कमल पार्टी में नशे में धुत्त एक खूबसूरत औरत। उसने जिसको चाहा उसको छुआ, जिसको चाहे दुत्कारा; वह खूब बहकी, कभी नाची, कभी रूठी। उसे जब जो भाया वह उसके पास सिमटी। वह सच बोली पार्टी में न बोले जाने वाले सच, पार्टी के सच, झुग्गी के सच। वह झूठ भी बोली, हसीन झूठ। उसके किस्से-कहानियां किस्सों सी चुभीं। एक बार उसका आंचल उसके खूबसूरत कंधे से गिर गया और उसकी उंगलियां बहुत देर तक आंचल को टटोलती रहीं; उन लम्हों में उसकी उंगलियों की हरकतों में पूरी पार्टी की चेतना बस गयी थी। पार्टी के बीचों-बीच एक बार वह गुमसुम हो बैठ गयी। तब तमाम कैसोनोवाओं की कोशिशें और जामों की छलक भी उसे छू न सकी। पूरी पार्टी समझो उसकी थी पर वह पार्टी की नहीं थी, सिर्फ अपनी थी। काश पार्टी में नशे में धुत उस खूबसूरत औरत की तरह, अपनी जंदगी बीत सके इस शहर में। स एक महामानव जो मिला कभी मैं फिर तुमसे मिलना नहीं चाहता। मैंने तुम्हें मंच पर नाटक के मुख्य-पात्रा के रूप में देखा था। छोटे से मंच पर तुमने महामानव से डग भरे। तुम्हारे कदम में वह ताल और मुडने में वह फुर्ती थी, जैसे कोई शेर अपने जंगल में, गश्त कर रहा हो। तुम्हारे संवादों की थिरकन से पूरा हाल थम गया तुम्हारे अभिनय की बारीकियों में पूरा हाल रम गया। उसके कुछ दिन बाद तुम मुझसे किसी सिलसिले में मिले। तुम शर्माते, सकुचाते, कद में मुझसे कुछ ५-६ इंच अदने, और अदना होने की कोशिश में, कुर्सी के कोने पर टिके, अपने अस्तित्व से शर्मिंदा होते हुए, अपनी उपलब्धियों की कमी को कारक मान, हाथ पसारे खडे थे। नहीं, मैं तुमसे मिलना नहीं चाहता, मुझे अपना महामानव चाहिए, गश्त करता जंगल का शेर।
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