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Vartmaan Sahitya ::January, 2007
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चालीस पार पर ’आधा गाँव‘ और ’राग दरबारी‘ जीवन सिंह
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प्रेमचन्द के बाद लिखे गये हिन्दी उपन्यासों में १९६६ ई. में प्रकाशित राही मासूम रजष कृत ’आधा गांव‘ और श्रीलाल शुक्ल कृत ’राग दरबारी‘ की ख्याति और लोकप्रियता किसी से छिपी हुई नहीं है। जहाँ तक लोकप्रियता का सवाल है, ’आधा गांव‘ के सामने ’रागदरबारी‘ बीस ही रहा है, उन्नीस नहीं। लेकिन, रचनात्मकता की परख का एकमात्रा पैमाना लोकप्रियता ही नहीं होता। लोकप्रियता की कसौटी पर ’आधा गांव‘ चाहे उन्नीस रहा हो, लेकिन रचनात्मक समृद्धि की दृष्टि से वह ’राग दरबारी‘ से कई कश्दम आगे है। बरसाती बाढ के पानी के थिर हो जाने पर ही पता चलता है कि परिवेश के लिए उसकी अर्थवत्ता कितनी है? किसी समाज, देश और समुदाय की विडम्बना, विसंगति और अन्तर्विरोधों से परिचित कराना निस्संदेह एक रचनाकार का प्रयोजन हता है, किन्तु जीवन के सौन्दर्य की सम्पूर्ति मात्रा इतने भर से नहीं होती। प्रेमचन्द का लेखन आज भी हिन्दी-उपन्यास-कला की कसौटी इसीलिए बना हुआ है कि उससे गुजष्रते हुए हमको सामाजिक समग्रता की रचनात्मक अनुभूति हुए बिना नहीं रहती। इस दृष्टि से ’राग दरबारी‘ हमेशा एक खण्डित समाज की तस्वीर पेश करता है और भरे पेट वाले पाठकों के लिए अच्छी-ख्ाासी मनोरंजक सामग्री मुहैया कराता है। इसके समक्ष ’आधा गाँव‘ हिन्दी समाज की एक ऐसी मुकम्मल तस्वीर बनाता है, जिसमें किये गये चरित्रा-न्याय से पाठक को पूरा सुकून और संतोष मिलता है। कहने का मतलब यह है कि यहाँ व्यंग्य का निशाना कोई ऐसा चरित्रा नहीं बनता, जो अपने जीवन में उत्पीडन-त्रास्त, लाचार और असहाय हो। श्रीलाल शुक्ल को इस बात का बहुत कम अहसास रहा है कि जिन लोगों पर वे अपना तीर छोड रहे हैं उनमें ज्यादातर लोग अपनी परिस्थितियों और व्यवस्था के मारे हुए हैं। वे स्वयं उन परिस्थितियों के सर्जक नहीं हैं, जिनमें उनको एक ’जागरूक‘ लेखक के व्यंग्य का निशाना बनना पडा है। व्यंग्य की यह सामन्ती परम्परा है, जिसमें हमेशा उच्चवर्गीय प्रभुतासम्पन्न लोग निम्नवर्गीय मेहनतकशों पर अपने व्यंग्यबाण फेंकते रहे हैं। संस्कृत कविता और नाटकों में यह परम्परा रही है, जिसका असर हिन्दी की रीतिकालीन कविता तक रहा है। बिहारी सरीखे एक समर्थ रीतिसिद्ध कवि ने ग्रामीणों (गंवार) पर इसी तरह कस-कसकर व्यंग्य किये हैं। सामन्तकालीन राजतंत्रा में राजा-महाराजा और तत्कालीन अमीर वर्ग को अपवादस्वरूप ही व्यंग्य का लक्ष्य बनाया गया है। इसी से मिलती-जुलती व्यंग्य-दृष्टि श्रीलाल शुक्लकृत ’रागदरबारी‘ की है, जिसमें न औरतों को बख्शा गया है, न लाचारों को। इसकी तुलना में ’आधा गाँव‘ के समग्र जीवन-व्यवहार में गम्भीर सृजनात्मक संतुलन है। प्रेमचन्द की भाँति यहाँ गष्रीबों, असहायों और मेहनतकशों पर उनकी परिस्थितियों की वजह से व्यंग्य नहीं किया गया है। यहाँ व्यंग्य-विद्रूप का निशाना बने हैं तो वे ही लोग, जो उसके वास्तविक पात्रा हैं। पाठक की न्याय-बुद्धि और लोकदृष्टि को यहाँ पूरी तसल्ली हासिल होती है, जबकि ’रागदरबारी‘ में प्रस्फुटित प्रहसन से इसीलिए क्षोभ हुए बिना नहीं रहता कि वहाँ रिश्तों की बानगी में न्यायसंगतता की बेहद कमी है। जबकि इस समय तक बौद्धिक दृष्टि से जागरूक और संवेदनशील लेखकों के सामने इतनी सी बात आईने की तरह साफश् हो चुकी थी कि इस संसार में जो भी कीचड-कर्दम है, वह मेहनतकश और शोषित-उत्पीडत वर्ग की देन न होकर उस प्रभुतासम्पन्न शोषक-शासक उच्चवर्ग की देन है, जो अपने हकश् में इस गंदगी को न केवल फैलाने में मददगार होता है, बल्कि इसे बढावा भी देता है। कहना न होगा कि श्रीलाल शुक्ल ’रागदरबारी‘ में इस दृष्टि से महरूम हैं। जबकि ’आधागाँव‘ का लेखक इस दृष्टि से बेहद सम्पन्न है। यही दृष्टि है जिसकी वजह से शुक्ल जी शिवपालगंज नामधारी गाँव की व्यवस्था, रिश्तों और व्यवहारों को ’अव्वल दर्जे‘ के मजषक का केन्द्र बनाये रखते हैं और राही जी अपनी गंगोली को गले का हार बनाते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि एक ही समय के दो लेखकों के नजषिरये में इतनी गहरी फाँक है कि ग्रामीण जीवन के सरोवर में अवगाहन करने पर एक को केवल घोंघे ही हाथ लगते हैं, जबकि दूसरे को घोंघों के संग कुछ मोती भी। दूसरा लेखक उन घोंघों को ही अपनी धरोहर मानकर उपन्यास रचना में प्रवृत्त होता है। इसी से ’आधागाँव‘ एक खूबसूरत उपन्यास बन जाता है, जो छोटे लोगों के छुटपन को न नापकर, छोटी समझी जाने वाली बातों में से उन बडे और गम्भीर सवालों को उठाता है, जो आज तक पूरे देश की जिष्न्दगी में जष्हर घोले हुए हैं। ’रागदरबारी‘ के तथाकथित गाँव से निकलती है एक ऐसे इंटर कॉलेज की कहानी, जो कॉलेज के अलावा और सब कुछ है, नहीं है तो कॉलेज नहीं है। वहाँ एक ऐसा थाना है जहाँ सभी कुछ मध्यकालीन है। वहाँ घूरे हैं, चौतरफश गंदगी है, जो ग्रामीणों के समग्र व्यवहार से जषहिर होती है। माना कि यह सब सच है, लेकिन इसके स्रोत कहाँ हैं, इस तथ्य से पाठक शायद ही पूरे उपन्यास में कहीं रू-ब-रू हो पाता हो। इतना अवश्य है कि लेखक भारतीय समाज की विकृतियों से चमत्कारिक रूप से वाकिश्फश् है और इस मामले में उसकी पकड को दाद दिये बिना नहीं रहा जा सकता। यथार्थ भी यह है, लेकिन यह एक कलाकार-चित्राकार का यथार्थ न होकर एक ऐसे फशेटोग्राफर-संवाददाता का ’यथार्थ‘ है जो चीजषें को बहुत ऊपरी सतह पर देखकर अपना और पाठक, दोनों का मनोरंजन कर लेता है। सच तो यह है कि लेखक अपनी विदूषक-वृत्ति में बेजोड है, जिसका कुल मिलाकर एक बडे प्रहसन जैसा प्रभाव एक पाठक के मन पर होता है। इसलिए यह व्यंग्य से अधिक प्रहसन या ड्रामा है। व्यंग्य देखना है तो हमको भारतेन्दु और उनके समकालीन लेखकों के पास जाना पडेगा। बालमुकुंद गुप्त के ’शिवशंभु के चिट्ठे‘ को फिर से देखना होगा और प्रेमचन्द, निराला और यहाँ तक कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के पास जाना होगा। स्वाधीन भारत में व्यंग्य की कला देखनी है तो हरिशंकर परसाई के लेखन की नब्जष् को टटोलने की जष्रूरत है। प्रभुतासम्पन्न वर्ग की विकृतियों को छोडकर, जब कोई छोटे और शोषण चक्कर के औजषर बने लोगों पर व्यंग्य करता है तो प्रहसन बनता है, व्यंग्य नहीं। कोई व्यंग्य तभी व्यंग्य की श्रेणी में स्थान पाता है, जब वह हमेशा उस ताकतवर के प्रति रहता है जो एक व्यवस्था को निर्मित एवं संचालित करने के लिए जिष्म्मेदार होता है। बडे लेखकों ने बडे पीडकों से टक्कर ली है, न कि अपने समय के ’छुटभैयों‘ को हँसी-मजषकश् का निशाना बनाया है। व्यंग्य का अभाव ’आधा गाँव‘ में नहीं है, लेकिन वहाँ व्यंग्य की वास्तविक खूबी को सहेज कर उसका प्रयोग किया गया है। ’रागदरबारी‘ के शिवपालगंज के ग्रामीण जितने जाहिल, चालाक, धूर्त और मौकापरस्त हैं, इसके विपरीत ’आधा गाँव‘ के गंगोली के ग्रामीण उतने ही समझदार, सरल और सहज हैं। इतना अवश्य है कि राही का गंगोली स्वाधीन भारत से पूर्व उस समय का गंगोली है, जब कि आजादी के आंदोलन में मुसलमानों के लिए अलग पाकिस्तान बनाने की गर्मी, वैचारिक माहौल में अपने शबाब पर थी। शुक्ल जी के शिवपालगंज की तासीर स्वाधीन भारत में एक बिगडते हुए गाँव की है। लेकिन स्वाधीनता प्राप्ति के पंद्रह-बीस वर्षों में ही भारतीय गाँव की तस्वीर का इतना उलट जाना, सहज विश्वसनीय नहीं है। दरअसल यह विकृति-समग्रता का एक ऐसा सांचा है, जिसमें सुरत्व और असुरत्व का बँटवारा इस तरह कर दिया जाता है कि सुरपक्ष में विकार के लिए कोई जगह नहीं रहती और असुर पक्ष में सुकृति के लिए। जब कि जीवन का वास्तविक यथार्थ इससे कतई भिन्न होता है। कहना न होगा कि यथार्थ-चित्राण की जो संश्लिष्ट-समग्रता ’आधा गाँव‘ की उपन्यास-कला में है, वह ’रागदरबारी‘ में नहीं। यही कारण है कि रागदरबारी की सारी भाषायी मुहावरे की कला के बावजूद उसमें इकहरेपन और एकरसता का एक ऐसा गोरखधंधा चलता है, जो पाठक को किसी ठीक ठिकाने पर नहीं पहुँचाता। यहाँ एक ही चित्रा है, जो बार-बार एक ही रूप में सामने आता है, वह रूप है-विकृति का एक महासागर। उपन्यास की पहली पंक्ति ही इसका संकेत कर देती है -’’शहर का किनारा। उसे छोडते ही भारतीय देहात का महासागर शुरू हो जाता था।‘‘ दिक्कश्त दरअसल यहाँ तब होती है जब लेखक इस महासागर के खारे पानी को तो देखता है, लेकिन उसकी अगाधता, व्यापकता और उस मूल्यवत्ता को नहीं, जो उसके तल में छिपी है। जब इस उपन्यास का सूत्राधार रंगनाथ गाँव की सीमा में पहुँचता है, तो उसे नजष्र आता है-’’थोडी देर में ही धुंधलके में सडक की पटरी पर दोनों ओर कुछ गठरियाँ-सी रखी हुई नजष्र आयीं। ये औरतें थीं, जो कतार बाँधकर बैठी हुई थीं, वे इत्मीनान से बातचीत करती हुई वायुसेवन कर रही थीं और लगे हाथ मल-मूत्रा का विसर्जन भी। सडक के नीचे घूरे पटे पडे थे और उनकी बदबू के बोझ से शाम की हवा किसी गर्भवती की तरह अलसायी हुई चल रही थी। कुछ दूरी पर कुत्तों के भूँकने की आवाजष्ें हुईं। आँखों के आगे धुंए के जाले उडते हुए नजष्र आये। इनसे इनकार नहीं हो सकता था कि वे किसी गाँव के पास आ गये थे। यही शिवपालगंज था।‘‘ जैसे कहावत है कि गाँव की शोभा उसके बाडे ही बतला देते हैं। वैसे ही उपन्यास में आगे क्या होगा, अकेला यह उद्धरण ही अपनी प्रतीक भाषा में सब कुछ बतला देता है। यह अवश्य सम्भव है कि यह उपन्यास लिखकर लेखक ने उन लोग को एक अच्छा जवाब दिया है जो ’अहा ग्रामजीवन भी क्या है‘ और ’भारत माता ग्रामवासिनी‘ जैसी कोमलकलित कविताएँ लिखकर और सुनाकर लोगों को अक्सर भरमाया करते हैं। जिससे वे शहरी सुविधाओं का स्वयं भोग करते रहें और दूसरों को उसका उपभोग करने से रोकते रहें। इसी विचार से उनका शहरी जीवन पर एकाधिकार बना रह सकता है। निश्चय ही इस उपन्यास में ग्रामीण समाज की अनाधुनिक पितृ-सत्ता का एक अच्छा चित्रा प्रस्तुत किया गया है, जिसकी वजह से औरतों को सडक की पटरी पर दोनों ओर गठरियों के रूप में दिखलाना तथा बेला के अलावा स्त्राी-पात्राों का टोटा होना, उस ग्रामीण जीवन की विडम्बना को सामने लाता है जो अपनी रमणीयता के बावजूद बेहद अगति से चिपटा हुआ रहता आया है। इसके व्यंग्य की एक खूबी यह भी है कि हमारे देहातों में अपनी संस्कृति और परम्परा के नाम पर जिस तरह दकियानूसीपन, अंधविश्वास और रूढवाद को प्रश्रय मिलता रहा है, उसकी यहाँ डटकर खबर ली गयी है। रंगनाथ के मामा वैद्यजी महाराज का चरित्रा इस उद्देश्य की पूर्ति बहुत अच्छे ढंग से करता है। वे आयुर्वेद पद्धति से उपचार करने वाले चिकित्सक हैं लेकिन गाँव की हर गतिविधि पर उनकी पकड है। ग्रामीण जीवन की व्यवस्थाओं के केन्द्र में उनका घर, परिवार और वे स्वयं हैं। साथ ही ’भारतीय संस्कृति‘ के व्यावहारिक प्रतिनिधि एवं प्रतीक भी हैं। ब्राह्मण हैं और शास्त्राों के पैरोकार हैं, जो जडता को बनाये रखने में लोगों की पूरी मदद करते हैं। वैद्य जी का ब्राह्मण होना यहाँ अनायास नहीं है। उनके चरित्रा के भीतर से हमको औसत भारतीयता का आसानी से बोध हो सकता है। हमारे समाज की यह परम्परा आज तक जीवित है कि वह व्यक्ति की पहचान सबसे पहले उसके जाति-रूप में करती है और यह परम्परा शहरी जीवन से ज्यादा गाँवों में अपना रंग दिखलाती है। वैद्य जी इसके सिरमौर हैं। उनकी बैठक और उसके बाहर बना चबूतरा इसके देश हैं, जहाँ हर आदमी पूर्वजन्म के पाप, भाग्य, भगवान और अगले जन्म के कार्यकर्म के बारम्बार विमर्श से एक ऐसी भारतीयता का निर्माण करता हैं, जिससे विज्ञान और तकनीक की शिक्षा भी मुक्ति नहीं दिला पाती। इस मामले में भारतीय शहरी जीवन के सरोकार भी भिन्न नहीं हैं, इसलिए इस उपन्यास की एक समासोक्ति भी बनती है, जो कुछ अपवादों को छोडकर लगभग सम्पूर्ण मध्यवर्गीय जीवन को अपने भीतर समेट लेती है। यहीं इसकी ताकत नजर आती है। ऐसे वैद्य जी को समझ पाना आसान नहीं है। इस तरह के वैद्यजियों से पूरा भारतीय मध्यवर्ग भरा पडा है। लंगड जैसा दलित और संघर्षशील पात्रा भी वैद्य जी के शास्त्राीय बंधनतंत्रा से मुक्त नहीं है। शुक्ल जी ने इस बात को व्यंग्य की पूरी शक्ति लगाकर इन शब्दों में व्यक्त किया है-’’तब तक लंगड दरवाजष्े पर आ गया था। शास्त्राों में शूद्रों के लिए जिस आचरण का विधान है उसके अनुसार चौखट पर मुर्गा बनकर उसने वैद्य जी को प्रणाम किया।‘‘ इससे प्रकट हुआ कि हमारे यहाँ आज भी शास्त्रा सर्वोपरि है और जाति-प्रथा मिटाने की सारी कोशिशें अगर फश्रेब नहीं हैं तो रोमांटिक कार्रवाइयाँ हैं। लंगड ने भीख जैसी माँगते हुए कहा-’’तो जाता हूँ बाबू!‘‘ यहाँ देखने की बात यह है कि इस सबके बावजूद वैद्य जी की तरफश् से लंगड के लिए सहायता का कोई हाथ आगे नहीं बढता। इस रूप में यहाँ वैद्य जी के वर्ग-चरित्रा को बहुत बारीकी से अंकित किया गया है। वे लंगड की लडाई को धर्म की लडाई भी कहते हैं, लेकिन अपने वर्ग-चरित्रा की वजह से उसमें शामिल होने से कतराते हैं। उलटे इसका दोष लंगड की बुद्धि को ही देते हुए उसके ऊपर हँसते हैं-’’इसकी भी बुद्धि बालकों की-सी है।‘‘ आज की राजनीति और व्यवस्था का यह केन्द्रीय चरित्रा है, जो स्वाधीनता के बाद से आज तक निरन्तर अपना स्वरूप-विस्तार करता चला आ रहा है। इसलिए लेखक का यह कहना गष्लत नहीं है कि ’’वैद्य जी थे, हैं और रहेंगे-अंग्रेजषें के जष्माने में वे अंग्रेजषें के लिए श्रद्धा दिखाते थे। देसी हुकूमत के जष्माने में वे देसी हाकिमों के लिए श्रद्धा दिखाने लगे।‘‘ सच तो यह है कि यह चरित्रा, देश और काल से परे है। यह जितना गाँव में है, उससे ज्यादा शहर में है। शहरी मध्यवर्ग की मौकापरस्ती किसी से छिपी नहीं है। वह अतीत भी है और वर्तमान भी। वर्तमान को देखकर फिलहाल कहा जा सकता है, भविष्य भी इसी तरह की शक्तियों के हाथों में है। इसी के चारों ओर सत्ता और शक्ति का चक्कर घूम रहा है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि यथार्थ के सर्वाधिक निकट ’रागदरबारी‘ का कोई चरित्रा है तो वह है वैद&

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