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Vartmaan Sahitya ::October, 2006
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’बतरस‘ का सालाना उत्सव सारिका चौबे
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बतरस‘ एक औपचारिक बैठक है, जो सामाजिक-साहित्यक- सांस्कृतिक विषयों पर बातचीत करती है...। बातें मजे-मजे में होती हैं। कविता-कहानी-गीत-नृत्य-नाटक... आदि में भी होती है। आज यह सिलसिला एक साल पूरा कर रहा है। आज हम पिछली ग्यारह बैठकों की झलकियां प्रस्तुत करके एक बिहंगावलोकन करेंगे। इसमें सभी प्रस्तोता ’बतरस-परिवार‘ के ही हैं, क्योंकि ’बतरस‘ किसी का नहीं है। और सबका है... इसीलिए आज का यह उत्सव मनाना हम सबके लिए बडी खुशी की बात है...‘‘ इस जानकारी के साथ ही ’बतरस‘ व इस सालाना आयोजन के प्रमुख सूत्राधार श्री सत्यदेव त्रिापाठी ने चैताली व सुप्रिया के सुकंठ से सरस्वती-वंदना से शुरूआत करायी। फिर तनुश्री के निर्देशन में अक्षिका ने गणेश वंदना का नृत्य पेश किया। ये कार्यक्रम भी ’बतरस‘ की मासिक गोष्ठियों के ही रहे। इसके बाद दो अक्टूबर के अवसर पर प्रतीक रूप में गांधीजी के वेश में श्री मोहन झिंगयानी एवं इस सालाना उत्सव के प्रमुख अतिथि प्रसिद्ध बांसुरी-वादक एवं संगीत निर्देशक श्री रघुनाथ सेठ को मंच पर आमंत्रिात किया गया। ’बतरस‘ के वरिष्ठ सदस्य, नामचीन सीरियल मेकर श्री कृष्ण राघव ने अतिथियों का परिचय दिया तथा सभा का स्वागत किया। आयोजन के सहर्ष प्रायोजक समाज सेवी श्री रामनारायण सर्राफ के दाय का उल्लेख हुआ। इसी क्रम में श्री अनंत श्रीमाली ने ’बतरस‘ का संक्षिप्त परिचय देते हुए बताया दो-चार लोगों ने मिलकर कुछ गपशप करने की योजना बनायी और हर महीने के पलहे रविार को चार बजे का समय तय कर दिया गया.... बस, इसके अलावा ’बतरस‘ का सबकुछ बात में शामिल होने वाले साथियों द्वारा तय होता है। मसलन-कहां हो, किस विषय पर बात हो, उस पर कौन-कौन लोग बात करें.... आदि सबकुछ। कोई भी किसी भी जगह ’बतरस‘ बुला सकता है। बस, उसे आयोजन में आकर प्रस्तावित करना हेाता है। वरना ’बतरस‘ जुहू-विलेपार्ले स्कीम में रोड नं-५ पर स्थित सत्यदेव त्रिापाठी के आवास ’नीलकंठ‘ में होती है और हर अगली बात का विषय पहली गोष्ठी में तय हो जाता है। सो, यह आप सबका आयोजन है। शामिल हों और आगे बढायें.....।
’बतरस‘ में हुई प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ पिछले दो अक्टूबर को गांधी जयंती पर हुई। बातचीत को याद करते हुए उनकी आत्मकथा के छोटे-से अंश का पाठ, उस पर वक्तव्य हुआ तथा ’वैष्णव जन तो तेने कहिए.....‘ वाला गांधी जी का प्रिय भजन गाया गया। दूसरी बैठक की याद में ’ईद‘ के दौरान रोजा-नमाज के वैज्ञानिक पक्ष पर नगमा मलिक ने प्रकाश डाला और दीवाली के उपलक्ष्य में गीत गाये ’मंच‘ नाट्यसमूह के विजय, अजय व लक्ष्मी ने। तीसरी बैठक अमृता प्रीतम (के अवसान) पर थी। ’रसीदी टिकट‘ का विवादास्पद अंश पढा डॉ. सुनीता साखरे ने व टिप्पणी की श्री रमन मिश्र ने। पिछली फरवरी में ’वेंलेंटाइन डे‘ पर कृष्ण राघव ने भारतीय वसंतोत्सव की याद दिलायी, विजय पंडित ने अपना व्यंग्य लेख पढा और युवा ममता व चंदेश ने विवाहेतर सेक्स-संबंधों पर गर्मागर्म संवाद किया। मार्च की होली बैठक को याद करते हुए सुरेन्द्र सारंग ने फाग सुनाये तथा मशहूर अभिनेता चेतन पंडित ने होली का फडकता हुआ गीत पेश किया। अप्रैल में मूर्ख दिवस पर अनत श्रीमाली ने सारी खरीदने की पति की मूर्खता वाला व्यंग्य सुनाया और होली-कविगोष्ठी जमायी देवमणि पांडेय व रासबिहारी पांडेय थे।
मध्यांतर के बाद में मजदूर-दिवस की शुरूआत संगठनों में सक्रिय धनु शर्मा के ’हल्ला बोल...‘ नारे से हुई। कॉमरेड राम सागर पांडेय ने मिलों के बंद होने से उपजती विसंगतियों के विरोध में खडे होने की अपील की और कॉमरेड शैलेश सिंह ने भगत सिंह को याद किया। जून के ’पर्यावरण दिवस‘ पर मेधा श्रीमाली का लेख एवं चेतन पंडित की स्टाइलिश कविता सुनी गयी। फिर आये, ’सावन‘ की बतरस में सुरेन्द्र सिंह ने भिन्न भिन्न धुनों में कजरी के कई उदाहरणों से समां बांध दिया। मृत्युंजय पांडेय ने साज-बाज व साथियों के साथ गायी कजरियों से सबका मन मोह लिया। और प्रसिद्ध क्लासिकल गायक सुधीर मजूमदार ने बडी मार्मिक गजल सुनायी। अगस्त की ’बतरस‘ आजादी पर हुई थी। गुलामी के इतिहास व असर पर सारंग लिखित शोधलेख पढा डॉ. महेन्द्र ने और अपना ही लिखा व स्वरबद्ध किया गीत गाया कु. सरिता उपाध्याय ने। साल की अंतिम बतरस ’शिक्षक दिवस‘ के उपलक्ष्य में मटुक-जूली प्रकरण की गर्माहट के चलते ’गुरू ः गरिमा और गिरावट‘ पर हुई थी। शंकर शेष के प्रसिद्ध नाटक ’एक और द्रोणाचार्य‘ के द्रोण-अर्जुन व द्रोण-कृपी-अश्वथामा के संवादों का नाट्य-पाठ किया नम्रता-रमेश राजहंस ने।
इसके बाद गद्गद् अंदाज में मुख्य अतिथि श्री रघुनाथ जी ने विभिन्न किस्म की बांसुरियों सहित बांसुरी वादन के रोचक उदाहरण प्रस्तुत किये। गांधीरूपी मोहन झिंगियानी ने गला खराब होने के बावजूद एक भजन गाया एवं दोनों ने ’बतरस‘ को अपनी शुभकामनायें दीं।
फिर शुरू होना था पब्लिक की मांग पर विजयकुमार का एकल म्यूजिकल व्यंग्य नाट्य ’हम बिहार से चुनाव लड रहे हैं‘, जिसके प्रमुख अंश अप्रैल की ’बतरस‘ में देखे गये थे। चूंकि यह आधे घंटे से लेकर दो घंटे तक जितना चाहें, चल सकता है। सो, ’बतरस‘ के एक प्रमुख आयोजक श्री सुरेन्द्र सारंग ने गिनकर तीन वाक्यों में धन्यवाद पहले ही दिया और फिर कुर्ता-धोती-गमछों के साथ अपनी गायन-मंडली व वाद्य लिए विजयकुमार मंच पर नुमाया हुए। अब तक पूरे देश में तीन सौ शो हो चुके परसाईजी की कहानी के इस नाट्यरूप का समां पूरे डेढ घंटे चला। कार्यक्रम ढाई बजे शुरू हुआ था। नौ बजने लगे, कोई जाने का नाम न ले रहा था। अंत में आयोजकों ने कहकर बंद कराया।
शायद अंधेरी, पश्चिम वाई.डब्ल्यू.सी.ए. के हाल को बंद करने का समय हो चला था। बिना किसी प्रोफेशनल आर्टिस्ट के, और बिना किसी भी मकसद के, फन मात्रा के लिए होता ’बतरस‘ का यह आयोजन शहर के सभी वर्ग का ध्यान खींच रहा है। इस महानगर की आपाधापी के बीच शायद एक शीतल झोंके की तरह सबको सुखद लग रहा है।

 



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