KhbarExpresswww.khabarexpress.com
Welcome Guest Sign In New user! Sign Up Now
Search Photo  
RSS 21 March 2010
Forum | Wallpapers | Photo Gallery | Business | Entertainment | Education | Sports | Article | City | Cartoon | Video News
Free News on your website



Vartmaan Sahitya ::October, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner

बिदेसिया की प्रस्तुति-लोकराग में ढलती संवेदना डॉ. दीपक कुमार राय
More Articles

सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के विरुद्ध यदि कुछ सार्थक किया जा सकता है तो यकीनन वह अपनी माटी पर मजबूरी से खडे होकर ही; अपने जन से जुडकर, उसकी चेतना और संवेदना से पूरी तरह बावस्ता होकर ही। बलिया, उत्तर प्रदेश के पूर्वान्चल, से साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था ’संकल्प‘ में पिछले दिनों भिखारी ठाकुर के ’बिदेसिया‘ के मंचन के माध्यम से ठीक यही किया भी, उस अप्रतिम लोक कलाकार और उसके ’जन‘ की ज्वाल से अपनी ज्वाल मिला देने की कोशिशों के सूत्राधार रहे-युवा रंगकर्मी एवं निर्देशक आशीष त्रिावेदी।
 दरअसल बिदेसिया की यह प्रस्तुति अपनी बुनियाद बचाने के चिंताओं से उपजी हैं, जो आदमी होने का हौसला भरती हैं। यह सही है कि भेाजपुरी परिवेश और उसके भाषायी लहजों की प्रस्तुति आसान नहीं होती लेकिन बिदेसिया के माध्यम से लोकराग में ढलती संवेदना-जरूरी सोच, कशिश और हरारतें लिए टाउन डिग्री कालेज के सभागार में मौजूद तमाम लोगों के दिलों में उतरती ही चली गई। सादगी निर्देशक का भी अंदाज है यह सावित किया आशीष ने तो अभिनय अपने आप में सृजन हैं, इसे साबित किया संकल्प की पूरी टीम ने। दर्शकों और कलाकारों का अद्भुत अभेद विकसित हुआ और लगभग दो घंटे अभिनय के कई पाठ और पुनर्पाठ रचे जाते रहे। यहाँ तक कि कुछ असंगत मंचीय चहकदमियाँ भी एक लय में ढली प्रतीत होने लगीः ठेठपन और लोकरूचियों का एक निहायत ही देसज ’विजुवल‘ विस्तार पाता रहा और नाटकीयता शोरगुल का केंचुल उतार सधे हुए अंग संचालन में सिमटती रही।
क्योंकि नाटक के केन्द्र में पात्रा नहीं परिवेश हैं, इसलिए वहां व्यक्तिगत त्राासदियाँ तो हैं, लेकिन जिम्मेवार अक्सर पूरी की पूरी व्यवस्था ठहरती है। जैसे प्यारी, सुन्दरी के माध्यम से एक स्त्राी का दुःख जब सतह पर आता है, तो यह प्यारी सुन्दरी के प्रति सहानुभूति और विगलन तो उपजाता ही है, उस व्यवस्था के विरूद्ध आक्रोशित भी करता है, जो गांव और शहर के द्वन्द्वों को और गाढा गरती है, जो बेशेजगारी बढाती है और गाँवों से युवकों का पलायन तय करती है। बिदेसिया उस व्यवस्था के विरूद्ध जागरण है जो व्यवस्था न जाने कितनी स्त्रिायों की नियति में अकेलापन लिख देती है, जिनके पति आजीविका की तलाश में कहीं ’बाहर‘ चले जाते हैं और फिर वहीं के होकर रह जाते हैं। यह पुरूषों की दुनिया में स्त्रियों की चीत्कार है और भिखारी इसी के साथ हो जाते हैं। वैसे तो भिखारी ठाकुर का पूरा रचना कर्म ही सामाजिक सन्दर्भों की तलाश का मानक बनता है, लेकिन ’बिदेसिया‘ में पति वियोग में विलखती प्यारी सुन्दरी की पीडा से ’बटोही‘ का खुद भी विलख उठना, भोजपुरांचल के ’टीपिकल‘ मर्दवादी परिवेश का महिलाकरण भी कर देता है।
प्रकाश परिकल्पना शायद उतनी सुनियोजित नहीं रही हो, और समूचेपन में संगीत पक्ष भी शायद उतना सुसंगत न रहा हो, लेकिन होली, चइता, पूर्वी जँतसारी, कुँवर विजयी आदि धुनों ने एक प्रवाह तो बनाया ही जिसमें लोग देर तक डूबते-उतराते रहे। हालांकि यह अच्छा ही हुआ कि प्रकाश और आर्केस्ट्रा का अनावश्यक तामझाम नहीं रहा वरना तकनीक का वर्चस्व तो ’लोक‘ के आनन्द को रिड्यूस ही करता है और वेलौस तथा निर्बन्ध भेाजपुरी मन-मिजाज का सुच्चापन किसी शास्त्राीयता में कहाँ ऊँट पाता है। भीषण गर्मी और उमस के बीच जब ’बिदेसिया‘ अपने शबाब पर पहुँचा तो पसीने से तर-ब-तर बिदेसी का ’मेकअप‘ पसीने की धार के साथ वह चला। इसमें सायासपन नहीं था, लेकिन अनायास ही, सज-सँवरकर और एकदम से बन-ठन कर ’बाहर‘ कमाने जाते भोजपुरिया सँवाग का एकदम से प्रामाणिक चित्रा तो उभर ही आया; कभी कोर पोंछते हुए तो कभी पसीना पोछते हुए।
बटोही के रूप में रवि प्रकाश आनंद, बिदेसी बने अभय, प्यारी सुन्दरी की भूमिका में श्वेता त्रिावेदी, रखेलिन की भूमिका में नम्रता त्रिावेदी एवं दोस्त की भूमिका में संतोष, सूत्राधार राकेश विक्रम सिंह, रखोलिन की भूमिका में सुनील कुमार राम और कुमार आनंद ने न सिर्फ प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ दी अपितु इतने स्वाभाविक लगे कि अभिनय की विधा आसान होने का भ्रम उत्पन्न करने लगी। राजीव कुमार मौर्य तथा आनंद कुमार चौहान ने भी अपनी छाप छोडी। पार्श्व गायन में मंजूसिंह भी संयत एवं सधी हुई लगी। हाँ, प्रख्यात सारंगीवादक उस्ताद जहीर खाँ जरूर बेजोड रहे। मंचसंचालन की भूमिका में रहे-नंद किशोर शर्मा, कार्यक्रम की शुरूआत पुलिस अधीक्षक अकरामल हक के द्वारा दीन प्रज्जवताव के साथ हुई।
बलिया की एक शाम इसकी साक्षी रही और वेरियर एल्विन के शब्दों को उधार लेकर कहें तो वह शाम बलिया के लोगों के लिए किसी वैकल्पिक विलासिता की तरह नहीं थी एक जीवन चर्या की तरह थी और सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह था कि बिदेसिया का मंचन एक सूचना की तरह रहा कि हमारा लोकबोध अभी मरा नहीं है।

 



Discuss this topic on KhabarExpress Forum 

Comments to this Article

Name:  राम मुरारी 28/01/2010 22:15:12
210.7.75.18
Comment: यकीनन बलिया में बिदेशिया का मंचन एक सूचना की तरह था कि हमारा लोकबोध अभी मरा नहीं है... और ये आलेख साबित करता है कि बाजार और पूंजीवादी मूल्यों के वर्चस्व की तमाम कोशिशों के बावजूद अभी भी हमारे दिलों में लोकबोध की ये अलख जल रही है... बहुत बढ़िया आलेख...
  

Post Your Comments to this Article Posting Rules
Name*:
Comment*:
 


October, 2006 <br> Sponsered by : Decor Home, BikanerOctober, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
January, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJanuary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
February, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerFebruary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
March, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMarch, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
April, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerApril, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
May, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMay, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
June, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJune, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 

All right reserved by Khabarexpress.com
Contact Us | Archives | Sitemap | Can't see Hindi ? | News Ticker
Special Edition: Lakshchandi Mahayagya, Camel Festival 2007, Vartmaan Sahitya, Nagar Ek - Nazaare Anek, Bikaner Udyog Craft Mela
Our Network rajb2b.com | khabarexpress.com | uniqueidea.net | PelagianDictionary.com | hindinotes.com
Developed & Designed by Pelagian Softwares