अगर आदमी के पास ’मन‘ न होता तो कितना अच्छा होता, भले ही आदमी बे मन होता परन्तु मन के हाथों मजबूर होकर बडी-बडी मुश्किलों में तो नहीं फँसता, अब आदमी क्या करे मन, है तो रखना ही पडता है। लालू ने अपना मन खुश रखा तो जनता अनमनी हो गयी, सो अब हरे चरागाहों में विचरण नही कर पा रहे हैं और रेलों की धडधडाती आवाजों को लोरी बता कर अपने मन को समझा रहे हैं। मन आदमी का हो या औरत का; लेखक का हो या पाठक का; चपल हो या चंचल, मन की महिमा तो अपरम्पार है।
मन चाहता है तो आदमी घोर गरीबी में चिकन बिरियानी खा-खाकर पकाने वाले चार बर्तन भी बेच लेता है, पीने को पानी नहीं है फिर भी मन चाहता है तो ८ पी एम पीता है और पियक्कड कहलाने लगता है उससे पूछो तो कहता है कि हम तो मन के मालिक हैं, जबकि सब मन के गुलाम हैं। प्रायः आदमी खुद तो मर सकता है लेकिन मन को नहीं मार सकता, कुछ लेखकों ने तो मन की स्तुति करने को ही कह दिया। कबीर ने कहा ’’माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर, कर का मनका डारि दे मन का मनका फेर‘‘ जबकि मन खुद भी निन्यानवे के फेर में रहता है। कभी-कभी तो यह मन आदमी को ढेरों जलालत भी झेलने को मजबूर कर देता है, मन ने चाहा और राह चलते किसी लडकी को छेड दिया और पिट गया आदमी, मन फिर खुश, यानी सब काम मन के और मन का कोई दोष भी नहीं। मन को कोई अच्छा लग जाय और न मिले तो आदमी को व्याकुल कर दे, और जनाब अचम्भा तो इस बात का है कि छोटे से आदमी का मन है कितना बडा जिसमें नफरत, ईर्ष्या, प्रेम , भक्ति, शक्ति और इसके अलावा अनेक अच्छे-बुरे भाव इसी मन में समा जाते हैं। और तो और इन्सानों की तरह मन में भी एकरूपता एवं एकमतता का अभाव है, अब मल्लिका का मन चाहता है कि कम से कम इनर वियर तो पहने ही जाएँ और दर्शकों का मन चाहता है कि यह भी न हों।।
मन क्या कुछ नहीं कर सकता......? मन नहीं चाहा देश की प्रधानमंत्राी बनना और सोनिया महान हो गयी, मन ने चाहा तेल भण्डार पर कब्जा करना और बुश को अपराधी बना दिया, लाखों लोगों की मौत का जम्मेदार बना बुश; मन फिर भी खुश। आडवाणी ने पाकिस्तान में जिन्ना के लिए जो मन ने चाहा वो कह दिया और अध्यक्षीय कुर्सी, खतरे में पड गयी। मन ने तो अपना सिर कछुए की तरह कपाल में छुपा लिया, अब आडवाणी अपने मन को टटोल रहे हैं। कुछ लोग मन लगाने की बजाय मन को मारना चाहते हैं, मगर साहब इसकी नाभि में तो शायद अमृत है जो इसे मरने नहीं देता। सलमान खान के मन ने ही तो चाहा था ऐश्वर्या को, सलमान ने मन को मारना चाहा, मन नहीं मरा, कुछ निर्दोष मर गये।
बिहार की दुर्दशा के लिए बगुलों की तरह चमकते नेताओं को दोषी ठहराना ठीक नहीं है। लालू, पासवान, नीतीश तो विकास को ही मुद्दा बनाकर चुनाव लडते हैं और बिहार का विकास करना भी चाहते हैं परन्तु बेचारे आदमी ही तो हैं, तो जाहिर है मन भी साथ है, जो विकास करना ही नहीं चाहता, गलती मन की और तख्ता पलटे लालू का, वाह रे मन। अब तक मन इस देश के सामाजिक एवं राजनीतिक विकास में एक बडी समस्या बन गया है, लेकिन वाह रे मन दुनिया का बडे से बडा डाक्टर या सर्जन भी मानव शरीर से इस मन को नहीं खोज पाया। अब मेरा मन कहता है कि डाक्टर प्रवीण तोगडया जरूर इस मन को मानव शरीर से खोज पाएँगे, लेकिन इसके लिए उन्हें मंचों पर शब्दों की चीर-फाड के बजाय ऑपरेशन थिएटर में जाना होगा और मन से मन को ढढना होगा। नहीं तो यही कहा जायेगा कि मन नहीं है चंगा तो कैसे बहेगी विकास की गंगा।
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