|
Vartmaan Sahitya ::October, 2006 Sponsered by : Decor Home, Bikaner साम्प्रदायिकता वैज्ञानिक सोच और मानवीय जीवन-मूल्यों को नकारती है
कुंवरपाल सिंह
स्वतंत्रा भारत की यह विडंबना है कि देश की सबसे बडी पार्टी कांग्रेस ने साम्प्रदायिकता तथा उससे जुडे सवालों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। अपने धर्मनिरपेक्ष चेहरे को साफ रखने के लिए जितना उनके राजनीतिक हित के लिए आवश्यक था, उतना ही उन्होंने साम्प्रदायिकता का विरोध किया। साम्प्रदायिकता के मूल पर प्रहार करना, उनके एजेंडा पर कभी नहीं रहा। कांगेस अपने वर्ग-चरित्रा के अनुसार साम्प्रदायिकता के प्रति ’चेक एण्ड बेलेंस‘ की नीति अपनाती रही है। किसी भी देश में पूँजीवाद तथा भूस्वामित्व पर आधारित पार्टी पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकती, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता तथा जातिवाद एक सीमा के बाद उनके मार्ग में बाधा बन जाते हैं। यह बात कांग्रेस के अतिरिक्त समाजवादी पार्टी तथा अन्य गैर-वामपंथी पार्टियों पर भी लागू होती है। इन गैर-वामपंथी पार्टियों को अवसरवादिता के कारण साम्प्रदायिकता का भूत दिनों दिन विकराल रूप धारण करता जा रहा है। यह देश की साझी विरासत और हमारे इतिहास-बोध को नष्ट किए दे रहा है। इन पार्टियों ने तर्क और विवेक की कसौटी पर कुतर्को के मायाजाल रच दिए हैं। इन कुतरकियों के पास डिग्रियाँ तो बहुत हैं, किन्तु हैं ये अनपढ। कार्ल माक्र्स ने इन्हीं लोगों के लिए कहा था-’’अज्ञान सबसे बडा राक्षस है। इसके अतीत में अनेक त्राासदियों को जन्म दिया है और भविष्य में और कितनी त्राासदियों को ये अज्ञान जन्म देगा, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।‘‘
इस अज्ञान के नमूने हमें पिछले बीस सालों में सबसे अधिक मिले हैं। कांग्रेस ने अपनी अवसरवादिता के कारण राम-मन्दिर के नाम पर बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा दिया। जब मुसलमानों ने विरोध किया तो, कांग्रेस ने ’शाहबानो केस‘ उठा कर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को खारिज कर दिया। ये दोनों ही कदम साम्प्रदायिक शक्तियों के लिए वरदान साबित हुए। ’संघ परिवार तथा उसकी ६४ भुजाएँ‘ (डा. नमिता सिंह की महत्वपूर्ण पुस्तक जो १९९९ में प्रकाशित हुई) सक्रिय हो गईं। जो व्यक्ति और संस्थाएँ मूर्ति-पूजा विरोधी थीं, उन्होंने भी हिन्दुत्व के इस अज्ञान में तन-मन-धन से सहयोग दिया। इनमें प्रमुख रूप से आर्य समाज तथा गुरु गोरखनाथ के मन्दिर तथा अनुयायियों का नाम लिया जा सकता है धर्म जब राजनीति और सत्ता के लिए इस्तेमाल होता है, तब उसका चेहरा अत्यन्त अमानवीय एवं विकृत दिखाई देता है। बाबरी मस्जिद का विध्वंस इन साम्प्रदायिक शक्तियों का सबसे बर्बर और घिनौना कार्य था। इतिहासकारों एवं साहित्यकारों के सारे तर्क ताक पर रख दिए गए। इतिहास में कभी-कभी मिथ यथार्थ से बडा हो जाता है। संघ परिवार तथा भाजपा को राममन्दिर में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उन्होंने धर्म और इतिहास के हाथी पर सवार होकर सत्ता प्राप्त कर ली। और वह कार्य हो गया जिसकी कल्पना किसी ने न की होगी। कांग्रेस को अवसरवादिता के कारण भारी हानि उठानी पडी। लेकिन फिर भी उन्होंने इतिहास से सबक लेना नहीं सीखा। कांग्रेसी प्याज भी खाते हैं और कोडे भी सहते हैं। साम्प्रदायिक राजनीति का सबसे बडा हथियार है अफवाह फैलाना। साम्प्रदायिक शक्तियों ने आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का दुरुपयोग पाखण्ड तथा अंधविश्वास फैलाने में किया है। २१वीं शताब्दी के मुँह पर यह एक करारा तमाचा है। हमारा सारा संपन्न मध्यवर्ग सारे आवश्यक कार्य छोडकर अंधभक्ति में मूर्तियों को दूध पिलाने में जुट जाता है। यही पद्धति दंगों में भी अपनाई जाती है। हिन्दी के समाचार-पत्रा इन पाखण्डों तथा अंधविश्वासों को फैलाने में काफी योगदान देते हैं। इन समाचार पत्राों का उद्देश्य शुद्ध व्यापार है। ये साम्प्रदायिकता, अंधविश्वास तथा धार्मिक पाखण्डों को खूब बेचते हैं। इस प्रकार इन समाचार पत्राों की भूमिका समाज-विरोधी है।
साम्प्रदायिक शक्तियों को नए-नए नारे गढने में महारत हासिल है। ’वंदे मातरम‘ की समस्या १९४७ में ही सुलझ गयी थी। हमारे संविधान में यह निश्चित कर दिया गया था कि देश का राष्ट्रीय गीत केवल ’जन-गण-मन‘ है। लेकिन अभी भी उन्होंने एक नया नारा दिया-’’इस देश में रहना होगा, वंदे मातरम् कहना होगा‘‘। इस नारे को सुनकर मुल्ला-मौलवी भडक गए। उन्होंने फतवा जारी कर दिया कि मुसलमान ’वंदे मातरम्‘ नहीं गाएंगे। जनता की मूल समस्याओं से न तो भाजपा, संघ परिवार को कोई सरोकार है, न ही किसी अन्य पार्टी को। ये काठ की तलवारें लेकर जनता के सामने नौटंकी करते हैं। परदे के पीछे दोनों एक हैं। किन्तु अब जनता सब समझने लगी है।
इस प्रसंग में सबसे हास्यास्पद स्थिति भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं तथा प्रांतीय मंत्रिायों की रही। कई टी.वी. चैनलों ने उनके इंटरव्यू लिए। सबने पूछा कि ’वंदे मातरम्‘ किसने लिखा और कब लिखा है? पूरा गीत सुना दीजिए। भाजपा चुनाव रूपी वैतरणी को इस गीत के माध्यम से पार करना चाहती थी, किन्तु उसके एक भी नेता न तो ’वंदे मातरम् का लेखक एवं समय बता सके और न पूरा गीत ही सुना सके। भाजपा के नवदीक्षित पुरोहित आरिफ मोहम्मद खाँन जरूर इस परीक्षा में पास हो गए।
कांग्रेस भी इससे पीछे नहीं रही। अर्जुनसिंह ने तो ७ सितंबर २००६ की तारीख तय कर दी कि वंदे मातरम् इस तिथि का शताब्दी वर्ष है, अतः सभी स्कूलों में इसे गाया जाए। बिना सोचे-समझे तमाम प्रांतों तथा केन्द्र सरकार के स्कूलों को निर्देश जारी कर दिए गए। जब कांग्रेस के उच्च नेतृत्व को पता चला कि इससे राजनीतिक नुकसान होगा, तब उन्होंने (अर्जुन सिंह ने) अपना आदेश वापस ले लिया। जब हमारे राष्ट्र की धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाली पार्टी का शिक्षा मंत्राी इतना अनपढ एवं अवसरवादी हो तो देश की शिक्षा का अल्लाह ही मालिक है। यहाँ यह बताना अनुचित न होगा कि यह गीत बंकिमचन्द्र चटर्जी के बहुचर्चित उपन्यास ’आनंदमठ‘ से लिया गया है। आनंदमठ की रचना सितम्बर १९०२ में हुई। फिर २००६ को शताब्दी वर्ष कहना इतिहास के साथ मजाक है। अब इस गीत की वास्तविकता पर भी बात कर ली जाए। इस गीत को मठ के संन्यासी गाते हैं, जो देवी दुर्गा (काली) के भक्त हैं। मठ के पास अपार संपत्ति एवं जमींदारी है। इस जमींदारी में कृषक समुदाय का बहुमत मुसलमानों का है। वे मठ के जमीदार, महंतों तथा संन्यासियों से बहुत पीडत हैं। वे इस अन्याय एवं अत्याचार का विरोध करते हैं। उन पर दमन करने के लिए महंत सन्यासियों की सेना तैयार करते हैं। वंदे मातरम् का जयघोष करते हुए मठ के संन्यासी मुसलमान किसानों के गाँव में आग लगा देते हैं। इसे आप देशभक्ति कहेंगे या बर्बरता। यह आर्थिक साम्प्रदायिकता का पहला स्पष्ट प्रमाण है। प्रेमचंद उस समय के अकेले लेखक हैं, जो किसानों पर जमींदारों के अत्याचार एवं दमन का विरोध करते हैं। वे मठों एवं महंतों की जमींदारी को साधारण जमींदारों से अधिक घातक मानते हैं। उनका सूत्रा वाक्य है-जब धर्म, धन और सत्ता तीनों मिल जाते हैं तो कोढ में खाज की तरह होते हैं। इसका इलाज बहुत मुश्किल है। उनके दो महंत सेवाराम तथा आसाराम हमारी बीसवीं शताब्दी के सबसे बडे खलनायक हैं। बंकिम बाबू ने उन्हीं महंतों को नायक बनाया है, यह कैसी राष्ट्रीयता है? यह उपन्यास अंग्रेजों के समर्थन तथा मुसलमानों के विरोध के लिए विख्यात है। इसे राष्ट्रीय उपन्यास कहना जनतंत्रा एवं धर्मनिरपेक्षता का खुला अपमान है।
हिन्दी के पाठकों के लिए सुखद आश्चर्य है कि माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के संासद तथा पोलिट ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी की एक पुस्तक आई है-’घृणा की राजनीति।‘ इसमें साम्प्रदायिक राजनीति के तमाम पक्षों पर विचार किया गया है। इसके साथ ही उन्होंने साम्प्रदायिक शक्तियों द्वारा किये जाने वाले मिथ्या प्रचार का तर्कसंगत उत्तर दिया है। वर्तमान राजनीति पर किसी भी राजनीतिक दल के नेता द्वारा रचित यह एकमात्रा महत्वपूर्ण पुस्तक है। यह घृणा की राजनीति का ऐतिहासिक परिवेश में तर्कसम्मत विश्लेषण करती है।
श्री येचुरी ने साम्प्रदायिकता के विभिन्न पक्षों का ऐतिहासिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण किया है। यथार्थ तथा वैज्ञानिक दृष्टि के बिना आज के युग में किसी भी चीज का तर्कसम्मत विवेचन संभव नहीं। पूर्वग्रह से भी तथ्य उलझ जाते हैं। उन्होंने साम्प्रदायिकता को संपूर्ण रूप में व्याख्यायित करते हुए विश्लेषित किया है तथा साम्प्रदायिक शक्तियों की आर्थिक आधारभूमि को भी रेखांकित करने का भी प्रयास किया है।
सांप्रदायिकता तथा धर्म के संबंधों पर येचुरी के विचार हैं-’’सचाई यह है कि हिन्दू राष्ट्र की विचारधारात्मक आधारशिला २० के दशक में ही वी०डी० सावरकर ने रख दी। १९२५ में आर.एस.एस. ने अपने गठन के बाद इस विचारधारा को अपनाया और इसे एक सांगठनिक ढाँचा प्रदान किया। खासतौर पर ३० के दशक के अंत में अंग्रेजों द्वारा प्रोत्साहित सांप्रदायिक विभाजन का उन्होंने भरपूर इस्तेमाल किया।‘‘ (पृ. ३३)
श्री येचुरी के अनुसार अंग्रेजों ने अपने औपनिवेशिक शासन को बनाए रखने के लिए धर्म को सांप्रदायिकता का रूप दे दिया, नहीं तो सांप्रदायिकता तथा धर्म दो भिन्न वस्तुएँ हैं।
माक्र्सवाद तथा धर्म के संबंध पर आम लोगों का विचार है कि धर्म का माक्र्सवाद से कोई लेना-देना नहीं है। माक्र्स की एक अत्यंत विख्यात उक्ति ’धर्म जनता की अफीम है‘ को आधार बना इस प्रकार की बातें कही जाती हैं। किन्तु जो ऐसी समझ रखते हैं वे माक्र्स के इस कथन को न तो पूर्णरूपेण पढते हैं और न ही उद्धृत करते हैं। इसमें माक्र्स ने आगे कहा है कि धर्म वास्तविक पीडा की अभिव्यक्ति भी करता है तथा इस के खलाफ विरोध प्रदर्शन भी करता है। धर्म उत्पीडत जनता की आह है तथा हृदयहीन दुनिया का हृदय है। वस्तुतः, धर्म को माक्र्स ने इसलिए अफीम कहा है कि धर्म अफीम की भाँति एक भ्रामक संसार रचने की सामर्थ्य रखता है। अफीम की जरूरत इसीलिए पडती है कि हम अपनी पीडा को छुपाना चाहते हैं। धर्म यही करता है। जब पीडा तथा सन्ताप सामर्थ्य से बाहर हो जाता है, तब धर्म ऐसी शक्तियों को सहारा देता है।
फासीवाद क्या है? फासीवाद पजीवादी शासन के प्रतिक्रियावादी, कट्टर तथा साम्राज्यवादी होते जाने वाली आतंकवादी तानाशाही का नाम है। फासीवाद का जन्म तब होता है जब शासक वर्ग को लगता है कि कोई उसके वर्गीय वर्चस्व के लिए खतरा बन गया है। यह खतरा मेहनतकश जनता के वंचित हिस्सों, सर्वहारा की ओर से उत्पन्न होता है।
आर.एस.एस. भारत के एक ऐसे सांप्रदायिक तथा फासीवादी तौर-तरीके वाला संगठन है जिसका एक निश्चित एजेंडा है और इस एजेंडा को पूरे देश में लागू करना उसका लक्ष्य है। गोलवरकर ने फासीवाद की प्रशंसा करते हुए उसके तौर तरीकों को सीखने की खुलेआम अपील की थी-’’अपनी नस्ल तथा संस्कृति की शुद्धता की रक्षा करने के लिए देश की साथी नस्ल का, यहूदियों का सफाया करके जर्मनी ने सारी दुनिया को स्तंभित कर दिया था। यहाँ नस्ली गौरव के चरमोत्कर्ष की अभिव्यक्ति हुई है। जर्मनी ने यह भी दिखा दिया है कि बुनियादी भिन्नताओं वाली नस्लों तथा संस्कृतियों का एक एकीकृत समग्रता में घुल-मिल पाना लगभग असंभव ही है। यह हम हिन्दुस्तान के लोगों के लिए एक अच्छा सबक है कि इससे सीखें और लाभ उठाएँ।‘‘ यहाँ नस्ल की जगह केसरिया सेना ने धर्म तथा सभी नस्लों की जगह मुसलमान को बैठा कर हिटलर के विचार को अपना बना लिया है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि हिटलर जिस प्रकार गोलवरकर का हीरो था, उसी प्रकार मौलाना अब्दुल अली मोइदी का भी। स्मरण रहे कि गोलवरकर की पुस्तक छपने के दो वर्ष बाद जमात-ए-इस्लामी की स्थापना हुई। मौलाना अबुल अली मोइदी के नेतृत्व में इस संगठन का स्थापना सम्मेलन हुआ। मोइदी का जमात-ए-इस्लामी में वही स्थान है जो आर.एस.एस. में गोलवरकर का। इन दोनों संगठनों का राजनीतिक लक्ष्य भी लगभग एक ही है। वस्तुतः ये संगठन सांप्रदायिकता के जहर को व्यापक रूप से फैलाते हैं तथा देश की जनता के हितों के खिलाफ काम करते हैं।
थोडे बहुत अन्तर भी हैं, किन्तु इससे इन दोनों के बीच की समानता खत्म नहीं होती है। इन दोनों ही संगठनों में निवर्तमान नेता द्वारा अगला नेता चुने जाने की अलोकतांत्रिाक पद्धति है। दोनों ने ही देश की आजादी की लडाई में योगदान नहीं दिया। यद्यपि तथ्यों से यह प्रामाणित हो चुका है कि आर.एस.एस. ने तो खुद को आजादी की लडाई से दूर रखा। वर्तमान में भी इन दोनों सांप्रदायिक शक्तियों का मेल-जोल दिख ही जाता है। १९ जुलाई १९९९ को हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकवादी संगठन लश्करे तैयबा के सूचना सचिव ने भाजपा की विदेश तथा परमाणु नीति तथा कारगिल युद्ध से निपटने की नीति को सराहा था तथा उसका हिमायती बनकर आया था।
वस्तुतः ऐसी अशिक्षा एवं अज्ञान के कारण ही ये दोनों फासीवादी साप्रदायिक तत्व अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की शर्त के लिए अतीत की घटनाओं की तथा इतिहास की गलत ढंग से व्याख्या करते हैं तथा प्राचीन एवं मध्ययुगीन पाशविक विचारों को आज के वैज्ञानिक युग पर थोपने की कोशिश करते हैं।
गोलवरकर का सबसे बडा योगदान फासीवादी हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए संगठनात्मक ढाँचा प्रदान करना है। गोलवरकर ने ही संघ परिवार की स्थापना की थी, जो आज घृणा की राजनीति का सबसे बडा संवाहक है। यद्यपि ऊपरी तौर पर इसे सांस्कृतिक गतिविधियों का संगठन बना कर पेश किया गया था। लेकिन जिसका उद्देश्य था धीरे-धीरे भीतर ही भीतर जनता में वैमनस्य का विष मिलाकर- ’हिन्दू राष्ट्र‘ का संदेश प्रचारित करना।
यही नहीं, इस पुस्तक में गोलवरकर ने अपने विचारों की पुष्टि के लिए तथ्यों को तोड मरोड कर तथा अपने सिद्धान्तों को उचित ठहराने के लिए कुछ अन्य विचार स्थापित करने का भी काम किया। जैसे यह साबì
Discuss this topic on KhabarExpress Forum
|
|
October, 2006 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | March, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | April, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | May, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | June, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | |
|