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’समरवंशी‘ उपन्यास और नक्सलवाद
डॉ. विजय बहादुर सिंह

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योंतो हिन्दी उपन्यास ने दो शताब्दियों की यात्राा लगभग तय कर ली है या कहें डेढ शताब्दी, फिर भी उसकी कोई एक सुनिश्चित रूपरेखा बन चुकी हो या कोई अन्तिम और निर्णायक ढाँचा मान सा लिया गया हो ऐसा कहा नहीं जा सकता। हिन्दी भाषी क्षेत्रा, उसकी लोक-विरादरी कला-बोध और साहित्यिक दृष्टि को लेकर अब तक जो बातें कही सुनी जा रही हैं उनमें परम्परागत लोक-दृष्टि यदि एक तरफ है तो शास्त्रा दृष्टि दूसरी तरफ। शास्त्रा के साथ भी कई दिक्कतें बेहद चुनौतीपूर्ण अंदाज में खडी हैं। कौन सा शास्त्रा? साहित्य शास्त्रा अथवा सौन्दर्यशास्त्रा? इस आधारभूत प्रश्न के साथ दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न शास्त्रा की देसी परदेसी जमीनों का है। एक वह जो भारतीय चिन्तन परम्परा की उपज है तो दूसरा जो यूरोप, अमरीका आदि देशों से चलकर आया है और अन्य सारी चीजों की तरह हम आधुनिकतावादी भारतीयों को पश्चिमीन्मुखता और वैचारिक पर जीविता की पहचान बन गया है।
 फलतः हिन्दी उपन्यास का जो टूटा-बिखरा शास्त्रा सामने आता है वह यही कि उपन्यास एक गतिशील ढाँचा है और उसे लेकर कोई निर्णायक बात अभी नहीं की जा सकती।
 पाठक और लेखक का स्थायी और सनातन संबंध यही है कि दोनों एक दूसरे के प्रति वैचारिक ईमानदारी और भावात्मकता का व्यवहार कर सकें। इस पृष्ठभूमि पर जब हम सोहन शर्मा द्वारा लिखित उपन्यास ’समरवंशी‘ पर विचार करते हैं तो पहली ही निगाह में यह कहना जरूरी हो जाता है कि उपन्यास का एक ढांचा विचारात्मक भी हो सकता है।
 भारत और यूरोप में भी शायद ही कोई ऐसा साहित्य चिन्तक हो जो विचारहीन लेखन का समर्थक हो। देखना सिर्फ यह है कि विचारों का यह नियोजन कहीं अत्यंत मशीनी और शास्त्राीय ढंग से तो नहीं की गई है? यदि की गई है तो निस्सन्देह एक भयावह कलात्मकमूढता या अविवेकमत्ता है, जो कलारूप को प्रभावशून्य तो बनाएगी साहित्य की सांस तो इसी सम्प्रेषण के बल पर चलती है।
 यह सुखद है कि ’समरवंशी‘ एक विचारधारात्मक या अधिक सही अवधारणात्मक कथा-लेखन होकर भी बेहद साफ-सुथरा और विमर्शकारी है।
 उपन्यास में सबसे ज्यादा तीखी आलोचना उस वामपंथी विचलन और भटकाव की की गई है जो संसदीय लेाकतंत्रा के चुनावी मार्ग पर उतर कर अवाम के साथ धोखा धडी करता है।
 तीखी टिप्पणी करते हुए इनकी कलई भी खोली गई है-’ये कम्यूनिस्ट लोग बात रिवोल्यूशन का करता है। क्रांति का बात बोलता है, लिखता है अंग्रेजी में। ’उपन्यास सवाल करता है-’किसके लिए लिखता है तुम? किसान के लिए। चाय बागान का मजदूर के लिए। मिल मजदूर के लिए। तो उसका जबान में लिखो.... होपलेस इन्टेलैक्च्युअल।..... अरे बाबा तुम अंग्रेजी लेकर हिन्दुस्तान का आदमी के पास कैसे पहुँचेगा।
 उत्तर सा देते हुए लिखा गया-’’मिश्र जी की लडाई निजी संपत्ति को बचाने की लडाई थी। यह सही है कि वे जमीन पर जोतने वाले के अधिकार को बचाने की लडाई लड रहे थे। फिर भी, उनकी यह लडाई अपनी निजी सम्पत्ति को बचाने की लडाई ही थी।.... उपन्यास आगे लिखता है-’निजी सम्पत्ति के साथ भावनात्मक लगाव रखकर सामाजिक परिवर्तन की लडाई नहीं लडी जा सकती।.... लेकिन हमारे पास एक सिद्धांत है, शोषण और जुल्म को ख्ात्म करके वर्गहीन समाज बनाने का सिद्धांत... हममें से कोई भी अपनी निजी सम्पत्ति बचाने के लिए नहीं लड रहा है।
 शंकर को संबोधित कर कामरेड जगदीश द्वारा दिया गया यह प्रबोधन नक्सलवाद की उस क्रांतिकारी जनसमर्पित सैद्धांतिकी को रेखांकित करता है जिसके नायक चारू मजुमदार और उनके अन्य साथी कॉमरेडगण हैं।
 उपन्यास यह बहस भी खडी करता है कि क्रांति की अगुवाई करने वाला पहला हिरावल दस्ता मिल मजदूरों का होगा या दिन-रात खटने के बाद नारकीय जीवन जीने वाले आदिवासी किसानों का पार्टी जिसे प्राथमिकता दे किसानों या मजदूरों को। मजदूरों के साथ छोटी-मोटी आर्थिक या जनतांत्रिाक माँगों को लेकर किए जाने वाले संघर्षों के बजाय कृषि आन्दोलन से जुडे हुए संघर्ष कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
 सबसे बडी और समझदारीपूर्ण बात जो यह उपन्यास करता है वह यह है कि विचारधारा और सिद्धांत का प्रचार-प्रसार.... राजनीतिक शिक्षा जरूरी है। उसी के आधार पर जनता के बीच से नेतृत्वकारी कैडर विकसित हो सकता है। क्रांति में जनता की भूमिका को अनदेखा नहीं करना चाहिए... जनता को साथ लेकर ही वास्तविक जनयुद्ध लडा जा सकता है।
 उपन्यास यदि अनुभवों के बजाय विचारधारा और सिद्धान्त के ठाट पर अपनी निर्मित करता है और इसके लिए कतिपय आवश्यक चरित्राों की कल्पना करता है तो उसके प्रयोजनों को देखते हुए यह प्रविधि सटीक है।
 इस दृष्टि से यह एक विलक्षण कथानक है जहाँ ऐतिहासिक चरित्रा और तथ्य कल्पित चरित्राों के द्वारा संदर्भ के रूप में आते हैं।
 कथाकार ने उपन्यास का जो ढांचा रचा है उसमें नक्सली गतिविधियों, छापामार, हिंसक कार्रवाइयों, नक्सली ठिकानों और उनके छोटे-बडे अधिकृत कामरेडों का जो चित्राण किया है वह भरोसेमंद है। किन्तु उपन्यास के प्रारम्भिक अंश जहां किंचित शिथिल, मन्द और धीमी गति वाले हैं मध्य भाग इतिवृत्तपरक और वर्णनात्मक/ पात्राों की प्रवेश-कथा कुछ कुछ विवरणात्मक है। ऐसा लगता है कि अन्तिम अंश को ताकतवर बनाने के लिए कथाकार ने प्रारंभिक और मध्य अंश को बतौर भूमिका प्रयुक्त किया है। इसलिए कथा-शिल्प की दृष्टि से यह उस उत्कृष्टता का प्रदर्शन नहीं करता जो यह अपनी वैचारिकता से करता है। अगर कल विचार उपन्यास जैसी कोई संज्ञा बनती या खेाजी जा सकती है तो निश्चय ही स्वीकार की जायेगी क्योंकि उत्कृष्ट लेखन प्रायः विचार शून्य लेखन की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती गो कि ऐसी कोशिशें भी चलती ही रहती हैं।
 तब क्या इसे एक राजनीतिक उपन्यास कहें? राजनीति और उसकी समकालीन प्रवृत्तियां ही क्या इसकी मुख्य कथावस्तु नहीं है? लेखक ने इसे भराव देने के लिहाज से बद्री और शंकर जैसे पात्राों की कथा भी कही है और प्रकारान्तर से लंपटता की राह पर चल पडने वाले दुस्साहसी युवकों को नक्सली रास्ते पर लाने की जैसे एक योजना सी भी प्रस्तुत कर दी है। ’मीणाघाटी‘ उनका पहला उपन्यास था जो मीणाजाति के उन संघर्षों की कथा कह रहा था, जिन्हें हम मुक्ति संघर्ष की कथा कह सकते हैं। वहां जो परिदृश्य था वह सामंतवाद था। अपने इस नए उपन्यास ’समरवंशी‘ में उन्होंने यह नहीं मान लिया है कि सामंतवाद ख्ात्म हो चुका है या उससे लडने की अब कोई जरूरत नहीं बची। बल्कि यह और अधिक जोर से कहने की कोशिश की गई है कि सामंतवाद के साथ-साथ उस सत्ता-राजनीति से भी लडने की बहुत जरूरत है। विकास शिक्षा बाजार और आधुनिकता का जो विदेशी प्रपंच और मायाजाल यहां नए सिरे से सक्रिय हो उठा है उपन्यास अपने पाठकों का ध्यान उधर भी खींचता है-’अमरीका, जर्मनी, फ्रांस ये सब देश का बडा-बडा कंस्ट्रक्शन कंपनी का बांध बनाने का क्षमता इधर बहुत बढ गया है। इनका अपना देश में इतना ’’कैपेसिटी‘‘ का उपयोग करने का अवसर नहीं है। विकसित देशों में ’डैम कंस्ट्रक्शन‘ का बेशी काम नहीं है। ’प्रोफिट‘ नहीं है। इसलिए ये लोग हमारा जैसा ’अंडर डेवल्पड कंट्रीज‘ में आने लगा हैं।‘‘
 दस-पांच गिने-चुने किन्तु महत्वपूर्ण चरित्राों के आधार पर जिनमें से एक भी स्त्राी पात्रा नहीं है-यह उपन्यास अपनी अवधारणाओं को बखूबी प्रस्तुत कर सका है। ग्रामीण और आदिवासी जीवन उनकी गतिविधियों का चित्राण करते हुए नदियों पहाडों और जंगलो के जो चित्रा उकेरे और खींचे गये हैं वे वैचारिक तौर पर निभ्रन्ति होकर भी बहुत काव्यात्मक हैं।
 यथार्थ का चित्राण करते हुए लेखन ने यह तो दरसा ही दिया है कि भाषा और विचार पर उसकी पकड जबरदस्त है। महीन से महीन बात को कहने की उसकी सामर्थ्य भी खूब है। तथापि, कथा-शिल्प में जैसी सघन संश्लिष्टता और समन्वयन की कला अपेक्षित है उसे साधनों की जरूरत फिर भी है। कोई भी एक पाठक के रूप में किसी कृति के पास विचार की खोज में नहीं जाता। यह तो उसे उन सैद्धांन्तिक पोथियों में भी मिल सकता है। साहित्यिक कृतियां विचारों को उन मार्मिक अनुभवों और शिल्पों में गूंथ दिया करती हैं जिनका साथ पाते ही वे अत्यन्त तरल और प्रवाहपूर्ण हो उठते हैं। यह तरलता जितनी प्रवाहपूर्ण और छनी-निथरी हुई होगी, कथा-शिल्प उतना ही प्रभावोत्पादक और लोकमुखी होगा। साहित्य का सबसे बडा संकट आज उसकी पठनीयता है। गहरी से गहरी बात को सहज से सहज अन्दाज में कहने की कला ही तो प्रेमचन्द आदि को महान बनाती है। डॉ. सोहन शर्मा जैसे जन-प्रतिबद्ध और क्रांतिकारी विचारों वाले लेखकों के सामने आज यह सवाल फिर भी खडा है कि उनके इस नक्सलवादी विमर्श को इतर बुद्धिजीवी जुझारू वर्ग कहां तक समझ और ग्रहण कर पाएगा? क्या इसकी कोई और तरकीब वे निकालेंगे?

 



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