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Vartmaan Sahitya ::October, 2006 Sponsered by : Decor Home, Bikaner बिस्मिल्ला खाँ
अजय कृष्ण
गर्व से मुस्कुराते हैं बिस्मिल्ला खाँ
जब कहा जाता है उन्हें
पाइपर ऑफ वारानसी
भोजपुर में जन्मे खाँ साहब
कतराते हैं अपने साक्षात्कारों में
लेने में जन्मस्थली का नाम
आखिर वहाँ कैसे बजती शहनाई
जहाँ बिरहा की तान पर
गरजते हैं कट्टे।
वाकई खाँ साहब की शहनाई में
हैदराबादी बिरयानी की खुशबू
और बनारसी का जायका है
उन्हें गँवारा न था
उनकी शहनाई से आए
लिट्टी-चोखे की चटकार
और खैनी की झांस
क्या खूब आती है इस शहनाई पर नींद
जब स्वादिष्ट भोजन से
भरा हो पेट और दाँतों को
गुदगुदाती हो सुपारी
पर उन्हें कैसे आए नींद
जिनकी अंतडयों से खटखटाती
हो सूखी लिट्टी और
दाँतों तले किनकिनाता हो
खैनी में बारूद
यहीं चूक गए खाँ साहब
अपनी पाइप में |
नहीं भर पाए बारूद
नहीं फूँक पाए शहनाई में टाइफून
जिला-जवारी होकर भी
हिला नहीं पाए ’जीला‘
जब मुसहरों की बारात में बजाते थे शहनाई
तभी से सपनाते थे
अकबरी दरबार और तानसेन
सो बन गए आज नवरत्न
मुस्काते हैं अब कैसे सुपारी कुरेदते
पेग्विन क्लासिक्स पर
मगर खाँ साहब को नहीं मालूम
कबीर अब भी बउआते हैं
कैमूर की पहाडयों पर
खाँ साहब की शहनाई
भले भरमा ले श्रोताओं को
पिला कर अफीम
पर नहीं झुठला सकती
इतिहास और लहू का वास्ता
मुस्कुराता है कल्लु धोबी
बनारस के घाट पर
धोता हुआ खाँ साहब का कुरता
जब उलटे पाकिटों के
कोनों से झडता है
सत्तू और खैनी। |
| द्वारा प्रो. गोपेश्वर सिंह, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली |
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