष की बहन राज्यश्री ने भी पति की मृत्यु के बाद कन्नौज का शासन हर्ष के आधीन कर दिया था। प्राचीन भारतीय इतिहास में ऐसी किसी स्त्राी का उल्लेख नहीं मिलता, जिसने स्वतंत्रा रूप से शासन भार संभाला हो।
महात्मा बुद्ध जैसे महान् विचारक की दृष्टि में भी नारी का स्थान तुच्छ था। बुद्ध ने नारियों को बौद्ध संघ में प्रविष्ट होने की आज्ञा अनिच्छापूर्वक देते हुए कहा था-’’आनन्द! यदि तथागत प्रवेशित धर्म विनय में नारियाँ घर से बेघर होकर प्रव्रज्या न पातीं तो यह ब्रह्मचर्य चिरस्थायी होता, सद्धर्म एक हजार वर्ष ठहरता। परन्तु चूँकि आनन्द, नारियाँ घर से बेघर हुई हैं, इसलिए अब यह ब्रह्मचर्य चिरस्थाई नहीं रहेगा, सद्धर्म पांच सौ वर्ष ही ठहरेगा‘‘ (वी.सी. पाण्डेय, भारत का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास, भाग-०१, पृ. ३३६ )।
पत्नी के रूप में भी नारी की स्थिति शोचनीय ही रही क्योंकि ’’उस स्त्राी को अच्छा माना जाता था जो पति को जवाब नहीं देती तथा पति के बाद भोजन करती थी, वह न केवल पति की वरन् पति के सगे-सम्बन्धियों की भी देखभाल करती थी‘‘ (आर. सी. मजूमदार, श्रेण्य युग, पृ. ६३०)। इसी तरह ’मनुस्मृति‘ में कहा गया है कि ’’स्त्राी को सदाचार से हीन, वासनापूर्ण आचरण से युक्त, गुणों से रहित पति की भी देवता के समान सेवा करनी चाहिए‘‘ (विशीलो कामवृत्तौ वा गुणैर्वा परिवर्जितः। उपचर्यः स्त्रिाया साध्व्या सततं देववत्पतिः।।, मनुस्मृति, ५/१५४)। ’स्मृति‘ में स्त्राी की हत्या तक का अनुमोदन किया गया है-’’जो स्त्राी नीच जाति के पुरुष से अवैध सम्बन्ध स्थापित करे, उसे कुत्तों से नुचवाकर मार डालना चाहिए।‘‘ (भतरिं लधयेता तु स्त्राी ज्ञातिगुणदर्पिता, तां श्रवभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते। मनुस्मृति, ८/३७१)। मनु के अनुसार-’’स्त्रा को सदैव पुरुष के अधीन रखना चाहिए। बचपन में पिता, युवावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में उसे पुत्रां के अधीन रहना चाहिए। ’’(बाल्या वा युवत्वा वा वृद्धया वापि मोषिता, न स्वातंत्रायेण कर्तव्यं किंचित कार्ये गृहेष्वपि। बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत्पाणिग्राहस्य यौवने। पुत्रााणां भर्तरि प्रेतेन भजेतस्त्राी स्वतंत्राताम्।। मनुस्मृति, ५/१४७-१४८ )। ’मनुस्मृति‘ में नारी के चरित्रा पर भी प्रश्नचिह्न लगाया गया है, क्योंकि मनु का विचार हैं ’’नारी का स्वभाव श्ाृंगारिक चेष्टाओं के द्वारा लोगों के चरित्रा को दूषित करना है। स्त्रिायाँ काम एवं क्रोध के वशीभूत होकर मूर्ख अथवा विद्वान पुरुषों को कुमार्ग की ओर प्रवृत्त कर देती हैं। अतः पुरुषों को चाहिए कि वह माता हो या बहन अथवा पुत्राी, किसी भी स्त्राी के साथ एकान्त में न बैठे।‘‘ (अस्वतंत्राः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम्, विषयेषु च सज्जन्तयः संस्थाप्या आत्मनोवशे। एवं स्वभावं ज्ञात्वासां प्रजापति निसर्गजम् परमं यत्रामातिष्ठेत्पुरुषोः रक्षणम् प्रति। मनुस्मृति, ९/२-१६)। इस काल में ’’नारी की सामाजिक स्वतंत्राता पर भी अंकुश लगना। प्रारम्भ हो गया था, अब वे सभाओं में भाग नहीं ले सकती थीं ‘‘ (आर.सी. मजूमदार, भारत का वृहत् इतिहास, भाग-१, पृ. ३७)।
’रामायण‘ महाकाव्य में भी सभी नारी पात्रा पतिव्रत धर्म का पालन करते दिखाये गये थे। कौशल्या, सुमित्राा, सीता, उर्मिला, मांडवी, मन्दोदरी, सुलोचना सभी नारी पात्राों को महान पतिव्रता की संज्ञा देकर देवी का स्थान दिया गया है, परन्तु सामान्य नारी के रूप में उनका चित्राण नहीं है। राम जैसा पुरुष भी वनगमन करते समय अपनी माता को पतिव्रत धर्म का उपदेश देता है। वास्तव में इस महाकाव्य में नारी को अनेक कर्त्तव्यों से युक्त किया गया है, परन्तु जहाँ अधिकारों की बात आती है वहाँ यह मौन है। इसी के अनुकरण पर तुलसीकृत ’रामचरितमानस ‘ में भी नारी के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाया गया है। इसमें एक स्थान पर ’समुद्र‘ कहता है-’ढोल, गंवार, शूद्र एवं पशु सभी दण्ड देने योग्य हैं।‘‘ (प्रभु भल कीन्हि मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं। ढोल-गंवार-शूद्र-पशु-नारी। सकल ताडना के अधिकारी। तुलसीदास, रामचरित मानस, सुन्दरकाण्ड, पृ. ७०५)। इसी प्रकार ’’जब शूर्पणखा, राम एवं लक्ष्मण के समक्ष प्रेम प्रदर्शित करती है, तब लक्ष्मण उसे अपमानित करते हुए कहते हैं कि जो पुरुष निर्लज्ज होगा वह ही तुम्हारा वरण कर सकता है।‘‘ (पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन वहि बहुरि पढाईड्ड लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरईड्ड तुलसीदास, रामचरितमानस, अरण्यकांड, पृ. ५८९)। अन्ततः लक्ष्ण द्वारा उसके नाक-कान काटना यह सिद्ध करता है कि उस युग में कामासक्त नारी के प्रति शारीरिक हिंसा करना अनुचित नहीं माना जाता था। इसी प्रकार, राम द्वारा सीता की अग्नि परीक्षा यह सिद्ध करती है कि रामराज्य में, जिसकी तुलना जनसाधारण श्रेष्ठतम युगों से करता है, उसमें भी नारी को अपने सतीत्व का प्रमाण देने के लिए पति निर्धारित नियमों से गुजरना पडता था। यद्यपि रचनाकार ने राम की मर्यादा को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से यह तर्क दिया है कि ’’सीता के वास्तविक स्वरूप को राम ने सीताहरण से पूर्व गुप्त रूप से अग्नि के पास सुरक्षित रख दिया था और अब इस प्रक्रिया द्वारा यह वास्तविक स्वरूप पुनः वापस लिया जा रहा है‘‘ (सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रकट कीन्हि चह अंतर साखी।। तुलसीदास, रामचरितमानस, लंकाकांड, पृ. ८१२) परिणामस्वरूप, सीता को अग्नि परीक्षा देने के लिए राम आदेश देते हैं। परन्तु यदि राम ने गुप्त रूप से सीता को अग्नि के पास सुरक्षित रख दिया था, तो यह वापस लेने की प्रक्रिया भी गुप्त रूप से सम्पन्न हो सकती थी। समाज के सामने कटु वचनो के साथ इस प्रपंच को करने का एकमात्रा उद्देश्य लोगों के समक्ष सीता की पवित्राता को दर्शाना मात्रा था। स्पष्ट है कि इस प्रकरण द्वारा समाज को मात्रा इतना संदेश देना था कि नारी चाहे कितनी भी पतिव्रता हो, उसे अपने सतीत्व का प्रमाण मांगे जाने पर देना होगा, भले ही वह राजकुल से सम्बन्धित हो। स्वयं सीता एक स्थान पर अग्नि से प्रार्थना करती हैं-’’यदि मैंने मन, वचन, कर्म से श्रीराम के अतिरिक्त किसी अन्य का ध्यान नहीं किया तो अग्निदेव आप मेरे लिए चंदन के समान शीतल हो जाएँ। (जौं मन वचक्रम मम उर माहीं। ताणि रघुवीर आन गति नाहींड्ड तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समानाड्ड, तुलसीदास, रामचरितमानस, लंका कांड, पृ. ८१३)
कौटिल्यकृत ’अर्थशास्त्रा‘ में भी नारी की स्वतंत्राता का विरोध किया गया है-’’यदि पत्नी बिना पति की आज्ञा के दूसरी स्त्राी स भेंट करने के लिए उसके घर जाती है, तो उस पर छह पण का अर्थदण्ड लगना चाहिए और यदि वह पुरुष से भेंट करने जाती है तो बारह पण। पति जब सोया हो या मदिरापान किये हुए हो, ऐसी स्थिति में यदि पत्नी गृहत्याग करती है, तो उसको बारह पण का अर्थदण्ड मिलना चाहिए। स्त्राी यदि किसी पुरुष से एकान्त में संदिग्ध स्थान पर हास-परिहास करे तो अर्थदण्ड के स्थान पर कोडों का दंड दिया जाना चाहिए। इसके लिए गाँव के चौराहे पर चाण्डाल द्वारा स्त्राी के शरीर पर दोनों ओर पांच-पांच कोडे लगाये जाने चाहिए‘‘ (ए.एल.वाशम, द वन्डर दैट वाज इण्डिया, पृ. १२७)
भारतीय समाज में विधवा स्त्राी के लिए यह आवश्यक था कि वह सात्विक जीवन व्यतीत करे। प्राचीन कानूनों के अनुसार, ’’विधवा को आत्मसंयम और कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए‘‘ (आर.सी. मजूमदार, श्रेण्य युग, पृ. ६३३) अन्यथा उसे पति के साथ सती हो जाना चाहिए‘‘ (वृहस्पति स्मृति, श्लोक ४८३-८४)। परन्तु, पुरुषों के लिए ऐसा कोई विधान नहीं था। पत्नी की दाह-क्रिया समाप्त करके पुरुष पुनः विवाह कर सकता था। वास्तव में, विधवाओं के पुनर्विवाह को रोकने के लिए ही सती प्रथा का जन्म हुआ था। महाकाव्य काल में महाराज पाण्डु की पत्नी माद्री पति के साथ सती हुई थी। यूनानी डियोडरस कहता है कि भारत में कई जाति में यह प्रथा प्रचलित थी। इसके अनुसार-’’विधवा स्त्राी को उसके मृत पति के साथ जला दिया जाता था‘‘ (मैकक्रिंडिल, इन्वेजन ऑफ इण्डिया बाई अलेक्जेन्डर, पृ. २७९)। यूनानी लेखक अरिस्टोबुल्स कहता है-’’३१६ ई. पूर्व एक भारतीय सेनानायक ईरान में यूमेनीस की सेना में लडने गया था तथा अपनी दोनों पत्नियों को साथ ले गया था। दुर्भाग्यवश, वह युद्ध में मारा गया, जिस पर उसकी दोनों पत्नियाँ सती होने के लिए आपस में लडने लगीं। चूंकि बडी पत्नी के गर्भ में बच्चा था, इसलिए दूसरी पत्नी चिता पर चढ गयी और पति के साथ सती हो गयी‘‘ (राधाकुमुद मुखर्जी, चन्द्रगुप्त मौर्य और उसका काल, पृ. २३५-३६)। परन्तु, सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण गुप्तकाल में मिलता है’’ पृ. ५१० ई. के एक लेख से पता चलता है कि गुप्त नरेश भानुगुप्त का सामन्त गोपराज हूणों के विरुद्ध युद्ध करता हुआ मारा गया और उसकी पत्नी उसके शव के साथ सती हो गई थी।‘‘
श्री भानुगुप्तो जगति प्रवीरो, राजा महान्पार्थसमोडति शूरः।
तेनाथ सार्द्धन्त्विह गोपराजो, मित्राानुगत्येन किलानुयातःड्ड
कृत्वा च युद्ध सुमहत्प्रकाशं, स्वर्ग गतो दिव्य नरेन्द्रकल्पःड्ड
भक्तानुरक्ता च प्रिया च कान्ता, भार्यावलग्नानुगताग्निराशिम्ड्ड
(ऐरण अभिलेख)
’’सम्राट हर्ष के पिता प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के पश्चात् उनकी माँ यशोमती वैधव्य के कलंक से बचने के लिए सरस्वती के तट पर चिता में जलकर सती हो गई थीं‘‘ (आर.सी. मजूमदार, श्रेण्य युग, पृ. ११२)।
पर्दा प्रथा ने भी नारी को अवनति की ओर धकेला। हिन्दू समाज में पर्दे की प्रथा ईस्वी सन् के प्रारम्भ में प्रचलित हो गई थी, परन्तु प्रारम्भ में यह राजकुलों तक ही सीमित थी, क्योंकि सार्वजनिक दृष्टि से बचने के लिए पर्दा धारण किया जाता था। बौद्ध काल की कुछ रानियाँ पर्दा युक्त रथों पर यात्राा करती थीं। इसी प्रकार, भास के नाटकों में भी पर्दा प्रथा का उल्लेख किया गया है। ’स्वप्नवासवदत्ता‘ में पद्मावती विवाह के पश्चात् पर्दा करती है। हर्षकृत ’नागानंद‘ से पता चलता है कि विवाह के पश्चात् स्त्रियाँ पर्दे में रहती थीं। भवभूति व माघ अपनी रचनाओं में पर्दे का वर्णन करते हैं। इससे स्पष्ट है कि तीसरी शताब्दी के लगभग समाज के कुलीन वर्ग में पर्दा-प्रथा का आरम्भ हुआ, जिसका अनुकरण समाज के सामान्य परिवारों में भी किया जाने लगा।
नारी जीवन की त्राासदी का एक पक्ष वेश्यावृत्ति के रूप में भी सामने आता है। प्राचीनकाल से ही यह प्रथा ’देवदासी‘ के रूप में हिन्दू समाज में रही है। ’’बनारस के दक्षिण में लगभग १६० मील की दूरी पर विन्ध्याचल की पहाडी पर स्थित रामगढ की गुफा से धार्मिक वेश्यावृत्ति का प्राचीनतम लेख प्राप्त हुआ है‘‘ (ए.एल. वाशम, द वन्डर दैट वाज इण्डिया, पृ. १३२)। मंदिरों में ये कन्याएँ देवदासी के रूप में नृत्यगान करती थीं। ’’कालिदास ने उज्जयिनी के महाकाल मंदिर में देवदासियों का वर्णन किया है‘‘ (के.सी. श्रीवास्तव, प्राचीन भारत का इतिहास एवं संस्कृति, पृ. ४६६)। दक्षिण में देवदासी प्रथा सामान्य रूप से प्रचलित थी, जहाँ यह आधुनिक काल तक चलन में रही। दक्षिण के अनेक अभिलेखों में देवदासियों के प्रसंग आये हैं जैसे-’’चालुक्य विक्रमादित्य षष्ठम के सेनापति ने अपनी माता की स्मृति में जिस मंदिर का निर्माण किया उसमें परम सुन्दर देवदासियों के लिए निवास स्थान बने थे‘‘ (ए. एल. वाशम, द वण्डर दैट वाज इण्डिया, पृ. १३२)। प्राचीन भारत में वेश्यावृत्ति को राजकीय संरक्षण प्राप्त था। ’अर्थशास्त्रा‘ वेश्याओं से राजकर एकत्रिात करने हेतु अधीक्षक की नियुक्ति का अनुमोदन करता है और कहता है कि प्रत्येक वेश्या को प्रति मास अपनी दो दिन की आय राज्य को ’कर‘ के रूप में देनी चाहिए‘‘ (ए.एल. वाशम, द वण्डर दैट वाज इण्डिया, पृ. १३१)। इसी प्रकार, महात्मा बुद्ध के समय में ’’आम्रपाली जो वैशाली के एक धनिक की पुत्राी थी। उसके अभूतपूर्व सौन्दर्य और गुणों के कारण लिच्छवियों की लोकतान्त्रिाक सभा में प्रचलित प्रथा के अनुसार यह निश्चय किया गया कि उसका विवाह नहीं होगा और सर्वलोक के भोग के लिए वह गणिका का जीवन व्यतीत करेगी‘‘ (आर.सी. मजूमदार, प्राचीन भारत पृ. १७४)।
प्राचीन भारतीय समाज में युवावस्था से पूर्व कन्याओं का विवाह अनिवार्य धार्मिक कर्त्तव्य माना जाता था। जिसके परिणामस्वरूप, अनमेल विवाह व बहुपत्नी विवाह होते थे। ३० वर्ष के पुरुष का १२ वर्ष की कन्या व २४ वर्ष के पुरुष का विवाह ८ वर्ष की कन्या के साथ करना शास्त्रासम्मत था‘‘ (आर. सी. मजूमदार, प्राचीन भारत, पृ. १७३)। बहुपत्नी प्रथा के चिह्न भारतीय समाज में प्रारम्भ से ही दिखाई पडते हैं। ’’याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थीं-मैत्रोयी और कात्यायनी‘‘ (सत्येतू विद्यालंकार, वैदिक युग, पृ. २१७)। इसी प्रकार, महाकाव्य काल में दशरथ, भीम, अर्जुन, कृष्ण; बौद्धकाल में शुद्धोधन, महाराज नन्द, बिम्बसार; मौर्यकाल में चन्द्रगुप्त मौर्य; गुप्तकाल में समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय आदि ने भी कई विवाह सम्बन्ध स्थापित किये थे।
यह मानना है कि नारी की स्थिति में गिरावट मुस्लिम आक्रमणकारियों के परिणामस्वरूप आयी तथा मध्यकाल की अपेक्षा प्राचीन भारत में नारी की स्थिति सुदृढ थी, सर्वथा भ्रामक है। क्योंकि भारतीय समाज में प्रारम्भ से ही नारी को पुरुष के अधीन रखा गया। सैद्धान्तिक रूप से तो समाज में उसे ’देवी‘ का स्थान दिया गया, परन्तु व्यावहारिक रूप में वह पुरुष की भोग्या ही थी। आदर्श नारी का वास्ता देकर उसे अनेक कर्तव्यों से लाद दिया गया। वास्तव में नारी की स्थिति में गिरावट ’आर्य सभ्यता‘ (१५०० ई. पूर्व से १००० ई. पूर्व) से ही दृष्टिगोचर होने लगी थी जो उत्तरोत्तर बढती चली गयी।
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