कहने को ’अंधेर नगरी‘ अपेक्षाकृत एक पुराना नाटक है, यदि वह आज भी खेला जाता है तो हमें अपने युग की प्रतिच्छाया ही नजष्र आती है। ’अंधेर नगरी‘ हमारी नगरी है। उस समय के मनुष्य का सुख-दुख हमारा सुख-दुख तो लगता ही है अपने कालखण्ड और अपने समाज में ही अनसुनी हमारी पुकार हमारी पूरी यातना का प्रतिनिधित्व करती हुई साथ हो लेती है। महत्वपूर्ण है लेखक का अपने सच से सीधा साक्षात्कार जो आगे भी सच का ही साक्षात्कार करवाते हुए हमारे अनुभव का जीवन्त हिस्सा बनता है। कथाकार कृष्णा सोबती कहती हैं-’’हम लेखक कितनी भी छोटी-बडी या साधारण प्रतिभा के धनी हों, इतना तो जानते हैं कि हमारा आचार-विचार और सामाजिक व्यवहार व्यक्तित्व का विस्तार जो भी हो, हमारी चेष्टाएं हमारी व्यक्तिगत चिंताओं और सरोकारों का अतिक्रमण कर उस ओर प्रवाहित होती हैं, जहाँ साधारणता का ठंठ सुरक्षित होता है। व्यक्ति के अंतरंग से उभरकर समाज और देश-काल की गूंथ में जज्ब होता रहता है। अपनी शाब्दिक और आत्मिक ऊर्जा में यही प्राणवान तत्व साहित्य का सरोकार कहलाता है।‘‘ इसी चिन्तन धारा में वह कहती है-’’सर्जक की आंख पाना और हाथ में कलम आना मानवीय जन्म का अलौकिक पुरस्कार है, पिछले जन्म का पुण्य है-लेखक होना जितना सहज दीखता है, वह उतना आसान है नहीं। लेखक एक बडी दुनिया को अपने में समेटे रहता है। अपनी एक सीमित इकाई में एक छोटी अन्तरंग दुनिया को बडी के पक्ष में खडा करता है। अपने होने के बावजूद अपने से ऐसी तालीम जगाता है जो उसे एक बडा परिप्रेक्ष्य देती है। उसे अपने से बाहर फैले संसार के यथार्थ से भी जोडती है। ’शब्दों के आलोक में‘ एक अपरम्परागत कृति है। जिसका जन्म शायद इस जरूरत से हुआ है कि जो कुछ कहा जाना है वह कहानी, उपन्यास, आलोचना के पूर्व निश्चित कटघरों में नही खप रहा। वह लेखकीय मनःस्थितियों को संस्कार और उथला-पुथला में सहजता तक लाती है और शाब्दिक रंगों में एक नया अर्थ देती है। ’लेखक के अन्तर्मन और उसके आस-पास फैले संसार की विलक्षणता, एकरसता, कठोरता, कोमलता, भय, आतंक, मैत्राी, वैर सभी अपने-अपने स्वभाव का व्याकरण चुनते हैं और शब्दों को रंग-विशेष में प्रस्तुत करते हैं।‘ और ’विचार की सर्जनात्मक प्रक्रिया शब्दों के सतही खयालों से नहीं, संस्कार और सहज की टकराहट, मुठभेड, में से गुजरकर सुस्पष्ट होती है।‘ (शब्दों के आलोक में‘ पृ. ८, ९) जीवन लगातार बदल रहा है। कृष्णा जी इस बदलाव को महसूस करते हुए मानवीय मनोभावों में मूल्यों के साथ-साथ जाने-अनजाने परिचित-अपरिचित को प्रतिबद्ध करती हैं। उनके कलात्मक स्पर्श ने भाषा को एक खास ढंग से तराशा है और पात्राों को गहराई दी है। अनामिका के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था-मुझे स्त्राी होने का गर्व है। मैंने मात्रा इसकी संज्ञा को ही धारण नहीं किया सहनशक्ति, आत्मविश्वास, परिश्रम में अपने को सेहतमंद व्यक्ति के रूप में सवारा है। उस स्पेस में जिया है जो आमतौर पर पुरूष के हिस्से में आता है। मैं साफश् निगाह से स्त्राी की तथाकथित आत्मकेन्द्रीयता देख सकती हूँ और पुरूष का अनुशासन भी जो उसे तराशता है गृहस्थी के लिए-अर्थ, साधन और सुविधाएं जुटाने के लिए। पुरूष के पास उसके अपने घर-गृहस्थी परिवार के अलावा वह ’बाहर‘ भी रहा जो उसके पुरूषोचित गुणों के अभ्यास के लिए एक बडा क्षेत्रा था। ठीक उसके विपरीत बिना शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्राता के स्त्राी के पास घर-गृहस्थी और बच्चों की दुनिया थी जो उसकी क्षमताओं को सीमित रखती रही। (शब्द के आलोक में, पृ. १९६)। कुछ अन्य नारीवादियों की तरह कृष्णा जी सारी गोलियां पुरूष पर खाली नहीं कर देतीं हालांकि स्त्राी-क्रान्ति के लिए स्त्राी का अधिकार-सजग होना जरूरी मानती हैं उसके लिए शिक्षा की स्वतंत्राता चाहती हैं और यह भी कि दर्प और दम्भ से उसे पछाडा न जाये। उनके लिए वक्त चाहती हैं ताकि साथ खडी हो सकें। कुछ इसी तरह इसाबेल आयेंदे ने एक साक्षात्कार में कहा था-’’मैं महिलाओं के प्रति सम्मानजनक दुनिया देख रही हूँ। ऐसी दुनिया जहाँ महिलाओं के मूल्यों को भी वैधता प्राप्त हो जैसी कि पुरूषों को। एक ज्यादा एकात्मक समाज। मैं सोंचती हूँ कि भविष्य में हम उन चीजषें को वापस पा लेंगे, जो हमने पहले कहीं खो दीं।‘‘ स्त्राी के पास करुणा और प्रेम की नैसर्गिक थाती है। इसलिए इसाबेल आयेंदे आश्वस्त हैं कि यह दुनिया खुद को किसी परमाणु विस्फोट में खत्म नहीं कर देगी उल्टे, हम लोग अपने आपको इस पृथ्वी को नचाने में कामयाब रहेंगे।‘‘ कृष्णा जी भारत की स्त्राी को व्यापक भूमिका में खरा उतरता देख पा रही हैं-स्त्राी की भूमिका में मात्रा बच्चे बनाना, परिवार का पालन-पोषण ही अब महिमामय आदर्श नहीं। ....जीवन-स्तर ऊँचा करने में और वैचारिक तथा उत्पाद इकाई के स्वरूप में उभरने की स्त्राी की क्षमता संदेह से परे है। कृष्णा सोबती ने अलग-अलग अन्दाजष् में परिवर्तन को पकडा है और हमारे साथ शेयर किया है। बाजार की सम्भावनाओं से हम आक्रान्त हो उठे हैं (पृ. ७२) व्यापक विस्तृत शब्द संस्कृति आज जिस दबाव के तले है वह विश्व भर के लेखकों के लिए चिंता का विषय है। प्रचार और प्रसार मीडिया क्या सचमुच ’विचार‘ को जकड लेगा? क्या राजनीति उत्पादन और व्यवसाय का गठबन्धन लेखन की शक्ति को गौण कर देगा? क्या बाजार और विज्ञान अपनी टकसाली संस्कृति से विचार सामर्थ्य को सीमित कर देंगे? क्या भाषा और रचनात्मकता पर इस सबकी रासायनिक प्रक्रिया हमारी सोच में बुनियादी परिवर्तन करेगी? ’सोच‘ पर हावी हो रही ’हाइवे संस्कृति‘ का ग्लोबल मॉडल क्या सचमुच हमें अपने होने की शैली से दूर कर देगा? सत्य अब चमचमाता मूल्य नहीं है। वह चपेट में है। सत्य की कई किस्में उपलब्ध हैं-अलग-अलग काउंटरों पर। अन्य उपभोक्ता सामग्री की तरह ही यह बेचा जा रहा है ....सत्य अब एक दुकान है। (पृ. १६५) पूंजी की आक्रामक एवं बर्बर व्यवस्था ने दिन-ब-दिन जीवन की एक-एक सांस को मुश्किल कर दिया है। पूंजी के साथ तकनीक के गठजोड ने मनुष्य से उसका आधार छीन लिया है। बीसवीं सदी के अंतिम हिस्से में जो बदलाव जन-जीवन ने भोगा है उसने उसके आंतरिक और बाह्य संसार को त्राासद बना दिया है। यह कैसे हो सकता था कि कृष्णा सोबती के ’शब्दों के आलोक में‘ इसकी अनुगूंज न हो। वह भला व्यक्ति की अस्मिता और आत्मसमान पर बनते बोझ को क्योंकर वाणी न देतीं? उन्होंने ठीक ही कहा है-चिंतन साहित्य की आत्मा है, तो भाषा उसकी देह। भाषा की जडों को हरा करने वाला रसायन, जो किसी भी भाषा को जिन्दा रखता है, जिन्दा करता चला जाता है, उसका स्रोत हमारा लोकमानस ही है। लोकभाषाएं, बोलियां अपने ताकश्त धरती से खींचती हैं। इतिहास भी इसी लोकमानस की भागीरथी के साथ-साथ बहता है और अपने सांस्कृतिक पुख्तापन में समय को अर्पित होता चला जाता है। (पृ. सं. ६७) ’शब्दों के आलोक में‘ डायरी, संस्मरण तथा पचास वर्षो के स्वाधीनता के अनुभव की गाथा भी है। भारतीय समाज की हकीकत है और विभाजन के विध्वंस का दर्द है। शब्दों के आलोक में हम बहुत कुछ देख पाते हैं।
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