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इधर के नोटेबल नाटकों में नया क्या है
सत्यदेव त्रिपाठी
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१. ’बिखरे बिम्ब‘ में नया क्या है
एन.एस.डी. के पिछले नाट्योत्सव में गिरीश कार्नाड लिखित-निर्देशित नाटक ’बिखरे बिम्ब‘ खेला गया था, जिसकी तारीफों के चर्चे मुंबई तो क्या, पूरे देश व समस्त नाट्यप्रेमी संसार तक पहुंचे थे और तो और, जब नामवरजी ने मुंबई म मीडिया पर आयोजित सेमिनार के उद्घाटन-अवसर पर इस नाटक की अभिनव प्रयोग के नाम पर खूब सराहना की, तो इसे देखने की इच्छा एकदम बलवती हो उठी थी। संयोग की बात कि पिछले महीने (सिंतबर, ०६) कार्नाडजी इसे लेकर ’पृथ्वी थियेटर‘ मबई में आ गये और घर बैठे देखने का सुनहरा मौका मिल गया।
नाटक के पहले गिरीश जी ने मंच पर आकर बेहद शालीनता के साथ दो बातें बतायीं। पहली यह, कि ’पृथ्वी‘ की प्रेरणा से ही अरूधंती नाग के बंगलोर में अपने स्व. पति (शंकर नाग) की स्मृति में ’रंग शंकरा‘ थियेटर बनाया है। उन्होंने अपने रंग-जीवन की शुरूआत ’इप्टा‘ के साथ मुंबई से ही की थी (और मुझे याद करते देर न लगी १९८८ में ’आखिरी सवाल‘ की भूमिका में अरूंधती नाग को)। सो, ’पृथ्वी‘ के लिए उनके मन में अगाध प्रेम व असीम आदर है। इसलिए अपनी एकल भूमिका वाले इस नाटक को यहां आकर वे करना चाहती थीं। दूसरी बात यह, कि इक्कीसवीं शताब्दी विधुत माध्यमों के जरिए निजी एवं गोपनीय छबियों के बिखरने का युग है। इसी बिखराव को बांधने व दिखाने की कोशिश की है मैंने। चूंकि मैं नहीं जानता इस माध्यम के तकनीकी उपयोग को, सो इसके निदर्शन का जिम्मा सँभाला है के.एम.चैतन्य ने-सहनिर्देशक के रूप में। और देखने के बाद लगा कि यह गिरीश कार्नाड की अति उदारता व विनम्रता है कि चैतन्य का नाम दे दिया सह निर्देशक के रूप में, वरना जो किया है उन्होंने, वह तो बस, अंत में एक धन्यवाद जितनी लियाकत का है और उसी तकनीक को अभिनव प्रयोग के रूप में सराहा जा रहा है। पर यूं देखा जाये, तो उसमें नया क्या है? पात्रा अपने से बात करते ही रहे हैं मंच पर अपना ही मन एक दूसरे अपने ही मन से। वही दूसरा मन, जो अंतस् का व्यक्तित्व होता है, यहां टी.वी. के पर्दे पर आ जाता है। ज्यादा साफ हो जाती है प्रक्रिया फिल्मों में डबल रोल की तरह। और ज्यादा समझ में आने लगती है। इसके लिए मंच पर टी.वी. सेट रखे गये हैं। यह भी कोई बडी बात नहीं। मंच पर यंत्रा में बंद यंत्रावान आ चुका है। यहाँ तक कि लिफ्ट व क्रेन आ चुकी है जीवित नेवले-बिल्ली आ चुके हैं। टी.वी. रखकर व्यक्ति के अंतर्मन को दिखाने का प्रयोग थियेट्रिकली कुंद कहा जाना चाहिए। अभिनव की अपार क्षमता व संभावना के सामने बाड लग जाती है। टेकनीकली भी इसे करना आसान है। तब मुझे लगा कि नामवरजी भी नाटक गाहे-बगाहे ही देखते हैं जब कहीं बुलाये गये हों बोलने के लिए और उसी के बाद या पहले नाटक हो रहा हो। सो, जाहिर है कि उन्हें बहुत कुछ नया-नया ही लगेगा। खैर ,
नाटक शुरू होता है एक लेखिका के वक्तव्य से, जिसके एक बडे हिट अंग्रेजी उपन्यास पर बनी टेलीफिल्म का प्रसारण होने वाला है। वह सफाई दे रही है कि कन्नड की मशहूर लेखिका ने यह उपन्यास अंग्रेजी में क्यों लिखा। जाहिर है विषय व लेखकीय ’अर्ज‘ आदि की बातें आती हैं। यह उस पर लगे आरोपों का उत्तर भी है। इस तरह टी.वी. के माध्यम से एक साथ ही अपनी छवि को जमा देने के बाद जब वह स्टुडियो से चलने को होती है, टी.वी. से उसी का बिम्ब पुकार उठता है। और अंतर्मन से संवाद शुरू होता है। यही पूरा नाटक है। इसी के दौरान एक-एक करके राज खुलते हैं
कि उपन्यास उसकी छोटी बहन ने लिखा है। इसीलिए अंग्रेजी में है। बहन अब मर चुकी है।
कि लेखिका ने एक प्रस्तावना लिखकर अपने नाम से छपा लिया है।
कि इस बेईमानी के कारण लेखिका का पति घर छोडकर कहीं चला गया है।
कि काफी समय से बहन के कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न था।
कि माँ-पिता की मृत्यु के बाद छोटी बहन की सारी देखभाल का श्रेय नायिका को ही है।
कि नायिका असल में पिता से मिली उसकी संपत्ति की लालच में यह सब कर रही थी।
कि छोटी बहन की खूबसूरती व प्रतिभा के चलते नायिका हमेशा से हीनग्रंथि का शिकार रही।
कि इसी प्रतिभा व खूबसूरती के चलते नायिका का पति भी उसमें अनुसक्त हो चुका था।
कि नायिका के साथ गहन क्षणों में छोटी बहन की उपस्थिति का दंश बार-बार सहा है नायिका ने।
कि वह चाहती है कि यह वक्तव्य टीवी के माध्यम से पति तक पहुंचे बिम्ब बने, बिखरे, फैले.... जाहिर है ये मनुष्य की सर्वसामान्य प्रवृत्तियां हैं। जीवन में रोज व साहित्य में तथा मंच पर कितनी कितनी बार प्रस्तुत हो चुकी हैं। बहुत सराहनीय व उल्लेखनीय है अरूधंती नाग का अभिनय। एकदम सधा, संतुलित। भाव व विषय को बेहद सादगी से, पर संर्पूणता में संप्रेषित करता हुआ। इसके लिए यह नाटक अवश्यमेव दर्शनीय है चिरस्मरणीय तो रहेगा ही।
२. ’राजरक्त‘ में कहा क्या है ः
सितंबर, ०६ में ही ’नेहरू सेंटर‘ के नाट्योत्सव का शुभारंभ करने मुंबई आये थियेटर के जीवित लीजेंड जनाब हबीब तनवीर अपना नया नाटक ’राजरक्त‘ लेकर। छत्तीसगढी भाषा के साथ गीत-संगीत भरी उनकी लोकशैली तो मशहूर है ही धर्म के अतिचारों को एक्सपोज करना भी उनका प्रिय विषय रहा है। ’जमादारन‘ व ’पोंगा पंडित‘ सरनाम हैं ही। इसके जोखम भी वे उठाते हैं और फायदे भी। इस बार भी टैगोर के दो उपन्यासों ’राजर्षि‘ एवं ’विसर्जन‘ पर बना यह नाटक हिन्दू धर्म की बलि-प्रथा की कट्टरता को लेकर है। टैगोर की कृति पर नाटक करने की भारी ’स्पांसरशिप‘ न मिली होती तो यह नाटक उनके चयन की पसंद में आता या नहीं, की चर्चा दीगर है, पर जब बन ही गया है, तो यह निर्विवाद है कि ’हबीब साहब के नाटक‘ जैसा बिल्कुल नहीं बन पाया है। चाहे इसके लिए उनका बुढापा जिम्मेदार हो, या ’स्पांसरशिप‘ का फरमाइशी दबाब, पर यदि ऐसा ही करना है तो बडे कष्ट के साथ कहना पड रहा है कि हबीब साहब के लिए ’न करना‘ ही बेहतर होता रिटायर तो एक न एक दिन सभी को होना है।
सबसे अच्छा हिस्सा है नाटक की शुरूआत का, जब दो मासूम बच्चों के सवालों से आहत होकर राजा पूरे देश में ’बलि-प्रथा‘ पर रोक लगा देता है। संस्कार-भीरू सारी प्रजा एवं संतान-प्राप्ति के लिए बलि चढाने को उद्यत रानी... आदि लोगों के एतराज के बावजूद यह राजाज्ञा लागू हो जाती है। लोग तो डर-भय या संकोच-अनुशासन वश मान लेते हैं, पर मंदिर का पुजारी कतई नहीं मानता। राजा के सामने बोलबाजी भी करता है, जिससे धर्म की साख्ा का पता चलता है। फिर पुजारी ढेरों षडयंत्रा करता है। यहां तक कि राजा के सगे भाई को फोड लेता है। इतना करते पुजारी को दिखाना हिन्दू राजतंत्रा को उकसाने के लिए काफी है, नाट्यकला के साथ जबर्दस्ती यह कि इस षडयंत्रा के खुल जाने पर भी पुजारी को पकडता नहीं राजा। क्या इतना ताकतवर होता था पुजारी। या इतना कमजोर या फिर इतना उदार है राजा? इसके बाद भी पुजारी अंत तक अनेकानेक षडयंत्रा करता ही रहता है। यह सब कुछ राजकाज व नाटक, दोनों को झुठला देता है। पुजारी के कारनामों को इतना खींचा व फीचा गया है कि धर्म के पाखंडों को उघाडने में हबीब साहब का कलाकर्म व नाट्यर्म अधिक उघड जाता है। साफ-साफ लग जाता है कि हिन्दू कट्टरों को उत्तेजित करने के लिए जानबूझकर किया जा रहा है, ताकि मसीहा भी बना जा सके व नाम-दाम भी मिले। इसका आधा-पौना भी इस्लाम को लेकर किया जाये, तो ’इस्लाम ख्ातरे में है‘ का नारा लग जाये....।
ऐसे में सवाल उठता है कि इस तरह हिन्दू सहिष्णुता को उद्गारना कहां तक उचित है? इसीलिए पूछ रहा हूँ-कि हबीब साहब ने ’राजरक्त‘ में कहा क्या है? जब हबीब तनवीर जैसा कलाकार ही आवेश में आकर कलात्मक संतुलन खो बैठेगा, तो क्या होगा?
अंत में रँगे हाथों पकडे जाने पर भी राजा न जाने क्यों दो दिन की मोहलत दे देता है पुजारी को और इसका फायदा उठाकर सत्ता-पलट कराने में कामयाब हो जाती हैं प्रतिरोधी शक्तियां। बलि-प्रथा फिर से शुरू हो जाती है। इस यथास्थिति से नाटक की समाप्ति अवश्य काफी व्यंजक है। जैसे नहीं पता चलता कि पुजारी की इतनी सारी कारगुजारियाँ क्यों चला ली जा रही हैं, उसी प्रकार पुजारी बने कलाकार रामचन्द्र को नहीं मालूम कि ऐक्टिंग के नाम पर वह क्या कर रहा है। और निर्देशक यह सब कैसे करा रहा है। कलाकार भी कमजोर हैं जैसे कच्ची हो निर्मिति। बस, नगीन तनवीर को देखना प्रस्तुति का सबसे आनंददायक सिला है उसका विश्वास, उसकी गति और उसका गायन तो.... बस, आहा। हां, समूह लोकनृत्य भी खूबसूरत हैं। लोकसंगीत मनभावन है। जैसे ’लोक‘ ही रह गया हो, ’मंच‘ गायब हो रहा हो ’नया थियेटर‘ से....। नयनाभिराम हबीब का अंत में भी मंच पर न आ पाना भारतीय रंगमंच की वह क्षति है, जो कभी पूरी न होगी। नये आने वाले दर्शक तरसेंगे और हम गर्वान्वित होंगे कि हमने हबीब साहब जैसे महान कलाकार को मंच पर खडे तो क्या, भांति-भांति की भूमिकाओं में ऐक्टिंग करते, नाचते-गाते देखा है....।
३. ’टोपी शुक्ला‘ में किया क्या है
’अंक‘ नाट्यसमूह ने साम्प्रदायिकता एवं फरकापरस्ती की थीम पर फिर एक जहीन कृति को उठाया है। इस अहम समस्या के प्रति समूह की संवेदना निर्विवाद है और पहले (जिस लाहौर नाहिं देख्या) की व्यावसायिक सफलता का सहारा भी कम नहीं है। याने ऐसे मुद्दों पर जनता भी जागरूक है तथा एक जहीन रंगकर्मी हिम्मत करने का जोख्ाम उठा रहा है संभावनाएं यही हैं।
परन्तु ’टोपी शुक्ला‘ उपन्यास है राही मासूम रजा की बेजोड कृति। नाटक बनाने में यह वैसा बना नहीं। जब तमाम मेजर भाग सूत्राधार बने दिनेश ठाकुर के डल व लडखडाये (फ्लंबिंग करते) नैरेशन में चला जाये-याने नाटक के सूत्रा को धराने वाला नाटक को धारण करने वाला बन जाये, तो रूपांतर की सीमा आपो-आप खुल जाती है। यही ’अंक‘ की भी सबसे बडी सीमा बनती जा रही है निर्देशक का व्यामोह कि सारी प्रमुख पुरुष भूमिकाएं वह खुद करे एवं सारी प्रमुख स्त्राी भूमिकाएं पत्नी करे। देख-देखकर दर्शक पक गया है। ’पृथ्वी‘ के पहले दूसरे शो में ’टोपी शुक्ला‘ जैसी रचना, जिसे पढते हुए चार दशकों बाद भी न पाठक ऊब रहा है, न थक रहा है, को देखने मात्रा बीस-पचीस लोगों का आना इसी तथ्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
यही हाल स्लाइडों के प्रयोग का भी है। नाट्य में न ढाल पाने के ढाल हैं ये प्रयोग, जिनमें नाट्य की धार कुंद हो गयी है और जिनके बीच पिस गयी है प्रस्तुति। तब निर्देशन क्या कर लेगा? और यहां तो दोनों एक हैं वरिष्ठ रंगकर्मी दिनेश ठाकुर। फिर डिजाइन भी उन्हीं का है। ऊपर से वही सूत्राधार को निभाते भी हैं। सो, हश्र वही कि ’ग्रह ग्रहीत पुनि वात बस, तेहि पुनि बीछी मार, ताहि पियाये वारूणी कहहु कवन उपचार‘? पर उपचार है रजा साहब की यह रचना, जो है ही इतनी जबर्दस्त कि इस मंचन को ’घी के लड्डू टेढे भी भले‘ सिद्ध कर देती है। तभी तो बोलने में इतने फीके संवाद भी अपनी मूल तेजी व असर के चलते श्रवणीय हो सके हैं। मूल के लहकते प्रसंग नीरस प्रस्तुति को जो उबाऊ नहीं होने देते। सूत्राधार के गैर-लाजमी फैलाव ने मूल पात्रात्व को काफी काटा है, फिर भी रवि खानविलकर ने चुनाव को सार्थक करते हुए टोपी को सोगहग बना दिया है। लेकिन इफ्फन के लिए अमित ऐसा ही नहीं कर सके। सकीना की शोख्ाी व शेखी तो झलकी, लेकिन उसकी तुर्शी व पीडा के पास भी नहीं फटक सकीं प्रीता। वाजिद व सलीमा के रूप में मख्ाीजा व गीतांजलि किलके जरूर, पर क्लिक नहीं हुए। इस प्रकार रजा साहब का जो ’द ग्रेट‘ टोपी शुक्ला है, वह ’अंक‘ में यदि सामान्य भी बन सका, तो उसी के कारण..... उस महान कथाकार को सलाम।
४. ’हम रहे न हम‘ का सरोकार क्या है ः
इस वर्ष का ’संगीत नाटक अकादमी‘ पुरस्कार नाट्य निर्देशन के लिए मिला है अपने तमाम अभिनव प्रयोगों के लिए मशहूर भी रंजित कपूर को। उन्हेांने रंगकर्म तो दिल्ली में रहकर किये हैं, पर शहर मुंबई ने उन्हीं के निर्देशन में नाटक प्रस्तुत करके उनके सम्मान का अनुपम उपक्रम किया। फलतः मुंबई के नाट्यरसिकों को एक सुंदर तोहफा मिला ’हम रहे न हम‘, जिसे देखने के बाद सचमुच ही अहसास होता है कि हम वही नहीं रहे, जो नाटक देखने आये थे। और इन सबके लिए नये नाट्यसमूह ’नक्षत्रा‘ व इसके संचालक श्री संजीव चोपडा को श्रेय देना ही पडेगा।
रजित जी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से हैं गोल्डमेडलिस्ट। उन्होंने इस नाटक में सभी कलाकार रानावि के ही लिये एक दिलनाज ईरानी को छोडकर। इस तरह बहुत दिनों की हमारी साध भी पूरी हुई इस शहर में रह रहे तीन सौ से अधिक रानावि छात्राों का किया एक नाटक तो देखने को मिला और प्रशिक्षण से फ व सधे अभिनय से बनता जादू सर चढ कर बोला.... कोई किसी से कम नहीं....।
माँ बनी सपना की चार बेटियों (नम्रता, नीतू, मेघना, उर्वशी) दो बेटों (सत्यजीत व मनीश) एक बहू (दिलनाज), एक दामाद (महेन्द्र) व एक पारिवारिक मित्रा (सुशील) के बीच चलती कहानी सबकी चरित्रिाक पहचान तो कायम करती ही है, कलात्मक ’फन‘ व सृजन से शुरू होकर प्यार व ईर्ष्या आदि संवेगों-आवेगों से होते हुए अभाव, लोभ, क्रूरता, शाहखर्ची, आवारगी और सबसे अधिक संपत्ति को लेकर रस्साकशी तक के बीच निर्मल मनुष्यता व निःशब्द सादगी के जीवनदर्शन तक जाती है। इसमें नफासत भरी नाट्यकला व यथार्थ से संचालित अपने-अपने जीवन के विविध रूप बेहद खूबसूरती से पिरोये गये हैं।
पर समझ में नहीं आया कि इस नाटक का समाज के साथ सरोकार क्या बनता है। काश, अपनी निजताओं से निकलकर वे कुछ बाहर भी आ पाते।
फिर भी ऐसी संकुल संरचना वाले जे.बी. प्रिस्टले के नाटक ’टाइम एण्ड द कॉनवेज‘ का ऐसा सटीक रूपांतर भी रंजितजी जैसे विशेषज्ञ के बूते की ही बात थी। इन सबको उतनी ही सफाई व सलीके से प्रस्तुत भी किया है उन्हेांने। पार्श्व ध्वनि व संगीत का योग भी खूबसूरत है। ऐसे प्रयोग के लिए उनका इस्तकबाल तथा पुरस्कृत होने पर नाट्य-प्रेमियों की तरफ से अभिनंदन....।
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