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उत्तिष्ठत जाग्रत के मंत्रादाता पं. कन्हैयालाल मिश्र ’प्रभाकर‘ से मेरी पहली भेंट सन् १९५१-५२ में हुई थी। उन दिनों वे मासिक ’नया जीवन‘ और साप्ताहिक ’विकास‘ का सम्पादन कर रहे थे। मैं अक्सर सहारनपुर आया करता था और उनके पास थोडी देर अवश्य बैठता था। उनका सम्पादकीय कार्यालय रेलवे स्टेशन से कोई आधे फर्लांग पर दाहिनी ओर था; और उनका निवास इतना ही आगे बढने पर बायीं ओर एक बडे फाटक में प्रवेश करने पर एक अहाते में बायीं ओर था। पहली बार मैं उनसे कार्यालय में ही मिला था। अपना परिचय देने के बाद मैंने उनसे कहा था कि मैंने उनके सम्बन्ध में सुना तो बहुत है; लेकिन उनका लिखा-पढा कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा था, पहले हम दोनों एक दूसरे को भली प्रकार जान तो लें, उसके बाद पढने-लिखने की बात होगी। तभी मेरी नजष्र उनके पीछे की ओर गयी, मैंने देखा कि वहाँ श्री गणेश शंकर विद्यार्थी का बडा सा चित्रा है। मैंने कहा, ’मुझे लगता है कि आप विद्यार्थी जी को अपना आदर्श मानते हैं।‘ प्रभाकर जी ने कहा था कि विद्यार्थी जी उनसे बहुत बडे थे। वे बडे प्रबुद्ध और निर्भीक पत्राकार तो थे ही, स्वाधीनता आन्दोलन में भी उन्होंने पूरे मन से भाग लिया था और फिर उनके नगर कानपुर में हिन्दू-मुसलमानों के बीच जो दंगा हुआ था, उसे शान्त करने के लिए उन्होंने अपने प्राणों की बलि दे दी थी। महात्मा गान्धी ने तब कहा था कि वे अपने जीवन का अन्त कुछ इसी प्रकार का चाहेंगे। वे भी चाहते थे कि उन्हें भी कुछ ऐसा ही जीवन मिले। उनके ये शब्द सुनने के बाद मेरी दृष्टि बायीं ओर गयी तो उसमें दो सूत्रा-वाक्य लिखे थे- १. ’दुनिया में बुराइयाँ इसलिए नहीं, कि बुरे आदमी ज्यादा बोलते हैं, बस इसलिए है कि भले आदमी चुप रह जाते हैं।‘ -शापेन हॉवर २. ’सफश्र योरसेल्फश् टू बी ब्लेम्ड, इम्प्रीजष्न्ड ; सफश्र योरसेल्फश्, ईवेन टू बी हैंग्ड, बट पब्लिश योर ओपीनियन्स। इट इजष् नॉट ऑनली ए राइट बट ड्यूटी।‘ -एक फ्रान्सीसी चिन्तक मुझे लगा था कि यही दोनों विचार प्रभाकर जी की पत्राकारिता के प्रेरणास्रोत हैं। जब मैंने दूसरी ओर देखा तो उस पर भी कुछ वाक्य लिखे हुए थे- ’हमारा काम यह नहीं है कि इस विशाल देश में बसे चन्द दिमागषी ऐय्याशों का फालतू समय चैन और खुमारी में काटने के लिए मनोरंजक साहित्य नाम का मयखाना हर समय खुला रखें।‘ ’हमारा काम तो यह है कि इस विशाल देश के कोने-कोने में फैले जनसाधारण के मन में विश्ाृंखलित वर्तमान के प्रति विद्रोह और भव्य भविष्यत् का निर्माण करने के लिए परिवर्तन की श्रमशील भूख जगायें।‘ इन वाक्यों को पढकर लगा कि यही प्रभाकर जी की पत्राकारिता और साहित्य की प्रेरणा के सिद्धान्त-सूत्रा हैं। मेरा मन उनके प्रति श्रद्धावनत हो गया ओर भावमुग्ध होकर उनसे कहा कि आफ सम्बन्ध में बिना बोले मैं बहुत कुछ जान गया हूँ और अब उसे आत्मसात् करना चाहूँगा। आपसे बातचीत अब दूसरी बार आने पर होगी। मैं उन दिनों सनातन धर्म कालेज, मुजफ्फरनगर में अध्यापन कार्य कर रहा था। अतः उनके कार्यालय से सीधे रेलवे स्टेशन गया अैर टिकट लेकर ट्रेन में बैठते ही उनके द्वारा दी गयी ’नया जीवन‘ को बडे मनोयोग से पढने लगा। सबसे पहले मैंने अग्रलेख और फिर प्रभाकर जी की एक रचना पढी। मुझे लगा कि प्रभाकर जी अपनी इस पत्रिाका के माध्यम से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र में नयी चेतना और नये जीवन मूल्य जगाना चाहते हैं। उसके बाद मैं ’विकास‘-को भी उलट-पुलट गया। उसमें भी प्रभाकर जी की एक रचना थी। उसमें पश्चिम के प्रसिद्ध विचारक मैकस्विनी का एक वाक्य था कि-गुलाम देश में हर प्रकार की कमजोरियाँ बडी तेजी से बढती हैं। आगे कहा गया था कि अब तो हम आजषद हैं और अब हमें अपनी दुर्बलताओं को पहचान कर उन्हें दूर करने और राष्ट्रीय सेवा में अपने को समर्पित करने के लिए सन्नद्ध होना चाहिए। प्रभाकर जी से मिलने जब दूसरी बार गया था तो वे मुझे अपने कार्यालय में नहीं, अपने निवास में मिले थे। वे मुझे जिस कक्ष में मिले थे, उसमें फर्श पर ही बैठने की व्यवस्था थी, अतः वहाँ बैठने पर मुझे लगा कि इस घरेलू परिवेश में उनके साथ अधिक आत्मीयता से बातचीत की जा सकती है। सामान्य शिष्टाचार के बाद मैंने उनसे कहा था- ’आपकी रचनाओं को पढकर मुझे लगा कि आप मूलतः कवि हैं। आपको आज लोग एक समर्थ गद्यकार के रूप में जानते हैं, क्या आपने कभी कविताएँ भी लिखी हैं?‘ प्रभाकर जी ने उसी दिन मुझे बताया था कि प्रारम्भिक दिनों में अधिकांश में कविता और यदा-कदा गद्य लिखते हुए उन्हें लगा कि उनका गद्य उनके पद्य से तगडा है। अपनी इसी धारणा को लेकर जब उन्हे स्वाधीनता आन्दोलन में भाग लेने के कारण जेल जाना पडा तो गद्य-लेखन बडी तेजषी के साथ चल पडा और कविता छूटती चली गयी। प्रभाकर जी का कवि तब भी जागरूक रहा। वह काव्य-चेतना से अनुप्राणित होने के कारण, जिस रूप में प्रकट हुआ उसे साहित्याचार्यों ने ’गद्य-काव्य‘ की संज्ञा दी है। किसी भी विषय को लेकर भावना का प्रवाह थोडी देर ही चलता है। इसलिए गद्यकाव्य विधा की रचनाएँ सामान्यतः छोटी ही होती हैं। प्रभाकर जी के गद्यकाव्य का लेखन चल ही रहा था कि तभी १९२८ में किसी मासिक पत्रिाका में छपे एक लेख में उन्हें पढने को मिला,-’’सम्पूर्ण जीवन का सम्पूर्ण चित्रा उपन्यास है और एक घटना का सम्पूर्ण चित्रा कहानी है।‘‘ इतना पढने के बाद वे सोचने लगे और उनके मन में यह प्रश्न उठा, कि जीवन की कोई घटना तो छोटी-से-छोटी भी हो सकती है, तो फिर कहानी के विस्तार की छोटी से छोटी सीमा क्या है? यह प्रश्न उनके मन में भर गया और १९३९ में जब महाप्राण बापू स्वतन्त्राता संग्राम के लिए धन इकट्ठा करने के लिए निकले थे, तो प्रभाकर जी के जीवन का एक छोटा-सा प्रसंग उनके मन को छू गया और एक छोटी सी कहानी बन गयी। ’महात्मा गांधी आ रहे हैं। उनके पर्स के लिए कुछ आप भी दीजिए सेठ जी।‘‘ ’बाबूजी आफ पीछे हर समय खुफिश्या पुलिस लगी रहती है, कोई हमारी रिपोर्ट करा देगा, इसलिए हम इस झगडे में नहीं पडते।‘ ’मैं रात दिन भाग रहा हूँ, जब मुझे ही पुलिस न पा सकी तो रिपोर्ट आपका क्या कर लेगी?‘ जष्रा सोचकर हाथ जोडते हुए से बोले-’अजी आपकी बात और है। हम कलेक्टर साहब से डरते हैं आपसे तो उल्टा कलेक्टर ही डरता है।‘ प्रसन्नता से मैंने कहा -’तो आप ही डरने वालों में क्यों रहते हैं? कांग्रेस में अपना नाम लिखा लीजिए और फिर कलेक्टर भी आपसे डरने लगेगा।‘ सेठ जी ने खींसें निपोर दीं-’हें, हें, हें।‘ प्रभाकर जी ने अपनी इस रचना को शीर्षक दिया ’सेठ जी‘ और फिर उन्होंने इसी प्रकार की और कुछ लघु कथाएँ लिखीं जो उनके ग्रन्थ ’आकाश के तारे ः धरती के फूल‘ में संकलित हैं। प्रभाकर जी ने इसी प्रकार अपने लेखन में रिपोर्ताज के आविर्भाव की कहानी लिखी है। सन् १९२५ में कांग्रेस का जो अधिवेशन हुआ था, दैनिक और साप्ताहिक पत्राों में प्रभाकर जी ने उसका विवरण पढा। अक्षर-अक्षर पढ लेने के बाद उनका मन प्यासा ही रह गया। उससे उन्हें बडी बेचैनी हुई और उन्होंने बार-बार सोचा कि क्या यह विवरण ऐसा नहीं हो सकता कि जो लोग इस प्रकार के आयोजन में नहीं गये हों, उन्हें भी वहाँ का आनन्द कुछ न कुछ मिल जाये? वे शत-प्रतिशत पाठक तो रहें, पर दस-बीस प्रतिशत दर्शक भी हो जायें। वे यह सब सोच ही रहे थे कि १९२६ में गुरुकुल कांगडी की रजत जयन्ती मनाने की घोषणा हुई। उसमें महात्मा गांधी, मालवीय जी और टी. एल. वासवानी आने वाले थे। अपने एक आत्मीय से उधार लेकर वे उस उत्सव में गये ओर बडी तल्लीनता से उसे देखा। उस आयोजन को देखकर वे आनन्द विभोर हो उठे और फिर उन्होंने इसका विवरण लिखा। उस समय वह एक महत्वपूर्ण उत्सव का आँखों देखा विवरण मात्रा था। आगे चलकर इस विधा को देश में विदेश में रिपोर्ताज नाम दिया गया। रूस के प्रसिद्ध लेखक इलिया एहेरनबर्ग को इस विधा का जनक माना जाता है। उसने सन् १९३९-४० में, हिटलर ने जब रूस पर आक्रमण किया था तो युद्ध-क्षेत्रा में जाकर उसके आँखों देखे विवरण लिखे थे। प्रभाकर जी ने इस विधा का सूत्रापात सन् १९२६ में ही कर दिया था। प्रभाकर जी के एक रिपोर्ताज ’राबर्ट नर्सिंग होम में‘ की चर्चा करना चाहूँगा। बात सितम्बर १९५१ की है। प्रभाकर जी इन्दौर गये हुए थे। वे जिनके यहाँ ठहरे हुए थे वे अचानक बीमार हो गयीं। उन्हें नर्सिंग होम में भरती कराया गया। उनकी आतिथेया के पलंग पर लेटते ही हिम धवल वेशभूषा में आच्छादित एक महिला, रोगी के पास आ गयी। प्रभाकर जी ने उसका शब्दचित्रा दिया है ः ’देह उनकी पैंतालीस बसन्त देखी, वर्ण हिम श्वेत, पर अरुणोदय की रेखाओं से अनुरंजित, कश्द लम्बा और सुता सधा। उन्होंने आते ही कहा, लम्बा मुँह अच्छा नहीं लगता, बीमार के पास लम्बा मुँह नहीं। उसकी भाषा साफ-सुथरी, उच्चारण स्पष्ट और स्वर, आदेश का। लेकिन वह अधिकारी का, अधिनायक का नहीं, जिसका आरम्भ होता है हथेलियों से और अन्त गोद में। वे उस होम की अध्यक्षा, मदर थीं जिनका जन्म फ्रांस में हुआ था और कर्मभूमि थी भारत। आगे चलकर वे कोलकाता चली गयी थीं और वहाँ उन्हें मदर टेरेसा के रूप में जाना गया। कालान्तर में उनकी लोक सेवा की भावना को देखकर उन्हें नोबुल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। प्रभाकर जी के इसी विवरण में अन्त में विवेकानन्द जी का राष्ट्र के तरुणों को सम्बोधित एक कथन है, जो अक्सर मेरे मन में गूँजता रहता है ः ’मूर्तियों के सामने घंटियाँ ही टुनटुनाते रहोगे या जनता के सामने जहाँ भगवान की बाँसुरी बज रही है, जाओगे?‘ प्रभाकर जी ने ठीक ही कहा है कि यह प्रश्न राष्ट्र के वातावारण में आज भी गूँज रहा है। प्रभाकर जी ने अपने सम्पर्क के छोटे-बडे अनेक लोगों के संस्मरण भी लिखे हैं, जिन्होंने कभी संस्मरण, तो कभी रेखाचित्रा और कभी संस्मरणात्मक निबन्ध का रूप लिया है। छोटे समझे जाने वाले अज्ञात, अपरिचित व्यक्तियों पर लिखी गयी उनकी रचनाएँ विशेष रुचिकर हैं। इस सम्बन्ध में उनके द्वारा उस बालिका पर लिखी गयी रचना विशेष प्रभावपूर्ण है, जो स्वाधीनता आन्दोलन के दिनों में चालीस फुट ऊँचे बाँस पर चढकर झण्डा फहराती है। प्रभाकर जी ने उसके इस कार्य का लोमहर्षक चित्राण करते हुए आगे लिखा है कि अगर यह कार्य लेनिन, गांधी, नासिर या जवाहरलाल के हाथ में होता तो क्या वे इससे कुछ विशिष्ट कर पाते? इसीलिए उनका सिर देश के इन हीरे-मोती-लालों की स्मृति में सदा झुका रहता है। प्रभाकर जी की लघु में महान् के दर्शन की यह प्रवृत्ति विशेष अच्छी लगती है। उन्होंने ठीक ही लखा है कि हम लोग बडों में ही बडप्पन देखने के आदी हो गये हैं। छोटे लोग जो वास्तव में बडों की आधारशिला होते हैं उन पर हमारी दृष्टि जाती ही नहीं। उनकी पुस्तक ’बाजे पायलिया के घुंघरू‘ (१९५७) अत्यन्त मनोरंजक संस्मरणात्मक निबन्धों का संकलन है। जिसे उन्होंने उगती-उभरती पीढयों के हाथों में समर्पित किया है और आगे नीचे लिखा है ः ’मैं गांधी, जवाहरलाल, सुभाष की जिस पीढी में जन्मा, पला, बडा हुआ और जिया, वह भारत की स्वतंत्राता के सिपाहियों की पीढी थी। इस पीढी की जवानी लाठी की धमाधम, गोली काण्डों की धाँय-धाँय और हथकडी, बेडयों की छनाछन में बीती। इसके बाद की पीढी, जिसमें मेरा बुढापा बीत रहा है, राष्ट्र के नवनिर्माताओं की पीढी है और उनका कार्य है, देश की भावी पीढयों के लिए सुख-साधन संजोना। क्या ये दो भिन्न कार्य हैं? मैं नहीं मानता यह। ये दोनों कार्य एक ही जीवन की परिपूर्णता के तन्त्रा-मन्त्रा हैं, पर मैं जानता हूँ कि सांसारिक वैभव की परिपूर्णता होते हुए भी जीवन की परिपूर्णता अपूर्ण है, यदि मानसिक परिपूर्णता न हो। मेरा विश्वास है कि उगती-उभरती पाीढयों की मानसिक पूर्णता के लिए ये लेख आमेघ रसायन हैं; तो अपने जीवन की यह कमाई मैं अपनी उगती-उभरती पीढयों के हाथों आनन्द और शुभकामनाओंे के साथ समार्पित करता हूँ, क्योंकि अपनी मृत्यु के बाद मैं उन्हीं में तो जीवन का आनन्द भोगूँगा।‘ इसके बाद ’यह क्या पढ रहे हैं आप?‘ शीर्षक का प्राक्कथन है। उसकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण पंक्तियाँ हैं- ’’अत्यन्त नम्रता के साथ मैं यह कहना चाहता हूँ कि इन लेखों में वही शुभ सम्पर्क है, जो अशान्ति में शान्ति, नीरसता में सरसता और निराशा में आशा के भाव देकर मन को बिना किसी प्रयत्न के यों बदल देता है कि जीवन पहले से अच्छा और आनन्दपूर्ण हो जाता है।‘‘ आगे लिखा है कि इन लेखों में बुद्धि के गोरखधन्धे नहीं, सरल हृदय की जिज्ञासाएँ हैं, चिन्तन है, अध्यवसाय है, प्रयत्न हैं, साधन है, सफलताएँ हैं और निष्कर्ष हैं, जिनकी मिठास से सात्विक आनन्द का अनुभव होगा और कुछ रचनात्मक करने की प्रेरणा मिलेगी। इस ग्रंथ की सभी रचनाएँ कुछ ऐसा ही प्रभाव उत्पन्न करती हैं। प्रभाकर जी की यह जीवन-दृष्टि जिस रूप में प्रकट हुई है वह कुछ रचनाओं के शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है, यथा-’’मैं आँख फोड कर चलूँ या आप बोतल न रखें?, ’धूप-बत्ती, बुझी-जली‘, ’सहो मत तोड फेंको‘,। ’मैं भी लडा, तुम भी लडे पर जीता कौन?‘, ’मैं पशु हूँ, पशु जैसा ही हूँ, पर पशु नहीं हूँ।‘, ’गरम खत ः ठंडा जवाब‘। ’बेईमान का ईमान, हिंसक की अहिंसा और चोर का दमन।‘, ’अधूरा कभी नहीं, पूरा और पूरी तरह।‘ आदि। उनके एक निबन्ध का शीर्षक है, ’यह सडक बोलती है‘। आप देख रहे हैं कि प्रभाकर जी ने सडक को बोलते हुए सुना है और उससे बहुत कुछ सीखा है, वह सब हमारे भी काम का है। प्रभाकर जी का एक ग्रन्थ ’महके आँगन चहके द्वार;। में दाम्पत्य जीवन के लिए बडे महत्वपूर्ण सूत्रा दिये गये हैं। इस सम्बन्ध में ’अगले पृष्ठों में‘ प्राक्कथन के रूप में जो कुछ कहा है, उसकी निम्नलिखित पंक्तियाँ देखिए- ’मुख्य प्रश्न तो यही है कि समाज में विवाह एक अटूट सम्बन्ध रहे या कच्चे धागे की तरह एक झटके में टूट जाने वाला?‘ ये हुई सिद्धान्त की बातें, व्यवहार की बात है वह, जिसे फ्रैंकलिन ने कहा, कि ’’विवाह से पहले अपनी आँखें खूब खुली रखो और विवाह के बाद आधी बन्द।‘‘ मतलब यह कि पुरुष-स्त्राी के सम्बन्ध में और स्त्राी-पुरुष के सम्बन्ध में गुण-दोषों की, स्वभाव की, परिस्थितियों की, अनुकूलता-प्रतिकूलता की भरपूर जाँच-पडताल करने के बाद विवाह करें, पर विवाह के बाद आलोचना की, गुण-दोषों की वृत्ति को बाँधकर विश्वास की, बर्दाश्त की, निभाव की वृत्ति पर वे टिकें। इसी भाव को बेवर्लीनिकॅल्स ने इन शब्दों में कहा है, ’’विवाह एक ऐसी पुस्तक है, जिसका पहला अध्याय कविता में लिखा जाता है और शेष भाग गद्य में।‘‘ ठीक है, वैवाहिक जीवन का आरम्भ भावुकता में होता है, पर उसकी पूर्णता एक यथार्थ है। भावुकता और यथार्थ में सामंजस्य स्थापित करने की कला ही सुखमय दाम्पत्य की कुंजी है। यह कुंजी पाठक-पाठिकाओं को नयी पीढी को भट करने के लिए ही अनुभवों और चिन्तनों से परिपूर्ण अध्ययन अगले पृष्ठों में प्रस्तुत है।‘‘ प्रभाकर की इस पुस्तक में विभिन्न संस्मरणों के माध्यम से जीवन के इन सूत्राों के बडे प्रभावपूर्ण व्याखान हैं। प्रभाकर जी की एक और पुस्तक ’जिन्दगी लहलहायी‘ (१९८४) के एक निबन्ध में उन्होंने विद्यार्थियों के बीच एक विचारगोष्ठी में जो कुछ कहा था, उसे अवतरित किया है। एक विद्यार्थी ने उनसे पूछा था, ’’सफलता का मार्ग क्या है?‘‘ उन्होंने उत्तर दिया था ः ’स्वप्न, संकल्प, श्रम, सिद्धि।‘ बातें बहुत हो चुकीं, संकट द्वार पर ललकार रहा है, उठो और उठते ही भय, झिझक और चिन्ता को दूर फेंक दो- बिलकुल उसी तरह कि जैसे अपने ऊपर चढे कानखजूरे को फेंक देते हो और भिड जाओ पूरी ताकत से, तुम्हारी विजय निश्चित है। फिर निश्चित-अनिश्चित क्या जब पराजय का कोई चान्स ही नहीं। वह तत्वदर्शी था- जिसने अतीत में गाया- ’’कार्यं वा साधयेयम्, शरीरं वा पाततेयम्‘‘ फिर भय क्या, झिझक क्या। जब एक मुट्ठी में विजय और दूसरी में सन्तोष है। पहली बार सम्भवतः १९७०-७१ वे अपने साथ सहारनपुर के मुन्नालाल महिला विद्यालय की हिन्दी विभाग की अध्यक्षा सौम्य श्रीमती कमला को लेकर मेरे पास आये थे। उन्होंने कहा कि कमला जी कह रही हैं कि मेरठ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. रामकरन सिंह जी ने इनसे कहा है कि ये मेरे साहित्य पर अनुसन्धान कार्य करें। लेकिन मैं अपने को इस योग्य नहीं समझता, आप इन्हें समझा दें कि ये किन्हीं और साहित्यकार पर अनुसन्धान कार्य करें। मैं कुछ कहूँ कि इससे पहले ही कमला जी ने मुझसे कहा कि डॉ. सिंह ने उनसे यह भी कहा है कि इस अनुसन्धान कार्य का निर्देशन डॉ. मिश्र करें। मैंने इन शब्दों को सुनकर कहा कि डॉ. सिंह के शब्द मेरे लिए आदेश के रूप में हैं और मेरी निश्चित धारणा है कि आफ साहित्य पर बडा प्रभावपूर्ण अनुसन्धान कार्य हो सकता है। कमला जी! आपको प्रभाकर जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर ही अनुसन्धान कार्य करना है। प्रभाकर जी मेरे इन शब्दों को सुनकर बोले थे ः ’आप मुझे झंझट में फँसा रहे हैं।‘ यह उनकी विनयशीलता थी। मैंने कहा कि आपको झंझट में फंसाना नहीं है, वरन् यह आपकी रचनाओं के प्रेरणास्रोत आपकी साहित्यिक-दृष्टि का अनुशीलन और आपकी रचनाओं की प्रभविष्णुता का आकलन होगा। कमला जी ने तब उनकी ही रचनाओं पर अनुसन्धान कार्य किया। यह प्रभाकर जी पर पहला शोध-प्रबन्ध था। आगे चलकर महाराष्ट्र के श्री विश्वास पाटिल ने प्रभाकर जी की पत्राकारिता पर अनुसन्धान कार्य करके पी-एच. डी. की उपाधि प्राप्त की। प्रभाकर जी से समय-समय पर मिलने पर मैं यह आग्रह करता रहा कि वे अपनी आत्मकथा लिखें, जिससे उनके साहित्य को समझने में विशेष सहायता मिलेगी। बात सम्भवतः १९९३ की है, मैं लखनऊ आ गया था। पत्रा-व्यवहार के आधार पर वे मेरा पता जानते थे, अतः वे एक दिन सुबह मेरे निवास पर पधारे और कहा कि मेरे आग्रह से उन्होंने अपनी आत्मकथा लिख दी है। उन्होंने मुझे ’तपती पगडण्डियों पर पद यात्राा‘ मेरे हाथों में पकडा दी थी। प्रभाकर जी ने उसी दिन उत्तर प्रदेश पत्राकारिता संस्थान में आयोजित संगोष्ठी के समापन सत्रा में अध्यक्षीय भाषण दिया था। उनके अन्तिम शब्द थे-अंधेरा माँगने आया था उजाले की भीख; हम अपना घर न जलाते तो क्या करते। मुझे लगा कि प्रभाकर जी की समस्त रचनाओं का यही अन्तःसू.त्रा है। मैंने उनकी आत्मकथा पर समीक्षा लिखी थी-’अदम्य जिजीविषा की संजीवनी वाणी।‘ हिन्दी के यशस्वी लेखक, सम्पादक और वरिष्ठ स्वतन्त्राता सेनानी श्री विश्वम्भर नाथ पाण्डेय जी ने शुभाशंसा के रूप में जो कुछ लिखा है, उसे अवतरित कर रहा हूँ ः प्रभाकर जी की ’तपती पगडण्डियों पर पद यात्राा....‘तिलतिलकर जलने समान थी, हर कदम जमीन पर नहीं, जलते अँगारे पर रखना था। हिन्दी पत्राकारिता के इतिहास में कष्ट सहन के अनेक उदाहरण हैं, पर विकास के संघर्ष की गिनती तो मोर्चों में करनी होगी, जिसमें शत्राु को पराजित करने के लिए घमासान युद्ध करना पडता है। प्रभाकर जी ने दस वर्ष लम्बे इस हिंसक मोर्चे पर, जो अहिंसक व्यूहरचना की और फिर जो सुनियोजित उद्योग किया वह उनके गांधीवादी रणकौशल का तो परिचय देता ही है, उनके साहसिक संतुलन को भी उजागर करता है। विरोधी अनेक, जिनके पीछे अंग्रेज सरकार की क्रूर पुलिस, इधर अकेले प्रभाकर जी और परिस्थितियाँ ऐसी कि प्रातःकाल का भोजन करते समय संध्या के भोजन का भरोसा नहीं। फिर दैवीय प्रकोप, चार पुत्राों और वीर पत्नी प्रभा की मृत्यु। ऐसे में मोर्चे पर जमे रहना, शत्राु के विध्वंस पर विजय पाना और नया निर्माण करना, साधारण बात तो नहीं। पद यात्राा के पृष्ठों को पढते हुए मुझे रोमांच तो अनेक बार हुआ, पर प्रभाजी की मृत्यु का प्रसंग पढते-पढते तो मैं रो ही पडा।‘ पाण्डेय जी ने इसके बाद यह प्रश्न उठाया है कि प्रभाकर जी के इस संघर्षशील व्यक्तित्व की मूल प्रेरणा क्या है? वे लिखते हैं, संघर्ष के आरम्भ में ही ’प्रभाकर‘ जी प्रभाजी से कहते हैं- ’’प्रभा! हमारे संघर्ष-यज्ञ की यह कसौटी बन गयी है कि इस संकल्प में यदि मेरा कोई स्वार्थ नहीं है और मैं इस हवन-कुण्ड में इसलिए कूदा हूँ कि ’विकास संस्था‘ स्वाधीनता संग्राम का जागरण-शंख बनने के लिए (अंग्रेजष् सरकार के आक्रमण से ) बची रहे, तो शत्राु कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, इसका बाल-बाँका न कर पायेगा, पर यदि मेरे संकल्प में दूर-पार भी स्वार्थ भावना है, तो संस्था तो डूबेगी ही मेरी भी दुर्गति होगी।‘‘ प्रभाकर जी का विपुल साहित्य है। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू और इन्दिरा गांधी के जीवन-वृत्त लिखे हैं। उत्तर प्रदेश के स्वाधीनता संग्राम की एक झाँकी भी उन्होंने लिखी है। बच्चों के लिए भी ’दूध का तालाब‘ नामक एक रचना है, जिसमें बाल कथाएँ संक |