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Vartmaan Sahitya ::October, 2006 Sponsered by : Decor Home, Bikaner भारतीय किसान समस्या : समकालीन लेखन
डॉ. आनन्द प्रकाश तिवारी
प्रेमचन्द के बाद गांव के लेखक तो हुए लेकिन किसानों का लेखक नहीं हुआ। गांव भी बहुत बदला। घोडे नहीं दिखायी पड रहे हैं। हाथी और बैल गायब हो रहे हैं। जानवरों की कहानी भी होती है, इन्हें पालने वालों का रिश्ता उनसे होता है। ट्रैक्टर और थ्रेशर की कहानी नहीं होती। कहानी का रिश्ता संवेदना से है। यह विचार प्रसिद्ध कथाकार डॉ. काशीनाथ सिंह ’भारतीय किसान समस्या और समकालीन लेखन‘ विषयक गोष्ठी में व्यक्त कर रहे थे। गांधी विद्या संस्थान एवं प्रगतिशील लेखक संघ के संयुक्त तत्वाधान में राजघाट स्थित संस्थान के सभागार में इस गोष्ठी का आयोजन किया गया।
विमर्श का विषय प्रवर्तन करते डॉ. रामाज्ञा राय ’शशिधर‘ ने कहा कि किसानों के जीवन से लेखकों के सीधे जुडने पर अनेक गोदान के रचे जाने की सम्भावना बनती है। उन्होंने कहा कि हिन्दी में जनान्दोलनों से जुडा लेखक नहीं है और हिन्दी में मेधा पाटेकर जैसी आन्दोलनकारी भी नहीं है। हिमाचल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं आलोचक प्रो. बच्चन सिंह ने प्रेमचंद पर विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि साहित्य केवल सरोकार नहीं होता है, साहित्य कैसे कहा जाता है, वह महत्वपूर्ण होता है। बनावट पर भी बात होनी चाहिए। ’गोदान‘ दुबारा नहीं लिखा जा सकता और ’अन्नाकरेनिना‘ दुबारा नहीं लिखा जा सकता। आज प्रेमचंद की परम्परा के कहानीकार बहुत कम रह गये हैं।
भाकपा माले के प्रान्तीय सचिव कामरेड अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने रचनाकारों और राजनीतिकों का संयुक्त मोर्चा बनाने तथा आन्दोलन में हिस्सा लेने पर जोर दिया। आज की सामाजिक संरचना को नये तरह से विश्लेषित करने की जरूरत है।
गांधी विद्या संस्थान के निदेशक प्रो. दीपक मलिक ने कहा कि आर्गनिक इंटलेक्चुअल का अभाव हो गया है। पूंजीतंत्रा की विचारधारा राष्ट्रीय विचारधारा में बदल गयी है और जनतंत्रा के साठ सालों में बना मध्य वर्ग उस विचारधारा का वाहक है। साहित्य का बाजार अब महानगर और शहरी उच्च और निम्न मध्यवर्गीय सोच के इर्द-गिर्द घूम रही है। स्वाभाविक है कि किसान लेखक के एजेण्डा में नहीं रह गया है।
प्रसिद्ध जन-कवि राजशेखर ने कहा कि रचनाकारों को गांव में जाना चाहिए और जीवन को सीधे जानकर रचना करनी चाहिए। दर्द की खिडकियां तो खुली हुई हैं, क्या आपने उन खिडकियों से झांकना जरूरी समझा है?
प्रगतिशील लेखक संघ के प्रदेश महासचिव एवं अभिनव कदम के संपादक डॉ. जयप्रकाश धूमकेतु ने आजादी के पहले के किसान और वर्तमान किसान की समस्याओं की तुलना करते हुए बताया कि घर का दुश्मन बाहर के दुश्मन से ज्यादा खतरनाक है और उससे लडना ज्यादा मुश्किल होता है। आज एक विशेष किस्म की नव सामन्ती चरित्रा का निर्माण हुआ है। कदाचार और भ्रष्ट तरीके से संचित पूंजी का सामाजिक पिरामिड बना है। इसके पर्दाफाश के लिए विशेष लेखकीय दायित्व है।
डॉ. श्रीप्रकाश शुक्ल ने शिवेन्द्र के उपन्यास के हवाले से किसान-जीवन की भयानक समस्याओं की तरफ ध्यान खींचते हुए कहा कि किसान ही किसान की समस्या से लडेगा और किसान के बीच से निकला हुआ लेखक ही किसानों की समस्या को वास्तव में लिख सकेगा। डॉ. विनय सिंह ने कहा कि प्रेमचंद का सूरदास किसी का मोहताज नहीं होता। लिखा ऐसा जाय कि कला जीवन से निकले और जीवन के लिए निकले। डॉ. नीरज खरे ने कहा कि गांव से रचनाकारों से सम्फ के अभाव में कहानी में वैसी संवेदना नहीं रह गयी है, हमें इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए।
इस गोष्ठी में बडी संख्या में हिन्दी, उर्दू के साहित्यकार और रंगकर्मी विशेष रूप से उपस्थित थे। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. कमालुद्दीन शेख और संचालन डॉ. संजय श्रीवास्तव ने किया।
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