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07 July 2008
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हिन्दी पत्राकारिता के विविध सोपान
शहबाज अली खाँ

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मौजूदा दौर में जहाँ उपभोक्तावाद, स्वार्थ, अवसरवादिता तथा बाजारवाद आदि अपने चरम पर हैं वहीं नैतिकता, संस्कार तथा समाज के पिछडे लोगों के प्रति प्रतिबद्धता यदि कहीं कायम है तो वह वामपंथी पार्टियों एवं विचारधारा के लोगों के पास है। पिछले तीस वर्षों से पश्चिम बंगाल में वामपंथ का एकछत्रा शासन होना तथा मौजूदा केन्द्र सरकार का वामपंथी पार्टियों पर टिका होना इनकी बढती हुई लोकप्रियता का प्रमाण है। उसमें यदि वामपंथी पार्टी तथा विचारधारा वाले बुद्धिजीवी तथा लेखक कोई पत्रिाका निकालते हैं तो वह निर्विवाद रूप से ग्रहणीय होगा ’स्वाधीनता‘ २००६ शारदीय विशेषांक अभी पढने को मिला। लगभग ४०० पृष्ठों वाली पत्रिाका है। उसकी सामग्री इतनी रचनात्मक एवं उत्तेजक है कि व्यक्ति लिखने पर मजबूर हो जाए।
पत्रिाका कई भागों में बंटी है, यथा-राजनीतिक लेख, प्रेमचंद, कविता, गीत, गजल, संस्मरण, उपन्यास अंश, कहानी, आलेख तथा नाटक आदि। साथ ही विचारोत्तेजक सम्पादकीय भी है। इसमें अमेरिका को साम्राज्यवादी हमलावर बता कर कुछ नये तथ्यों का उद्घाटन किया गया है कि किस प्रकार वह पूरी दुनिया में अपने एजेंट बनाता रहता है। इजराईल इसका सबसे बडा उदाहरण है। भारत में अभी तक साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन की एक परंपरा रही है। किन्तु भाजपा तथा कांग्रेस दोनों अमेरिका के पिछलग्गू बनने की कोशिश कर रहे हैं। ये दोनों ही पार्टियां इस समय देश की संम्प्रभुता के लिए खतरा बन गयी है। क्योंकि ये स्वतंत्रा विदेश नीति को नष्ट किए दे रही है। इसमें प्रधानमंत्राी मनमोहन सिंह जैसे व्यक्ति का ब्रिटेन-प्रेम और भी भयानक और दुखद बात है। वामपंथ इसी का विरोध करता है तथा इसके लिए वह आंदोलन करने को तैयार रहता है।
राजनीतिक लेखों में वामपंथी पार्टियों के शीर्षस्थ नेताओं के लेख हैं जैसे-ज्योति बसु, बुद्धदेव भट्टाचार्य, सीताराम येचुरी, विमान बसु, प्रकाश करात आदि। किन्तु जो लेख अधिक ध्यान खींचते हैं वे हैं-बुद्धदेव का ’’हम किस राह पर चल रहे हैं‘‘, सीताराम येचुरी का ’भारतीय शिक्षा-मात्राा, गुण और न्याय के बीच संतुलन कायम करो‘ तथा श्यामली गुप्त का ’धर्म, समाज, और नारी। बुद्धादेव भट्टाचार्य ने अपने लेख में अमेरिका को पूंजीवाद का सबसे प्रतिनिधि बतलाते हुए उसके विरोध में हो रहे विश्वभर के वामपंथी आंदोलनों को रेखांकित किया है। लैटिन अमेरिकी देशों में वामपंथी सरकार एक सशक्त पार्टी बन कर उभरी है। इसके साथ ही यूरोप के भी कुछ देशों में वामपंथ की हवा चल रही है। चीन तो अमेरिकी आधिपत्य को चुनौती देने वाला सबसे सशक्त कम्युनिस्ट देश है। दुनिया भर में वामपंथी रुझान वाली सरकारें अब साम्राज्यवादी शोषण के खिलाफ जनवादी आंदोलन पर उतर आये हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि छोटे-छोटे देश अमेरिका के विरोध में तो उठ खडे हुए हैं किन्तु भारत जैसा शक्तिशाली देश अमेरिकी एजेंट बनने के लिए तत्पर दिखाई द रहा है। वामपंथ इसी को रोकने के लिए कटिबद्ध है। इसके लिए उन्होंने अनेक जन-विकास की नीतियां बनाई हों।
सीताराम येचुरी ने आरक्षण को लेकर किये जा रहे विवाद पर लेख लिखा है। येचुरी जी ने उच्च शिक्षा पर अपना विचार प्रकट किया है। उनका कहना है कि भारत में शिक्षा सर्वसुलभ होने के बाद भी कुछ चंद लोगों के विशेषाधिकार में है। यदि भारतीय शिक्षा में समता एवं सामाजिक न्याय बनाए रखना है तो आरक्षण की व्यवस्था करनी ही होगी। किन्तु इस आरक्षण के लिए कुछ नियम भी बनाने होंगे। ओबीसी में आधे लोग सम्पन्न हैं, उन्हें आरक्षण से बाहर रखना होगा। आरक्षण यदि उचित तरीके से किया जाए तो वह अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है।
श्यामली गुप्त ने धर्म और समाज में नारी की स्थिति को लेकर अत्यन्त ज्वलंत प्रश्न उठाया है। वस्तुतः आज साम्राज्यवादी ताकतें अपनी रक्षा के लिए धार्मिक कट्टरता को प्रश्रय दे रही हैं। वो अपने वर्ग की रक्षा के लिए उग्रवादी तथा आतंकवादी संगठनों से गुप-चुप मेल-जोल किए हुए हैं। जहाँ तक भारत की बात है यहाँ के लोग धार्मिक कर्मकाण्ड तथा अंधविश्वास में सबसे आगे हैं। इसिलए यहाँ स्त्रिायों की दशा और भी सोचनीय है। वर्ग-शोषण तथा धार्मिक-कट्टरता के शिकार पिछडे वर्ग के लोग होते हैं इनमें भी सर्वाधिक शोषित महिलाएं ही हैं। केवल हिन्दू धर्म ही नहीं बल्कि सबसे अधिक उदार, समतावादी तथा वैज्ञानिक धर्म कहे जाने वाले ईसाई और इस्लाम धर्मों में भी स्त्रिायों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा गया।
प्रेमचंद से संबंधित लेखों में नमिता सिंह का लेख ’पत्राकार प्रेमचंद ः रचनात्मक प्रतिबद्धता के विविध आयाम‘ तथा अजय कुमार सिंह का लेख ’बच्चे, शिक्षा और प्रेमचंद‘ प्रेमचंद के लेखन के नये पहलुओं को उजागर करती है। नमिता सिंह जी ने अपने लेख में पत्राकार प्रेमचंद के साथ-साथ समीक्षक प्रेमचंद पर भी प्रकाश डाला है। इस लेख से पता चलता है कि प्रेमचंद को आलोचना की भी पकड थी। यद्यपि प्रेमचंद ने कहीं भी स्वतंत्रा रूप से नहीं लिखा है किन्तु पत्रा-पत्रिाकाओं में लिखे उनके लेखों से व्यक्त होता है।
पत्राकार प्रेमचंद ने स्त्राी-शिक्षा, पुस्तकों की विशिष्ट भूमिका, अंध विश्वास, भाषा के प्रश्न, सांप्रदायिकता आदि जैसे अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर भी लेख लिखे हैं। इस कथन में अतिश्योक्ति न होगी कि उनके यह लेख आज भी प्रासंगिक हैं।
अजय कुमार सिंह ने बच्चों की शिक्षा के संबंध में प्रेमचंद के क्या विचार थे बतलाकर उनके बहुआयामी लेखन को एक और दिशा दी है। प्रेमचंद बच्चों के शैशवस्था को महत्वपूर्ण मानते थें। उनके अनुसार इस अवस्था में बना उनका चरित्रा फिर नहीं बन सकता। शिक्षा संबंधी प्रेमचंद के विचार आज व्यवहार में लाये जाने चाहिए।
प्रेमचंद पर लिखा गया चंद्रकला पाण्डेय का लेख निराश करता है। इस लेख में केवल उद्धरण दिए गए हैं। पूरी की पूरी कहानी ही इस लेख में उद्धृत है। इससे अंक की गंभीरता पर आँच आती है।
इसमें कुँवरपाल सिंह का एक संस्मरण भी पठनीय है ’जावेद कमाल अलीगढ वाले।‘ इसमें प्रतिभाशाली शायर जावेद कमाल के बहाने से सिंह जी ने तत्कालीन अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय की राजनीति तथा देश की राजनीति को भी पाठकों के समक्ष रख दिया है। जावेद कमाल अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय की कैंटीन चलाते थे और शायरी किया करते थे। उनके मित्राों में उस समय के बहुत से बडे-बडे फनकार थे-मोइनहसन जज्बी, राही मासूम रजा, खलीलुर्रहमान आजमी, अब्दुल सत्तार, शहरयार, अशफाक पापे, मुजफ्फर अली, असगर वजाहत, गुरदेव सिंह आदि उनके मित्रा-मंडली में थे। स्वयं के.पी. सिंह भी इस मंडली के लोकप्रिय व्यक्ति थे।
अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय की पृष्ठभूमि पर अब तक तीन उपन्यास आए हैं-टेढी लकीर, (इस्मत चुगताई) ’टोपी शुक्ला‘ (राही मासूम रजा) तथा ’कैसी आगी लगाई‘ (असगर वजाहत)। बाद के दोनों उपन्यासों में जावेद कमाल एक प्रमुख चरित्रा के रूप में उपस्थित हैं।
कविताओं में उत्तम कुमार पीयूष की कविता ’बुट्टन कानक्लेव‘ पठनीय है। इसे धूमिल की ’मोचीराम‘ की अगली कडी माना जा सकता है। मलखान सिंह सिसौदिया की भी कविता सुन्दर है। सिसौदिया जी ६० वर्षों से निरन्तर प्रगतिशील आंदोलन से भी जुडे रहे हैं। यह कविता सोचने पर मजबूर करती है कि पुरानी पीढी के लोग आज भी किस तरह इतना अच्छा लिख रहे हैं? शायद साधारणजन से गहरी प्रतिबद्धता तथा उपभोक्तावाद के विरूद्ध संघर्ष ही इनकी कविताओं को जीवंत बनाता है।
कहानियों में रोहिताश्व की ’खुशबू‘ उपभोक्तावादी भयावहता को सीधी-सरल भाषा में व्यक्त करती है। आशिक बालौत की कहानी ’अस्तित्व‘ जहाँ समाप्त हुई, वहीं से आरंभ होती तो निश्चित ही बेहतर होती।
मदन दीक्षित का ’शाम के साये‘ १८५७ की १५० वीं वर्षगांठ पर आया पहला नाटक है। जो १८५७ के स्वतंत्राता संग्राम का नया मूल्यांकन करता है भारतीय शासक एवं सामंतवर्ग की काहिली, आरामतलबी तथा स्वार्थों को उद्घाटन करता है। उनकी कुलीनता की भावना ने जनरल बख्तयार खाँ को जो कि सर्वोच्च कमांडर थे, बुरी तरह से असफल बना दिया। नाटक से एक चीज और भी स्पष्ट होती है-अपने देश की मुक्ति के लिए किसान, मजदूर, छोटे-छोटे जमींदार, कारीगर ही लड रहे थे लेकिन कुलीनतंत्रा ने इस पर अपने स्वार्थ के लिए कब्जा कर लिया।
यह नाटक पठनीय भी है तथा मंच पर खेला भी जा सकता है। यह ’मोरी की ईंट‘ उपन्यास के यशस्वी लेखक मदन दीक्षित की अंतिम कृति भी है। गत ६ जुलाई को उनका निधन हो गया।
यह पत्रिाका न होकर आज के समय के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा साहित्यिक दस्तावेज है। हिन्दी राज्य में कोई भी ऐसी पत्रिाका नहीं निकलती है जबकि हिन्दी के नाम पर यहाँ करोडों रूपया खर्च हो रहा है। इस पर सोचने की आवश्यकता है।

 



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Name: 
sk.dumka@gmail.com (10/11/2007 17:09:57)
59.94.72.180
Comment: 
शहबाज खां का यह आलेख हिन्दी पाठ्कों के लिये अमूल्य धरोहर है।
   

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