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अभी सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आयी है और फिर राजनीति के अखाडे सजने लगे हैं। बजाय रिपोर्ट के तथ्यों को वस्तुगत रूप में ग्रहण करने के, तथा राष्ट्रीय विकास की जरूरतों के रूप में उन पर विचार करने के, उन पर बयानबाजी की जा रही है और चुनावी मुद्दों के लिये लगाम कसी जा रही है। किसी भी राष्ट्र के विकास की अवधारणा में सभी जाति, धर्म, वर्ण और वर्गों को शामिल किया जाना जरूरी है। सभी का योगदान जरूरी है। किसी भी समाज का किसी राष्ट्र का निर्माण एक जाति या सम्प्रदाय के बलबूते नहीं होता। यह इतिहास को झुठलाना होता है। १८५७ की क्र्ांति से पहले ही हिन्दुस्तान के किसान और कारीगर तबाह हो चुके थे। कारीगर भूखों मर रहे थे और मजदूर बन कर मिट्टी के मोल अपना श्रम बेच रहे थे। किसान जष्मीन के नये बंदोबस्तों में देसी जमींदार, ताल्लुकेदार और अंग्रेज शासकों के बीच पिस रहे थे और इधर उधर भाग रहे थे। फौज में भर्ती हो रहे थे। शहरों में आकर मजदूर बन रहे थे, या वतन से दूर जाकर मजदूरी कर रहे थे। १८५७ की क्राांति के बाद अंग्रेजों के बदले का शिकार मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय ही हुआ। गालिब के शब्दों में कि दिल्ली उजड गई और सिर्फ एक हजार मुसलमान ही वहां बच पाये। यह अलग बात है कि पहला सबक जो अंग्रेजों ने फिर लिया वह हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोडना था जो उनकी राह में सबसे बडा रोडा थी। बाद में लुटे-पिटे मुस्लिम समुदाय पर उन्हने हाथ रखा। वे संख्या में भी कम थे इसलिये उन्हें संभालना आसान था। इसके बावजूद बीसवीं सदी में चल रहे राष्ट्रीय आन्दोलन में हिन्दू-मुस्लिम समुदाय का बराबर योगदान रहा। निश्चित रूप से अंतिम चरण में जिन्ना जैसा कट्टर राष्ट्रवादी नेता मुख्यधारा से अलग हो गया और पाकिस्तान के निर्माता के रूप में इतिहास पुरूष हुआ। इस राजनीति के विपरीत सर सैय्यद अहमद खां जैसे लोगों ने ही मुख्य धारा से अलग थलग जा पडे, लुटे-पिटे मुस्लिम समुदाय की शिक्षा और सांस्कृतिक उत्थान के लिये पहल की और उनके सशक्तीकरण के लिए प्रयास किये। इसके बावजूद आज भी मुस्लिम समाज, अनुसूचित जाति, जनजाति के दलित समाज के समान ही शिक्षा और व्यवसाय में बहुत पीछे है। आर्थिक विपन्नता कहीं न कहीं सांस्कृतिक पिछडेपन से, संकीर्णतावाद से जुड जाती है। विपन्न समाज पर धार्मिक नेतृत्व हावी हो जाता है। आर्थिक विपन्नता और असमानता से उपजी सामाजिक कुंठा अपराध और आतंक का रास्ता भी तलाशती है। जहां एक ओर दलित और पिछडे समाजों को मुख्य धारा में लाने के लिये चर्चा होती रही, प्रयास होते रहे और नीति-सिद्धान्त बनने की प्रकरि्या चलती रही, वहीं मुस्लिम समाज को नजष्रअंदाज किया जाता रहा। उनकी आर्थिक-सामाजिक और सांस्कृतिक स्थितियों में बदलाव लाकर उसके सकारात्मक परिणामों की उपेक्षा की जाती रही। उन्हें केवल राजनीति के मोहरे के रूप में, वोट बैंक के रूप में समझा जाता रहा। जो प्रयास हुए उनमें भी सद्भावना और नीयत कम थी, शोरगुल ज्यादा था, सियासत ज्यादा थी। ब्रिटिश राज में एक ओर भारतीय वर्णव्यवस्था के तले पिसते हुए दलित समाज की स्थितियों की ओर अंग्रेजी राज का ध्यान गया। महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा दलित समाज के शिक्षा के प्रचार प्रसार और इस हेतु उनके द्वारा स्थापित सत्य शोधक समाज की गतिविधियों को अंग्रेजों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहायता दी जो उनके बीच सामाजिक जागृति का एक माध्यम बनी। इसी की अगली कडी के रूप में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर थे जो दलितों के लिये सामाजिक न्याय और समानता के संघर्ष के कारण युग पुरूष हुए। मुस्लिम समुदाय के बीच अलीगढ आन्दोलन ही था जिसने इस रूप में प्रयास किया। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में इस ओर पहला प्रयास ब्रिटिश राज के प्रशासक एलिफिन्स्टन ने एक व्यापक सर्वेक्षण के माध्यम से किया और दलित तथा पिछडे मुस्लिम समुदाय के सशक्तीकरण के लिये प्रयास करने की आवश्यकता पर बल पर दिया था। पहली बार १९३५ में सरकारी नीति के अंतर्गत दलित हिन्दू और दलित मुस्लिम को विशेष सुविधाएं देने के लिये प्रावधान किया गया। यह हमारी वर्णवादी व्यवस्था का कमाल ही कहा जायेगा जहां दलित समाज हमेशा दलित ही रहता है। चाहे वह कितना ही धर्म बदल ले। एक धर्म पुस्तक-एक भाईचारे वाले धर्म का चोगा भी पहन ले, उसकी जन्मना स्थितियां उसे जस का तस रखती हैं। इसीलिये दलित मुस्लिम या दलित ईसाई जैसे वर्ग आज भी हमारी सामाजिक चिन्ताओं में हैं। एक साथ वे नमाजष् तो पढ सकते हैं, गिरजे में साथ बाइबिल की आयतें तो पढ सकते हैं लेकिन रोटी-बेटी का संबंध नहीं हो सकता। केवल और केवल आर्थिक सशक्तीकरण उन्हें राष्ट्रीय मुख्य धारा में ला सकता है, उन्हें सामाजिक न्याय और समानता के अधिकार प्रदान कर सकता है। आर्थिक सशक्तीकरण का रास्ता शिक्षा के दरवाजे से होकर निकलता है। गरीबी के साथ सामाजिक पिछडेपन का चोली-दामन का साथ है। इससे पहले इन्दिरा गांधी के शासनकाल में अनुसूचित जाति-जनजाति तथा पिछडे हुए मुस्लिम समाज की आर्थिक-सामाजिक स्थितियों के अध्ययन के लिये, दस सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया था। १९८३ में कमेटी के अध्यक्ष डॉ. गोपाल सिंह की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि अल्पसंख्यक समाज में लगातार भेदभावपूर्ण व्यवहार के प्रति कुंठा व्याप्त है और इसे पूरी तरह से निकालने के प्रयास होने चाहिये यदि हम चाहते हैं कि राष्ट्र की मुख्य धारा में उनका स्थान हो। कोई भी समाज जो अलग-थलग कटा रहेगा, विपन्नता और अशिक्षा के वातावरण में रहेगा, उसके रूप में एक बडे मानव संसाधन से राष्ट्र को भी वंचित रहना पडेगा। ये भेदभावपूर्ण और असंतोष पैदा करने वाली स्थितियां उस समाज के विकास को तो बाधित करती हैं साथ ही राष्ट्र के एक बडे भू-भाग को भी खोने का खतरा उठाती हैं जहां उस समूह का भौगोलिक रूप से प्रभाव है। पिछले कुछ दशकों से साम्प्रदायिक दंगों में हमेशा एक तयशुदा नमूना नजष्र आया है जहां अल्पसंख्यक समुदाय के आर्थिक आधार पर चोट की गई है। सर्वाधिक ताजष उदाहरण २००२ में गुजरात के मुस्लिम नरसंहार का है जहां चुन-चुन कर उनके व्यापारिक प्रतिष्ठानों को नष्ट किया गया, जीविकोपार्जन के साधनों को नष्ट किया गया। आज भी बडी संख्या में वहां लोग बेघरबार हैं और जाहिर है कि रोजगार, शिक्षा और व्यवसाय जैसी जीवन की धाराओं से वंचित हैं। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार सबसे निर्धन वर्ग का प्रतिशत यदि अनुसूचित जाति/ जनजाति में ३५ है तो मुस्लिम समाज में यह ३१ प्रतिशत है (जो सामान्य हिन्दू वर्ग के लिये ८.९ प्रतिशत है। शहरों में यह निर्धनता का प्रतिशत बढकर ३८.४ हो जाता है; अनुसूचित जाति जनजाति के ३६.४ प्रतिशत से २ प्रतिशत ज्यादा) शिक्षा के स्तर में भी स्कूल जाने वाले लडके, लडकियों का प्रतिशत अनु. जाति/जनजाति से कम है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट इस भ्रम को भी तोडती है कि अधिकांश मुस्लिम बच्चे मदरसे में शिक्षा प्राप्त करते हैं (एक प्रचलित धारणा के अंतर्गत कि मदरसे में आतंकवादी पलते और बनते हैं)। रिपोर्ट के अनुसार केवल ३-४ प्रतिशत बच्चे मदरसे में शिक्षा प्राप्त करते हैं और उसके पीछे भी मुख्य कारण आर्थिक है जहां मां-बाप सामान्य स्कूलों का खर्च नहीं उठा पाते। सामान्यतः हिन्दू वर्ग में १५.३ प्रतिशत स्नातकों की तुलना में जहां मुस्लिम स्नातकों का प्रतिशत ३.४ है। वहीं अनुसूचित जाति/जनजाति का २.२ है। सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यक समुदाय की उपस्थिति कुल प्रतिशत ४.९ है जो अन्य समुदायों की तुलना में बहुत कम है और केवल दलित वर्ग के समकक्ष है। जब तक समाज के सभी हिस्सों का सर्वांगीण विकास नहीं होगा, तब तक सही अर्थों में राष्ट्रीय विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। जरूरी है कि विकास के इन मुद्दों पर राजनीति न की जाय और बिना ढोल नगाडों के, इन्हें विकास के एजेन्डे में प्राथमिकता दी जाय। शिक्षा के क्षेत्रा में दलित और पिछडे वर्ग के समान इन्हें आरक्षण की सुविधा मिले। नौकरियों में इन्हें समान अवसर मिलें। सामाजिक समरसता के वातावरण का निर्माण कर उनके बीच व्याप्त भय और असुरक्षा को दूर करके ही एक बडे समुदाय को मुख्य धारा में लाया जा सकता है।
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