प्रतापगढ उत्तर प्रदेश में जन्मे विख्यात लेखक ललित शुक्ल की नवीनतम कृति हमारे हाथों में है-’समय के हस्ताक्षर‘। जैसा कि पुस्तक के नाम से ही विदित है कि ये पुस्तक उस दौर को समेटे है जिसने ललित शुक्ल को डॉ. ललित शुक्ल बनाया है कवि एवं लेखक ललित शुक्ल बनाया है। ललित शुक्ल का यह व्यक्तित्व बनने की प्रक्रिया में जिन जिनसे उनकी वाकफयत रही है, उनकी संवेदना के तार जुडे हैं, समय के साक्षी वे सब इस किताब के अंश बने हैं। वे सब जिन्होंने उन्हें न केवल साहित्य से बल्कि जीवन के मानवीय पक्षों से भी रूबरू कराया। वे सब जिन्होंने उनके कोमल मन में कविता का बीज बोया, जिनके संसर्ग में उन्होंने अपनी भाषा को साहित्यिक जामा पहनाया।
वह पूरा दौर जो ये किताब दिखाती है, विभिन्न साहित्यिक हलचलों का दौर रहा है जिसमें हिन्दुस्तान की आजादी से पहले और बाद के तमाम सामाजिक, आर्थिक और साहित्यिक पहलुओं पर उन्होंने अपनी पैनी दृष्टि घुमाई है। काफी हद तक राजनीतिक स्थितियों का भी खुलासा हमें इसमें मिलता है मगर उतना ही जितना उस रचनाकार के व्यक्तित्व को उद्घाटित करने के लिए जरूरी हो। उस समय के साक्षी तमाम रचनाकारों की प्रवृत्तियों, मनोभावों, चेष्टाओं, व्यसनों, दुर्व्यसनों, अभिरुचियों का साहित्यिक योगदान जिस रूप में भी रहा है-उनके सभी पहलुओं पर एक पैनी नजर ’समय के हस्ताक्षर‘ में देखी जा सकती है।
इस पुस्तक में कुल मिलाकर १६ लेख हैं या कहा जाय संस्मरण हैं-लेख इसलिए क्योंकि अंग्रेजी में म्ेेंल लिखा है और संस्मरण इसलिए क्योंकि हिन्दी में संस्मरण लिखा है। मुझे लगता है ये दोनों ही हैं जिसमें लेखक न केवल अगली पीढी के साथ अपनी सदाशयता दर्शाता है बल्कि उनके प्रति अपनी अगाध श्रद्धा को भी इनमें पिरोता है। इन लेखों में कई बार सहमति और असहमति के बीच का पुल भी हमें दिखाई देता है, मसलन रामनरेश त्रिापाठी मधुशाला के पाठ पर क्रोध में अपना वक्तव्य देते हैं और मनोभावना को विकृत कर लेने और यौनाचार के दलदल में फंस जाने के ख्ातरे से आगाह करते हैं वहीं दूसरी ओर बच्चन के लेख में रामनरेश त्रिापाठी के बारे कहा जाता है कि बुजुर्ग साहित्यकार का लिहाज करके लोग चुप रहे। (वही, पृ. ८७)
इन सभी संस्मरणों को पढते हुए मुझे लगा कि कितनी बारीकी के साथ लेखक अपने किरदारों के साथ रूबरू हुआ है। किरदार इसलिए क्योंकि वे सब किताब के किरदार हैं-वो किरदार हैं जिनसे ललित शुक्ल बावस्ता हुए हैं, हँसी ठट्टा किया है, उनका इंटरव्यू लिया है। किरदारों की कहानी को अपनी जबानी कहा है। उनकी छोटी से छोटी घटना को अपनी शैली में बताते हुए उन्हें दिलचस्प और मार्मिक बनाया है।
चिरगंाव साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ राजनैतिक गतिविधियों का भी केन्द्र रहा है। सुभाषचंद्र बोस का चिरगंाव में दिया गया भाषण ऐतिहासिक है। उसके लिए सभा में स्वागत भाषण मैथिलीशरण गुप्तजी को पढना था किन्तु चिरगांव में उपस्थित न होने के कारण वह जम्मेदवारी सियारामशरण गुप्त के जिम्मे आन पडी थी। उसे उन्होंने बखूबी निभाया भी।
सियारामशरण गुप्त का यह संस्मरण इतिहास के लिए एक बहुत जरूरी पाठ है। गांधीजी की मृत्यु के बाद बिरला भवन के सार्वजनिक न होने पर एवं उसका ऐतिहासिक संरक्षण न होने पर सियारामशरण गुप्त को होने वाली पीडा एवं क्लेश को वे घनश्याम दास बिरला को लिखे गए पत्रा में व्यक्त करते हैं। सियारामशरण गुप्त के अनोखे संकल्पों को भी इस लेख में देखा जा सकता है जब वे बडे भाई नन्ना (रामकिशोरजी) की मृत्यु पर पान न खाने का संकल्प धारण करते हैं और गांधीजी की मृत्यु के दिन से खैनी (तंबाकू) खाना भी छोड देते हैं।
जैनेंद्र कुमार पर लिखते समय ललित शुक्ल की कलम इस कदर चली है जैसे वे सब घटनाएं उनके सामने ही घटी हों। हालांकि बहुत सी महत्वपूर्ण घटनाएं उनके सामने घटी भी हैं। जैनेन्द्र कुमार के साथ ललित शुक्ल का रिश्ता कितना प्रगाढ रहा है, इसे लेख में देख सकते हैं। मुझे याद है करीब ९ साल पहले १९९७ में ललित शुक्ल किसी किताब पर काम कर रहे थे यह पुस्तक शायद आलोचना की थी। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं किसी उपन्यास पर समीक्षा लिखने के लिए उत्सुक हूँ? मेरे हां करने पर उन्होंने कहा तो फिर त्यागपत्रा पर लिखो। त्यागपत्रा जो उस समय तक मैंने पढा भी नहीं था। जो करीब ६० साल पुराने माहौल में रचा-पचा उपन्यास था, जिसमें मनोवैज्ञानिकता के जिन मानदंडों को दर्शाया गया था वे सब वर्तमान परिस्थितियों में भी उतने ही सटीक और सही ठहरते हैं कि लगता है जैनेन्द्र कुमार आज की स्थितियों और संबंधों का ही लेखा-जोखा लिख रहे हैं।
जैनेंद्र कुमार के अनोखे विवाह का जक्र भी इस लेख में किया गया है जिसमें पांच लोग शामिल हुए, जिसमें कोई पंडित नहीं, कोई हवन नहीं, अग्नि नहीं-न कोई तामझाम, न कोई भेंट भिटावन। कुल खर्च साढे सत्राह रुपये। हिन्दुस्तान का नक्शा जमीन पर काढा और उसकी प्रदक्षिणा की। चतुरसेन शास्त्राी की इस प्रतिक्रिया पर कि ’जैनेन्द्र कुमार जब छींकते हैं तो कहानी बन जाती है‘, मुझे यह कहना है कि जब जैनेंद्र कुमार के लेखन में इतना दमखम है, मनोविज्ञान की गहरी पकड है, रिश्तों का निर्वाह करने की व उनकी जटिलता को दर्शाने की इतनी खूबसूरत कला है तो भाई चतुरसेनजी ऐसे सस्ते वाक्यों से काम नहीं चलेगा। हमें याद ही होगा ये वही चतुरसेन शास्त्राी हैं जिनके बारे में प्रेमचंद ने १७ जुलाई, १९३३ को जैनेंद्र कुमार को एक पत्रा लिखा था ’’...इन चतुरसेन को क्या हो गया है कि इस्लाम का विषवृक्ष लिख डाला। इसकी तुम आलोचना लिखो......‘‘ (चिट्ठी पत्राी, भाग-२, पृ. ३२)। इसी लेख से पता चलता है कि जैनेंद्र कुमार के लेखन-गुरू चतुरसेन शास्त्राी थे जिन्होंने सुनीता और कल्याणी के प्रकाशन पर कहा कि क्या ऊटपटांग लिखा है। खैर गुरु गुड ही रहा और चेला चीनी हो गया ऐसा गुड जो सीलकर सीरा बन गया-सीरा भी ऐसा जिसमें बंद दरवाजों के कारण सडांध पैदा हो गई। जैनेंद्र कुमार की मृत्यु के बाद उनके बेटे प्रदीप को लिखे गए ललित शुक्ल के पत्रा की संवेदना हमें गहरे छूती है। जैनेंद्र कुमार पर ललित शुक्ल की यह टिप्पणी सटीक है कि ’लोग जदगी जीते हैं पर जैनेंद्र कुमार ने तो साहित्य जिया है, अपना चिंतन जिया है।‘
देवेन्द्र इस्सर साहब के संस्मरण को पढते वक्त पता लगा कि अरे! इस्सर साहब की उम्र ५०-५५ नहीं ७५ से ऊपर है। दरअसल उनके लेखन और ललित शुक्ल के साथ हुई कई बार बातचीत से मेरे मन में एक जो शख्सयत उभरती थी वो करीब ५०-५५ के आसपास रही होती थी। मैं कितना गलत था। जितनी उम्र मैंने सोची थी उससे तो कहीं ज्यादा उनका साहित्यिक योगदान है। पिछले दिनों एक दिन श्रीराम सेंटर में उनसे मुलाकात हुई तब मुझे ललित शुक्ल की ये पंक्ति बहुत याद आई कि यह लेखक कलम कम घिसता है सोचता ज्यादा है। इस्सर साहब से मैं उस दिन पहली बार मिला पर लगा कि यह मुलाकात पहली तो नहीं ही हो सकती इतनी गर्मजोशी थी उनके साथ मिलने में कि बहुत कुछ था जो मुझे लगा अनकहा रह गया। उनके पास आइडियाज की भरमार है। रचनात्मकता के स्तर पर काम के लिए समर्पण भाव मुझे उनके व्यक्तित्व का अटूट हिस्सा नजर आए। इस्सर साहब के बारे में शुक्लजी का यह मूल्यांकन कि उनसे मिलकर बार-बार मिलने को मन करता है, उनकी कहानियों को बार-बार पढने की इच्छा होती है सौ प्रतिशत सही हैं।
भगवती प्रसाद वाजपेई की किस्सागोसाई की भाषा को लेखक ने किताब में खूबसूरती के साथ रखा है। बहुत सी छोटी-बडी घटनाओं के उद्धरण दिए गए हैं। एक उद्धरण ललित शुक्ल प्रायः अपनी बातचीत के दौरान रखते हैं। हुआ ये कि एक बार भगवती प्रसाद वाजपेई का अभिनन्दन समारोह किया गया। यह कानपुर की बात है। ललित शुक्ल उस कार्यक्रम में उपस्थित थे। वाजपेईजी के कहने पर समारोह के पश्चात् देर रात वे वाजपेईजी के घर गए। उनकी पत्नी ने दरवाजा खोला और बोलीं है गयो तुम्हारौ अभिनंदनों, अब ऐसौ करौ जा अभिनंदन कूं अपने गले में लटकाइलेउ और सबै दिखाइ दिखाइकें कहौ कि हमारौ अभिनंदनों भयौ है, हमारौ अभिनंदनों भयौ है, अभिनंदन करने की थोथी सार्थकता पर उनकी पत्नी की यह एक सटीक टिप्पणी कही जा सकती है जिसके प्रत्यक्षदर्शी खुद ललित शुक्ल हैं।
धूल-धूसर के गांव की पहचान करने वाला यायावर, मस्तमौला, खूशबू का खोजी, मस्ती में फकीरी की डगर पर चलने वाला झक्की रचनाकार देवेन्द्र सत्यार्थी जब गांव-गांव जाकर लोकगीतों को इकट्ठा करता है, उनकी संस्कृतियों और तहजीबों को एक सूत्रा में बांधते हुए चलता है, उसी प्रकार जैसे रामनरेश त्रिापाठी ग्रामगीतों को इकट्ठा करते रहे तब निःसंदेह राहुल सांकृत्यायन की याद आना स्वाभाविक हो जाता है।
लोक और जन को समर्पित देवेन्द्र सत्यार्थी की कला पर ललित शुक्ल की दृष्टि का कैमरा पूरी पडताल करता है जब जन और जनवाद से लोक नदारद हो रहा है। वो लोक जिसमें एक शौकीन बांसुरी वादक-घर-दुआर से बेखबर नदी किनारे बैठा हुआ है कोई सुने न सुने।‘ ये ललित शुक्ल के शब्द हैं। बांसुरी के मीठे-मीठे बोल पर बच्चन के संस्मरण में एक प्रसंग जरूर पढा जाना चाहिए
बच्चनजी बैठे हैं पास से किंगरी वाला गुजरता है। वो बच्चनजी को कई लोकगीत और भजन सुनाता है। बच्चनजी पूछते हैं भाई, एक बात बताओ, तुम्हारी किंगरी बडा मीठा-मीठा बोलती है। इसे तुम क्या खिलाते हो?
वह बोला साहब इसे मैं अपना कलेजा खिलाता हूँ।
सच ही कहा है बगैर कलेजा खिलाए एक सच्ची और सही कला किसी को आ भी नहीं सकती।
राही मासूम रजा ललित शुक्ल के पसंदीदा लेखकों में से एक रहे हैं। उनकी वसीयत को वे कई बार अपनी बातों में लाते हैं। राही के तीन मांओं के प्रसंग को भी उन्होंने संस्मरण का हिस्सा बनाया है। पहली मां नफीसा बेगम जिन्होंने उन्हें जन्म दिया। दूसरी मां अलीगढ यूनिवर्सिटी और तीसरी मां गंगा का जक्र आते-आते कई बार तो इतने भावुक हो उठते हैं कि सामने वाले की आँखें नम हो उठती हैं। मौत के बाद रिसाला निकालने की संपादकों की मानसिकता पर राही की चोट कहीं न कहीं ललित शुक्ल की अपनी चोट बन पडी है।
ललित शुक्ल जिस प्रकार अपनी पिछली पीढी से चीजों को सीखने और अपने जीवन में अपनाने की बात करते हैं उसी प्रकार अपने सहयात्रिाओं और अपने से छोटों (उम्र में भी) से भी सीखने की प्रक्रिया उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हैं। मसलन पिछले दिनों एक दिन फोन पर गणित में पढाई जाने वाली पाइथागोरस प्रमेय की बात हो रही थी तो वे बोले कि अगली बार हब हम मिलेंगे तब मैं तुमसे जानूंगा कि पाइथागोरस प्रमेय की उत्पत्ति अब कैसे की जाती है।
इन सभी संस्मरणों को पढते हुए लगता है कि ये तो जानकारी का ख्ाजाना है पूरा इतिहास है जिसे ललित शुक्ल अपने दिमांग की अलबम में से निकालते रहे हैं। इन संस्मरणों में उद्धृत कई पुस्तकों को पढने की इच्छा निःसंदेह बलवती होती है।
संस्मरणों को लिखते वक्त प्रायः अपने को हावी करने की प्रवृत्ति अक्सर होती है जिससे उस कृति के साथ न्याय नहीं हो पाता है वो सब इस पुस्तक में बिल्कुल नहीं है; बल्कि मुझे उलट लगता है कि जहां लेखक को स्वयं को दिखाते हुए चलना चाहिए था वहां वो उपस्थित नहीं है। पिछले दिनों मलखान सिंह सिसौदिया की संस्मरणों की एक अच्छी किताब बेहतर दुनिया के लिए संघर्षों के सहयात्राी भी पढी जिसे समय के हस्ताक्षर के साथ मिलाकर अगर पढा जाए तो मुझे लगता है कि हम आधुनिक हिन्दी साहित्य के एक बहुत बडे दौर से न केवल वाकिफ हो पाते हैं बल्कि उसकी गूढता को भी समझ पाते हैं।
अतीत की बहती नदी के साथ-साथ ललित शुक्ल के कई सहयात्राी अभी भी उनकी स्मृतियों का हिस्सा हैं उन पर शायद हम शीघ्र ही कोई और अच्छी पुस्तक देखें। पुस्तक की प्रिंटिंग और साज-सज्जा अच्छी है। निःसंदेह यह पुस्तक संग्रहणीय है।
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