सुबह-सुबह जसवीर त्यागी का फोन आया-’’बधाई है सर आपको और अम्मा को।‘‘ ’’किस बात की?‘‘ ’’सर, आफ विवाह के वर्षगाँठ की।‘‘ ’’अच्छा अच्छा,‘‘ मैं हंसा, ’’दरअसल जसवीर, विवाह की वर्षगाँठ कभी मनाता नहीं हूँ न, इसलिए याद नहीं रहती। बस तुम याद दिला देते हो तो हम लोग जान लेते हैं कि हाँ ५ जुलाई को हमारा विवाह हुआ था। बस इतना ही। ’’नहीं सर, यह दिन तो याद रखने का है। भरेपूरे परिवार के बीच इस दिन की स्मृति को उत्सव के रूप में बडी ऊष्मा के साथ सहेजना चाहिए। इस दिन की खुशबू आप और अम्मा जी ही नहीं, आफ परिवार के साथ हम जैसे अनेक लोग महसूस करते हैं।‘‘ ’’तो भी हम लोगों का स्वभाव नहीं बन पाया कि इस दिन को उत्सव के रूप में मनाया जाए। शादी की पचासवीं साल गिरह मनाने के लिए भी हम उत्सुक नहीं थे। तुम्हारी अम्मा जी तो बिलकुल ही तैयार नहीं थीं। किन्तु बच्चों के आग्रह के आगे हमें विवश होना पडा और पारिवारिक माहौल में ही इस दिन को याद कर लिया गया।‘‘ ’’जी सर।‘‘ ’’हाँ तुम मेरे जीवन के महत्त्वपूर्ण प्रसंगों को याद रखते हो और अपनी शुभकामनाओं से उन्हें सींचते हो, यह मेरे लिए अत्यंत सुखद बात है। मेरा आशीष है कि अपने लोगों के जीवन-प्रसंगों की छवियाँ तुममें सदा दीप्त होती रहें और तुम स्वयं जीवन-यात्राा के अनेक सुखमय पडावों से सपरिवार गुजष्रते रहो।‘‘ जसबीर के फोन के बाद मैंने पत्नी को बधाई दी। पहले तो वे अकबकायीं, फिर याद दिलाने पर हँसीं और मुझे बधाई दी। बच्चों ने यह सब करते देखा तो उन्हें भी याद आया कि आज हमारी शादी की साल-गिरह है और उन्होंने आकर प्रणाम किया। बस और कुछ नहीं। हाँ, शाम तक कुछ फशेन और आये-सविता का, अलका-मनु का वीरेन्द्र कुमार यादव का, लालित्य ललित का, आदित्य का, कौशिक का, जे.पी. शर्मा का कुछ और और का। हम तो अपने दैनिक कार्यों में लग गये थे किन्तु रह-रह कर आते हुए ये फशेन बार-बार इस दिन के वैशिष्ट्य का बोध कराते रहे और मैं बार-बार इस दिन से अलग होकर भी अलग नहीं हो पा रहा था। श्रीमती जी, तो नित्य की तरह अपने गृह-कार्य में तल्लीन होकर इस दिन को भी सामान्य दिनों जैसा एक दिन बनाये चल रही थीं और चूँकि फशेन भी मैं ही सुन रहा था अतः बधाइयों का कोमल आघात उनकी कार्य-तल्लीनता में कहीं बाधक नहीं बन रहा था। सब कुछ रोजष् जैसा ही तो था। पत्नी का सुबह चार बजे उठना, प्रातः भ्रमण, व्यायाम, पानी की मोटर चला कर फूलों को सींचना, सबके लिए चाय-नाश्ता बनाना, बच्चों को स्कूल-बस में चढाना, स्कूल जाती बहुओं के खान-पान की व्यवस्था करना, फिर घर के शेष लोगों को खिलाना-पिलाना। फिर वाशिंग मशीन के साथ हो लेना और साथ ही साथ मध्याह्न भोजन की तैयारी करते रहना। ’माता जी, माता जी‘ कहते हुए आने वाले बाहरी लोगों की समस्याएँ सुनना और निबटाना, बीच-बीच में सामने की दुकान से सामान लाना, घर में उपस्थित छोटे-बडे लोगों की फश्रमाइशों के साथ यहाँ वहाँ होना और न जाने क्या क्या? बीच में दो घंटे सोना और उठ कर फिर घर के खटराग में लीन हो जाना। आज भी ऐसे ही दिन बीत गया और पता ही नहीं चला कि उनके लिए आज कोई विशेष दिन आया था। लेकिन मैं तो इस दिन से अलग होकर बार-बार इसके साथ होता रहा। मैं तो फुरसत में रहता हूँ न, और भावुक भी तो हूँ, अतः मैं रह-रह कर इस दिन की आवाजष् सुनता रहा और मेरे चाहे- अनचाहे यह आवाजष् १९४८ से लेकर अब तक की यात्राा के कुछ दृश्य उपस्थित करती रही। मेरे सामने एक भरापूरा परिवार है-तीन बेटे, दो बेटियाँ, तीन बहुएँ, पोते-पोतियाँ, धेवते-धेवतियाँ....। इन सबकी छवियाँ और उपलब्धिय, सुख-दुख, संकल्प-विकल्प...., इसी दिन की तो देन हैं। रह-रह कर याद आते रहे वे महकते हुए दिन जो विवाह के सद्यः पश्चात् उससे फूटे थे, जिन्होंने हमारे समय को इन्द्रधनुष की तरह सतरंगी बना दिया था। अपनी पढाई-लिखाई की व्यस्तता के बीच भी हम पंछी की तरह उडते हुए अनुभव करते थे। ऋतुओं और मौसमों की हँसी तो मुझे पहले भी मोहती थी, किन्तु अब हम दोनों की साहचर्य-यात्राा से वह और भी मोहक हो गयी थी। लगता था कि उसमें हमारी हँसी और हमारी हँसी में हवा समा गयी है। लगता था फूल हमारे लिए खिल रहे ह, सुगंधित हवाएँ हमारे लिए बह रही हैं, कोयल हमें पुकार रही हैं, वसंती नदियाँ अपने साथ चलने के लिए हमें बुला रही हैं, फूली हुई उमडती हुई फश्सलों में एक आमंत्राण हमारे लिए है। याद आये पी-एच.डी. करने के समय के अभावों से लथपथ वे दिन। लेकिन हमारे प्रसन्न साहचर्य ने अपनी ऊष्मा और भरेपूरेपन पर अभावों को हावी नहीं होने दिया। वे दिन क्या थे जैसे यहाँ से वहाँ तक फैले खुरदरे प्रस्तर-खंडों के बीच-बीच में हँसते हुए रंग-बिरंगे फूल। धीरे-धीरे हमारी यात्रााएँ फैलती गयीं-वाराणसी से बडौदा, बडौदा से अहमदाबाद, अहमदाबाद से नवसारी, नवसारी से फिर अहमदाबाद, अहमदाबाद से दिल्ली। इस यात्राा में न जाने कितने संघर्ष आये, संकट आये, तकलीफें आयीं, समस्याएँ आयीं, पारिवारिक दायित्वों के रुक्ष दवाब आये, बीमारियाँ आयीं लेकिन हमारे दाम्पत्य जीवन की न ऊर्जा कम हुई न स्निग्धता। हमने पारस्परिक राग और समझ से सारी प्रतिकूलताओं को झेल लिया और उन्हें अपने ऊपर हावी होने नहीं दिया। हमारी हँसी, हमारी अल्पाकांक्षा, हमारी सादगी, हमारी ग्रामोन्मुखता, हमारी शक्ति बनी रही। जो प्राप्त होता गया, उसी में गुजष्र-बसर करते रहने की आदत ने हमें अप्राप्य के पीछे लहूलुहान नहीं होने दिया। सरस्वती जी ने मुझसे न कभी कपडे की माँग की, न जेवर की, न यहाँ-वहाँ घूमने फिरने की इच्छा जतायी, न सिनेमा देखने की। बस सम्मान के साथ सहज भाव से मैं जो कमाता गया, उसी में वे काम चलाती गयीं-और अपनी असंपन्नता और साधारणता में गर्व से तनी रहीं-कोई कुंठा नहीं, कोई हीनता-बोध नहीं, बल्कि यह गौरव-बोध कि वे एक सम्मानित लेखक और प्रवक्ता की पत्नी हैं। उन्हें मरे छात्राों और सहकर्मियों से बेहद सम्मान मिलता रहा। मकान के आसपास के सभ्य परिवार के लोग उन्हें बहुत मान देते थे। तो अट्ठावन वर्षों की हमारी सहयात्राा ऐसी लगती है जैसे कल ही शुरू हुई हो। आज देखता हूँ कि बहुत सी सहयात्रााएँ शुरू होने के साथ टूटने लगती हैं और एक त्राासदी में पर्यवसित हो जाती हैं या लंबी दूरी तो पार करती हैं किन्तु लगता है कि सहयात्राी एक दूसरे को सहारा नहीं दे रहे हैं बल्कि साथ को बोझ की तरह ढो रहे हैं और सहयात्राा उनकी प्रसन्नता नहीं, एक मजबूरी है। फिर भी विडंबना यह कि वे बहुत फूहड तामझाम के साथ विवाह की साल-गिरह मनाते हैं। वह निरा भद्दा प्रदर्शन होता है। ऐसी स्थिति में हमारी या हमारी जैसी अन्य अनेक सहयात्रााएँ ईश्वरीय वरदान सी लगती हैं। हम कृतज्ञ हैं उस सत्ता के प्रति जिसने हमारी सहयात्राा को अभिशाप नहीं, वरदान बनाया। कुछ फूल कुछ काँटे, हमने आपस में बाँटे जीवन के हर एक मोड पर हमने एक दूसरे का इंतजषर किया है हाँ, हमने प्यार किया है। तो, मैं तो आज इस लंबी सहयात्राा के रस में डूबता चला गया, लेकिन सरस्वती जी वर्तमान के दायित्व से प्रसन्न मन से जूझ रही हैं। उनका यों जूझना कभी-कभी मुझे उदास कर जाता है। मैं चाहता रहा कि नौकरी से अवकाश पाने के बाद जब घर में बैठूँगा तब सरस्वती जी देर तक पास बैठेंगी, हम गपशप करेंगे-साहित्य पर, समाज पर, परिवार पर, अतीत पर, वर्तमान पर। लेकिन मुझ निठल्ले के पास बैठ कर गपशप करने का समय उनके पास नहीं था। परिवार के ढेर सारे काम उनके साथ चल रहे होते थे। बच्चों की तरह कभी कोई काम, कभी कोई काम उनका दामन खींचता रहता है। अब देखिए विवाह की सालगिरह का पूरा दिन बीत गया, उन्हें मेरे पास बैठ कर बीते दिनों को कुछ देर जी लेने का अवसर नहीं मिला। मैं अकेला ही अट्ठावन साल की यात्राा कर आया। भला हो कुछ उन लोगों का जो बीच-बीच में आते गये और उनके आने से उत्सव जैसा तो कुछ लगता ही रहा, सरस्वती जी को अपने काम-काज को जहाँ का तहाँ छोड कर हमारे बीच बैठना पडता रहा। दोपहर को नरेश शांडिल्य आये, शाम को छः बजे के करीब पत्राकार अनिल शर्मा आये, फिर आठ बजे के आस-पास लालित्य ललित और जसवीर त्यागी आये। मेरे पुत्रा शशांक के साढू और उनकी पत्नी प्रतिभा आये। इस सबके बीच अपनी पूरी प्रसन्न अस्मिता के साथ होकर सरस्वती जी ने भी आखिर यह वर्षगांठ मना ही ली। आज गाँव से मंझले भाई साहब रामनवलमिश्र का फशेन आया। बहुत अच्छा लगा। उनसे बात हो रही थी तो लगता था गाँव से ही संवाद हो रहा है। उन्होंने पूछा-’’कब आ रहे हो?‘‘ इस सवाल के सामने होने पर दर्द उभर आता है। वह दर्द गाँव न जा पाने का होता है। इस सवाल के उत्तर ने तो मुझे झूठा ही बना दिया है और अपने प्रति लज्जित भी। हर बार उत्तर देता हूँ कि इस नवंबर में जष्रूर आऊँगा। नहीं जा पाता। फिर प्रश्न होता है-’’कब आ रहे हो?‘‘ उत्तर होता है फरवरी में। और फिर नहीं जा पाता। इस तरह कितने साल बीत गये गाँव के प्रश्न और अपने उत्तर के बीच पिसते हुए। और सच पूछिए तो प्रश्न गाँव का ही नहीं होता, अपने मन का भी होता है। उसे लगता है कि उसमें बसा हुआ गाँव अकुला-अकुला कर पूछता है कि गाँव कब आ रहे हो। न जाने का दर्द घर-परिवार या गाँव वालों को होता हो या न होता हो मुझे तो होता ही है। कितने साल हो गये गाँव गये हुए और गाँव है कि पुकारता ही रहता है। मन कहता है-तुम बयासी वर्ष के हो गये, इस जीवन का क्या ठिकाना, कब सब कुछ छोडकर चला जाय? ऐसी स्थिति में तो जाने के बाद भी मुझे यह टीस सालती रहेगी कि हाय अंत में गाँव नहीं जा सका, वह मुझे और मैं उसे पुकारता ही रह गया। मेरे मन, मुझे पता है तुम अभी भी जवान हो, अभी भी जीवन-जगत् का कुछ भी तुम्हारे भीतर बासी नहीं हुआ है। लेकिन इस तन की तो सोचो जो दिल्ली में ही बाहर निकलने से पहले सौ बार आना-कानी करता है। पोर-पोर थकान और तकलीफश् से भरा हुआ यह लंबी यात्राा की कल्पना से ही काँप जाता है। नियमित खान-पान, योग-व्यायाम और समुचित विश्राम के सहारे इसे कुछ ऊर्जा अनुभव करने दे रहा हूँ। यात्राा पर निकलते ही सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है और फिर काफशी दिनों तक इसका खामियाजा तन को भोगना पडता है। फिर भी गाँव जाने का हौसला टूटा नहीं। भीतर कोई बार-बार कहता है-’’जाऊँगा, जरूर जाऊँगा।‘‘ और मैंने भाई साहब से कह दिया कि आऊँगा, इस नवम्बर में अवश्य आऊँगा। नवबंर शीत-ताप की दृष्टि से बहुत अनुकूल महीना है। मेरे अनेक अंतरंग पाठक मेरे कथा साहित्य में मेरे गाँव से गुजष्र-गुजष्र कर इतने अभिभूत होते हैं कि उन्हें मेरे गांव और उसके परिवेश को साक्षात देखने की इच्छा होती है। कइयों ने कहा-’’एक बार अपने गाँव ले चलिए न।‘‘ मैं संकेाच में पड जाता हूँ। क्या है मेरे गाँव में जो इन्हें वहाँ ले चलूँ। जैसे इनके शहर के आसपास के गांव हैं, वैसे ही मेरा गाँव भी है। कुछ कच्चे-पक्के मकान, कुछ खेत, कुछ बाग-बगीचे, कुछ ताल-पोखरे, कुछ देवी-देवताओं के चौरे, कुछ कच्ची-पक्की सडकें, पगडंडियाँ बस। ये वहाँ क्या देखेंगे? देखना हो तो अपने शहर या कस्बे के आस-पास के गाँव में घूम आयें। उतनी दूर मेरे गाँव जा कर तो ये मन में यही सोचेंगे....अरे यही है मिश्र जी का गाँव? यहाँ क्या है जो इसे देखने इतनी दूर चला आया? हाँ, सचमुच उनके लिए वहाँ कुछ नहीं है लेकिन मेरे लिए तो वह न जाने क्या-क्या है? मेरे लिए ये कच्चे-पक्के घर, ये खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, सडकें, पगडंडियाँ, ताल-पोखरे निर्जीव सत्ता मात्रा नहीं हैं, वे साहचर्य के स्पंदन हैं। इनके साथ मेरा कितना लंबा और सघन साहचर्य रहा है, इनके बीच में जिया हूँ बना हूँ, सपने देखे हैं, सौन्दर्य की प्रतीतियां प्राप्त की हैं, मूल्य की छवियाँ पायी हैं, मुझमें अनेक संबंधों के बिंब निर्मित हुए हैं। मौसमों और ऋतुओं के माध्यम से धरती और आकाश के विविध संवादों का अनुभव किया है, अनेक मानव-चरित्राों के वैशिष्ट्य का बोध पाया है। सुख-दुख और संघर्ष की कितनी यात्रााएँ की हैं। तो मेरे लिए यह गाँव कितना कुछ है और वहीं कितना कुछ बार-बार अपने भीतर बुलाता है। वहाँ जाने पर मैं कितना कुछ नया देखूँगा और कितनी-कितनी स्मृतियाँ मेरे साथ हो लेंगी। इसलिए मैं तो वहाँ जाने के लिए तडपता हूँ, किन्तु दूसरे लेाग जाकर वहाँ क्या पायेंगे? तो भाई साहब का फशेन सुनकर गाँव मेरे भीतर फिर जाग उठा। वह गाँव, जिसे मैंने जिया था। उस जिये हुए गाँव के अनंत लोगों के चेहरे एकबारगी मेरे भीतर उतरा आये। वे चेहरे अब रहे नहीं। जब गाँव जाता था, तब अनेक अग्रज और समकालीन लोग अपने प्यार भरे सान्निध्य से मुझे घेर लेते थे। धीरे-धीरे वे दुनिया छोडते गये। मेरे अपने घर में भी पुराने लोगों में से कोई नहीं रहा। माँ और पिता तो सातवें दशक में ही चले गये थे, मेरे बडे भाई साहब भी नहीं रहे। मुझ से बडे लोगों में मंझले भाई रामनवल जी ही बचे हैं और हो सकता है गाँव में कोई और अग्रज बचा हो। रामनवल जी मेरे भाई ही नहीं हैं, वे बचपन में मेरे साथी-संघाती भी रहे हैं। हमारे बीच वय का दो-एक साल का फशसला होगा। अतः, हम साथ खेले-कूदे, लगभग साथ ही पढे, साथ-साथ खेतों में काम किया, साथ-साथ लडे-झगडे, साथ-साथ अभावों के दंश सहे, साथ-साथ सुख-दुख भगे। बाद में हमारे रास्ते, अलग-अलग हो गये। मैं उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर होता गया, उनकी शिक्षा पर विराम लग गया। मैं शिक्षा प्राप्ति के कर्म में एक बार गाँव से बाहर निकला तो बाहर-बाहर ही जीवन बीतता रहा और उन्होंने नौकरी भी की तो गाँव के आसपास ही यानी वे लगातार गाँव के ही बने रहे। लेकिन हम तीनों भाइयों के बीच भ्रातृत्व का राग सदा बना रहा। उसकी लय कभी टूटने नहीं पायी। बडे भाई साहब ने तो हम भाइयों के लिए अपने को समर्पित ही कर दिया था। तो गाँव जाने की तडप के पीछे भाई रामनवल जी से मिलने की तडप भी निहित होती है। हम आज हैं, कल कब बिछड जायेंगे कौन जानता है। भाई रामनवल जी ने प्रस्ताव रखा कि मैं तीन जनवरी को क्यों न गाँव आऊँ? हाँ, तीन जनवरी को उनकी जन्मतिथि है। उस दिन वे अपने अनेक कवि मित्राों के बीच अपना जन्मदिन मनाते हैं। वे स्वयं कवि हैं-भोजपुरी के बहुत सच्चे और संवेदनशील कवि। उनकी कविताओं में &
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