अधुनिक भारत के निर्माताओं में मेरे गांव के नाई के लडके चंदू का भी स्थान है। यह स्थान उसे तब मिलेगा जब मैं इतिहास में उसके योगदान की पहचान के लिए कोशिश करूँ। पहचान का यह अनोखा दावा ऐसे शोषण पर टिका है जिसकी पूरी महत्ता के बारे में वह भी नहीं जानता था। मैं चंदू को तब से जानता हूँ जब वह अपने फूले हुए पेट वाले बदन पर एक घिसा-पिटा नेकर पहने रहता था और हम एक साथ गांव की गलियों की धूल में लोटते थे। हम कभी चोर-सिपाही, कभी दुकान-दुकान कभी दूसरे छोटे-मोटे खेल खेलते थे जिनका आविष्कार हमने अपने और अपनी माताओं के आनन्द के लिए किया था। सभी बडे लोगों में से सिर्फ वो दो ही थीं जो हमारी ओर ध्यान देने की कृपा करती थीं। चंदू मुझसे छः महीने बडा था और सब कामों में वह आगे रहता था। मैं खुशी-खुशी उसके पीछे चलता था क्योंकि वह ततैये पकडने, उनकी पूंछ दबा कर जहर निकालने और उनके नन्हें पैरों में धागा बांध कर उडाने में माहिर था जबकि यदि मैं कभी गांव के कुएं के चबूतरे के पास कीचड पर पानी पीने इकट्ठे हुए ततैयों की टोली के पास जाने की हिम्मत करता तो हमेशा गाल पर चांटा पडता था। हम जब बडे हो गये तब भी वह मेरे लिए संपूर्णता का मूर्त रूप था क्योंकि वह इतने कठिन डिजाइनों की कागज की पतंगें बना सकता था और इतने संतुलन से उन्हें उडा भी सकता था जो मैं कभी नहीं कर पाता था। यह तो निश्चित था कि वह स्कूल में सवाल हल करने में मेरे जितना अच्छा नहीं था क्योंकि शायद उसके पिता ने उसे कम उम्र में ही नाई का पारंपरिक काम सिखा कर गांव में बाल काटने के काम के लिए भेजना शुरू कर दिया था। इस कारण उसके पास स्कूल के मास्टर जी द्वारा दिये गये गृहकार्य को करने का समय नहीं रहता था। पर वह कविता सुनाने में मुझसे अच्छा था। वह न केवल स्कूल की किताब में दी गयी कविताएं याद रखता था बल्कि कहानी निबंध के अंतहीन पृष्ठों को भी इस तरह दोहरा सकता था कि वह कविता जैसे लगते थे। मेरी माँ को इस बात से खिन्नता होती थी कि चंदू को स्कूल में वजीफश मिलता था जबकि मुझे फीस भरनी पडती थी। वह मुझे लगातार यह कहकर उसके साथ खेलने से रोकती रहती थीं कि वह छोटी जाति का, नाई का बेटा है और तुझे अपनी जाति और वर्ग के हिसाब से व्यवहार करना चाहिए। मगर मुझे अपने पूर्वजों से जो कुछ भी विरासत में मिला था, उसमें अपने को ऊँचा समझने की भावना तो मुझमें निश्चित रूप से नहीं थी। हर सुबह मेरी माँ जाति की पहचान का लाल टीका मेरे माथे पर लगाती थीं। मुझे अचकन कसे सूती पाजामें, सोने के काम वाले जूते और रेशमी पगडी की पोशाक पहनाई जाती थी। इस सबसे मुझे शर्मिन्दगी महसूस होती थी। मैं चंदू जैसे तरह-तरह के अनोखे कपडों के दर्शनीय गठजोड का लिबास पहनने के अधिकार के लिए तरसता था। वह पहनता था-सेवानिवृत्त सूबेदार द्वारा दिया गया खाकी नेकर और गांव के वकील लाला हुक्मचंद द्वारा दिया गया काला शनील का कोट जिसको सीपियों से सजाया गया था, और गोल टोपी। मुझे चंदू की घूमने फिरने की आजादी से ईर्ष्या होती थी जो उसे पिता की प्लेग से मृत्यु के बाद अनायास ही मिल गयी थी। वह सुबह गांव के ऊँची जाति के घरों में जाकर बाल काटने और हजामत करने का काम करता था। फिर वह नहा धो कर तैयार होकर लाला हुक्मचंद की बंद बग्घी के पायदान पर बैठ कर शहर जाया करता था। पर वह मेरे प्रति दयालु था। उसे पता था कि मुझे शहर जाने का मौका बहुत कम मिलता है और मुझे रोज मन में भगवान का डर लिए तीन थकाऊ मील चलकर बडे गांव जोडियाला के माध्यमिक स्कूल में जाना पडता है जबकि वह क्रूर मास्टरों के चंगुल से पूरी तरह छुटकारा पा चुका था क्योंकि पिता की मृत्यु के बाद उसने स्कूल छोड दिया था। इसलिए वह मेरे लिए शहर से हमेशा कोई न कोई उपहार लाता था जैसे चित्राकारी का ब्रुश, सुनहरी स्याही, सफेद चॉक, दुहरी धार वाला चाकू, पेन, साथ ही वह सभ्यता के बाजारों की तरह-तरह की चीजों का चुटीला विवरण सुना कर मेरा मनोरंजन करता था। चंदू को हर रोज शहर से वापस आने के लिए जिला अदालत में लाला हुक्मचंद की फिटन का इंतजार करना पडता था। वहां पर वह साहिबों, वकीलों, चपरासियों और पुलिस के आदमियों द्वारा पहने जाने वाले अंग्रेजी स्टाइल के अनोखे लिबासों को देखता था और उनका विशेष रूप से विस्तार से वर्णन करता था। एक या दो-बार उसने अपनी एक गुप्त इच्छा भी जाहिर की। चंदू की माँ उसके नाई के काम से कमाए गये पैसों को एक घडे में इकट्ठा करके रखती थी। चंदू की इच्छा थी कि वह उन पैसों को निकाल कर उनसे शहर के दांतों के डाक्टर कालन खान जैसा लिबास खरीदे। उसका कहना था कि कालन खान लोगों के नए दांत बल्कि नई आँखें भी लगा कर शहर में चमत्कार का काम करता है। उसने कालन खान की वेषभूषा का मुझसे वर्णन किया। वह एक युवा पुरुष था जो बालों से एक तरफश् मांग निकालता था और वह टाई के साथ कलफश् लगी शर्ट, काला कोट और धारीदार पतलून और साथ ही रबर का ओवर कोट और पम्प शू पहनता था। वह जादूगर जब अपना अंग्रेजी चमडे का बैग दक्षता से खोलता था तो उसमें से स्टील के चमकते औजार झलकते थे। तब उसने इस बारे में मुझसे सलाह मांगी कि वह जो पांचवीं कक्षा तक पढा नाई था अगर डाक्टर कालन खान के स्टाईल के कपडे पहने तो क्या अधिक शानदार नहीं लगेगा? उसका कहना था कि यद्यपि वह उच्च शिक्षा प्राप्त डाक्टर नहीं है तथापि वह मुहासों, फोडों और कटे का इलाज करना जानता है। यह उसने अपने पिता से सीखा और उसके पिता ने अपने पिता से। मैं उसकी परियोजना से सहमत था और उसी उत्साह से मैंने उसका हौसला बढाया जिस तरह मैं अपने हीरो के हर कारनामे या विचार से उत्साहित होता था। एक दिन मैं चंदू को सुबह अपने दरवाजे पर देख रोमांच से भर गया। उसने सफेद पगडी, सफेद रबर कोट (जो उसके लिए थोडा बडा था पर बडा शानदार था) और पम्प शू पहने थे जो इतने चमक रहे थे कि उनमें मेरा चेहरा साफश् नजष्र आ रहा था। उसके हाथ में एक चमडे का बैग था वह भी गाँव में अपने काम के लिए चक्कर लगाने निकला था और मुझे यह दिखाने आया था कि वह नए लिबास में कितना शानदार लग रहा था। ’अद्भुत‘! मैंने कहा ’अद्भुत‘! और वह जागीरदार के घर की ओर दौडा जिसकी हजामत वह हर सुबह बनाया करता था। मैं उसकी तारीफश् करता हुआ उसके पीछे-पीछे चला। इस समय गली में ज्यादा लोग नहीं थे, तो मैं अकेला ही चंदू की शान देख रहा था, जो डाक्टर की तरह का लिबास पहने था पर गांव की दीवारों पर थोपे गये उपलों और नाली के गंदे पानी से बचता बचाता काफशी संकोच से गली पार कर रहा था। पर जैसे ही हमने जागीरदार के घर में कदम रखा हमें मकान मालिक का नन्हा बेटा देवी मिला। उसने खुश होकर ताली बजाई और चंदू के आने की घोषणा की जो अपने सुन्दर हीरो जैसे कपडों से मिशन स्कूल के पादरी जैसा लग रहा था। ’राम! राम! राम!‘ स्थूलकाय जागीरदार विजय आनंद चिल्लाया। वह अपना जनेऊ कान पर लगा रहा था क्योंकि वह तुरंत ही संडास से निकला था ’’सूअर के बच्चे! गाय के चमडे का बैग और न जाने किस जानवर की खाल का कोट और शैतानी काले अंग्रेजी जूते लेकर हमारे घर में घुस रहा है। दूर हो! दूर हो! शैतान के बच्चे। तू मेरा धर्म भ्रष्ट करेगा। लगता है तेरा बाप मर गया है इसलिए तुझे किसी का डर नहीं रहा।‘‘ ’पर मैंने डाक्टर की पोशाक पहनी है, जागीरदार साहिब!‘ चंदू बोला। ’’दफश हो सूअर! दफश हो और अपनी नीची जात नाई के लायक कपडे पहन! मैं तुझे कोई नई करतूत करते न देखूँ। नहीं तो मैं तुझे कोडे लगवा दूँगा।‘‘ ’’मगर राय विजय चंद साहिब‘‘, चंदू ने कहा। ’’भाग जा! भाग! फालतू कहीं का!‘‘ जागीरदार चिल्लाया। ’’मेरे और पास मत आना नहीं तो मुझे पूरे घर को शुद्ध गोबर से पवित्रा कराना पडेगा।‘‘ चंदू वापिस हो लिया। उसका चेहरा लाल था। उसे बुरी तरह धक्का लगा था। उसने मुझसे नजष्रें नहीं मिलाईं। वह जानता था कि वह मेरा हीरो है और मेरे ही सामने उसका अनादर किया गया था। वह गाँव के साहूकार थानूराम की दुकान की ओर चल दिया। थानूराम की गांव की गली के छोर पर किराने की दुकान थी। जागीरदार के बेटे देवी ने अपने पिता के कडवे शब्द सुनकर रोना शुरू कर दिया था। मैं उसे चुप कराने के लिए रुक गया था। जब मैं गली के मुहाने पर पहुँचा तो मैंने देखा कि साहूकार के हाथ में तराजू का सिरा था जिसमें वह अनाज तोल रहा था और बहुत ही अभद्र भाषा में वह चंदू पर चिल्ला रहा था। ’’तू सुअर! तुझे अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए, अपनी बूढी माँ का ध्यान रखना चाहिए और तू इन अस्पताल वालों के भ्रष्ट कपडों में जोकर बना घूम रहा है। जा और अपने कपडे पहन कर आ तब मैं तुझे अपने बाल काटने दूँगा‘‘, कहते हुए उसने अपने सिर पर बंधी परम्परागत चोटी को छुआ। चंदू का मुँह उतर गया। वह भागा और मेरे पास से वह इतने गुस्से में गुजरा जैसे इस सारे हादसे के लिए मैं ही जिम्मेदार हूँ। और यह सोचकर मैं लगभग रोने लगा कि वह मुझसे नफरत करता है क्योंकि मैं ऊँची जाति का हूँ। ’’पंडित परमानन्द के पास जाओ!‘‘ मैं पीछे से चिल्लाया ’’उसको बताओ कि यह जो कपडे तुमने पहने हैं, अशुद्ध नहीं हैं।‘‘ ’’हो तो तुम भी उसके साथ शामिल।‘‘ पंडित परमानन्द ने जागीरदार के घर से निकलते हुए कहा। ’’यहां आओ।‘‘ शायद इस अपवित्रा संकट की चर्चा करने के लिए उसे बुलाया गया था। ’’तुम लडकों को स्कूल की पढाई-लिखाई ने बिगाड दिया है। ये सब कपडे पहनना तुम्हारे लिए शायद ठीक होगा क्यकि तुम एक पढे-लिखे इंसान बनोगे पर इस नीची जाति के लडके को यह सब पहनने का क्या अधिकार है? ये और कलुषित क्यों होना चाहता है? तुम एक उच्च जाति के लडके हो। वह नीची जाति का शैतान है। वह शैतान है।‘‘ चंदू ने यह सुन लिया था। उसने पीछे मुडकर नहीं देखा और वह जल्दबाजी में भागा जैसे उसे कोई जरूरी काम है जिसमें वह उलझा है। उन गालियों से ज्यादा जिनके कारण वह भागा था। मेरी माँ ने मुझे आवाज दी और कहा कि यह मेरे खाने और स्कूल जाने का समय है अन्यथा मैं लेट हो जाऊँगा। और वह उस नाई के लडके से मेरी दोस्ती को लेकर भाषण देने के लालच को रोक न सकी। किन्तु मैं चंदू की किस्मत को लेकर पूरा दिन परेशान रहा और स्कूल से लौटते समय चंदू के छप्पर में जा पहुँचा जहां वह अपनी माँ के साथ रहता था। उसकी माँ झगडालू बुढया के रूप में मशहूर थी। क्योंकि वह एक नीची जाति की औरत ऊँची जाति के लोगों को उस रूप में देखने की हिम्मत करती थी जैसे वह खुद को देखने का हौसला नहीं रखते थे। मेरे साथ हमेशा वह दयालुता से पेश आती थी जबकि वह मुझ से भी उन्हीं तानों वाले अंदाज में बात करती जो उसने साठ साल के कष्टों और अनादर से जूझने के अनुभव के कारण हासिल किये थे। मेरी तरफ मुडकर उसने कहा-ठीक है, तुम आये हो, अपने दोस्त को देखने, अगर तुम्हारी माँ को यह पता चलेगा कि तुम यहाँ आये हो तो वह मेरी आँखें नोंच लेगी कि मैंने तुम्हारी प्यारी सूरत पर अपनी गंदी नजरें डालीं। और तुम! क्या तुम इतने ही भोले हो जितने दिखते हो। या तुम भी औरों की तरह पाखंडी हो।‘‘ ’’चंदू कहाँ है माँ!‘‘ मैंने कहा। ’’मैं नहीं जानती बेटा!‘‘ उसने सब सीधे-सादे तरीके से कहा। ’’वह शहर की ओर गया है और कहता है उसने सडक किनारे लोगों की हजामत करके कुछ पैसे कमाये हैं। मैं नहीं जानती वह क्या कर रहा है। मुझे नहीं लगता उसे अपने पिता के ग्राहकों को नाराज करना चाहिए। वह बच्चा है और उसके दिमागष् में अजीब-अजीब ख्ायाल आते हैं। उन लोगों को इससे गुस्सा नहीं होना चाहिए। वह लडका ही है। शायद तुम उससे मिलना और उसके साथ बाहर जाकर खेलना चाहते हो। ठीक है। जब वह आयेगा मैं बता दूँगी। मुझे लगता है वह सडक तक ही गया है। ’’ठीक है माँ‘‘, मैंने कहा और घर चला गया। चंदू ने दोपहर बाद मुझे बुलाने के लिए सीटी मारी। यह हमारा खुफिया संकेत था जिसे हमने बडों की दखल-अंदाजी व उनकी डांट-फटकार से बचने के लिए बनाया था जो अक्सर हमारे साथ दिखने पर हमपर पडती थी। ’’चलो बाजार घूमने चलते हैं,‘‘ उसने कहा, ’’मुझे तुमसे बात करनी है।‘‘ मैं उसके साथ चला ही था कि उसने अपनी बात शुरू कर दी, ’’तुझे पता है आज सुबह मैंने कचहरी के पास हजामत और बाल काट के एक रूपया कमाया। अगर मुझे दोपहर में लाला हुक्मचंद की फिटन में वापिस नहीं आना होता तो मैं और कमा लेता। पर मुझे इन पुराणपंथी मूर्खों को सबक सिखाना है। मैं हडताल करने जा रहा हूँ। मैं उनकी सेवा करने उनके घरों में नहीं जाऊँगा। मैं लाला हुक्मचंद के जुआरी बेटे से पाँच रुपये में जापानी साइकिल खरीदूंगा। मैं उसे चलाना सीखूंगा और हर रोज उसपर शहर जाऊँगा। क्या मैं अपना ओवर कोट, काले चमडे के जूते और सिर पर सफेद पगडी पहन कर साइकिल चलाता हुआ शानदार नहीं लगूंगा। जबकि मेरी साइकिल में अपने औजार का बैग रखने के लिए आगे टोकरी भी होगी।‘‘ ’’हाँ!‘‘ मैंने सहमति जताई। मैं बहुत रोमांचित था। इसलिए नहीं कि मैं साइकिल पर बैठे चंदू की शान की कल्पना कर रहा था वरन् इसलिए कि अगर चंदू को साइकिल मिल गयी तो वह मुझे बेशक उसकी सवारी करना सीखने न दे और कभी उधार न दे पर पीछे कैरियर पर या आगे डंडे पर बैठाकर कभी-कभी मुझे शहर जरूर ले जायेगा। चंदू ने साइकिल खरीदने के लिए इस निश्चिन्तता से मोड पार किया कि मैं उसकी इस व्यावसायिक क्षमता से हैरान हो गया। वह जिस तरह अपने पैरों को उठाता था, वो देखकर मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता था कि उसमें यह काबलियत हो सकती है। फिर उसने मुझसे गोपनीय आवाजष् में कहा, ’’तू एक दो दिन इंतजषर कर, मैं तुझे ऐसी चीजष् दिखाऊँगा जिस देखकर तू इतना हंसेगा जितना पहले कभी नहीं हंसा होगा।‘‘ ’’मुझे अभी बता।‘‘ मैंने जिद की। उसके साहस के रोमांच ने मुझे भी उत्साह से भर कर अधीर कर दिया था। ’’अब तू इंतजार कर‘‘, उसने कहा। ’’इस समय मैं सिफश्र् एक इशारा दे सकता हूँ। यह वह राजष् है जो सिर्फ एक नाई ही जान सकता है।‘‘ अब मुझे यह साइकिल चलानी सीखने दे। तू इसको कस कर पकड, मैं इसपर चढता हूँ। और मुझे लगता है सब ठीक होगा।‘‘ ’’लेकिन‘‘ मैंने कहा, ’’यह साइकिल चलाना सीखने का तरीका नहीं है। मेरे पिता ने पीछे से पैडल मार कर चलाना सीखा और मेरे भाई ने पहले पै
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