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Vartmaan Sahitya ::January, 2007
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इन्दु श्रीवास्तव की गजलें
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(१) दर्द का दौर गुजष्र जाएगा जो भी हारेगा बिखर जाएगा। आज की सोच कर जी ले बाबा, कल की सोचेगा तो मर जाएगा। आईना देख के क्या होना है, खुद में ही देख सँवर जाएगा। फूल, पत्ते ख्ाजां में जाएंगे, कौन कहता है शजर जाएगा। मछलियाँ डर से भाग जायेंगी, तू जो पानी में उतर जाएगा। रास्ता उसका शाम तक देखा, अब न आया तो किधर जाएगा। आम लोगों में गष्जष्ल मत कहना, तेरे शेरों का असर जाएगा।

(२) रात बीते तो सहर की सोचें, कोई तरकीब गुजष्र की सोचें। अपना रिश्ता नहीं बाजषरों से, बात ख्ाामोश डगर की सोच। यूँ भी घर में बहुत झमेले हैं, घर से निकलें तो उधर की सोचें। मजर् को गर दवा नसीब नहीं, किसी मुफशीद जष्हर की सोचें। कुछ अदद दर्द, कुछ अदद आँसू, इतना सामां है सफश्र की सोचें। सिफश्र् दो गजष् जष्मीन अपनी है, जहाँ को छोड जष्फश्र की सोच।

(३) डाकिये की साइकिल-सी जिष्न्दगी चलती रही गम खुशी की चिटिठयाँ बन आस-सी पलती रही। कभी इसका प्यार बाँचा, कभी उसके दुख पढे दोस्त सी लगती रही पर चर सी छलती रही। बीहडों की खुरदुरी पगडंडियों में दौडती, दोपहर से हार थक कर सांझ-सी ढलती रही। बेबसी की टोपियां और भूख की वर्दी पहन, गोल चश्में में उनींदी आंख-सी जलती रही। उछलती, मुडती, ठिठकती हर गली के मोड पर, बंद दरवाजों में सांकल की तरह हिलती रही। जेठ के तपते महीने में पसीने सी बही, पूस में कुहरा लपेटे भोर-सी लगती रही।

(४) आँखों में लाख दर्द छुपाए हुए हैं लोग, लगता है जष्माने के सताए हुए हैं लोग। बैठे हैं सर ये ओढ रिवाजों की चादरें, बदकारियों की टाट बिछाए हुए हैं लोग। इनको छुआ तो शर्म से पानी हुई नदी, इस तरह आंसुओं में नहाए हुए हैं लोग। बारूद सुलगने से हवा भी डरी-सी है, बदले की एक आग दबाए हुए हैं लोग। कुछ जष्लजष्लों में बह गये कुछ हादसों में गुम, कुछ भूख के दल-दल में समाए हुए हैं लोग। ऊपर से आदमी हैं ये आजषद मुल्क के, कांटों की बाड दिल में लगाए हुए हैं लोग। भूले से इसे कोशिश-ए-आदाब न समझो शर्मिन्दगी में सर को झुकाए हुए हैं लोग।

(५) उनकी महफिश्ल के दस्तूर निभाने कैसे आयेंगे। सीने में भरा है दर्द हम गाने कैसे आयेंगे। मेरे टूटे दरवाजष्े पर फूल सितारे मत रखना, बदलेगा जब नक्शा दोस्त पुराने कैसे आयेंगे। एक नियम कशनून यहां का इक साकशी इक प्याला है, मंदिर-मस्जिद वाले सर, मैख्ााने कैसे आयेंगे। सहमे-सहमे ठूंठ खडे हैं टहनी पत्ते ख्ााक हुए, इन पेडों पर तोते रात बिताने कैसे आयेंगे। उनकी चिन्ता तोप, मिसाइल, उनकी चिन्ता एटम बम, अपनी इक चिन्ता खेतों से दाने कैसे आयेंगे। बेमौसम बादल बरसे तो दाने-दाने खेत हुए, निचली बस्ती वाले कश्जष्र् चुकाने कैसे आयेंगे।

एम. आई. जी. १-६-१०१, इन्दिरा नगर, रीवा (म. प्र.)



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