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Vartmaan Sahitya ::January, 2007
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वर्चस्व के विरुद्ध बोलती कविताएं ओमप्रकाश वाल्मीकि
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समकालीन हिन्दी कविता में हरपाल सिंह ’अरुष‘ की कविताओं ने अपनी उपस्थिति से जो सार्थक हस्तक्षेप किया है, वह समूचे परिदृश्य को बदलाव की प्रक्रिया से जोडकर कविता को बहुआयामी रूप देता है। छोटी, कम उल्लेखनीय नदियों के माध्यम से सामान्य जन-जीवन की विषमताओं और दुर्व्यवस्था के कुचक्र को गंभीरता से रेखांकित करने का जो साहस दिखाया है, वही हरपाल सिंह ’अरुष‘ को अन्य कवियों से अलग करता है। उनकी काव्य पृष्ठभूमि में जिस शब्दावली का प्रयोग हुआ है, वह भी अपने आप में अनूठी है। गंभीर बल्कि उनके शब्द-सम्पदा को वे जिस आसानी से इस्तेमाल करते हैं, वह सिफश्र् प्रतीकात्मकता से ही संभव नहीं। बल्कि काव्य-तत्वों में बिम्ब प्रधानता भी विद्यमान है- प्रश्नों की क्या पूछते हो उनकी आँखों में उबलते अँगारों को देख उत्तरों की उत्कंठाएं तिलमिलाकर अचेत हो जाती हैं। दरअसल वे अपने अनुभवों को परिपक्वता के साथ अभिव्यक्त करने में सक्षम हैं। अनुभवों का यह संसार इन कविताओं को महत्वपूर्ण बनाता है। ’’भीमा और मुरझाई कपास‘‘ कविता-संग्रह की भूमिका ’’मैं कह ही देता हूँ‘‘ में भी वे इस बात का उल्लेख करते हैं कि जब हम साहित्य में समकालीनता के सन्दर्भ तलाशते हैं तो राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिकता को किसी न किसी प्रकार सभ्यता और संस्कृति के साथ एकाकार होते देखते हैं- भूखे आदमी के लाचार रक्त में खदबदाती हिंसा सैकडों पुण्यों पर भारी नहीं है क्या? इस संग्रह में नदियाँ दलितों, पिछडों, शोषितों, प्रताणितों का प्रतीक बनकर अनुभवों का एक विस्तृत और व्यापक संसार बनाती हैं।हिंडन नदी उत्तर प्रदेश की एक छोटी-सी नदी है, वैसे ही राजस्थान की बनास और महाराष्ट्र की भीमा। लेकिन इस संग्रह की कविताओं में गहरी प्रतीकात्मकता भावबोध के द्वारा अभिव्यक्त हुई है। सभ्यता और संस्कृति की दुहाई देकर मानवीय संवेदनाओं का दोहन, शोषण करना, उनसे खिलवाड करना, अपने वर्चस्व को बनाए रखने के नये-नये हथकंडे रचना, ये सब रोजमर्रा की घटनाओं में देखने को मिलता है। हरपाल सिंह ’अरुष‘ नदी के दुःख में समष्टि का दुःख देखते हैं। नदी के अंतस् में उठती चीत्कार को कवि गहरे अर्थबोध के साथ शब्दों में ढालता है- मेरे तट पर जहां किसी की श्रद्धा नहीं टिकती फैली निर्जन रेत पर पसर गये दुःखों के थपेडों की लाचार भाषा के अर्थ को सहेजने की सामर्थ्य से वंचित करुणा की आँखें डबडबाकर रह जाती हैं। इन प्रतिकूल स्थितियों में तमाम सवाल राख हो जाते हैं। कवि के भीतर जैसे कुछ चटक जाता है। सभ्यता की महानता का उद्घोष करने वालों के प्रति कवि तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। और यह महानता खोखली साबित होती है- लगता है सभ्य लोग भूखों की किसी उन्नत प्रजाति के हैं जिनकी क्षुधा शान्त होने का नाम नहीं लेती शेष लोग जिनको असभ्य घोषित कर दिया है वे नागरिक की श्रेणी से निष्कासित होने का शाप झेल रहे हैं। रातदिन श्रम से जूझते, खटते लोगों के प्रति समाज का रवैया श्रम विरोधी है। जिसे दलाल संस्कृति ने जन्म दिया है। हरपाल सिंह ’अरुष‘ की इन पंक्तियों में इस दर्द को गहरी अन्तर्वेदना के साथ व्यक्त किया गया है- मेरे चारों ओर सपनों की फश्सलें लहलहाती हैं परन्तु किसी बाहुबली की टेढी मुस्कान मण्डी में बैठकर उन्हें नीलाम कर देती है। मुझे याद है वामन के पग ठाली बैठकर खाने वालों के पास ऐसी युक्तियाँ होती हैं। सांस्कृतिक छद्म की आड में यातना भोग रहे लोगों के अनुभवों और उनकी त्राासदियों की ये, कवितायें मानवीय श्रम की पक्षधर हैं। हरपाल सिंह ’अरुष‘ के इस संग्रह में १०५ कविताएं हैं। जिनमें व्यक्त वैचारिकता के केन्द्रबिन्दु किसान, दलित और मजष्दूर हैं। यह वैचारिकता उनके स्वयं के अनुभवों से उपजी श्रम की महत्ता को स्थापित करती है, जहाँ उन्होंने प्राचीन मान्यताओं के प्रतीकों को नये संदर्भों के साथ रखकर देखने की कोशिश की है- ये बेचारे ईश्वर से ही डरते हैं जबकि इनको आदमियों से डरना चाहिए। *** कुदाल-फावडा, हल-दरांती ही इनकी सम्पत्ति है भूमि, बैल और फश्सलें सब गिरवी रखे हैं किसी की धरोहर के रखवाले होकर रह गये हैं। *** लाख परिश्रम करने पर भी जिनकी हथेलियां बुआई से छूट गये खेत की तरह खाली रह गयीं उनके दर्द की खदबदाहट मेरे कानों के परदे हिला जाती है मनुष्य की पहली समस्या भूख है। कवि हरपाल सिंह ’अरुष‘ इस पीडा को गहरे अवसाद के साथ अभिव्यक्त करते है- मोक्ष और स्वर्ग को तो तब समझूँ जब इस नासपीटी भूख से पीछा छूटे पेट भरे लोगों को आत्मा-परमात्मा, अध्यात्म की चिंता सताती है। ’आत्मा‘ के सवाल कवि को व्यथित करते हैं। तभी तो वह सवाल खडा करता है- यदि प्रत्येक प्राणी में आत्मा है तो मेरे भीतर की आत्मा संघर्ष के लिए क्यों नहीं उठ खडी होती है। वनों की अंधाधुंध कटायी से प्रकृति के संतुलन पर जो असर पडता है उससे जीवन भी ख्ातरे में है। वनों के प्रति कवि की संवेदना बहुत गहरी है- जंगलो! सावधान हो जाओ। पक्षियों के घोसलों को जगह नहीं मिलेगी अब कुल्हाडे शाण पर व्यायाम करके आ रहे हैं अब आरे अपने पैने दांत दिखाते-मुस्कराते गिजगिजी भूखी दीमक में रूपांतरित होकर आ रहे हैं। हरपाल सिंह ’अरुष‘ के कविता-संग्रह ’’भीमा और मुरझाई कपास‘‘ में आम लोगों की चिंता के साथ बढते प्रदूषण, साम्प्रदायिकता और मनुष्य विरोधी राजनीतिक हथकंडों का विरोध भी स्पष्ट दिखायी पडता है। उनके सरोकारों में मनुष्य की जीवटता, संघर्ष, भाईचारा, समता का ही स्वर प्रमुख है। वे जमीन से जुडे कवि हैं, जिनकी कविताओं में मिट्टी की सोंधी खुशबू ही नहीं, मिट्टी के प्रति गहरा लगाव भी दिखायी पडता है। वे गहरे भाव-बोध को अपनी कविताओं में बारीकी से समायोजित करते हैं। साफश्गोई उनकी विशिष्टता है। भाषा के प्रति उनमें गहरी आत्मीयता है तभी तो स्थानीय जनमानस के शब्द बिना किसी कृत्रिाम प्रयास के सहजता से प्रयोग किये गये हैं। कौरवी बोली के शब्द, मुहावरे बिना किसी बाह्य आडंबर के कविता को संप्रेषणीय बनाते हैं।



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