सम्पादकीय
बांसवाडा समाचार बीकानेर समाचार डूंगरपुर समाचार हनुमानगढ समाचार अर्न्तराष्ट्रीय समाचार जयपुर समाचार मेड़ता समाचार मुम्बई समाचार राष्ट्रीय समाचार प्रादेशिक समाचार श्रीगंगानगर समाचार सूरतगढ समाचार फोटो दीर्घा
संग्रहण (new)
-------------------------- पुस्तक समीक्षा वर्तमान मुद्दे आर्थिक सम्पादकीय शिक्षा परीक्षा परिणाम प्रदर्शनी खाना खजाना हिन्दुओ के व्रत व त्यौहार इतिहास त्चरित टिप्पणी प्रेरक प्रसंग बातचीत पत्रकारिता व्यक्तित्व दर्शन राजनीति धार्मिक स्मरणांजलि लघु कथाऐं खेलकूद पर्यटन आने वाली फिल्म -------------------------- वर्तमान साहित्य --------------------------
मतदान कार्टून फोरम ई पत्र एस म एस वॉलपेपर स्क्रीनसेवर -------------------------- वर्घीकृत विज्ञापन Advertising With Us Online Advertising व्यापार निर्देशिका Rajasthan Webs Softwares Hosting Package Web Design |
Vartmaan Sahitya :: January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner |
मनु श्रीवास्तव की दो कविताएं
Add
comment
Mail
this Story
Write
to Editor
|
कमल पार्टी में नशे में धुत्त एक खूबसूरत औरत। उसने जिसको चाहा उसको छुआ, जिसको चाहे दुत्कारा; वह खूब बहकी, कभी नाची, कभी रूठी। उसे जब जो भाया वह उसके पास सिमटी। वह सच बोली पार्टी में न बोले जाने वाले सच, पार्टी के सच, झुग्गी के सच। वह झूठ भी बोली, हसीन झूठ। उसके किस्से-कहानियां किस्सों सी चुभीं। एक बार उसका आंचल उसके खूबसूरत कंधे से गिर गया और उसकी उंगलियां बहुत देर तक आंचल को टटोलती रहीं; उन लम्हों में उसकी उंगलियों की हरकतों में पूरी पार्टी की चेतना बस गयी थी। पार्टी के बीचों-बीच एक बार वह गुमसुम हो बैठ गयी। तब तमाम कैसोनोवाओं की कोशिशें और जामों की छलक भी उसे छू न सकी। पूरी पार्टी समझो उसकी थी पर वह पार्टी की नहीं थी, सिर्फ अपनी थी। काश पार्टी में नशे में धुत उस खूबसूरत औरत की तरह, अपनी जंदगी बीत सके इस शहर में। स एक महामानव जो मिला कभी मैं फिर तुमसे मिलना नहीं चाहता। मैंने तुम्हें मंच पर नाटक के मुख्य-पात्रा के रूप में देखा था। छोटे से मंच पर तुमने महामानव से डग भरे। तुम्हारे कदम में वह ताल और मुडने में वह फुर्ती थी, जैसे कोई शेर अपने जंगल में, गश्त कर रहा हो। तुम्हारे संवादों की थिरकन से पूरा हाल थम गया तुम्हारे अभिनय की बारीकियों में पूरा हाल रम गया। उसके कुछ दिन बाद तुम मुझसे किसी सिलसिले में मिले। तुम शर्माते, सकुचाते, कद में मुझसे कुछ ५-६ इंच अदने, और अदना होने की कोशिश में, कुर्सी के कोने पर टिके, अपने अस्तित्व से शर्मिंदा होते हुए, अपनी उपलब्धियों की कमी को कारक मान, हाथ पसारे खडे थे। नहीं, मैं तुमसे मिलना नहीं चाहता, मुझे अपना महामानव चाहिए, गश्त करता जंगल का शेर।
Discuss this topic on KhabarExpress Forum
|
|
June, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | May, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | April, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | March, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | October, 2006 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | |
|