KhbarExpresswww.khabarexpress.com

EDA - School Accounting Software

Welcome Guest Sign In New user! Sign Up Now
Search Photo  
RSS Wednesday, February 15, 2012



Vartmaan Sahitya ::January, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner

काव्य-लय या छंद-लय हरपाल सिंह अरुष
More Articles

कविता एक चेतन संबोध है, जो रचनाकार की अनुभूति में आकार ग्रहण करता है और भाषायी प्रोसेस के माध्यम से आस्वादक तक पहुंचता है। जिसके स्वर की जांच ध्वनि की नाडी और आशय की संास को परखकर ही की जा सकती है। नाडी की ’रिद्म‘ उसकी शक्ति की लय है तथा सांसों की आवृत्ति उसके आशय को व्यक्त करने वाली कालावधि का संयोजन है। इन दोनों को, सममिति और आवृत्ति-अंतराल के आधार पर समझना सरल हो सकता है। लय इतनी मृसण होती है कि इसके प्रवाह म खुरदरेपन तथा अवरोधन की संभावनाएं कम से कम होती हैं। प्रश्न उठता है कि छंद-लय तथा मात्राा-आधारित नियमन से हटकर यह जिष्क्र कैसी और कौन-सी लय का आने लगा है? इसका उत्तर, थोडा सोचने पर अपने आप उभरकर आने लगेगा। मात्राा-आधारित आरोह-अवरोह से संपन्न रचना में भले ही संगीत के तत्त्वों से मेल खाने की कितनी ही क्षमता हो यदि अर्थ-ध्वनि को निस्वनित नहीं करती तो वह कविता कहलाने की अधिकारिणी नहीं मानी जाएगी। आधुनिक कविता में लय की तलाश कठिन नहीं रह जाती, यदि हम ऊपर बतलायी गयी पहचान को समझकर चल सकें। बहुत सीधे और आसान तरीके से कहें तो कविता की लय श्रुति-अनुभव और श्रुति-कल्पना से विशेष संबंध नहीं रखती, क्योंकि श्रुति-अनुभव तथा श्रुति-कल्पना संगीत-कला के आनंद से संबंध रखती हैं जो सार्वजनिक रूप धारण कर चुकी हैं। यदि कविता और संगीत को परस्परावलंबी मान कर चलेंगे तो एक प्रकार से कविता को संगीत की सपोर्ट देकर खडा करने जैसी स्थिति ही सामने आएगी। कविता को जिन छंदों में बांध कर रखा जाएगा वे इसीलिए सार्वजनिक हैं कि उनको फार्मूलाबद्ध किया जा सकता है और उनमें से अधिकतर पहले से ही फार्मूलाबद्ध हैं भी। कई कवि एक ही प्रकार के छंद में कई प्रकार की रचना करने में सक्षम हो सकते हैं। यहां पर ’प्रकार‘ शब्द को पहचानने की आवश्यकता है। यह ’प्रकार‘ किसी रचनाकार कवि के ’व्यक्ति‘ की पहचान होता है। ’रिदमोस‘ शब्द जिससे ’रिदम‘ बना है, ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ ’प्रवाह‘ है। कविता में, इस ’प्रवाह‘ को शब्दों में, शब्दों के मध्य होने वाले संघात में व शब्दों के संयोजन से उद्भूत ध्वनियों की लय के रूप में समझना आज के संदर्भ में अनिवार्य-सा लगने लगा है। आज की कविता छंद के पार जा चुकी है। कविता में छंदपन कम अर्थात श्रुति-अनुभव तथा श्रुति-कल्पना कम और अर्थ-लय अर्थात ध्वनि अधिक आ गयी है। सभी जानते हैं ध्वनि को ’व्यंजना‘ भी कहा जाता है। यह व्यंजना ही कविता की लय है। गद्य को विवरणात्मकता के सहारे अब कविता नहीं कहा जा सकता। विद्रूप, विरोध, द्वंद्व, तुर्शी, तल्खी, झुंझ, आवेग, आक्रोश, कुढन और लाचारी की व्यंजना हेतु शब्दों का चयन और क्रम अपने आप लय का संधान कर देते हैं। कई बार अधीरता और उतावलापन, कई बार धैर्य और प्रतीक्षा इसी काव्य-लय द्वारा व्यंजित किये जाते हैं। जब शब्द, शब्द नहीं रहते; शब्दों के पारंपरिक अर्थ, अर्थ नहीं रहते तब शब्द ऐसी कंपन करते हैं कि उसकी आवृत्ति से जो काव्य-नाद प्रवाहित होता है उससे काव्य-लय उत्पन्न होती है। कविता, काव्य-लय से पोषण ग्रहण करती है। जहां तक अलंकार की बात है उसकी आवश्यकता तो लय को स्थूल रूप प्रदान करने के लिए है। सूक्ष्म ’ध्वनि‘ को आस्वादक तक पहुंचाने के लिए अलंकार की सहायता ली जाती है। अर्थात् अलंकार प्रेक्षण में सहायता करता है। लय तो अपने आप में कविता के अंदर विद्यमान होती ही है। कविता की प्रकृति और बनावट में ही लय अनुस्यूत होती है। कविता में प्रयुक्त शब्द-विन्यास या वाक्य-संरचना अथवा शब्द-समूहों का संयोजन ही पर्याप्त नहीं होते जब तक कविता की भौतिकी के इन उपकरणों से कोई ’टोन‘ निनादित नहीं होती। कविता का आस्वाद बिना लय के ग्रहण नहीं किया जा सकता, अर्थात् जैसी और जितनी लय होगी कविता वैसा और उतना आस्वाद-प्रेषण करने की क्षमता रखती है। इसको पलट कर ऐसे भी कहा जा सकता है कि वह शाब्दिक कला जिसमें से लय का निस्वन नहीं होता कविता वाला स्वाद नहीं दे सकती। कविता अपने आप में इतनी मृसण और सूक्ष्म होती है कि उसको सपाट, स्थूल और निरामय यांत्रिाकी से नहीं समझा-समझाया जा सकता। यहां पर इतना जान लेना उचित होगा कि विराम-संकेतों और राग-तालिकाओं की गणितीय-प्रविधियों के संयोजन-प्रयोग का इस्तेमाल करके तैयार किया गया शब्द-समुच्चय काव्य-लय का ’टेक्स्ट‘ तैयार नहीं कर सकता। इसके लिए शब्द के अर्थ-अंतराल और व्यंजना के संकर-नाद को ध्वनित करने के लिए उच्च स्तर की शब्द-साधनामय उदात्तता की आवश्यकता है। कविता में शब्दों का संयोजन इस प्रकार किया जाता है कि अर्थ, आयाम और आवृत्ति के मध्य आशय-अन्वेषण की जिज्ञासा को उकसाने वाला एक विशेष प्रकार का उच्छवास उभरता है कि अर्थ का प्रक्षेपण निर्झर की तरह होने लगता है। इस प्रकार काव्य-लय उन्हीं परिचित शब्दों को निकालकर आस्वादक को विस्मयकारक (डीफेमीलिअराइज) स्वाद से सराबोर कर देती हैं। कवि इस सामर्थ्य को जुटाने के लिए अभ्यास और साधना को कलात्मक उच्चता को प्राप्त करता हुआ शब्दों पर दबाब, अर्थों में पिच, और क्रम में अवस्थापन का प्रयोग करके ऐसा संघटन तैयार करता है कि कविता अपने आप लयमान होने लगती है। छंद की लय और कविता की लय का अंतर समझना आज के कवि और आलोचक दोनों के लिए आवश्यक है। जो लोग चोसर, मिल्टन, वर्ड्सवर्थ, तुलसी, सूर और प्रसाद आदि को आज तक प्रासांगिक बताकर छंद, ताल और तुकांतता को कविता की लय के उपादानों-प्रतिमानों में गिनाने का प्रयास करते हैं उनके आग्रहीपने को कुछ इस तरह भी सोचने की सम्मति दी जा सकती है कि इन कवियों की अमिधा आधारित कुछ कविताओं को यदि छंद, ताल, तुक का सहारा न होता तो क्या इनकी दशा होती। कविता आदि संगीत के सहारे मात्रा पर खडी हो सकेगी या हो सकती हो तो फिर काव्य-लय का अस्तित्व ही कहाँ बचेगा? इस बात को और स्पष्ट करने के लिए शमशेर बहादुर सिंह की कविता से उदाहरण लेते हैं। प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे/ भोर का नभ/ राख से लीपा हुआ चौका (अभी गीला पडा है)/ बहुत काली सिला जरा से लाल केसर से/ कि जैसे धुल गयी हो/ स्लेट पर या लाल खडया-चाक/ मल दी हो किसी ने / नील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह/ जैसे हिल रही हो / और..../ जादू टूटता है इस उषा का अब सूर्योदय हो रहा है। यहां पर एक साथ कितनी अर्थ-अन्वितियां झंकृत हैं। शब्दों की सततता, अंतर्निभरता, अन्योन्याश्रितता जिन ध्वनियों को उत्पन्न कर रही हैं, उनकी बीट्स धरती और आकाश के मध्य फैले अंतराल को भर रही हैं। नभ और शंख में नादत्व का साम्य, उस पर भी शंख (वस्तु) को ऊर्ध्वत्व प्रदान करना, ’अभी गीला पडा है‘ में कोष्ठक लगा कर लय का उत्पन्न करना, कवि के अभ्यास और कौशल को दर्शाना है। ’गीला चौका‘ कह देने से इतनी काव्यात्मकता नहीं आ सकती थी। नभ में चौके को देखना, सिल, स्लेट, केसर, खडया, लाल रंग आदि के द्वारा धरती की पदार्थमयता को व्यंजित करने के लिए शब्दों पर स्ट्रैस देकर अर्थ-झंकृति उत्पन्न की गयी है। ’गौर झिलमिल देह‘ कहकर आंगिकता की लय उत्पन्न की गयी है। ’और....‘ के रूप में अंतराल देकर आयाम के लंबान में विस्तार दिया गया है। इसके बाद फिर एक लय उभारी गयी है, जादू टूटना, सूर्योदय का होना के पुनः संयोजन से पूर्ववर्ती लय के साथ संघात से बीट्स उत्पन्न कर दिये गये हैं जिससे एक शक्तिशाली अर्थान्वेषण से भरी गूंज अनुनादित होती है जो आकाश के बदलते रंगों, जागतिक, दैहिक और सूक्ष्म अनुभूतियों और संवेदनाओं के द्वारा अपनी ’टैक्स्टुअलिटी‘ का सृजन करती है। कवि, इस प्रकार सौंदर्यशास्त्राीयता को पाठ्य कविता के कलेवर में प्रस्तुत करता है। यहां पर लय के दोनों रूप मिलते हैं। वस्तुओं के द्वारा अर्थ-स्फीति का उदाहरण भी प्रस्तुत किया गया है। इसका अतिरिक्त आस्वाद लेने के लिए पाठक में चित्राकला का आस्वाद ग्रहण करने की क्षमता का होना भी आवश्यक हो जाता है। एक बडा लैंडस्केप विद्यमान है। रंगों, दूरियों, वस्तुओं को उभारकर कई दृश्यों को एक साथ कोलाज के रूप में चित्रिात किया गया है। गद्य-कविता में ही इतने प्रतिसंसार संरचित किये जा सकते हैं। इतनी सूक्ष्मता, संक्षिप्तता भी, जो विशेष अनुनादन उत्पन्न करके लय का संधान कर सके। चित्राात्मक अंतराल को शब्दों की सघनता से साध लिया गया है। एक ओर संवेदना का जागतिक विस्तार, दूसरी ओर भावात्मक सघनता; एक ओर अर्थ-ध्वनियों की अनुसृष्टि दूसरी ओर काव्य-चर्या का उपागम, है न संघात पर संघात। फिर इस द्वंद्व में से काव्य-संभव लय उत्पन्न क्यों नहीं होगी।



Discuss this topic on KhabarExpress Forum 

Post Your Comments to this Article Posting Rules
Name*:
Comment*:
 


October, 2006 <br> Sponsered by : Decor Home, BikanerOctober, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
January, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJanuary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
February, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerFebruary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
March, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMarch, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
April, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerApril, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
May, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMay, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
June, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJune, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 

All right reserved by Khabarexpress.com
Contact Us | Archives | Sitemap | Can't see Hindi ? | News Ticker
Special Edition: Lakshchandi Mahayagya, Camel Festival 2007, Vartmaan Sahitya, Nagar Ek - Nazaare Anek, Bikaner Udyog Craft Mela
Our Network rajb2b.com | khabarexpress.com | uniqueidea.net | PelagianDictionary.com | hindinotes.com
Developed & Designed by Pelagian Softwares