घर की चौखट पर एक-दूसरे से सट कर खडी हेमन्ती बोज्यू की दोनों बेटियां और दोनों बहुएं वैन को तब तक अपलक निहारती रहीं जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गई। इसी तरह उन्नीस-बीस साल पहले हेमन्ती बोज्यू भी चौखट पर आ खडी हुई थीं। उनके पति और हम लोगों के परम-प्रिय हरदा हुडकी का निधन हुए उन्नीस-बीस साल तो हो ही गए होंगे। वैन में रख कर हेमन्ती बोज्यू का शव उसी दिशा की ओर ले जाया गया जिस दिशा में हरदा के शव को ले जाया गया था। हरदा की ही भांति उन्होंने भी काया की माया के चक्कर में न पडने का निश्चय किया था। शायद यही कारण था कि ’राम नाम सत्त है‘ के इन शोकाकुल क्षणों में हरदा मानो साक्षात सामने आकर खडे हो गए और कहने लगे, ’’क्यों रे जिबुवा, क्या सोच रहा है। मृत्यु तो परम सत्य है। मृत्यु और जीवन के रहस्य प्राचीन क्या अर्वाचीन काल से ही हम भारतीयों के चिंतन मनन के प्रिय प्रसंग रहे हैं। इस मनमोहक-बहुरंगी संसार में रह कर भी हम भारतीय जीवन और मृत्यु के रहस्यों को खोज निकालने के असफल प्रयत्न में लगातार जुटे रहे हैं और अपनी निपट मूढतापूर्ण जिज्ञासा के चलते आगे भी जुटे रहेंगे।‘‘ हरदा इस तरह के फलसफाई अंदाज में बोलने के आदी नहीं थे, लेकिन अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले, जब वे बीमार थे, उन्होंने यह बात हरक सिंह के देहावसान का समाचार मिलने पर सहसा कह डाली थी और मैं सुनकर जैसे कहीं गुम हो गया था। यह भी विचित्रा संयोग था हरक सिंह की मृत्यु के कुछ ही सप्ताह बाद नरूआ अर्थात नरेन्द्र तिवारी के निधन का भी समाचार आया था और यह समाचार मुझे अत्यंत निर्विकार भाव से हरदा ने ही सुनाया था। बहरहाल, हरदा हुडकी के हम तीनों अंतरंगों में से अब केवल मैं ही बचा था और नौकरी से विधिवत रिटायर होने की आयु से काफी पहले ही स्वेच्छा से अवकाश ग्रहण कर लेने के बाद एक बार फिर अल्मोडा आ बसा था। हरक सिंह और नरुआ ने एक बार अल्मोडा छोडा तो वे न केवल नौकरी से आखिरी दिन तक चिफ रहे, बल्कि बाल-बच्चों के परिवारों के साथ लखनऊ और इलाहाबाद में ही बस गए। हां, कभी-कभी गर्मियों के मौसम में वे अल्मोडा पहुंच जाते और तब हरदा हुडकी उन्हें देखकर कहते, ’’क्यों रे, ऐसे आना भी कोई आना हुआ। घुमक्कडों की तरह हफ्ते-दस दिन के लिए यहां आते हो और नैनीताल, रानीखेत, कौसानी होते हुए यहां दो-एक दिन ठहर कर काठगोदाम-हल्द्वानी के रास्ते लौट जाते हो। लगता है, पाथर ही फरका गए तुम।‘‘ जब ये ’पाथर फरकाना‘ अल्मोडा के उन निराश-हताश युवाओं के शब्द हुआ करते थे जो एम.ए., एम.एस-सी. आदि करने के बाद साल-दो साल की बेरोजगारी से ऊब कर ’देस‘ की ओर चल देते थे और बस के स्टार्ट होने से पहले बस स्टॉप पर पडे किसी बडे से पत्थर को पलटते हुए संकल्प करते थे कि बूढों और रिटायर्ड लोगों के इस उबाऊ शहर में स्थायी रूप से लौट कर तो अब आना ही नहीं है। हरदा हुडकी कुमाऊनियों के इस उबाऊ शहर से स्थायी रूप से कभी नहीं गए। यहां तक कि मृत्यु के परम सत्य का साक्षात्कार भी उन्होंने यहीं किया। हरदा के निधन के समय उनकी दोनों बेटियां जयन्ती और जिबन्ती उपस्थित थीं। दोनों पुत्रा भी सपरिवार उपस्थित थे जिन्हें वे सदा से भुवन और जगदीश के बजाय भुबिया और जगुवा कहते आए थे। बोज्यू, जिन्हें तुम मैदानी लोग भौजी या भौजाई कहते हो, हरदा को अक्सर समझातीं कि दोनों बेटे बडे हो गए हैं, बाल-बच्चों वाले हैं। इसलिए अब उन्हें भुबिया और जगुवा कहना शोभा नहीं देता, लेकिन हमारे हरदा हुडकी जीवन पर्यन्त उन्हें भुबिया-जगुवा ही कहते रहे, यहां तक कि भुवन की मराठी और जगदीश की पंजाबी पत्नी के सामने भी। दोनों ने अंतर्जातीय विवाह जरूर किए थे, लेकिन दोनों की पत्नियां जब कभी अल्मोडा आतीं तो कूर्मांचली बहुओं की तरह ही व्यवहार करतीं और शादी-विवाह आदि के अवसरों पर ठेठ पहाडी लंहगा पिछौडा पहनतीं। वर्षों पहले बेटों की इन्हीं मराठी और पंजाबी पत्नियों को हरदा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था और धीरे-धीरे उनके कुमाँऊनी जैसी ही बन जाने पर वे गर्व महसूस करने लगे थे। एक बार जब किसी ने निंदा के से स्वर में कहा कि यार हरदा, तेरे तो दोनों ही बेटों ने बाहर शादी कर ली, तो हंसते हुए हरदा ने जवाब दिया, ’’हम ठैरे लकीर के फकीर भुस्स कुमाँऊनी, इसलिए मां-बाप ने इस हेमन्ती से बांध दिया तो बस इसी के होकर रह गए, लेकिन असल आधुनिक तो ये भुबिया और जगुवा ही हैं जिन्होंने अपनी पसंद की शादियां कीं। हमें भी ऐसा मौका मिलता तो कितना मजा आता। लेकिन क्या पता, मजा नहीं भी आता। इसलिए इस हेमन्ती से विवाह हुआ तो कुल मिला कर अच्छा ही हुआ। कम से कम इसने हमारी साधना में तो विध्न नहीं डाला।‘‘ साधना से हरदा का मतलब था हुडका बजाते हुए कूर्मांचली लोकनृत्यों और लोकगीतों की दुनिया में खो जाना। हुडका लगभग हर समय उनके गले में लटका रहता, जिसके कारण उनका उपनाम ही हुडकी पड गया। यह अल्मोडावासियों की फितरत है कि लोगों की और आदत के अनुरूप देखते-देखते उनके नाम को तो तोडते-मरोडते ही हैं, नाम के साथ उपनाम भी जोड देते हैं और आमतौर पर ऐसे उपनाम चंद दिनों में ही चल निकलते हैं। मसलन, जोशी खोला के चन्द्र मोहन जोशी को चॉकलेट खाने का शौक था, तो किसी ने एक दिन उन्हें ’चनुवा चॉकलेट‘ घोषित कर डाला और तब से उन्हें चन्द्र मोहन जोशी या चनुवा दाज्यू के बजाय ’चनुवा चॉकलेट‘ ही कहा जाने लगा। अल्मोडा के पास खूंट गांव के निवासी बद्री दत्त पंत आकर अल्मोडा बस गए तो उन्हें, बुजुर्गों के अनुसार लौंडे-लफाडयों के चक्कर में बोतल की तल लग गई जो अंततः उनकी दुर्गति का कारण भी बनी। उन्हें धुत देख कर किसी बुजुर्गवार ने एक दिन किसी दूसरे बुजुर्गवार से कहा, ’’ये साला बद्री तो हर समय बस बोतल में ही रमा रहता है। कभी-कभी तो इसके बेटे इसे सडक किनारे से उठा कर ले जाते हैं।‘‘ और इसी के साथ बद्रीदत्त पंत सहसा ’बदरी बोतल‘ कहलाने लगे। इसी परंपरा में हुडके की व्यास पर रात दिन लोकगीतों में रमे रहने वाले पांडेर वोला निवासी हरीश चन्द्र पांडे का संक्षिप्त नाम हरीश दा अथवा हरीश दाज्यू पडने के बजाय पहले ’हरीश हुडकी‘ पडा और बाद में उनके प्रशंसकों और शुभचिंतकों ने हरीश को सम्मानपूर्वक ’हरदा‘ बनाते हुए उन्हें ’हरदा हुडकी‘ घोषित कर दिया। ऐसे हमारे हरदा हुडकी की जब अल्मोडा के लाला बाजार से गले में हुडका लटकाए हुए गुजष्रते तो नरुवा, हरक सिंह और मुझ जैसे जाने कितने युवा उनके पीछे हो लेते और लगे हाथों अनुरोध भी कर डालते कि वे हुडका बजाते हुए दो-एक कूर्मांचली लोक गीत सुना दें। और हरदा अमूमन हम लोगों का अनुरोध ठुकराते भी न थे। लेकिन एक दिन उन्होंने गीत सुनाने से पहले पूछ डाला, ’’तुम लोग कहते हो कि हुडका बजाऊं और गीत सुनाऊं। लेकिन पहले ये बताओ कि तुम्हें इस हुडके के बारे में पता क्या है?‘‘ उनके प्रश्न पर सब निरुत्तर थे। तब उन्होंने मेरी ओर इशारा करते हुए नरुवा, हरक सिंह और अन्य लडकों से कहा, ’’तुम्हें मालूम है रे, ये जिबुवा आजकल पत्रा-पत्रिाकाओं में लेख-कहानियां लिखने लगा है?‘‘ सबने ’हां‘ कहा, पर साथ ही जोड दिया कि ’असल में ये जिबुवा आजकल बेरोजगार है, इसलिए जेब खर्च निकालने के लिए इधर-उधर से पढ-पढा कर कुछ चलताऊ-सा लिख देता है, लेकिन महाकवि सुमित्राा नंदन पंत और इलाचन्द्र जोशी जैसे पर्वत-पुत्राों की तरह मौलिक इसके पास कुछ नहीं है।‘ लडकों की बात सुनकर पहले तो हरदा हंसे, फिर बोले ’’यार जिबुवा तू कपोल-कल्पित कहानियों के साथ-साथ चोरी वोरी करके अंट-शंट विषयों में लेख लिखता रहता है, पर एकाध मौलिक लेख इस हुडके के बारे में क्यों नहीं लिखता। इसकी उत्पत्ति के बारे में विस्तार से मैं तुम्हें बता दूंगा। आखिर देस में रहने वालों को पता तो चले कि अपने कुमांऊ में हुडका नामक कोई वाद्य है जिसके कारण हरीश चन्द्र पांडे की ’हरदा हुडकी‘ के रूप में ख्याति है। पर तू लिखेगा क्या, तुझे खुद ही पता नहीं कि....‘‘ ’’क्यों पता नहीं है।‘‘ मैंने कहा, ’’भगवान शंकर के डमरू जैसी ही चीज तो है ये हुडका।‘‘ हरदा फिस्स से हंसे और हंसी थमने पर अपनी मौलिक स्थापना प्रस्तुत करते हुए बोले, ’’भोले शंकर हिमालय में रहते हैं और हम यहीं कर्मांचल में, जो हिमालय का ही अंग ठैरा। हिमालय भी पहाड और ये कूर्मांचल भी पहाड। इसलिए वो भी पहाडी और हम भी पहाडी। उनके हाथ में जो है वो डमरु कहलाया। हमारे हाथ में जो है वो हुडका हो गया। दोनों एक ही चीज।‘‘ और हुडका बजाते हुए वे गाने लगे-’’बेडू पाकेा बार मासा, हो नरैण का फल पाको चैता मेरी छैला।‘‘ दरअसल लोकगीत गाने और हुडका बजाने का शौक हरदा ने किशोरावस्था में ही पाल लिया था। फिर किशोरावस्था का यह शौक धीरे-धीरे व्यसन जैसा हो गया। लेकिन इस शौक ने व्यसन का रूप बाद में लिया, पहले उन्होंन इण्टरमीडिएट पास करके अल्मोडा के पास रानीखेत छावनी में सात-आठ महीने अंग्रेजों की नौकरी की। यह सन् छियालीस के आसपास की बात थी जब अंग्रेज भारत से अपना तामझाम समेटने की तैयारी कर रहे थे, तब एक दिन, हरदा हुडकी के ही शब्दों में, ’’अंग्रेज सार्जेन्ट विलिंगटन खफश हो गया कि मिस्टर हैरिस चंद्र पांडे, तुम फाइलों में नोटिंग ठीक से नई करता। और उसी दिन शाम को उसने आफिस से निकलते समय मेरे भेल में जोरों की लात जमा दी।‘‘ अपनी जवानी के दिनों की यह घटना अल्मोडा के लाला बाजार में शाम के समय एक बन्द दुकान के चबूतरे पर बैठे हुए हरदा ने बताई तो हम लोग खी-खी करके हंसने लगे। हम लोग मानी मैं, नरेन्द्र तिवारी उर्फ नरुवा और हरक सिंह। हम तीनों अपने को उनके निकट पाते थे और बेरोजगारी का गम भुलाने के लिए अक्सर उनके पास बैठे बातें करते रहते थे। ये बातें कई बार एकतरफा होतीं, यानी हरदा की जिन्दगी के किस्से और हादसे, जिन्हें हम तीनों बडे मनोयोग से सुनते। खैर, तो जब हम तीनों खी-खी कर हंसे तो हरदा ने हम लोगों की ओर देखते हुए गंभीर स्वर में कहा, ’’हँस तो रहे हो, पर भेल का मतलब भी समझते हो तुम लोग? अल्मोडा में रहते हुए भी अपना पहाडी कल्चर और बोली तक भूल गए हो तुम।‘‘ हरक सिंह ने तत्काल प्रतिवाद किया, ’’हरदा, आप हम लोगों को ऐसा अज्ञानी क्यों समझते हैं। हम न तो अपनी बोली भूले हैं और न कल्चर, लेकिन इस साले भेल का कल्चर से क्या मतलब?‘‘ उन्होंने मुस्कराते हुए पहले हरक सिंह की ओर देखा फिर मेरी तरफ, और बोले, ’’कल्चर और भेल के सम्बन्धों पर अभी आता हूँ, पहले जिबुवा तू मेरे मूल प्रश्न पर आ और बता कि भेल का क्या मतलब हुआ।‘‘ ’’अब इतना मूर्ख तो मैं हूँ नहीं कि भेल का मतलब मुझे न पता हो।‘‘ मैंने कहा, ’’संक्षेप में यह समझ लीजिये कि सार्जेन्ट विलिंगटन ने आफ चूतडों पर लात मार दी।‘‘ ’’वाह, जिबुवा!‘‘ मुस्कराते हुए हरदा बोले, ’’आज तूने पहली बार समझदारी से बात की। तो अब भेल और कल्चर के संबंधों पर भी तुम लोगों को समझा दूँ। समझ लो कि भेल के ठीक से मटकने पर ही लोकनृत्य आनन्ददायी होता है और तुम लोग इतना तो मानोगे ही कि लोकनृत्य हमारे पहाडी कल्चर का अविभाज्य अंग है।‘‘ इस बीच मैं कुछ बोलने ही जा रहा था कि हरदा ने टोक दिया, ’’यारो, तुम लोग तो भेल को बस हगने की चीज ही समझते हो। खैर, कोई बात नहीं। तो आगे इतना और समझ लो कि भेल से हगने पर जो पदार्थ निकलता है, वो अपने कुमाऊं में ही क्या पूरे देश प्रदेश में खाद का रूप धारण कर एग्रीकल्चर के काम आता है। और इसी के साथ यह भी अच्छी तरह समझ लो कि एग्रीकल्चर ही अपने इस कुमाऊं से लेकर प्रदेश और देश- दुनिया तक में कल्चर का मूल आधार है। देश की पचहत्तर-अस्सी प्रतिशत जनता एग्रीकल्चर पर निर्भर है और उसी के लोक गीत, उसी के लोक नृत्य, उसी की लोक कला असली कल्चर ठैरे।‘‘ मुझे लगा, हरदा की बात में दम है। शायद ऐसा ही कुछ नरुवा और हरक सिंह ने भी महसूस किया। तभी मेरी ओर देखते हुए हरदा ने अपनी ही रौ में कहा, ’’क्यों, समझ गया रे, जिबुवा? नहीं, तू कहां समझेगा। बामन जो ठैरा और बामनों को खेती-बारी और लोकगीत-संगीत से क्या सम्बन्ध। वैसे बामन तो मैं भी हूँ, लेकिन मुझे पता है कि ज्यादातर लोकगीत और लोकनृत्य खेतों से ही निकले हैं। इस हरक सिंह हलिया को जरूर पता होगा। क्यों रे, हरक सिंह, पता है तुझे?‘‘ हरक सिंह हंस दिया। मौका पाकर हरदा ने मुझे और नरुवा को सम्बोधित कर कहा, ’’ये हरक सिंह भी अब हल कहां चलाता है। इसलिए इसे हलिया क्या कहना! पैंट-कोट वाला साहिब और पक्का बामन जैसा ही हो गया है ये भी। क्यों, ठीक कह रहा हूं रे, जिबुवा?‘‘ ’’क्या ठीक और क्या बेठीक।‘‘ मैंने कहा, ’’मैं तो ये जानता हूं कि आप भेल के बहाने व्यर्थ ही कल्चर और एग्रीकल्चर के रिश्तों को ले बैठे। मूल विषय पर आइये और ये बताइये कि अंग्रेज सार्जेन्ट विलिंगटन ने आफ चूतड पर जोरों की लात जमाई तो उसके बाद क्या हुआ?‘‘ ’’होना क्या था।‘‘ हरदा परम वीतराग भाव से बोले। फिर धीरे-धीरे उनके होठों पर रहस्यमय मुस्कान उभरी और उन्होंने कहा, ’’आगे जो कुछ हुआ, वह बडा हैरतअंगेजष् है।‘‘ ’’सो क्या?‘‘ नरुवा और हरक सिंह ने उत्सुकता से एक साथ पूछा।‘‘ ’’अब छोडो भी वह सब, यारो।‘‘ हरदा मानो फिर वीतराग हो गए। ’’कैसे छोड दें! जब बात हैरतअंगेज है तो आप उसे इस तरह बीच में नहीं छोड सकते।‘‘ ’’अब तुम जानना ही चाहते हो तो बता देता हूँ।‘‘ हरदा बोले, ’’लात पडने के अगले दिन मैं मुंह लटकाए आफिस जा रहा था और जाते हुए मन ही मन सोच रहा था कि इन साले दंभी अंग्रेजों की नौकरी क्या करनी। अच्छा हो कि त्यागपत्रा दे दूं। तभी पीछे से सार्जेन्ट विलिंगटन आ गया और अपनी गाडी से उतरते हुए बोला-मिस्टर हैरिस चन्द्र पांडे, इट सीम्स दैट यू हैव फैल्ट इट टू मच....‘‘ इतना बता कर हरदा रुक गए और नरुवा की ओर देखने लगे। अपना कर्तव्य समझ कर नरुवा ने पूछा, ’’तो आपने क्या कहा उस अंग्रेज सार्जेन्ट विलिंगटन से?‘‘ ’’कहता क्या मैं।‘‘ हरदा बडे मासूम अंदाजष् में बोले, ’’कुछ कहने के लिए सोचने का टाइम ही नहीं मिला। विलिंगटन का चेहरा भी थोडा उदास-सा लग रहा था इसलिए मैंने कह दिया-नो सर, हमने कुछ फील नहीं किया। गलती हुई होगी
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