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Vartmaan Sahitya ::January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner भूलभुलैया सामाजिक त्राासदियों की सहज, व्यंगपूर्ण अभिव्यक्ति की कहानियां
नमिता सिंह
अमर गोस्वामी के नये कहानी संग्रह ’भूल भुलैया‘ में उनकी बारह कहानियां हैं। ये कहानियां अपने समय को ही नहीं सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था पर बेहद कलात्मक ढंग से टिप्पणी करती हैं। आज सामाजिक परिस्थितियाँ अपने आप में एक जटिल परिवेश के साथ अपने वर्तमान और आने जाने वाले समय को व्याख्यायित कर रही हैं। पूरे वैश्विक सन्दर्भों के साथ ही इसकी जटिलताओं को समझा जा सकता है और सम सामयिक निष्कर्ष ग्रहण किये जा सकते हैं। अमर गोस्वामी की कहानियों की भावभूमि बहुत विस्तृत है। कहानियां अपनी गति में बढती जाती हैं और फैलती जाती हैं। वे अपनी संरचना में कई पर्तें समेटे होती हैं और पर्त दर पर्त खुलती हुई पाठक के सामने बडे सवाल खडे करती हैं। उसके सामने एक बहुआयामी परिदृश्य का सृजन करती हैं। ये कहानियां पात्राों के वैयक्तिक मनोजगत का आलंबन लेकर अपने समय की सामाजिक परिस्थितियों पर लगातार टिप्पणी करती हैं। यहां पति-पत्नी के रिश्ते हैं जो साधारण मध्यवर्ग से लेकर कॉरपोरेट जगत तक फैले हैं। यहां पिता पुत्रा के बीच संबंधों के विभिन्न संदर्भ हैं। उच्च वर्ग के दंभ और मानसिकता के बीच दलितों के सवाल हैं। शिक्षा के क्षेत्रा में उनके प्रति संवेदनहीनता के प्रश्न हैं। सास-बहू के परंपरागत भारतीय समाज के बीच में चमकती मानवीय संवेदना की सुनहरी लकीरें हैं और विदेशों में जा बसने वाले बेटों के परिवार और उनके बूढे माँ-बाप की त्राासद परिस्थितियों से जूझने की कोशिशें हैं। ये परिस्थितियां विशुद्ध आज के समय से उपजी हुई हैं लेकिन इनकी कहानियां इकहरी नहीं हैं। वे अपने साथ पूरे सामाजिक परिवेश को समेटे हुए चलती हैं और इतना ही नहीं। वैश्वीकरण की प्रक्रिया किस तरह पूरे समाज को समग्र रूप में प्रभावित कर रही हैं, कैसे व्यक्तिगत स्तर पर आपसी संबंधों को निर्धारित कर रही है, इस पर भी बहुत सहजता से टिप्पणी करती हैं। लेकिन यह निष्कर्ष भाषण या बयानों से नहीं है और कलापूर्ण रचनात्मकता के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं। सबसे बडी विशेषता इन कहानियों की भाषा है। भाषा का खिलन्दडपन कहानियों को प्रवाहमान बनाता है और सहजता प्रदान करता है। भाषा का कौतुक उसकी ताकत है। जीवन की त्राासद परिस्थितियों को सरलता के साथ प्रस्तुत करना बहुत बडी विशेषता है और अमर गोस्वामी को इसमें महारथ हासिल है। संग्रह की पहली कहानी ’तोहफा‘ सचमुच हिन्दी के पाठकों के लिये एक तोहफा है जो न केवल भाषा के स्तर पर बल्कि पूरी परिस्थितियों को बेहद सहज और कौतुक के साथ प्रस्तुत करती हैं। यह सिर्फ सुमनलता और उसके पति केशवानन्द के विवाह की पहली रात की कहानी नहीं है। यह आज की पूरी व्यवस्था के वैश्वीकरण की कहानी बन जाती है। पूरे बाजारवाद की ओर जिस खूबसूरती और प्रभावी ढंग से यह छोटी सी कहानी इंगित करती है, वह अद्भुत है। मुझे लगता है कि यह अकेली कहानी पूरे संग्रह की कहानियों पर भारी है। भाषा का कौतुक यहां भी फैला हुआ है जो कथ्य को और उसमें समाहित बडे सवालों को बेहद सहजता और सरलता से सामने रख देता है। दरअसल भाषा ही कथ्य और विचारों का आलंबन है। सरलता और सहजता अपने आप में बहुत बडी विशिष्टता होती है। बहुत आसान नहीं है सहजता का निर्वाह करना और यही इन कहानियों की विशिष्टता है और ताकत भी है। इसी के बरक्स अंतिम कहानी ’भूल भुलैया‘ को रखा जा सकता है जहां रॉकी के जूते का शौक, और लोन लेकर लिये गये नये जूते ही कहानी है। पूरा समाज लोन की संस्कृति पर टिका है। इस विश्व बाजार व्यवस्था में भारत और भारत जैसे अन्य विकासशील (रॉकी के परिवार जैसे साधारण मध्यवर्गीय) देशों की आधुनिक संस्कृति भी लोन व्यवस्था से संचालित हो रही है। साधारण सी लगने वाली यह कहानी भी बाजारवाद पर गंभीर टिप्पणी करती है। संग्रह की अन्य महत्वपूर्ण कहानियों वसुधैव कुटुम्बकम, कैलेंडर और हॉस्टल हैं। ’हॉस्टल‘ कहानी में शिक्षा जगत में व्याप्त वर्णव्यवस्था का चित्राण है जो बाहर से नहीं दिखाई देता लेकिन भीतर ही भीतर आज भी दलित वर्ग के होनहार छात्राों को शिक्षा की सुविधाओं से वंचित करता है। बिना किसी शोर-शराबे और नारेबाजी के यह कहानी हॉस्टल के भीतर धंसे एक अलग हॉस्टल की कहानी कहती है। खेलावनराम का यह कहना-’’यह हम जैसों का हॉस्टल है....जैसे किसी गांव के जमींदार का मकान और उसी गांव में रहने वाले एक बहुत गरीब किसान का मकान....‘‘ पूरी स्थितियों को बयान कर देता है। बहुत मार्मिक और तथ्यपरक कहानी है जो अपने समय के सच को उद्घाटित करती है। ’’वसुधैव कुटुम्बकम‘‘ आज के अराजक माहौल की सशक्त कहानी है जहां एक सीधा-सादा गृहस्थ अपने मकान को सुरक्षित नहीं रख सकता। समाज के दूसरे दबंग लोगों से लेकर पुलिस व्यवस्था तक, सभी लूट-पाट में लगे हैं। बेहद कौतुकपूर्ण परिस्थितियों के बीच से चलती हुई यह एक व्यापक सामाजिक त्राासदी की कहानी है। ऐसी ही एक अन्य व्यंगपूर्ण, चुटीली भाषा में लिखी गई कहानी ’कैलेंडर‘ है जो समाज की नैतिकता के दुहरे मानदंड और पाखंड की पर्तों को खोलती है। कैलेंडर जिसमें एक लाल रंग की कार है और उसके आगे विश्वसुन्दरी की तरह खडी गोरी है-’’गोरी के सारे कपडे लुट चुके थे वह सर्वहारा की स्थिति को प्राप्त हो चुकी थी पर उसके चेहरे पर कोई गम नहीं था, उल्टे वहां पर दम था जो उसकी आंखों में भी कम नहीं था। कुल मिलाकर सब कुछ बडा सरगम था-‘‘ पडोस के बुजुर्ग चचा से लेकर नायक की मित्रा लीला तक यह पाखंड का व्यवहार और घर के भीतर और बाहर की अलग-अलग नैतिकता का व्यापार स्पष्ट दिखाई देता है। कैलेंडर पूरे व्यंग और सामाजिक विरोधाभासों के बीच एक महत्वपूर्ण कहानी बन जाती है। संग्रह की अन्य महत्वपूर्ण कहानियां कोट, वरदान, हाशिये पर पर हैं जो धर्म, नैतिकता जैसे विषयों को सामाजिक सन्दर्भों में उठाती हुई व्यंगप्रधान कहानियां हैं। व्यंग विधा का सफल निर्वाह कहानियों को प्रभावपूर्ण बनाता है। लम्पट, लीलामई और तुम्हारी नजर से ही क्यों देखूं कहानियों में अनावश्यक विस्तार से बचा जा सकता था। इससे कहानी की प्रभावोत्पादकता और चुटीलापन कम होता है। अमर गोस्वामी की कहानियों को पढते हुए अनायास इस्मत चुगताई याद आने लगती हैं। मुझे लगता है कि आज तक हिन्दी में मंटो और इस्मत जैसे कथाकार पैदा नहीं हुए। सामाजिक विद्रूपताएं, संस्कार और सामंती मान्यताओं के बीच मानव समाज की त्राासदी के अनगिनत पहलुओं पर इन दो महान कथाकारों ने जो कहानियां लिखीं, वो आज भी हिन्दी में दुर्लभ हैं। विशेष रूप से इस्मत चुगताई की कहानियों में भाषा का अद्भुत कौतुक और खिलंदडपना है। वहां त्राासद परिस्थितियों से उपजी सिचुएशन है जिसे बेहद सरलता से इस्मत जैसे चाहे गीली मिट्टी की तरह कहानी को गढ लेती हैं और पाठक के सामने नंगी सच्चाईर्यां पूरे तौर पर उजागर होती हैं। हिन्दी और उर्दू का कथा साहित्य इतना करीब है, एक ही डाल पर जैसे दो विधाएं खिली हों, इसीलिये मंटों और इस्मत जैसे महान कथाकार हिन्दी के भी उतने ही अपने हैं जितने उर्दू के हैं। हम हिन्दी के रचनाकारों के सामने इस्मत की कहानियों में निहित सामाजिक त्राासदी के विविध रूपों का उद्घाटन करने की क्षमता एक मानक है जिसका मुख्य आधार कथ्य की संपूर्ण संवेदना के साथ भाषा का कौतुक है जो हमें लगातार हंसाता है लेकिन साथ ही रुलाता भी है। हमें ऐसी चुभन दे जाता है जो गंभीरता से सवालों पर सोचने के लिये मजबर करता है। अमर गोस्वामी में यह क्षमता मौजूद है जो अन्य कथाकारों में सहज दिखाई नहीं देती। हिन्दी कथा साहित्य में आज नयेपन के नाम पर ऊल-जलूल प्रयोग हो रहे हैं। अपठनीय रचनाएं आ रही हैं और मित्राों, प्रायोजकों के दम पर रेवडयां भी पा रही हैं। खितोदे (खिलेगा तो देखेंगे) जैसी रचनाएं धमाका करके फुस्स हो जाती है। ऐसे में यह कहानियां हिन्दी कथा साहित्य में एक ऊँचाई का मानक स्थापित करेंगी, एक नये भाषा संस्कार का निर्माण करते हुए व्यापक सामाजिक प्रश्नों को पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करने का रास्ता बनायेंगी, ऐसी उम्मीद ही नहीं बल्कि विश्वास है।
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