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Vartmaan Sahitya ::January, 2007
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’वर्तमान साहित्य‘ का अक्टूबर, ०६ का अंक यथा समय मिल गया था। इस घोर मराठी क्षेत्रा में आपने अंक भेजकर मेरी साहित्यिक भूख को मरने नहीं दिया। अपनी कई दुर्लभ सामग्री के कारण अंक दस्तावेजी बन गया है। ’चेखब शताब्दियों की राजनीति‘ शीर्षक आलेख हिन्दी की साहित्यिक राजनीति पर बेबाकी पडी है। भारत रत्न बिस्मिल्ला खां और गीतकार साहिर लुधियानवी पर दुर्लभ सामग्री है। सभी कहानियां पठनीय हैं लेकिन ’अतीश की खेती‘ रिपोर्ताज का स्वाद देती है। कविताएं और गष्जष्लें संवेदित करती हैं। बरेली का सांस्कृतिक परिचय शोधपरक है।
प्रो. (डॉ.) लखनलाल सिंह आरोही, पुणे

’वर्तमान साहित्य‘ अब पत्रिाका न रहकर एक विचारधारात्मक आंदोलन का रूप ले चुकी है। साहित्य संस्कृति की दुनिया में ’वर्तमान साहित्य‘ पत्रिाका का यह हस्तक्षेप अपने आपमें एक इतिहास है। अक्टूबर अंक में प्रकाशित ’चंचल चौहान‘ का आलेख मुक्तिबोध की ’भूल गलती-एक कुपाठ‘ विचारणीय है। आपका यह कथन सर्वथा उचित है कि ’हमारी आर्थिक नीतियां ही हमारी राजनीतिक नीतियां तय करेंगी।‘ फिर कबीर प्र्रेमचंद की ही तरह गांधी की भूमिका को नकारना संभव नहीं। २०वीं शताब्दी को प्रभावित करने वाले हेगेल लुडविग फायरबाख्ा , डारविन, फ्रायड, माक्र्स, एंगेल्स, लेनिन जैसे महापुरुषों में एक नाम अवश्य ही गांधी का भी है।
डॉ. श्रीनिवास शर्मा, कोलकाता

प्रवासी रचनाकारों को मुख्य धारा से जोडकर आपने उस काम को कर दिखाया जिसे सरकारी हिन्दी सेवकों ने सोचा भी नहीं। आन्दोलनधर्मिता, संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता शेष नहीं रही। इसलिए वे परजीवी बन गये हैं। एक समय था जब करंजिया के हिन्दी ब्लिट्ज को मात्रा उसके अंतिम पृष्ठ के ख्वाजा अहमद अब्बास को पढने के लिए पाठक लालायित रहते थे। ’वर्तमान साहित्य‘ के समय संवाद में कुँवरपाल सिंह की भावनाओं में अपने को निमग्न करने और अपनी बात में मौजूदा प्रश्नों से जूझती हुई नमिता सिंह से सम्बद्धता कायम करने के लिए मैं उसे सबसे पहले पढता हूँ।
आप राही मासूम रजा को ही केवल प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध की परम्परा में नहीं देखें, बल्कि नई पीढी को उस लीक पर ले चलने का काम करें जो पुरस्कार खोजने और पाने में लगे रहते हैं।
सितम्बर अंक में रमेश कुन्तल मेघ ने सर्जन के चाकू की तरह कलम का कमाल दिखाया है। समाजवादी आंदोलन के अवसान और राष्ट्रीय स्तर पर साम्यवादी आंदोलन के सीमित क्षेत्राों में कैद हो जाने की परिस्थिति का विश्लेषण और निदान की व्याख्या की है।
अक्टूबर अंक में गांधी को सामने रखकर जिस ढंग से आपने वर्तमान की पडताल की है वह भविष्य के लिए सम्बल है। वामपंथी दृष्टिकोण से गाँधी की प्रासंगिकता को आप ठीक वक्त पर सामने लाये हैं।
विजय शर्मा ने साहिर को याद करके आज के शायरों और फिल्मी गीतों के रचयिताओं के सामने चुनौतियां प्रस्तुत की हैं। कृष्णकुमार यादव ने औरहान पामुक को सामने रखकर जो कहा है वह बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर देता है। संपादकीय में बालश्रमिकों के बारे में पढकर सन्तुष्टि हुई। सरकारी विज्ञापनों से बालश्रमिकों का भला होने से रहा। एन.जी.ओ. चलाने वालों के लिए तो यह कच्चा माल है। इमराना प्रसंग तो हराम और हलाल की लडाई में भटक गया है, और सोचने के लिए बाध्य कर देता है। सम्पूर्ण पत्रिाका के बारे में एक वाक्य में यही कहा जा सकता है कि-’आज की जरूरत है यह‘।
राजेन्द्र राजन, पूर्व सदस्य, बिहार विधानसभा, बेगूसराय

सितम्बर अंक ने बांध लिया। समय संवाद जैसे मेरे ही विचारों को शब्द दे गया। हम सब भी तो अपने अपने ढंग से कम दोषी नहीं। कार्यालयों-बैंकों आदि में ’हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है, उसका सम्मान करें,’ ’हिन्दी में ही कार्य करें‘ जैसी सूचनाओं के तले बैठे कर्मचारी अंग्रेजी में काम करते रहेंगे। अपनी बारी की प्रतीक्षा में बैठे ’बोर‘ होते लोग सूचना पढते भी रहेंगे और अपनी बारी आते ही बिना एक क्षण भी अभी पढी सूचना पर विचारे, अंग्रेजी का प्रयोग करने लगेंगे। फर्श्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले के सामने हिन्दी में उत्तर देना जब तक अपमानजनक लगता रहेगा-अंग्रेजी न बोल पाना हीनभाव पैदा करता रहेगा, हिन्दी पर अंग्रेजी भारी पडती है। आपने सही लिखा कि हिन्दी संस्थानों का दरबारीकरण हो गया है। हिन्दी के संदर्भ में लगता है ’हिन्दी भाषा व्यथा अनन्ता‘। कैसी बिडम्बना है कि जिन शिशुओं की कभी दूध की बोतल भी नहीं छूटी उनकी प्ले स्कूल की कक्षाओं में ट्विंकल ट्विंकल, ए फॉर एप्पल जैसे पहले पाठ बन गये हैं। तथाकथित सभ्य समाजी हम लोग बडे फख्र से नाक ऊँची करते हुए बच्चे से कहते हैं, बेटा अंकल को बताओ नोज कहाँ है। डॉ. सुधेश के संचार माध्यमों में हिन्दी के मूल भाव से सहमति रखते हुए भी मुझे लगता है शब्दों के युग्म में मिली-जुली भाषा पर आपत्ति उठाते हुए कुछ ज्यादा ही गम्भीर हो गये हैं। वैसे दृश्य व श्रव्य संचार माध्यमों के संदर्भ में भ्रष्ट होती हुई भाषा पर उनकी पीडा से मैं पूर्णतया सहमत हूँ। डॉ. सुधा तथा डॉ. अब्दुल लतीफ के लेखों से जानकारियों में बढोत्तरी हुई है। हिन्दी अधिकारी चुटीले सत्यों की व्यथा में भी आनन्ददायी रहे। यह सच है कोई भी एक दिवस मना लेने से कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती। फिर भी ऐसे दिवस आयोजन, विशेषांक एक बार अन्तरात्मा को झकझोरते ही हैं। माँ भारती को उसकी अनन्त व्यथाओं से उभारने की जिजीविषा हमार श्रेयस बने।
नताशा अरोरा, नोयडा

स्वाधीनता समारोह से जुडे इस मास में सय्यद मौहम्मद मेहदी का गाँधी जी का संस्मरण निकालकर अच्छा किया है। वर्णाश्रम व्यवस्था के अतारकिक दर्शन के पक्ष में उनकी कठदलीलों और दूसरी कुछ बातों के बावजूद इस महान शख्सियत को याद किया ही जाना चाहिए। मुक्तिबोध की कविता ’भूल-गलती‘ के पुनर्पाठ वाले आलेख में डॉ. विनीता रघुवंशी ने भी गाँधी जी की सराहना की है। पर वहाँ यह विवेच्य कविता के मन्तव्यों से परे है। उक्त कविता का जितना अंश लेख में आ सका है उससे तो बस इतना मालूम होता है कि इस कविता में भारत-चीन युद्ध में देश को मिली करारी हार से आहत और नाराज कवि ने नेहरू की नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न खडे किये हैं। नेहरू युग में फली-फूली मूल्यहीनता और राजनैतिक दोमुँहेपन आदि की चर्चा भी उदाहरण/प्रसंगों के साथ की जाती तो बेहतर होता। एक ऐसी कविता जो गाँधी की वकालत नहीं करती के सहारे गाँधी और नेहरू के दृष्टि विपर्यय पर चर्चा और गाँधी की सराहना असंगत लगती है। मजे की बात यह भी है कि नेहरू के तमाम प्रतिस्पर्द्धियों को ध्वस्त करते हुए गाँधी ने ही नेहरू को अपने उत्तराधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित किया था। अब यह देखिये कि ’सामाजिक कर्ान्ति के दस्तावेज‘ की समीक्षा में सूरज पालीवाल ने नेहरू के चरित्रा के एक शुक्ल पक्ष की चर्चा की है। इससे इस युग मूल्यहीनता के आरोप के सन्दर्भ में नेहरू की गर्दन पकडने का तरक स्वीकारने में दुविधा होती है। यह भी महज इसलिए कि बहस उदाहरण या प्रसंगों से पुष्ट नहीं है।
अकशील कश्ैस, नई दिल्ली

’वर्तमान साहित्य‘ का अंक मिला। अपने बडे पुराने दोस्त वेणु गोपाल की बारह कविताएं देखकर और भी खुशी हुई। उर्दू साहित्य को हिन्दी की शायद ही कोई पत्रिाका इतनी तबज्जो देती हो। कौन पत्रिाका बची है जो किसी कवि की एक साथ बारह-पंद्रह कवितायें छापकर मुकम्मिल तस्वीर सामने लाये। इस पुरानी परंपरा का निर्वाह करते हुए आपने बहुत अच्छा किया।
श्याम कश्यप, दिल्ली

निरंतर अंक मेश्राम जी के माध्यम से प्राप्त होते रहे हैं। क्या आप नहीं चाहेंगे कि यह पत्रिाका अलीगढ के परिवेश से निकलकर प्रदेश, देश की सीमाओं काल को लांघकर सारे संसार में मशहूर हो। मैं चाहूंगा कि इसका प्रसार-प्रचार शासकीय, अशासकीय, निजी संस्थानों के पुस्तकालयों तक भी हो। क्योंकि वर्तमान समय में और स्थितियों में इस प्रकार की स्तरीय पत्रिाकाओं का नितान्त अभाव सा है और टेलीविजन के इस युग में अपने अस्तित्व को बचाये रखने का कार्य कुछ कम दुरूह तो नहीं, वरना दिनमान, रविवार जैसी पत्रिाकाओं का पता तक नहीं है।

ओमप्रकाश नामदेव, भोपाल

भारत का ’समाजवादी आंदोलन और युगीन साहित्य‘ लेख में लेखक ने सामयिक, राष्ट्रीय, राजनैतिक आकाश में समाजवादी मुखौटे की विद्रूपताओं का जिन्हें देखकर जनमानस समाजवादी नारों से ग्लानि एवं क्षोभग्रस्त हो रहा है, का अल्पजीवी वैचारिक दस्तावेज प्रस्तुत किया है। किन्तु लेख पढकर लगता है कि लेखक भी किसी हद तक लोहियाजी के प्रभा मण्डल से मोह ग्रस्त है। हमारे देश के समाजवादी, लेखक के अनुसार बार-बार मोहग्रस्तता से मुक्ति पा नई मोहग्रस्तता जो कभी मनोगत (सर्वोदय) और कभी संशोधनवादी कृतियों (लोहियाजी के छः सूत्रा) में उलझ जाते हैं। इस प्रकार मोहभंग की त्राासदिक दशाओं से गुजरता अमेरिकन मॉडल, समाजवाद, माक्र्सवादी समाजवादियों को दुनियाभर में कम्युनिस्ट के रूप में पहचान बनाने को बाध्य भी कर देता है। यह भी उस समाजवाद की एक देन है।
’मुक्ति‘ कहानी ’सत्य चैतन्य लिखित‘ के बारे में सब जानते हैं कि कपडों के अन्दर हर कोई नंगा है। फिर भी सभ्यता का तकाजा है और सामाजिक सौन्दर्य की अपरिहार्यता की समाज में पूर्ण नग्नता या तो विकसित अवस्था में हो सकती है या घोर फूहडपन में। यथार्थवाद के नाम पर मुक्ति कहानी का प्लेटफार्म के अंधेरे में वर्णित अंश क्या ’आधी रात‘ जैसी ब्लू किताबों से होड नहीं करता। या फिर उसी बहस को आगे नहीं बढाता है जो एक प्रतिष्ठित पत्रिाका के सम्पादक महोदय पर अभी भी छिडी हुई है।
सतीश चन्द्र ’सतीश‘, फर्रूखाबाद

’वर्तमान साहित्य‘ का अगस्त-२००६ अंक। सम्पादकीय में नमिता जी ने अंधविश्वास, चमत्कार, तरकहीनता, पाखण्ड और धार्मिक भावनाओं की सौदेबाजी की प्रवृत्ति पर बहुत सटीक टिप्पणी की है। आधुनिकता और वैज्ञानिकता के दौर में अंधविश्वासों का बढना निश्चित रूप से चिन्ता का विषय है। ऐसे में पढे-लिखे जागरूक लोगों को आगे बढकर हस्तक्षेप करने की जरूरत है।
डॉ. विनीता रघुवंशी ने मुक्तिबोध की ’भूल-गलती‘ का पुनर्पाठ करते हुए उसकी गहराइयों में जाकर अच्छा विश्लेषण किया है। डॉ. माधवेन्द्र का ’शिलांग‘ पर रिपोर्ताज रोचक और ज्ञानवर्धक है। डॉ. वन्दना झा का ’समदाउन की अर्थवत्ता‘ शीर्षक लेख भी शोध-परक और स्तरीय होने के साथ मिथिला-भोजपुर अंचल की संस्कृति को प्रस्तुत करता है। समय संवाद में अमेरिका के दुहरे चरित्रा मगर मच्छी रूप और भेडये वाली चाल का ठीक से पर्दाफाश किया है। कवितायें सभी अच्छी हैं। अशोक सिंह की ’अपने शहर की चर्चित कवियत्राी के पलायन पर एक सामूहिक शोक गीत‘ शीर्षक लम्बी कविता बाजारवादी और उपभोक्ता संस्कृति की अच्छी तस्वीर प्रस्तुत करती है। तमाम सम्पादक, समालोचक और कवि ऐसी कवियत्रिायों और कथाकारों को सब्जष्बाग दिखाकर गायब कर देते हैं। अनवर सुहैल की कविता बहुत स्वाभाविक, प्रभावशाली और मन को छूने वाली है। प्रमोद त्रिावेदी की तीनों कवितायें अच्छी हैं। उनकी कविता ’मैं जानता हूँ जिन्हें‘ भावना और संवेदना के धरातल पर काफी प्रभावित करती है। मनोहर चमोली ने पहाडों के सौन्दर्य और उनकी पीडा को बडे आत्मीय ढंग से प्रस्तुत किया है। अशोक तिवारी की बंधन कविता से मैं सहमत नहीं हूँ। उन्हें रिश्तों को गहराई में जाकर गम्भीरता से समझने की जरूरत है। इनकी दूसरी कविता ’शायद‘ एक अच्छी, विश्वसनीय और संभावनाओं से भरी कविता है। डॉ. अनुपम माथुर की आरंभिक दोनों कवितायें अच्छी नहीं लगीं। तीसरी कविता ’संवेदनहीन‘ आज के समय पर एक सटीक और अच्छी टिप्पणी है। अजय कृष्ण की ’प्रवासी‘ और राकेश भारती की ’आयोजन‘ कविताएं भी अच्छी लगीं।
प्रवासी अंक एक और दो ’वर्तमान साहित्य‘ के इतिहास में मील के पत्थर की तरह हैं। ये अंक ऐतिहासिक महत्व के हैं।
डॉ. वशिष्ठ अनूप, रामेश्वर सिंह हाई स्कूल कैम्पस,
रासमंडल, जौनपुर

’वर्तमान साहित्य‘ का अगस्त अंक। पुनर्पाठ के अन्तर्गत डॉ. विनीता रघुवंशी ने मुक्तिबोध की चर्चित कविता ’भूल-गलती‘ का सुन्दर मूल्यांकन किया है। मैं विनीता जी के इस मूल्यांकन से सहमत हूँ कि ’भूल को वक्त आने पर सुधारा जा सकता है, परन्तु गलती समय के साथ स्थायी रूप ग्रहण करती जाती है और उसे सुधार पाना असम्भव ही नहीं, बहुत कठिन होता है।‘ इस अंक की कहानी और कविताएं अच्छी हैं। डॉ. माधवेन्द्र ने ’शिलांग‘ का सुन्दर शब्द चित्रा खींचा है। अशोक सिंह की कविता ’एक सामूहिक शोक गीत ः अपने शहर की चर्चित कवियत्राी के पलायन पर‘ पढने पर मुझे जिज्ञासा होती है कि कवियत्राी कौन है। संपादकीय में नमिता जी ने धार्मिक पाखंड पर जोरदार प्रहार किया है। गणेश जी का दूध पीना और हनुमान तथा दुर्गा की प्रतिमाओं का हिलना मात्रा भारत में ही संभव है। समय संवाद अपनी विचारोत्तेजक टिप्पणियों से प्रभावित करता है।
डॉ. सुनील विकर्म सिंह, जौनपुर

’वर्तमान साहित्य‘ का अगस्त, ०६ अंक। संपादकीय में धर्मांधता पर बेबाक टिप्पणी। स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए धार्मिक पाखण्डों से निजात पाना जरूरी है। ’खण्ड-खण्ड पाखंड का संकल्प इस जकडन से मुक्ति दिला सकता है....।‘ लगभग सभी रचनाएं प्रभावित करती हैं। विशेष रूप से दिनेश पालीवाल, महेन्द्र नारायण पंकज, महावीर रवाल्टा और काजी अब्दुल सत्तार की कहानियों ने विशेष रूप से प्रभावित किया है। ’लक्ष्मन की जमीन‘ में पंकज ने ग्राम्य परिवेश और ग्रामीण न्याय पद्धति का बहुत साकार चित्राण किया है। उर्दू कहानी इतरे लहू (काजषी अब्दुल सत्तार) की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। ’समदाउन‘ एवं ’आलोचना और संस्कृति‘ आलेख ज्ञान बर्धक हैं।
रहमान अली ’राकेश‘, अररिया, बिहार

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