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Vartmaan Sahitya ::January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner मैं अछूत नहीं हूँ
प्रणव कुमार ’प्रियदर्शी‘
मुझे बहुत कुछ छूता है मैं छूत की संवेदना से पैर से लेकर सर तक सिंचित हूँ मैं अछूत नहीं हूँ मुझे छूता है आकाश में भटकने वाला बादल पदचिह्न रहित उडते हुए पक्षियों की मुस्कुराहट धवल चाँद की अकुलाहट यह सब मुझसे कितना दूर है लेकिन मुझे छूता है मैं छुआ हुआ पाता हूँ स्वयं को फूल की आंतरिक खिलावट से कांटों की गर्हित सजावट से धूप की जलन से छाया की लगन से पत्थरों से, रेत से पृथ्वी से, आकाश से किससे दामन उलझाऊँ किससे दामन छुडाऊँ मेरा सम्बन्ध है अपने आप पूरे ब्रह्माण्ड से कई लोग कभी दूर से तो कभी पास से कहते हैं मुझे आपको बहुत जल्दी कोई बात छू देती है छूनेपन की व्यथा से जब आहत होता हूँ नवीन राह के आलोक पर बढकर नये भावालोक के साथ लौटता हूँ छूनेपन की व्यथा को अपने लिए अमूल्य पूंजी मानता हूँ मैं अछूत नहीं हूँ जिनको कुछ छूता नहीं है वह कैसे जीते हैं वह अपनी जानें मैं अपनी जानता हूँ रात सूरज को छूकर ढलती है बीज धरती को छूकर विकसित होता है नदी किनारे को छूकर चलती है कुछ मुझे छूता है कुछ को मैं छूता हूँ इस तरह से मैं अपने चारों तरफश् एक नया संसार गढता हूँ प्रवीण कहते हैं मुझसे आपकी बात सिफश्र् सिद्धान्त की होती है वह ’व्यवहार में‘ सम्भव नहीं है जबकि मेरी बात मैं निष्पक्ष होकर जानता हूँ व्यवहार के पृष्ठ से उठकर सिद्धांत के फलक पर चढती है शायद इसलिए ऐसा हो पाता है कि मुझे बहुत कुछ छूता है मैं भी बहुत कुछ को छूता हूँ मैं अछूत नहीं हूँ बी-४८, हरमू हाउसिंग कालोनी, राँची, ८३४००२ (झारखण्ड)
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