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मुक्तिबोध की ‘भूल-गलती’ः एक कुपाठ
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वर्तमान साहित्य के अगस्त २००६ के अंक में किन्हीं डॉ. विनीता रघुवंशी ने मुक्तिबोध की कविता, ’भूल-गलती‘ के पुनर्पाठ के नाम पर जो विश्लेषण किया है उसका तथ्यों, सत्यों और मुक्तिबोध के साहित्यिक और सामाजिक सरोकारों से दूर तक का कोई वास्ता नहीं है, कविता के बहाने उस कुपाठ में उस संघी दुष्प्रचार को अभिव्यक्त किया गया है जिसकी काट मुक्तिबोध जीवन भर करते रहे। संघी मानसिकता के लोगों ने मध्यप्रदेश में उनकी पुस्तक, ’भारतः इतिहास और संस्कृति‘ पर पाबंदी लगवा दी थी। याद रहे यह पाबंदी १९ सितंबर १९६२ को लगी थी जब भारत में एक संविधान लागू था जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी हर नागरिक को मिली हुई थी। किताब पर पाबंदी लगाने के वे ही घिसे पिटे तर्क दिये गये थे कि इससे हिन्दुओं और जैनियों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है और समाज में कानून और व्यवस्था का संकट पैदा हो सकता है। उस किताब में से संघी मानसिकता के लोगों ने वे पैरे उठा लिये थे जो ’शुद्ध आर्य रक्त‘ के झूठ का पर्दाफाश करते थे। मुक्तिबोध ने वैज्ञानिक चेतना का आधार पर यह लिखा था कि भारत में विभिन्न प्रजातियों के टकरावों और मिश्रण से ’वर्णसंकर जातियों का उद्भव हुआ‘, इन जातियों को ’व्रात्य‘ कहा गया और इनमें दार्शनिक और बुद्धिजीवी हुए जिनमें पार्श्वनाथ आदि का उल्लेख किया। हास्य के लहजे में राम और कृष्ण के काले होने को भी इसी प्रजातीय घालमेल से मुक्तिबोध ने जोड दिया। वर्णसंकर जातियों की उपस्थिति को तो गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामचरित मानस में स्वीकार किया था (भले ही कलियुग में पतन के रूप में किया हो) तो फिर उन्हीं कारणों से उनकी कृति पर भी पाबंदी की मांग क्यों नहीं? संघी मानसिकता की मूल पहचान हैं ः भारत के संविधान और इसके जनतंत्रा को स्वीकार न करना और यदि करना ही है तो सिर्फ सत्ता हथियाने के लिए जैसे कि जर्मनी में हिटलर ने किया था और जिसे अपने आदर्श के रूप में संघियों के गुरु गोलवलकर ने स्वीकार किया था। दुर्भाग्य से इस चेतना से हिन्दी के भी कुछ तत्व अपना लेख करते रहते हैं। डा. विनीता रघुवंशी की चेतना पर भी उसी जनतंत्राविरोधी फासीवादी विचारधारा का भयंकर असर है जिसकी अभिव्यक्ति उनके उक्त लेख में हुई है।
यहां यह स्पष्ट कर दूं कि मैं इस महिला लेखक को व्यक्तिगत रूप से न तो जानता हूँ न कभी मिला हूँ। इसलिए प्रतिक्रिया सिर्फ उनके लेख में व्यक्त विचारों को ले कर है, उनके व्यक्तित्व या पारिवारिक जीवन पर कोई लांछन नहीं है और न मेरा उनसे कोई राग-द्वेष या पूर्वग्रह संभव है। लेकिन जनतंत्रा पर वैचारिक रूप में हमल हो या राजनीतिक रूप में में, यह हमारा सामाजिक दायित्व है कि हम उसका प्रतिरोध करें, यह हमने मुक्तिबोध से ही सीखा है। अविवेक, तर्कहीनता और सरासर झूठ किसी की ओर से आये, उसका निराकरण जरूरी लगता है। भारत की जनता ने और उससे जुडे रचनाकारों ने भी इसके लिए इंदिरा गांधी तक को नहीं बख्शा था (एक महिला के रूप में वे आदर की पात्रा थीं, जनतंत्राविरोधी शक्ति के रूप में वे आलोच्य थीं)।
खैर, उक्त लेखक ने सबसे पहले अपनी संघी मानसिकता का इजहार इस वाक्य में किया कि ’पश्चिमी ढंग के विकास की अवधारणा ने सामाजिक जीवनशैली और बुनियादी आधारों को आघात पहुंचाया है।‘ इस तरह लेख की पूरी प्रस्तावना में एक तरह से भारत की वैज्ञानिक प्रगति, औद्योगीकरण आदि को कोसा गया है और इसके लिए जवाहरलाल नेहरू की लानत मलानत करते हुए ’भारतीयवादी युगस्रष्टा‘ गांधी जी की लाइन को तरजीह दी है। इस तरह की भूमिका बनाते बनाते मुक्तिबोध के विचारों को ले कर जो कुछ लिखा, वह सरासर झूठ पर आधारित है, उन्होंने लिखा कि ’मुक्तिबोध के लिए राजनीतिक मतवाद या काव्यांदोलन का पक्षपोषण कविता का प्रयोजन नहीं है।‘ आज तो उनके दुश्मन भी जानते हैं कि मुक्तिबोध माक्र्सवादी कवि और चिंतक थे और माक्र्सवाद एक दर्शन भी है और राजनीतिक मतवाद भी, इस मतवाद पर आधारित राजनीतिक पार्टियां विश्व के सभी क्षेत्राों में हैं, दुनिया के कुछ हिस्सों में वे सत्ता में भी हैं। मुक्तिबोध का पूरा लेखन विश्व की उन तमाम राजनीतिक शक्तियों जो सर्वहारावर्ग और उसकी विचारधारा... माक्र्सवाद व लेनिनवाद... के प्रति समर्पित हैं के पक्ष में खडा है और उन तमाम शक्तियों के खिलाफ है जो जनवादियों हैं और साम्राज्यवाद और सामंतवाद की पिट्ठू ह। देश के स्तर पर भी उनका लेखन तमाम शोषणकारी जनवादविरोधी फासिस्ट और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ है जो भारत की प्रगति में बाधा उत्पन्न करती है जिन्हें ’प्रतिक्रियावादी‘ कहा जाता है। ये शक्तियां ’भारतीयता‘ या ’राष्ट्रभाषा‘ का जाप करती रहती है मगर साम्राज्यवाद तथा बडे धन्नासेठों और रजवाडों का हित साधन करती है। यह भी उनके लेखों से स्पष्ट है कि काव्यांदोलन के रूप में ’प्रतिवाद‘ का पक्षपोषण उन्होंने किया और उसकी विचारधारा को कला के सर्वोच्च बिन्दु पर पहुंचाया। इसलिए विनीता जी की यह मान्यता सही नहीं है कि ’मुक्तिबोध के लिए राजनीतिक मतवाद या काव्यांदोलन का पक्ष-पोषण कविता का प्रयोजन नहीं है।‘ सच्चाई तो यह है कि उनका समूचा लेखन मध्यवर्ग से यही कहता है कि ’तय करो किस ओर हो तुम‘। या ’पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?‘
अपनी लंबी भूमिका के बाद विनीता जी ने अपना मंतव्य जाहिर किया कि ’यहां कविता की व्याख्या करना मेरा प्रयोजन नहीं, सिर्फ कविता में व्यक्त उस राजनीतिक वास्तविकता पर प्रकाश डालते हुए ऐतिहासिक प्रक्रिया के बीच से नेहरू और गांधी जैसे युग निर्माताओं के दृष्टि विपर्यय पर विचार करना अभिप्रेत है।‘ इस भूमिका के बाद मुक्तिबोध की कविता का कुपाठ शुरू होता है ः ’भारतीय जनता द्वारा पं. जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्राी के रूप में चुनना सबसे बडी भूल है।‘ आगे इस कुपाठ से टिप्पणी की कि ’पश्चिमी विकास की अवधारणाओं से प्रभावित हो कर जिस प्रकार की उन्नति का स्वप्न उन्होंने भारतभूमि पर रचा वह तो आधारहीन और बुनियादी ढंग से गलत था ही, साथ ही नेहरू की दूसरी ऐतिहासिक गलती भारत-चीन समझौता भी साबित हुआ। पंचशील के सिद्धांत की स्थापना का स्वप्न पं. नेहरू ही नहीं वरन् समस्त जनता-जर्नादन के लिए भी एक बहम ही साबित हुआ।‘ इन तमाम स्थापनाओं के पीछे भारतीय जनतंत्रा के प्रति हिकारत की नजर साफ देखी जा सकती है। अपने संघी बयानों को पुष्ट करने के लिए कविता की जो पंक्तियां दी गयी हैं उनका इस विचारसरणी से कोई संबंध नहीं है। लेखक के अनुसार पहली भूल गलती नेहरू को प्रधानमंत्राी बनाने की हुई। फिर आगे चल कर वे लिखती है कि ’भूल-गलती में भारतचीन युद्ध के परिणाम से उत्पन्न वेदना की अभिव्यक्ति हुई है। चीन का आक्रमण राष्ट्रभियान पर किया गया आघात था।‘ इस कुपाठ की यही विशेषता है कि इसमें वह सब देखा गया है जिसका ’फसाने में कोई जक्र ही नहीं‘। ऐसा मनमाना कुपाठ जिसमें जगह जगह ’राष्ट्रीय भावनाओं‘, ’राष्ट्रभिमान‘ और ’राष्ट्र राष्ट्र‘ की हुंकार लगायी गयी है मुक्तिबोध के विचारों पर ही आघात करता है।
मुक्तिबोध को माक्र्सवादी विचारधारा ने यह सिखाया था कि समाज का विकास उत्पादन के साधनों यानी टेक्नालॉजी के विकास से होता आया है, आदिम काल में औजार आदिम थे, दासयुग में उससे बेहतर हुए, फिर सामंतवाद में और अधिक विकसत हुए। पूंजीवाद के आगमन से तमाम तरह का वैज्ञानिक विकास हुआ और आज भी हो रहा है। पूंजीवाद के इस प्रगतिशील रोल को खुद माक्र्स ओर हर माक्र्सवादी चिंतक की तरह मुक्तिबोध भी जानते थे। इसके लिए फ्रांस की क्रांति पर उनकी जो टिप्पणियां हैं उन्हें देखा जा सकता है। पूंजीवादी दौर में निजी संपत्ति के अधिकार और लाभलोभ पर आधारित व्यवस्था से पैदा हुए दुर्गुणों का और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत समाजवाद की स्थापना से संभव होता होगा, ऐसा उनका विश्वास था। लेकिन मुक्तिबोध यह भी जानते थे कि भारत या चीन जैसे अविकसित देशों में अभी सीधे समाजवाद की मंजिल का नारा नहीं दिया जा सकता और निजी संपत्ति के अधिकार को खत्म करने की वस्तुगत स्थिति भी अभी नहीं है। इसलिए विकास की मंजिल का निर्धारत अलग अलग देशों में अलग अलग तरीके से होगा और कम्यूनिस्ट पार्टियां यहाँ सत्ता हासिल करेंगी वहाँ भी मुख्य दिशा सामाजिक आर्थिक विकास और उत्पादन प्रणाली को वैज्ञानिक तरीके से आगे बढाने की रहेगी। उन्होंने लिखा था कि-
’’माक्र्सवाद के अनुसार समाजवाद की बुनियादी बातों में खेती तथा उद्योगों का समाजीकरण, और राष्ट्र विकास के लिए बहुत आर्थिक आयोजन का काम शामिल है। एक बार इस बुनियादी लक्ष्य को स्वीकार करने के बाद, देश-देश की अपनी-अपनी परिस्थितियों तथा विकासावस्थाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्थायी-अस्थायी अनेक प्रकार की संस्थाएं और कार्यक्रम चलाये जा सकते हैं। यहाँ तक कि व्यक्तिगत उद्योग तथा व्यक्तिगत खेती तथा निजी संपत्ति तक को प्रश्रय दिया जा सकता है। चीन ने, एक ओर, सामाजिक सत्ता के अंतर्गत पूंजीवाद को न केवल प्रश्रय दिया, वरन् उसका इस ढंग से विकास किया कि जिससे वह सामाजिक सत्ता के बल को बढा सके और उसकी उत्पादित वस्तुएं वही ह जिनकी आवश्यकता समाज को है।‘ (रचनावली-६, द्वि.सं.पृ. १३५)
उनके तमाम लेख इस बात के गवाह हैं कि वे भारत के औद्योगिकरण और आधुनिकीकरण के खिलाफ नहीं थे, जैसा कि विनीता जी ने सिद्ध करने की कोशिश की है। मुक्तिबोध ने जवाहर लाल नेहरू की भूमिका की कई जगह पूरी तरह सराहना ही की है, नेहरू ही नहीं, हर स्वतंत्राता सेनानी की, यहां तक कि संघियों के पितामह वीर साबरकर के शुरू के दिनों की भी सराहना की, आलोचनात्मक दृष्टि के बावजूद मुक्तिबोध ने किसी भी स्वंतत्राता सेनानी की आजादी के बाद के दिनों में भी निंदा या छीछालेदर नहीं की जैसी कि बहुत से तत्वों ने की, निंदा ही नहीं, गांधी जी का तो हिन्दू सांप्रदायिक तत्वों ने कत्ल ही करवा दिया। कोई माक्र्सवादी या जनतंत्रा में विश्वास रखने वाला जनता को कभी भूल गलती करने वाला नहीं मानता, मुक्तबोध ने जगह जनता को सम्मान के साथ चित्रिात किया है, भूल गलती करने वाली अपढ या जाहिल शक्ति नहीं। हर ज्ञानवान कवि ने उसे निराला की तरह शक्ति माना है, समाज का बदलाव करने वालों को उसकी पूजा करनी होगी। अंधेरे में कविता में भी निराला की तरह उन्होंने कहा कि-
मिट्टी के लोदे में किरगीले कण कण / गुण हैं
जनता के गुणों से ही संभव / भावी का उद्भव
जनवादविरोधी मानसिकता ही जनता को दोषी बताती रहती है। किसी भी जगह यदि कोई उनकी पसंद का नेता हार जायेगा तो वे जनता को भूल-गलती करने वाला बतायेंगे। बेख्त ने मजाक में ऐसे लोगों से यही कहा कि ’दूसरी जनता चुन लो।‘
लेखक महोदया ने लिखा है कि ’पं. नेहरू जनता-जनार्दन के अति विश्वास या आंख मूंदकर किये गये भरोसे (विश्वास) की सबसे बडी भूल के रूप में तख्त पर आसीन हुए थे। पश्चिमी विकास की अवधारणाओं से प्रभावित हो कर जिस प्रकार की उन्नति का स्वप्न उन्होंने भारत भूमि पर रचा वह तो आधारहीन और बुनियादी ढंग से गलत था ही, साथ ही नेहरू की दूसरी ऐतिहासिक गलती भारत-चीन समझौता भी साबित हुआ।‘ इस तरह वे पंचशील सिद्धांत को भी भूल बताती है। इस व्याख्या में वे यह भूल जाती है कि भारत एक गणतंत्रा बन चुका था, उसमें फैसले गणतांत्रिाक प्रक्रिया से होते थे, वे किसी व्यक्ति को पसंद हों या न हों, लेकिन उनको ’तख्त पर आसीन‘ किसी एक नेता की कारगुजारी नहीं माना जा सकता। ये फैसले पूरे देश के फैसले थे। लेखक महोदया की भाषा इस गणतंत्रा को किसी एक व्यक्ति की जागीर की तरह देख रही है, तभी उनको नेहरू एक बादशाह नजर आ रहे हैं, गणतंत्रा के फैसले उस बादशाह के फैसले लग रहे हैं। मुक्तिबोध इन तमाम फैसलों को सकारात्मक तरीकों से देख रहे थे हालांकि उनको इस गणतंत्रा का वर्गचरित्रा मालूम था, वे जानते थे कि यह जनतंत्रा पूंजीवादी-सामंती व्यवस्था का ही एक आधुनिक रूप है, फिर भी देश के विकास और हित में लिये गये ये फैसले सराहनीय थे और मुक्तिबोध ने इसके लिए भारतीय नेतृत्व की सराहना की, क्योंकि उनकी नजर किसी संघी पीलिया की शिकार नहीं थी। शिक्षकों की एक सभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि-
पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में, देश समाजवादी निर्माण की ओर चल पडा है। जो लोग यह सोचते हैं कि हम उस प्रवृत्ति को खत्म कर सकते हैं वे बडे भारी भ्रम में हैं। देश ही नहीं, संपूर्ण जगत में जनता जाग्रत हो उठी है और अपनी चेतना के स्तर के अनुसार स्वयं अपने मुक्तिमार्ग पर चल पडी है।‘ (रचनावली-६, पृ. २०१)
इसी तरह कई लेखों और टिप्पणियों में उन्होंने पं. नेहरू की नीतियों की सराहना की क्योंकि उनसे देश में औद्योगिक विकास और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को बल मिल रहा था और पुराने दकियानूसी विचारों और मध्ययुगीन सडे गले तौर तरीकों को झटका लग रहा था जिन्हें आज भी बहुत से पढे लिखे लोग भी ’भारतीयता‘ या ’भारतीय संस्कृति‘ या ’सांस्कृतिक राष्ट्रवाद‘ समझने की भूल गलती करते रहते हैं। मुक्तिबोध ने अपनी इतिहास वाली पुस्तक में भी गंाधी, तिलक आदि सभी की सकारात्मक भूमिका का कविसुलभ संवेदना से वर्णन किया, सिर्फ संप्रदायिक तत्वों को ब्रिटिश हकूमत के औजार के रूप में चित्रिात किया, महात्मा गांधी की भूमिका का प्रशंसात्मक वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा कि ’इस बीच अंग्रेज सरकार, एक ओर, जनता का भयानक दमन करती, तो दूसरी ओर, संप्रदायवादियों के जरिये देश में फूट फैलाती।‘ उसी पुस्तक में ’भारत की स्वाधीनता का सूर्य‘ शीर्षक अध्याय में उन्होंने पहले वाक्य से ले कर अंत तक जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व की सराहना की। शुरू का पैरा तो पूरी तरह नेहरू की ही तारीफ में लिखा ः
’प्रधानमंत्राी पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में भारतीय जनतंत्रा की प्ë

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