कर रहे हैं क्या, कभी सोचा है हमने दोस्तो
गिद्ध बन इस मुल्क को नोचा है हमने दोस्तो
हुए, जैसे भी हुए, आजाद तो हम हो गए,
है आजादी चीज क्या, खोजा है हमने दोस्तो
घडी-घंट, अजान तो मुद्दआ बनते यहीं,
मुद्दआ कहत-दहत, छोडा है हमने दोस्तो
खेल कर बच्चे हैं जैसे तोड देते झुनझुना,
उस तरह जनतंत्रा को तोडा है हमने दोस्तो
हमने जिसको आस्मां समझा, उसी पे थूकते,
कौन सी तहजीब ये सीखा है हमने दोस्तो
अपने से करते दलाली, हवाला है जंदगी
खुद को कुर्सी के लिए बेचा है हमने दोस्तो
वक्त ने गर दे दिया शोहरत तो इतराना है क्या,
डूबते मस्तूलों को देखा है हमने दोस्तो
धूप ज्यादा, साया कम, सर पे ले खटिया ’गोपाल‘
चिथडे हिन्दोस्तान को बांटा है हमने दोस्तो |
जो भी लिखो, सरेआम लिखो
लिखो, लिखो, आम के नाम लिखो
बहुत किए रिवायत की कवायत,
अब उनका काम तमाम लिखो
हाथ थामों उनका, जो हाथ वाले हैं
बताए मकसद जो, उसे सलाम लिखो
रफ्तार बहुत तेज है वक्त की,
ऐसे में अपना मुकाम लिखो
सुबह का धोखा हुआ है बारहा,
यकीन आए तो शाम लिखो
सच भी होता है झूठ से बदतर,
ऐसा है आज का निजाम लिखो
बदलता है तो बदलो खुद ’गोपाल‘,
सीधी राह पकडो, मत इल्हाम लिखो |