|
Vartmaan Sahitya ::October, 2006 Sponsered by : Decor Home, Bikaner गंगा की लहरों से एकाकार हुई शहनाई की सुर लहरी:
चन्द्रशेखर पाण्डेय
|
बिस्मिल्लाह!! पहला अक्षर, ज्ञान की नगरी काशी में जिसका चरम लक्ष्य माना जाता है। ढाई अक्षर प्रेम का कबीर ने काशी से शब्दों का सन्देश दुनिया को दिया उन्हीं की नगरी के बिस्मिल्लाह खाँ ने शहनाई के सुरों को साध्यकर वाद को भ्रम साबित कर दिखाया साथ ही सबद हो या रामायनी, कबीर ने कुछ कह डाला। शहनाई के सुरों में भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने उसे सुर संगीत के रूप में लोगों के दिलों तक पहुँचा दिया। बिस्मिल्लाह खाँ काशी की माटी में रच-बसकर शिवत्व की राह चले शेष रह गये काशी के विश्वनाथ मन्दिर की ड्योढी से बाला जी मन्दिर तक उनकी शहनाई के सुर काल जामियाद जिसे कबीर ने ब्रह्मकी संज्ञा दी थी। काशी के कवियों में कबीर को कभी नहीं भुला सकते इसी तरह उनके सुरों के लिए बिस्मिल्लाह को भुलाना मुश्किल है। जहाँ शिव को कालेश्वर कहते हैं कबीर को सहस्त्रााब्दी सूफी सन्त ; उस्ताद बिस्मिल्लाह को ज्वलन्त दीप शिखा पुरूष कहने में कोई दोष नहीं है। जिस प्रकार कबीर के काव्य के बिना हिन्दी अधूरी लगती है उसी प्रकार सुब्हे बनारस हो या शाम की वन्दना, उस्ताद की धुन के बिना अधूरी रह जाती है। अगर उस्ताद होली बजाये तो तन-मन इन्द्रधनुष बन जाता। कजरी गूंजती बिरही के मन में मिलन की तडप हूक बनकर कुरेदती। माँ गंगा की पुजइयाँ में ममता की बरसात होने लगी, अगर कहीं चैती की राग छेड दिये तो मलिक मुहम्मद जायसी की नागमति नयन चुए जाय प्रोरी से साक्षात्कार होने लगता। खाँ साहब कहते थे, धुन में वो खिंचन लाओ दीवाना बनाना है तो दीवाना बना जा। उस्ताद ने अपनी साधना बिहार के डुमरावं में शुरू की बचपन में ही अपने मामा के साथ काशी आ गये और उन्हीं के साथ वाराणसी के बालाजी मंदिर के सामने सुर साधना की थी। वैसे तो उस्ताद ने शहनाई के प्रमाणित कार्यक्रम पेश किये, लेकिन आज से ५४ वर्ष पूर्व एक ऐसा आयोजन मील का पत्थर साबित हुआ, यह कार्यक्रम था, वर्ष १९५२ में नूतन गणेशोत्सव सेवा मंडल नारायण दीक्षित लेन का। जिसमें उस्ताद ने गणेश जी की शहनाई से वन्दना की थी। ख्ााँ साहब ने परम्परा के अनुसार तीन बार नमन किया गणेश भगवान का और ऐसे धुन में लीन हुए कि गणेशोत्सव कमेटी के लोग कहते, वह पल भुला पाना बडा मुश्किल है। इस कार्यक्रम में कई दिग्गज कलाकार जैसे गिरिजा देवी, किशन महाराज जैसे कलाकार थे। उस्ताद के पास हर रंग की धुनों की पिचकारी थी। जैसा मंच का मिजाज देखते वैसा मन की फूंक से भर देते थे शहनाई में। ऐसे ही कर्बला के शहीदों को हर साल आँसुओं का नजराना पेश करने का दृश्य, सबकी आँखों में आंसुओं को छल-छला देता उस पल उस्ताद खुद इतने गमगीन होते कि उनकी आँख डबडबा जाती और सांसें शहनाई से फूंक मारने में बेबस हो जातीं। उस्ताद कुछ देर रुक जाते और आँसुओं को गालों तक सफर तय करने से रोकते, उस्ताद की शहनाई में वो जादू था जिससे बंधकर क्या मुसलमान और क्या हिन्दू सभी वाराणसी स्थित दालमंडी के जुलूस में एक होते। साथ में कदम बढाते फातमान की ओर। यही नहीं जुलूस जिस रास्ते से गुजरता लोग खिडकियों बरामदों में खडे आँसू पोंछते दिखते। उस्ताद कहते थे, गंगा न केवल मन को शांति देती है, वे उसे पावन और निर्मल भी मानते थे। जन्दगी में रवानी , ताजगी और साथ ही हौसला मंद बनाती नई ऊर्जा देती है। ख्ाां साहब कहते थे, गंगा में खिंचाव है। किनारे बैठते ही मन खुद ब खुद कुछ गुनगुनाने लगता है। बालाजी भगवान ने दर्शन दिया था। उस्ताद को गंगा घाट स्थित बालाजी मंदिर के सामने रोज रियाज के दौरान बालाजी दिव्य रूप में आये, मेरे सर पर हाथ फेरा और बोले ’’बजाओ बजाओ। बडे मौज करोगे।‘‘ उस्ताद गंगा तट पर कई-कई घंटे रियाज करते, उस समय उनकी धुन और उनकी गंगा के अलावा उन्हें कुछ अच्छा नहीं लगता था। धुन साधना में इतने लीन हो जाते मानों किसी तपस्वी ने अपने तप को न छोडने की हठ कर ली हो। गंगा घाट से लेकर अमरीकी देशों तक के अपने सफर में लोगों को उन्होंने शहनाई के सुरों से मंत्रामुग्ध कर दिया। उस्ताद गंगा को हिन्दुस्तान की आबरू मानते थे। उस्ताद को अपने वतन और गंगा से कितना प्यार था इसका प्रमाण है वह वाक्य, जब उन्ह अमेरिका में बसने का आमंत्राण मिला उस्ताद बोले मेरे दोस्त कहाँ मिलेंगे, वहाँ कहा गया उन्हें भी लाइए, मेरे परिवार वाले? उन्हें भी लाइए। अमेरिका के राष्ट्रपति ने उन्हें पूरे परिवार के साथ बुलाने का अमंत्राण दिया। उस्ताद ने चुटकी ली पर मेरी गंगा यहाँ कैस आ सकती है? उस्ताद की निगाह में संगीत साधना थी। कहते थे जिस प्रकार भक्ति की कोई जात नहीं होती उसी प्रकार संगीत की कोई जात नहीं होती। रियाज और मिजाज स्थिर कर संगीत में बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है। ख्ाां साहब सिमटे हुए समाज से कटे हुए प्राणी नहीं थे। संकट मोचन मंदिर व कैंट स्टेशन पर हुए बम विस्फोट ने उन्हें बुरी तरह झकझोर दिया था। वे आतंकवादियों को शैतान की औलाद बोल उठे थे। बडे रुआब में कहा था अमा यार इतनी ताकत है कि हम दो चार आतंकवादियों को अपने बगल में दबा सकते हैं। उनका चेहरा उस वक्त क्रोधित था। कैमरे के सामने गालियां बकने से नहीं रोक पाये, कहा इनकी कोई जात नहीं होती, जिन लोगों ने संकट मोचन में विस्फोट किया है उन्हें खुदा कभी मुआफ नहीं करेगा। उस्ताद ने अपनी यादों में खोते हुए चिफ गालों से धीरे से कहा ’’अमां! कभी हम भी संकट मोचन में शहनाई बजाते थे। तौबा-तौबा आज वहाँ बम के धमाके गूंजे? तौबा-तौबा।‘‘ ऐसी आत्माएं मरती नहीं प्रतीक बन जाती हैं। ऐसी विभूतियां मरण से परे अमृतकाय हैं। ऐसी आत्माओं के लिए राही मासूम रजा की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं
कुछ इसका मिजाज जोगिया है
गंगा के किनारे बस गया है।
गंगा की तरह सिजिल सिजिल भी
गंगा की तरह ये पाक दिल भी
हर दिल में चराग जल रहा है।
एन. ६, २-एल-११ इंदिरा नगर, पोस्ट सुन्दरपुर , वाराणसी
Discuss this topic on KhabarExpress Forum
|
|
October, 2006 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | March, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | April, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | May, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | June, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | |
|