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Vartmaan Sahitya ::October, 2006
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नूरूद्दीन का अनोखा सपना
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नूरूद्दीन-भला-सा, ख्याातिहीन जीव जिसके चेहरे पर दीनता की परत अवश्य, पर नूर दूर-दूर तक नहीं। जरूरी नहीं कि जिस वैशिष्ट्य की परिकल्पना माँ-बाप करें, वह व्यक्ति पर पूरी तरह से उतरे ही। गाँव भी अनजाना, पहचानरहित, अस्मिताविहीन। सच पूछा जाए तो वह गाँव था भी नहीं। वह था आदिलपुर गाँव का मजरा जिसे खेरवा के नाम से जाना जाता था। खेरवा में बस साठेक देहलियाँ थीं।
नूरूद्दीन खेतिहर मजदूर था। उसके पिता भी मजदूर थे। पिता के पिता यानी दादा भी। उससे पिछली पीढी के लोग भी मजदूर थे। प्रायः हर परिवार में फसल-चक्र की भाँति समृद्धि और विपन्नता का चक्र चलता रहता है। यानी, पीढी की सीढी पर चढें, तो कभी-न-कभी समृद्धि आयी हुई होती है या विपन्नता। पर नूरूद्दीन का परिवार अपवाद सरीखा। मानो गरीबी किसी मूल्यवान धरोहर की तरह शाश्वत विरासत में मिली हो। मजहब बदला, पर गरीबी से छुटकारा नहीं मिला। जो बहुत गरीब, अर्थविज्ञान के अन्तिम पायदान पर होते हैं, उनकी समस्याएँ इतनी विकट, बहुमुखी और अन्तर्गुम्फित होती है कि आर्थिक उन्नयन दुष्कर हो जाता है। पुरानी कहावत है, पैसा पैसे से बनता है। लगता है कि ऐसे परिवार न सहस्राब्दियों से सही, शताब्दियों से जरूर मजदूरी करते आ रहे होंगे।
खेरवा के ज्यादातर परिवार मेहनत-मजदूरी कर कालक्षेप करते थे। इस सुदूर देहाती क्षेत्रा में सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मजदूरी आकाशकुसुम सरीखी थी। विकास के सारे कानफोडू प्रतिध्वनिपरक और बहुदलीय नारों के बावजूद खेरवा में कोई सरकारी योजना लागू नहीं हुई। अन्त्योदय, बी.पी.एल. राशन कार्ड, जवाहर रोजगार योजना, काम के बदले अनाज योजना, विधवा पेंशन योजना, वृद्धावस्था पेन्शन योजना, स्वरोजगार योजना, विश्वबैंक, योजना आयोग वगैरह इनके सच नहीं थे। ज्यादातर लोग मुख्य गाँव आदिलपुर की भाषा में नम्बरी गाँव- में मजदूरी करने जाते थे। कुछ लोग अलग-बगल के अन्य गाँवों में भी। कुछ लोगों के पास अपनी जमीनें थीं, पर एक-डेढ बीघे से ज्यादा किसी के पास नहीं। कुछ ने जानवर पाल रखे थे और दूध-दही बेचकर रोजी-रोटी चलाने की कोशिश करते थे। चारे की समस्या के कारण ज्यादा जानवर रख सकने की भी स्थिति न थी। किसी के खेत में जानवर चले जाएँ तो जानवर तो कॉजी-हाउस में, टंटा अलग से।
नूरूद्दीन अपनी राह आने वाला, अपनी राह जाने वाला सीधा-सादा-संकोची व्यक्ति। सुबह मजदूरी पर निकल जाता, शाम को लौटता। रोटियाँ साथ बाँध ले जाता। लौटने पर इतना थककर चूर हुआ होता कि खाना खाने के बाद ही झपकी आने लगती। खून सुखाने वाली मेहनत के कारण विपन्न निद्रामित्रा होते हैं, अनिद्रा-व्याधि कोसों दूर रहती है।
बीवी अनारो से नूरूद्दीन के दो बच्चे थे- एक लडका अल्लाबख्श यानी अल्लन और एक लडकी सितारा। दूसरी बीवी का ख्याल उसके लिए ऐसा ही था जैसे किसी हथिनी के नीचे कचर-मचर जाना। जहाँ एक बीवी और उससे उत्पन्न बच्चों का भरण-पोषण भारी हो, वहाँ सोचना भी तनाव का हेतु था भले ही उसके लिए धार्मिक और विधिक स्वीकृति सुलभ हो। कुछ लोग मुसलमानों के लिए चार विवाह की धार्मिक स्वीकृति को उपहासभाव या बहुस्वादी मजे के भाव से उल्लिखित करते हैं, पर उन्हें पता नहीं होता कि इस स्वीकृति का लाभ उठाने वालों की संख्या बहुत कम होती है-विपन्नजनों के बीच तो बिल्कुल नहीं। सच तो यह है कि गरीबों का कोई धर्म नहीं होता। अगर होता, तो वह गरीबी या इससे आप सन्तुष्ट न हों, तो उसे गरीबी अनुकूलित धर्म कह सकते हैं।
नूरूद्दीन घर के बाहर चबूतरे पर, छप्पर के नीचे खाट डालकर सोता था। पास ही एक छोटा-सा गड्ढा था जिसमें सर्दी में आग जलाकर, घेरा बनाकर लोग हाथ सेंकते थे और जिसे ’तपता‘ कहा जाता था। सर्दी की एक कोहरारहित सुबह जब सूरज का लाल गोला प्रकट हुआ, नूरूद्दीन ने हौले से आँखें खोलीं। वह उन भाग्यशाली लोगों में हैं जो तब आँखें खोलते हैं जब उषा की लालिमा उनके चेहरे को दुलराती-हलराती है। मानों माँ की भूमिका में अवतरित हुई हो। नूरूद्दीन आज विस्मय और उमंग से भरा-पूरा था। उसने आँखें तेज-तेज झपकाते हुए आवाज दी, ’’घरैतिन, जरा यहाँ आना।‘‘
अनारो घर के भीतर से निकली, ’’हाँ, क्या बात है?‘‘
स्वर में व्यस्तता से उपजी तुर्शी और खीज।
’’जरा बैठना।‘‘
वह बैठी नहीं, दीवार की टेक लगाकर खडी हो गयी। दिमाग में कोई काम या कई काम तैर रहे थे शायद। सामान्य परिवार की स्त्रिायों के लिए यह समय बहुत व्यस्तता का होता है।
नूरूद्दीन अपनी बात कहे, उससे पहले ही अनारो फिर बोल पडी, ’’बोलो, क्या कह रहे हो?‘‘
संवाद की घसीट इस बात की गवाह कि वह कुछ ही सेकेन्डों में सब कुछ जान लेना चाहती है।
वह बोला, ’’रात सपना देखा।‘‘
’’कौन-सा सपना?‘‘
’’क्या देखता हूँ, अपने खेरवा के पश्चिम ओर, ऊसर में एक मस्जद बन गयी है, बिल्कुल झक्क सफेद, कली से पुती हुई।‘‘
’’अच्छा!‘‘ चेहरे पर विस्मय।
’’जानती हो वह मस्जिद किसने बनवायी है?‘‘
’’किसने?‘‘ बात से बात निकल रही थी।
’’मैंने।‘‘
’’तुमने?‘‘ विस्मय और व्यंग्य का मिश्रित भाव।
’’हाँ, मैंने।‘‘
’’हफ्ते भर घर बैठ जाओ, तो रोटी के लाले पड जाएंगे। चले हैं नवाब साहब मस्जद बनवाने! मस्जिद तो जब बनवाना तब बनवाना, पहले दिशा-मैदान हो आओ। रात खत्म हो गयी है।‘‘
वह गोलाई में झुकते हुए नृत्यमुद्रा की तरह घूमी और ’फिस्स-से‘ हँसती, उछलती हुई घर के भीतर विलीन हो गयी।
वह खिसिया गया। अगला रास्ता निश्चय ही दिशा-मैदान की ओर जाता था।
नूरूद्दीन ने सपने की बात गाँव वालों को तो नहीं बतायी, पर यह प्रस्ताव करने से नहीं चूका, ’’खेरवा में एक मस्जद बनवायी जाए, तो कितना अच्छा हो!‘‘
गाँव के सबसे ज्यादा बुजुर्ग, सन जैसी सफेद लम्बी दाढी वाले, पारि्कन्सन्स बीमारी की तरह गर्दन डगडगाने वाले और चलने में डण्डे पर पूर्णाश्रित मुहर्रम अली चचा ने चश्मे के पीछे से झाँकती आँखों को स्थिर कर प्रतिक्रिया व्यक्त की, ’’बेटा नूरे, हम लोगों के पास कहाँ इतना पैसा-कौडी जो मस्जद तामीर करा सकें। खयाल बुरा नहीं, पर नामुमकिन है। वैसे आदिलपुर में कितनी बडी मस्जद है, हम लोग शुरू से ही वहाँ जाते रहे हैं। फिर, आदिलपुर है ही कितनी दूर कोई मील भर। तनातनी के इस जमाने में जितना जैसा अब तक चलता आया है, उतना चलता रहे, यही बहुत है।‘‘
दूध बेचने का धन्धा करने वाले अब्दुल करीम का कहना था, ’’लगभग पन्द्रह-बीस मिनट का रास्ता है आदिलपुर का। इतना तो पैदल चलना ही चाहिए। थोडा जिस्म को जुम्बिश देते जाएंगें, तो ज्यादा सबाब होगा।‘‘
गले से उठते स्वर में जवानी का जोश और ठसक।
एक भी व्यक्ति ऐसा न था जिसने मस्जिद तामीर किये जाने की संभाव्यता पर प्रश्नचिह्न न खडा किया हो। इस सबके बावजूद नूरूद्दीन पर मस्जद का ख्ाब्तनुमा दिवास्वप्न तारी।
खेरवा में चुहल चल निकली। लोग उसे देखते ही कुछ ऐसा पोंक देते, ’’और कहो नूर भइया। कब तक तामीर करवा रहे हो मस्जद?‘‘
कुछ युवक अक्सर मसखरी करते, ’’चचा, क्या हुआ आपकी उस कुश्ती का परिणाम? नूरा ही रह गयी?‘‘
जैसा कि हर गाँव में कोई-न-कोई होता है, ’नूरूद्दीन की मस्जद‘ खेरवा का सर्वप्रिय-सर्वग्राही परिहास हो गया। वैसे मुसलमानी गाँव होते हुए भी खेरवा में किसी मस्जद का न होना, किसी हाजी का न होना, यहाँ के लोगों की विपन्नता का सर्वपठनीय प्रमाण-पत्रा था।
घर से आदिलपुर और आदिलपुर से घर की कुत्ता दौड में नूरूद्दीन जवान से प्रौढ हो गया। समय की तूलिका ने चेहरे पर झुर्रियों और झांइयों का विरूप ग्राफ बुन दिया। सिर और दाढी के बाल पौष्टिक आहार के अभाव में सफेद हो गये। हाडतोड मेहनत के कारण थोडी कमर झुकी, थोडे कन्धे, थोडी गर्दन। पाँच-छह दाँत टपक पडने से गोल चेहरा त्रिाकोणात्मक हो गया। कुछ और परिवर्तन भी हुए। बेटा अल्लाबख्श उर्फ अल्लन जवान हो गया, दाढी-मूंछ उग आयीं। शरीर में चुस्ती, जोर और दम-खम आ गया। खुदा ने इतनी ताकत और दाँव-पटुता दी कि एक-से-एक हट्टे कद्दार पहलवान को कुश्ती में चित कर देता। पर निर्विकल्पता की स्थिति में वह भी पुश्तैनी धन्धे मजदूरी में एक दिन नाथ दिया गया या यों कहें वह स्वयं नथ गया। शादी भी हो गयी। अब अब्बू और नूर-ए-चश्म दोनों मजदूरी में।
छिदि्रत घट के जल की तरह कुछ समय और रिस गया। गर्मी की एक नरम सुबह नूरूद्दीन के घर हंगामा मच गया। हंगामा क्या, हडताल जैसी स्थिति। अल्लन अब्बू का रास्ता छेंककर खडा हो गया, ’’कई बार कहा, पर आप मानते नहीं। बस, बहुत हो गया। आज से आप मजदूरी पर नहीं जायेंगे। मैं जाता ही हूँ। घरखर्च चल जाएगा। लोग चमगोइयाँ करते होंगे, कनफुसकी मारते होंगे कि बाप ने पाला-पोसा, बडा किया, पर अल्लन अभी भी बूढे बाप को दौडाये रहता है-बैलगाडी में जुते बूढे, बीमार बैल की तरह।‘‘
नूरूद्दीन छटपटाये। जैसे किसी ने नाक पर कपडा रख दिया हो।
’’मेरी बात सुनो। अभी तो काम कर सकता हूँ। कोई दिक्कत महसूस नहीं होती। क्या करूंगा यहाँ बैठे-बैठे? चरपायी तोडूंगा या बावले कुत्ते की तरह दरवाजे-दरवाजे मारा घूंमूंगा?‘‘
चिन्ता की पारस्परिकता बेटे को बाप की चिन्ता, बाप को बेटे की चिन्ता। अल्लन ने उनके चेहरे को ध्यान से देखा-झुर्रियां, झांइयां,  मिचमिचाती आँखें,  माथे की सलवटें,  झडते बाल, सफेद दाढी, गले की झूलती त्वचा, उभरी हँसली और इन सबके पीछे बेहिसाब थकावट, टूटन, भटकन, बदहाली, बदहवासी, दुश्चिन्ता....।
वह बोलने को ही था कि अनारो ने आगे बढकर मोर्चा संभाल लिया, ’’आपको नहीं, पर मुझे दिक्कत है, भारी दिक्कत है।‘‘
अर्धविराम लेकर वह फिर बोली, ’’अक्सर बीमार रहते हो। मौसम का मिजाज बदला नहीं कि शुरू हो गयी ’खों, खों‘, छूटने लगी हँफनी और इस पर भी जनाब फरमाते हैं कि दिक्कत नहीं। किसी दिन वहीं आदिलपुर में काम करते-करते ’टें‘ हो गए, तो सीधे खेत से खटिया पर टाँगकर लाये जाओगे। पर मेरे रहते-रहते ऐसा कर नहीं पाओगे। समझे, खाँ साहब?‘‘
यह कहकर अनारो ने उनका हाथ पकडा और लगभग खींचते हुए चबूतरे की चारपायी पर स्थापित कर दिया, ’’चलो बैठो चुपचाप।‘‘
नाटक ’मिनी कू‘ (लघु विद्रोह) का यह अन्तिम दृश्य था।
नूरूद्दीन अब घर में पडा रहता। बीच-बीच में बीडी फूंक लेता, उठते धुएं की बहुरूपी आकृतियों को निहारता और ’खों, खों‘ करता। ’खों, खों‘ करते ही बीवी बीडी पीने के कारण झाड पिलाती। ऊबने पर गाँव में निकल पडता और ताश या सुरबग्घी पर हाथ आजमाता। घूम-फिरकर ’बैतलवा डाल पर‘ यानी चबूतरे रूपी अपने दडबे में। दिनचर्या चुनौतीविहीन, खासी ऊबाऊ, सुस्त और बोझिल।
एक दिन वह कहीं जाने को हुआ। अनारो ने टोका, ’’कहाँ चल दिए?‘‘
’’आदिलपुर।‘‘
’’क्यों? ‘‘ सख्त मास्टरनी के अंदाज में वह बोली।
नूरूद्दीन भी आज अकड गया, यद्यपि उसे डपटना नहीं कहा जाएगा, ’’क्या कहीं आने-जाने की भी मनाही है?‘‘
अनारो ने फौरन गेयर बदल दिया। वह मुस्कुरा उठी जिसे छिपाने के लिए उसने दुपट्टा ओठों के बीच दबा लिया।
उस दिन नूरूद्दीन ने आदिलपुर की राह क्या पकडी, वह अक्सर का काम हो गया। इतना जरूर कि रोटी खाकर दिन चढने पर जाता और दिया बत्ती से पहले लौट आता।

एक दिन खेरवा के बाशिन्दों ने देखा कि वह अपने सिर पर ईंटें रखे चला आ रहा है। उसके बाद यह दृश्य अक्सर दिखने लगा। सिर पर गोल बेडरी और उस पर रखी ईंटें। शायद वह घर पर निर्माण-कार्य करवाना चाहता है और माँग-जाँचकर ईंटें इकट्ठा कर रहा है।
एक दिन जेठ की दुपहरी में जब ऊपर का घाम और नीचे जमीन की भुलभुल मनुष्य को पस्त करने के लिए आठों-आठ उद्यत थी, नूरूद्दीन ईंटें ढोता हुआ आ रहा था। शरीर पसीने से तर-ब-तर, बाल, दाढी और बरौनियों तक में अटकी पसीने की बूंदें, मुंह से निकलती हंफनी, बोझ के कारण गर्दन की नसें तनी हुई, बिवाई फटे, नंगे पैर....। शरीर ऐसे डगमगा रहा था जैसे अगले कदम में ही मय ईंटों के ढेर हो जाएगा। ऐसा न होना जीवन भर के श्रमाभ्यास की विजय होगी।
सामने से एक भैंसा गाडी गुजरी जिसमें लकडी के दो बडे कुन्दे लदे हुए थे। तेज धूप और भारी बोझ के कारण भैंसा हांफ रहा था, नथुनों से फुफकार निकल रही थी। भैंसे और नूरूद्दीन में क्या कोई अन्तर रह गया था?
पीछे से एक युवक आया और बगल में चलते-चलते बोला, ’’ताऊ, मैं ईंटें पहुँचा दूँ?‘‘
वह थोडा सख्त अंदाज में बोले, ’’नहीं, अब रह कितना दूर गया है।‘‘
रास्ता अभी भी आधा बाकी था। युवक का प्रस्ताव उन्हें अपनी क्षमता, अपनी श्रमशीलता, अपनी संघर्षशीलता, अपनी जिजीविषा का अपमान लगा।
आदिलपुर और आस-पास के गाँवों में जिन व्यक्तियों के यहाँ निर्माण या मरम्मत का कार्य चल रहा रहा होता, उनसे चिरौरी-विनती कर वह सात ईंटें माँग लेते न कम न ज्यादा। वह ईंट के भट्टों तक भी दौड लगाते। कुछ उनकी बुजुर्गी का, कुछ उनकी शराफत का और कुछ उनकी लम्बी दाढी का लिहाज करते। कुछ यह सोच कर कि सात ईंटें ही तो मांग रहा है, कौन बडी बात है, तरस खा जाते। कुछ इस मानसिकता के भी होते कि भले काम के लिए मांग रहा है, दे दो।
नूरूद्दीन पर जुनून सवार। न बीवी की सुनने को तैयार, न बेटे की। वह मजदूरी से भी ज्यादा मेहनत करने लगे। ईंटों पर ही नहीं रुके। कभी झोले में सीमेन्ट भर कर ला रहे हैं, कभी बजरी, कभी मौरंग, कभी बालू। सारी सामग्री अपने घर के सामने इकट्टा करते जा रहे थे। रात तकवाई भी करते। जरा-सी आहट हुई नहीं कि चौकन्ने हो जाते। क्या मजाल कि कोई एक ईंट चुरा ले। अनारो ने एक दिन कह दिया कि नाली के पास आठ-दस ईंटें लगा लें, तो कीचड नहीं होगा। उन्होंने बेहत तल्खी से मना कर दिया। अनारो ने भी दरवाजे पडी इस सम्पत्ति से मुंह मोड लिया।
करते-करते दो हजार ईंटें इकट्ठा हो गयीं। खेरवा के लोग दंग। जो लोग मस्जिद की योजना को लेकर मजाक उडाया करते थे, वे अचम्भे में थे। मुँह पर ताला लग गया था।
एक दिन कुछ लोग झुण्ड बनाकर आए। बोले, ’’हमारी नासमझी, हमारी कमअक्ली, हमारी गलतियों को माफ करो, चचा। हम आपका मजाक उडाते रहे। नादानी में समझते रहे कि काम सपने जैसा है इकदम नामुमकिन। पर आप नामुमकिन को मुमकिन कर रहे हैं वह भी æ

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