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क्या गाँधी आज प्रासंगिक हैं?

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गांधी पर उनकी मृत्यु के ५८ वर्ष बाद भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में आज भी बहस छिडी हुई है। कुछ लोगों के विचार में आज गाँधी की आवश्यकता नहीं है। वे तो अब इतिहास-पुरूष हैं। इस विषय पर आज गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। गाँधी के विरोधी कौन लोग हैं? पहले इस प्रश्न पर विचार कर लिया जाय। हमें गाँधी के तीन प्रकार के विरोधी दिखायी देते हैं। एक वे हैं जो अपने को बहुत क्रांतिकारी लेखक और बुद्धिजीवी समझते हैं। दूसरे, वे दल और व्यक्ति हैं जो भारतीय संस्कृति तथा हिन्दू धर्म के सबसे बडे पैरोकार हैं। तीसरे, वे हैं जो गाँधी का विरोध नहीं करते किन्तु उनके विचारों की हत्या कर रहे हैं जिनमें कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व है। कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने को धर्म निरपेक्ष तो कहते हैं लेकिन आर्थिक नीतियां उनकी भी खुले बाजार व्यवस्था के अनुरूप हैं। असल में आज के संदर्भ में हमारी आर्थिक नीतियां ही हमारी राजनीतिक नीतियां तय करेंगी। एक बडे विद्वान का कथन है कि व्यक्ति, संस्थाएं और राजनीतिक दल क्या कहते हैं, इस पर मत जाइए। वे क्या करते हैं, इस पर विचार कीजिए। एक व्यक्ति धार्मिक प्रवचन करता है तो वह अपने दोषों को छिपाने के लिए कई चेहरे और मुखौटे लगाता है। हमारे आज के बहुत से राष्ट्रीय दल ऐस हैं जो जनता को भ्रम में रखने के लिए निरंतर भ्रमजाल बुनते हैं। भारत के आम जन चुप रहकर अपना निर्णय देते हैं। उनके पास विवेक की अपनी कसौटी है। हमारे देश के किसान और मजदूर कबीर की परम्परा के हैं, जिनका कहना था-
तू  कहता  कागद  की  लेखी,
मैं  कहता  आँखिन  की  देखी।
साधारणजन व्यवहार और कार्यपद्धति देखते हैं। वे आफ ’मैनिफेस्टो‘ को नहीं पढते हैं। जब कथनी और करनी की खाई बहुत बढ जाती है तब फिर वे माफ नहीं करते। चाहे कांग्रेस हो, समाजवादी हो या फिर क्षेत्राीय पार्टियां, सबके साथ यही व्यवहार होता है। भारतीय जनता पार्टी ने नारा दिया-
’सबको देखा बार-बार, हमको देखो एक बार।‘
जनता ने उन्हें भी मौका दिया। लेकिन, जनता ने जब धोखा खाया तो उन्हें भी उसी रास्ते पर लौटा दिया जिससे वे सत्ता में आए थे।
आज फिर से, आर्थिक परतंत्राता बढ रही है। कुछ अदृश्य स्वार्थ हैं जो किसानों-मजदूरों के लिए ’प्रेतात्माओं‘ की तरह हैं और उनका खून सुखाने का काम कर रहे हैं। आर्थिक विकास और समानता का नारा देने वाली हमारी केन्द्रीय व राज्य सरकारें १९९० से देश के साथ अन्याय कर रही हैं और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दबाव में किसान और छोटे व्यापारियों का शोषण कर रही हैं। परिणामस्वरूप किसान और व्यापारी आत्महत्या कर रहे हैं। देशी कारखानों के बंद होने से मजदूर भुखमरी के शिकार हो रहे हैं। बाल मजदूरों के हित में सरकार कितने ही कानून बनाए, जब तक गरीब विरोधी आर्थिक नीतियां रहेंगी बाल मजदूरों की समस्या यथावत बनी रहेगी।
गाँधी पर तब भी और आज भी मनगढन्त आरोप लगते रहे हैं। कुछ दलों ने यह भी नारा दिया कि हमें आज गोडसे की बहुत जरूरत है। नारे को लेकर जब जनता के बीच गोडसे गये तो जनता ने उन्हें आईना दिखा दिया। दल को मजबूर कर दिया कि अपने अधिवेशन में गाँधी की तस्वीर लगाएं। गाँधी, आज भी क्यों जिंदा है, जबकि उन्हें बहुत पहले ही गोली मार दी गयी थी। व्यक्ति को मारा जा सकता है, विचार नहीं मरता। गाँधी ने, हिन्दुस्तान के साधारणजन के लिए हर प्रकार के उत्थान का काम किया। सबसे पहले लाखों बुनकरों को, खादी के माध्यम से, सम्मान का जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त किया। महिलाओं को ग्रामोद्योग और चरखा से जोडकर उनमें आत्म सम्मान और विश्वास पैदा किया। कुटीर उद्योग के माध्यम से वे विकास चाहते थे। गाँधी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कांग्रेस को उच्च मध्यवर्ग के नेतृत्व से निकाल कर किसान, मजदूर और महिलाओं से भी जोडा।
गाँधी ने कांग्रेस को एक राष्ट्रीय पार्टी का सच्चा स्वरूप दिया। गाँधी छुआछूत के विरोधी थे और दलित वर्ग की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्राता के पक्के हिमायती थे। वे बडे उद्योग-धंधों और बडे घरानों के विरोधी थे। वे चाहते थे कि देश का विकास छोटे-छोटे उद्योग-धन्धों द्वारा हो। बेकारी दूर करने के लिए वे शहरीकरण के विरुद्ध थे।
यह सही है कि वे धार्मिक शब्दावली का प्रयोग करते थे और स्वयं को धार्मिक व्यक्ति कहलाने में सम्मान अनुभव करते थे। उनके धर्म में, संकीर्णता और धर्म का व्यापार नहीं था। धर्म का राजनीतिक लाभ उन्होंने कभी नहीं उठाया। उन्हें भारत के तमाम धर्मों और भाषाओं से मुहब्बत थी। वे देश की भाषा ’हिन्दुस्तानी‘ बनाना चाहते थे जो देश की मिली-जुली संस्कृति की संवाहक थी। उनके धर्म का स्वरूप ’जे पीर पराई जाणे रे!‘ में समाहित था। वे भारत  के हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा के प्रबल समर्थक थे, धर्म, जाति, वर्ण, वर्ग और लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव उन्हें असह्य था। गरीब उनके लिए ’दरिद्र नारायण‘ थे। राष्ट्रीय संदर्भों में दलितों और महिलाओं की समस्याओं को उन्होंने केन्द्र में रखकर महत्व दिया। हमारे रचनाकारों को उनसे काफी प्रेरणा मिली।
गाँधी की सबसे बडी विशेषता थी कि उन्होंने अपनी कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं रखा। वे जो कहते थे वही करते थे। इस दृष्टि से दुनिया भर में गाँधी की कोई तुलना नहीं है। उन्होंने साधारणजन को साथ लेकर दुनिया के सबसे बडे साम्राज्य को भारत से विदा होने के लिए विवश कर दिया।
गाँधी ने इसीलिए स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद कहा था कि कांग्रेस की भूमिका अब समाप्त हो चुकी है। इसे भंग कर दिया जाना चाहिए। ’भारत सेवक समाज‘ उनके इसी विचार का विकल्प था। उन्हें आभास था कि कांग्रेस वही सब करेगी, जो उसे नहीं करना चाहिए। आज उनकी बात सोलहो आने सच साबित हो रही है। देश अपने ही संसाधनों से आत्म निर्भर बने, देश के विकास में सबकी समान भागीदारी हो और भारत एक स्वावलम्बी देश बने, यह उनका सपना था। वे भोग-विलास की उन तमाम वस्तुओं का विरोध करते रहे, जो मनुष्य को व्यक्तिवादी और भ्रष्ट बनाती हैं। व्यक्ति का सामूहिक सोच नष्ट हो जाता है। ’सादा जीवन-उच्च विचार‘ दर्शन के वे शायद अंतिम उदाहरण हैं।
अपने जन्म के १३७ वर्ष बाद, इसीलिए गाँधी आज भी जनता के दिलों में समाए हैं। जो जनता के दिलों में बस जाते हैं, उन्हें कभी कोई नहीं मार सकता। कबीर और प्रेमचन्द इसके अन्य उदाहरण हैं।


 

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