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Vartmaan Sahitya ::October, 2006
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सभ्यताओं के संघर्ष के बीच ओरहान पामुक को साहित्य का नोबेल पुरस्कार कृष्ण कुमार यादव
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सभ्यताओं का संघर्ष/एक सभ्यता और दूसरी सभ्यता/ के बीच अन्तर करता/ और उनमें एक द्वन्द्व पैदा करता/ बस ऐसे ही चलता है/ सभ्यताओं का संघर्ष / कोई नहीं सोचता/ सभ्यताओं की आड में/ यह मानवीय संघर्ष है..... सभ्यताओं के संघर्ष की इस प्रतिध्वनि की आड में तुर्की के जाने माने लेखक व टिप्पणीकार ५४ वर्षीय ओरहान पामुक को वर्ष २००६ हेतु साहित्य का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गई। पुरस्कार की घोषणा करते हुए स्वीडिश अकादमी ने पामुक के लिए लिखा है- ’’ओरहान पामुक ने अपने पैतृक नगर (इस्ताम्बुल) की व्यथित आत्मा की तलाश में संस्कृतियों के संघर्ष के नए मुहावरे और बिल्कुल नए प्रतीकों को जन्म दिया है।‘‘
ओरहान पामुक जिस देश से सम्बन्ध रखते हैं, वह आरम्भ से ही सभ्यताओं के संघर्ष का शिकार रहा है। प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की द्वारा मित्रा राष्ट्रों के विरुद्ध लडने के बावजूद युद्ध के समय ब्रिटिश राजनीतिज्ञों द्वारा भारतीय मुस्लिमों, जो कि तुर्की के सुल्तान को इस्लाम का खलीफा मानते थे, को आश्वासन देना कि युद्ध पश्चात् भी तुर्की की सम्प्रभुता से खिलवाड नहीं किया जाएगा, पर अन्ततः युद्ध में हार पश्चात् तुर्की को विघटित करने के प्रयास करना एवं नतीजन, भारत में इसके विरुद्ध खिलाफत आन्दोलन खडा होना व तत्पश्चात् महात्मा गाँधी द्वारा इसे हिन्दू-मुस्लिम एकता का रूप देते हुए अन्ततः व्यापक स्तर पर असहयोग आंदोलन चलाना, यह दर्शाता है कि तुर्की सदैव से ही संस्कृतियों के संघर्ष का एक सम्वेदनशील क्षेत्रा रहा है। तुर्की का घ्घ्घ् हिस्सा यूरोप में व आधा हिस्सा एशिया में पडने के कारण इसे पूर्वी व पश्चिमी संस्कृतियों की मिलन स्थली भी कहा जा सकता है पर मिलन के साथ संस्कृतियों का संघर्ष भी स्वभाविक है। वस्तुतः अपने गौरवशाली अतीत से विमुख होने और मुस्तफा कमालपाश की क्रान्ति के बाद तुर्की न तो पूर्णतया इस्लामी रह गया है और न ही यूरोपीय सभ्यता के साथ कदम मिला पाया है। स्वयं पामुक इस कशमकश को स्वीकारते हैं कि- ’’पश्चिम के रूप में रंग जाने की आकांक्षा और लगातार यह काम सही तरीके से नहीं कर पाने के आरोपों के बीच यूरोप की आत्मा को अंगीकार करने की भावना और इसे नकलची कोशिश मानकर पैदा हुआ अपराध बोध कहीं न कहीं भावनाओं के स्तर पर सदैव एक अन्तर्द्वन्द्व पैदा करता है।‘‘ वस्तुतः ओरहान पामुक तुर्की के साहित्य जगत में उस समय उभरकर सामने आये, जब लेखकों की पिछली पीढी विदा ले रही थी। पामुक उनसे इस मायने में अलग थे कि वे प्रयोगधर्मी थे। चीजें जिस रूप में वाह्य स्तर पर दिखती हैं, सिर्फ वही सच नहीं होतीं वरन् उसके पीछे भी कई तत्व अन्तर्निहित होते हैं। पामुक की सबसे बडी चिन्ता यह रही है कि दो विपरीत संस्कृतियों के बीच किस प्रकार इस्ताम्बुल को उसका खोया हुआ गौरवशाली अतीत लौटाया जाय। यह वही इस्ताम्बुल है, जिसके बारे में कभी फ्लॉबर्ट ने भविष्यवाणी की थी कि वह एक दिन विश्व की राजधानी बनेगा, पर दुर्भाग्य कि वह तुर्की की भी राजधानी नहीं बन पाया। पामुक अपने इस पैतृक नगर की खोयी हुई सांस्कृतिक विरासत को पुनः सहेजना चाहते हैं और वर्तमान बदहाली से परे उसे एक आधुनिक विचारों वाले समृद्ध व विकसित नगर के रूप में देखना चाहते हैं। अपनी किताब ’इस्ताम्बुलःमेमोरीज ऑफ द सिटी‘ में वे लिखते हैं- ’’इस्ताम्बुल की नियति मेरी नियति है। मैं इस नगर से जुडा हुआ हूँ, क्येांकि आज मैं जो कुछ भी हूँ, इसकी बदौलत हूँ।
ओरहान पामुक मात्रा एक संवेदनशील लेखक ही नहीं वरन् सामाजिक टिप्पणीकार भी हैं। एक स्विस पत्रिाका को दिए गए साक्षात्कार में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान तुर्की हुकूमत को आर्मीनियाईयों व कुर्दों के जनसंहार का दोषी ठहरा कर उन्होंने ’तुर्की और तुर्कीपने‘ का अपमान करने की आफत मोल ले ली। नतीजन, उन्हें कुछ समय के लिए देश छोडकर भागना पडा और जब लौटे तो उन पर मुकद्दमा चला। इस दौरान उन्होंनें अपनी मनोस्थिति पर लिखाह है-’’मेरे देश में पाशाओं, संतों और पुलिसकर्मियों को कई तरह के अवसर उपलब्ध हैं पर यहाँ पर लेखकों का कोई सम्मान नहीं है और उन्हें मुकद्दमेंबाजी में कई वर्ष बर्बाद करने पडते हैं। ...विवाद खडा करना मेरा शगल नहीं रहा, इसलिए सार्वजनिक जीवन से मैं कुछ दिनों के लिए दूर हो गया। एक प्रान्तीय गर्वनर ने मेरी किताबों को जलाने के आदेश दिए। इसके बाद इस्ताम्बुल में मेरे लौटने पर सिसली में चलाए गए अभियोग ने मेरे मुद्दे को अन्तर्राष्ट्रीय महत्व का बना दिया। ...अब मैं समझ सकता हूँ कि क्यों मुझको आखिरी ’वास्तविक तुर्की लेखक‘ समझा जा रहा था।‘‘ बहरहाल, यूरोपीय संघ के दबाव के बाद तुर्की सरकार ने पामुक के खिलाफ दायर मुकद्दमा वापस ले लिया।
पामुक को सबसे ज्यादा चर्चा २००२ में प्रकाशित उनके उपन्यास ’कार‘ से मिली, जिसका कि २००४ में ’स्नो‘ शीर्षक से अंग्रेजी अनुवाद भी बाजार में आया। इसे एक साहित्यिक उपन्यास मानने के बजाय राजनैतिक उपन्यास ज्यादा माना गया और तुर्की से बाहर भी उन्हें इसी के बाद पहचाना गया। यह उपन्यास एक ऐसे व्यक्ति पर आधारित है जो जर्मनी में १२ साल निर्वासित जीवन व्यतीत करने के बाद अपने देश तुर्की तुर्की लौटता है, जहाँ एक अखबार उसे पत्राकार के रूप में एक ऐसे सुदूर गाँव में भेजता है, जहाँ व्यापक पैमाने पर लडकियाँ निरन्तर आत्महत्या कर रही हैं। उस गाँव की वस्तुस्थिति देखकर वह हैरान रह जाता है, क्योंकि वह इलाका भयानक गरीबी, भुखमरी व बेरोजगारी से ग्रस्त है। रोजगार के अभाव में युवा लडके दिन भर ताश खेलते और शाम को लौटकर अवसादग्रस्त स्थिति में अपना गुस्सा घर की लडकियों और पत्नियों पर उतारते। नतीजन, लडकियों में ऐसी स्थिति से दुखी होकर आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बढती जाती है। आत्महत्या करने के उनके तरीके भी अजीबो-गरीब हैं। सबसे पहले वे घर के सारे काम निपटाती हैं और फिर अचानक जहर पीकर, नींद की गोलियाँ खाकर या गोली मारकर आत्महत्या कर लेती हैं। स्थानीय प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी कोई ऐसा रचनात्मक कदम नहीं उठाना चाहता, जिससे कि लोगों की जीवन-शैली में सुधार हो व आत्महत्या जैसी स्थितियाँ न उत्पन्न हों, वरन् वह आत्महत्या को एक बुराई बताते हुए कागजी कार्यवाही द्वारा स्थिति से निपटना चाहता है। निश्चिततः पामुक का यह उपन्यास आज भी कई देशों की सामाजिक स्थिति का बयाँ करता है। स्नो (बर्फ) का प्रयोग पामुक ने एक प्रतीक के रूप में किया है, जो दर्शाता है कि जिस तरह पेड-पौधों, घरों, दुकानों व सडकों पर बर्फ की मोटी चादर फैली हुई है, उसी तरह मानवीय संवेदनाओं को भी बर्फ  ने  ढक लिया है, जिससे रह-रहकर विक्षोभ के रूप में धुआँ उठता रहता है। इसी उपन्यास में तुर्कों द्वारा आर्मीनियाइयों व कुर्दों के जनसंहार का प्रसंग भी दृष्टव्य हुआ है, जिसने इस उपन्यास को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित कर दिया।
इसी प्रकार पामुक का उपन्यास ’माई नेम इज रेड‘ भी काफी चर्चित रहा। इसमें १६वीं सदी के उस इस्ताम्बुल को दर्शाया गया है, जब ऑटोमन साम्राज्य अपने ढलान पर था। सभ्यताओं के संघर्ष के बीच इस्लाम को यूरोप से मिली शिकस्त को पामुक ने इसमें दर्शाया है। सुल्तान का एक दरबारी कलाकार वेनिस जाता है और वहां के एक कलाकार का काम देखकर चकित रह जाता है। अचानक उसे अपने देश की सांस्कृतिक श्रेष्ठता के गौरवशाली दिन याद आने लगते हैं, जो कि अब खो चुके हैं। इस्ताम्बुल लौटकर वह सुल्तान को उक्त घटना के बारे में बताते हुए अपने साम्राज्य की गौरवगाथा के बारे में एक ग्रंथ लिखवाने की सलाह देता है। उसकी बातों से प्रभावित होकर सुल्तान ग्रंथ-रचना हेतु कुछ कलाकारों व लेखकों को बुलवाते हैं, पर इनमें से एक की हत्या कर दी जाती है। उपन्यास कई रोचक मोड लेता है, पर अंततः यही प्रतिस्थापित करने की कोशिश करता है कि ऑटोमन साम्राज्य अपने गौरवशाली अतीत को कभी भी नहीं भुला पाया और न ही दूसरी संस्कृतियों के उत्थान को सहजता से ले सका। इस उपन्यास में पामुक ने अनुपम ढंग से मिथकों व दर्शन के रोचक रोमांस के बीच सभ्यताओंे व संस्कृतियों के संघर्ष को बखूबी दर्शाया है।
तुर्की में उनकी किताबों से ज्यादा चर्चायें उनकी टिप्पणियों व साक्षात्कारों को लेकर होती रही हैं। ९० का दशक आते- आते उन्होंने अपनी किताबों की बिक्री के मामले में सारे पिछले रिकार्ड तोड दिए। अकेले अमेरिका में उनकी आठ अनूदित किताबों की पाँच लाख से ज्यादा प्रतियाँ बिक चुकी हैं। ओरहान पामुक की कृतिय में केवडेट बे एण्ड हिज सन्स (१९८२), द व्हाइट कैसेल, द ब्लैक बुक (१९९०), माई नेम इज रेड, स्नो (२००४), इस्ताम्बुल ः मेमोरीज ऑफ ए सिटी (२००४) इत्यादि उल्लेखनीय हैं। पर इस अन्तर्राष्ट्रीय पब्लिसिटी ने उन्हें तुर्की के बुद्धिजीवियों व मीडिया की निगाह में पाश्चात्य देशों के साथ खडा करना आरम्भ कर दिया। नतीजन, पामुक का हर बयान राजनैतिक रूप लेने लगा और चर्चायें उनके व्यक्तित्व व लेखन की बजाय साक्षात्कारों, टिप्पणियों व पाश्चात्य संस्कृति से उनके अनुराग पर केन्दि्रत होने लगीं। दुनिया भर की अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिाकाओं में दिए गए उनके साक्षात्कार व बयानों को तुर्किश मीडिया अपने हिसाब से तोड-मरोड कर परोसने लगा।
स्वीडिश अकादमी द्वारा ओरहान पामुक को साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा करना विवादों से परे नहीं रहा। ऐसा कहा जा सकता है कि साहित्य के नोबेल पुरस्कार का पैमाना साहित्येतर हो गया है। अब यह रचनात्मक श्रेष्ठता के आधार पर नहीं वरन् लेखक की राजनैतिक सक्रियता के आधार पर दिया जा रहा है। यह कोई पहली बार नहीं है जब कि साहित्य का नोबेल पुरस्कार विवादों के घेरे में है। वर्ष २००४ में अपनी ही सरकार की कट्टरवादी नीतियों की कटु आलोचक रही आस्ट्रिया की एल्फ्रिड जेलिंक को नोबेल पुरस्कार देने पर १८ सदस्यीय स्वीडिश अकादमी के ही एक सदस्य ने रोष जताते हुए तीखा विरोध दर्ज कराया था। पिछले वर्ष २००५ में ब्रिटिश नाटककार हैरोल्ड पिंटर को जब साहित्य का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गयी तो वे कहने से नहीं चूके कि-’’इस नोबेल पुरस्कार के पीछे मेरे नाटकों का उतना योगदान नहीं है, जितना कि मेरी राजनीतिक सक्रियता का।‘‘ ज्ञातव्य है कि हैरोल्ड पिंटर इराक के खिलाफ कार्रवाई के ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के फैसले से इतने खफा थे कि उनके खिलाफ महाभियोग चलाने तक की मांग कर डाली थी।
ओरहान पामुक सिर्फ एक साहित्यकार व टिप्पणीकार ही नहीं वरन् मानवतावादी भी हैं। सलमान रूश्दी ने पामुक को इस्लाम तथा आधुनिक पाश्चात्य दुनिया के बीच पुल का काम करने वाले इकलौते लेखक के रूप में याद किया है। पामुक की सतर्क लेखनी भूमण्डलीकरण के इस दौर में हर मुद्दे व विचार पर चली। भारत व चीन की तेजी से विकसित हो रही  अर्थव्यवस्था को  रेखांकित करते हुए दोनों देशों में मध्यम वर्ग के अभ्युदय को वे एक साहसिक कदम मानते हैं। तुर्की के प्रति वे लिखते हैं कि-’’कई अच्छे रूप में परिवर्तित होते विश्व की ओर हमारा ध्यान न होकर ऑटोमन साम्राज्य के बदनुमा दाग को छिपाने पर टिका हुआ है। ऐसे में अगर एक तरफ वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रवेश के लिए भारी भीड है, तो दूसरी तरफ उग्र राष्ट्रवाद है, जो पाश्चात्य अविष्कारों, वास्तविक लोकतंत्रा और विचार की स्वतंत्राता की तरफ देख रहा है।‘‘ अपने ऊपर हुए वैचारिक हमलों और मुकद्दमेबाजी के पक्ष में उन्होंने दुनिया के कई लेखकों पर इसी प्रकार हुए हमलों का उदाहरण दिया। कोरिया में महान जापानी लेखक केनजाबूरो उई पर अतिराष्ट्रवादी तत्वों ने आक्रमण किया क्योंकि उन्हेांने कोरिया एवं चीन पर किए गए आक्रमण पर टोकियो में विचार करने की बात कही थी। इसी प्रकार वी.एस. नायपॉल पर भी वैचारिक हमले हुए, क्योंकि वे प्रथम ऐसे लेखक थे जिन्होंने उपनिवेशत्तर युग में गैर-पाश्चात्य लोगों के निजी जीवन के कठोर व खूनी चेहरे को उजागर किया। पामुक ने रूस द्वारा चीन में दिखाई गई असहिष्णुता, भारत में हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता पर किये गए आक्रमण और चीन में भी कुछ ऐसे ही हालातों पर प्रश्न उठाए। पामुक का स्पष्ट मानना था कि पश्चिमी राष्ट्रों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता पर इस प्रकार के घोषित व अघोषित प्रतिबंधों की सम्भावना लगभग शून्य है और यही स्वतंत्राता, आधुनिक दृष्टिकोण के साथ उन्हें पाश्चात्य संस्कृति के करीब लाती है। एक इस्लामी राष्ट्र के नागरिक होते हुए भी १९८६ में अयातुल्ला खुमैनी द्वारा दिये गये सलमान रूश्दी की हत्या के फतवे के खुले विरोध में पामुक का यह अन्तर्द्वन्द्व समझा जा सकता है।
निश्चितः स्वीडिश अकादमी ने ओरहान पामुक को साहित्य का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा कर, पूर्वी व पश्चिमी संस्कृतियों की मिलन स्थली तुर्की को गौरवान्वित किया गया है। भले ही पामुक पर तुर्की की सत्ता को चुनौती देने के चलते मुकद्दमेबाजी हुई हो पर अंततः पामुक का व्यक्तित्व एक ऐसे व्यक्ति के रूप में उभरकर सामने आता है जो पूर्वी व पश्चिमी संस्कृतियों की अच्छाईयों को आत्मसात् करते हुए अपने पैतृक नगर इस्ताम्बुल के गौरवशाली अतीत को वापस लाकर उसे केन्द्र बिन्दु में खडा करना चाहता है और इसकी तलाश में संस्कृतियों के संघर्ष के नए मुहावरों और नए प्रतीकों को जन्म देता है।

भारतीय डाक सेवा, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर नगर, मण्डल-कानपुर-०१



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