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Vartmaan Sahitya ::January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner भूल-गलती : पुनर्पाठ
विनीता रघुवंशी
अपने वर्तमान साहित्य के अक्टूबर २००६ के अंक में मेरे आलेख भूल-गलती पूनर्पाठ पर प्रत्यालोचन लिखा है। आप मेरे आदरणीय हैं। प्रत्यालोचन पढकर मैं दिल खोलकर हँसी। आपने मेरे आलेख को गहराई से पढा, उसके लिए मैं आभारी हूँ। मुक्तिबोध को लेकर माक्र्सवादियों में बहुत ज्यादा पूर्वाग्रह हैं। वे ही आफ प्रत्यालोचन में भी घिसी-पिटी बातों और तर्कों के दुहरावे दिखलाई पडे। एक बात आप, मेरे आलेख और मेरी रचनादृष्टि के संबंध में नोट कर लें कि मैं न तो जनसंघी हूँ न कोरी हिंसात्मक राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रभावित हूँ। मुझ पर किसी भी प्रकार का उन्मादी तत्व हावी नहीं है। मैं रचनाकार को पुस्तकों, पुस्तकालयों की अलमारी से मुक्त करके आम पाठक तक पहुँचाना चाहती हूँ। ’वाद‘ रचनाकार की इस पहुँच में सबसे बडी बाधा है। आपने यदि मुक्तिबोध पर समीक्षात्मक विश्लेषणात्मक कार्य किया है तो आप साधुवाद के पात्रा हैं। किन्तु आप मुक्तिबोध के मालिक नहीं ह। यदि मैंने मुक्तिबोध की कविताओं में नागरिक बोध का गहरा और व्यापक भाव देखा है तो उसमें बुराई कहाँ है? और क्या है? कृपया विचारें। क्या माक्र्सवादी का राष्ट्र कम्युनिस्टों का राष्ट्र कांग्रेसियों का राष्ट्र अलग-अलग है? उनकी राष्ट्र चेतना का स्तर भी अलग है क्या? दूसरी बात मैंने मुक्तिबोध की कविताओं के जिस मर्म-स्वरों को पकडने की चेष्टा की वो नई कविता के समीक्षकों द्वारा उठाये गये तत्वों पर ही ठहरे हैं। नई कविता आक्रोश की कविता है। यह आक्रोश धूमिल की ’मोचीराम‘ और ’संसद से सडक तक‘ राजकमल चौधरी की ’मुक्ति प्रसंग‘ में सोमित्रा मोहन की लुकमान अली में तथा मुक्तिबोध की हर लंबी कविता में देखने को मिलता है। वह चाहे ’अंधेरे में‘, ’चाँद का मुँह टेढा है‘ या ’भूल-गलती‘ में हो। ’भूल-गलती‘ और ’अँधेरे में‘ व्यवस्थाओं से, आजादी से, राजनीतिज्ञों के आदर्श तथा राजनीति से मोह-भंग की स्थिति से उत्पन्न रचनात्मक आक्रोश है। मैं ना तो जनतंत्रा को बदलना चाहती हूँ और ना ही जनता को। जनतंत्रा में मोहाविष्ट जनता ही इस प्रकार की भूलें करती है। आम चुनाव महज औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। आप अपने श्रेष्ठताबोध में होश खो चुके समीक्षक प्रतीत होते हैं। आप जिन बिन्दुओं को सामने रखकर मुक्तिबोध की समीक्षा कर चुके हैं, उसके अलावा साहित्य में कोई दूसरे दृष्टिकोण से भी रचना का विश्लेषण किया जाता है तो वह पहले का नकारना नहीं है। वरन् रचना की शक्ति और प्राणवत्ता है। वह रचना बहुआयामी है जो किसी एक आयाम से पाठक को तृप्त नहीं करती। मुक्तिबोध को माक्र्सवादी समीक्षकों ने तमगे की तरह अपने सीने पर सजा रखा है। जिस तरह पूरा राष्ट्र गाँधी को छवि की तरह इस्तेमाल करता है पर संवाद की स्थिति बनने पर कन्नी काटने लगता है। क्या मुक्तिबोध माक्र्सवादियों के लिए सजावट की वस्तु तो नहीं? छवि निर्माण का साधन तो नहीं? यह भी सोचने की बात है। मुक्तिबोध अपनी जमीन, अपने लोक, अपने समय के यथार्थ, अपनी परम्पराओं से गहरे तौर पर संपृक्त हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो मुक्तिबोध भी माक्र्सवाद की आड में वही सत्ता सुख पा जाते तो आज का माक्र्सवादी, तथाकथित वामपंथी या कम्युनिस्ट रचनाकार पा रहा है। जबकि गहरी ईमानदारी, गहरी राष्ट्रासक्ति, जो मुक्तिबोध की रचनाशीलता का प्राणतत्व है। मुझे आपने अपने प्रत्यालोचन में दकियानूसी बताया है। वह मैं नहीं हूँ। जो पश्चिमी ढंग का आधुनिकीकरण हमारे देश का हो रहा है। उसमें मैं बेहद प्रसन्न हूँ। किन्तु चिन्ता वहाँ है जब मैं आज के वैश्वीकृत होते भारत के विभाजन पर सोचती हूँ। एक ओर गरीब हिन्दुस्तान है और एक ओर अमीर हिन्दुस्तान है। इस भारत के विभाजन पर मुक्तिबोध क्या लिखते? क्या सोचते? मुक्तिबोध की पोलिटिक्स क्या होती? वैसे भी जब मुक्तिबोध समय से पूर्व समय के यथार्थ को लिख रहे थे उन्हें पागल मान लिया गया था। ’अंधेरे में‘ जिस यथार्थ को मुक्तिबोध ने चित्रिात किया वह बाद के दशकों में भारतीय राजनीति में स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगा। समग्र हिन्दी साहित्य में चीन से हारने (१९६२) पर क्षोभ में डूबी पहली रचना ’भूल-गलती‘ मुक्तिबोध की ही दिखलाई पडती है। आज पुरस्कारों, लाभकारी व्यवस्था में लिप्त कितने रचनाकार कारगिल के छद्म युद्ध-विजय के यथार्थ की संवेदना से विचलित हुए। जरा सोचें। मैं अपने आलेख के बारे में ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहती। हाँ! प्रत्यालोचन पढते वक्त लगा मैं किसी संकीर्ण मानसिकता की गिरफ्त में हूँ यह आपका सोचना है। आप जानें। किन्तु आपने मेरे लिए जिस अश्लील भाषा का प्रयोग किया है। उससे मैं आफ बारे में इतना अवश्य सोच पाई कि आप भी महिलाओं के प्रति पुरुष अहंकार से भरा रवैया रखने वाले माक्र्सवादी हैं। आप मुझे जानते हैं या नहीं यह भी प्रत्यालोचन के लिए जरूरी नहीं है। आफ गहरे आक्रोश ने यह जरूर साफ जाहिर कर दिया कि आप भी उन कठमुल्लों में शामिल हैं जो महिलाओं के लिए फतवे निकाला करते हैं। आप मेरे बुजुर्ग रचनाकार हैं इसलिए यही सलाह दे सकती हूँ कि आप जब भी किसी रचना पर अपने विचार लिखें कृपया शालीनता की सीमाएं बनाए रखें और केवल रचना पर ही बात करें। आप असहमत हों तो तर्क दें, दंड नहीं। मैं किसी भी रचनाकार को जब पढती हूँ तब अपने पाठकीय नजषिरये को वाद के घेरे से मुक्त रखती हूँ। नया ज्ञानोदय पत्रिाका के जुलाई ०६ के अंक में अग्नि शेखर की जवाहर-टनल शीर्षक से प्रकाशित रचना को भी देखें। वह भी राजनीति के युगीन यथार्थ पर विचार करने का भरपूर अवसर देती है। मुक्तिबोध को नजषिरये के बंधन से मुक्त करें। आपकी अस्मिता। आपकी जमीन। सब सुरक्षित है। इसी अपेक्षा के साथ। हिन्दी-विभाग, शा. क. एवं वा. स्ना. महाविद्यालय, हरदा (म.प्र.)
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