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Vartmaan Sahitya ::January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner इतिहास में दर्ज कराने की पहल
आशिक बालौत
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध भारत के विभिन्न भागों में अनेक विद्रोह हुए। इन विद्रोहों की व्यापकता को देखकर यह कहा जा सकता है कि ये विद्रोह भारतीय किसानों, आदिवासियों की सरकार विरोधी भावनाओं की सक्रिय अभिव्यक्ति थे। जनता के बीच विद्रोह की चिंगारियों का फूटना मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्राों में ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरूद्ध व्यापक असंतोष था। इसका मुख्य कारण सरकार की नई लगान व्यवस्था और सत्ता का उत्पीडक रूप था। भूमि को निजी संपत्ति बना देना भी एक प्रमुख कारक था। औपनिवेशिक व्यवस्था की मार आदिवासी समुदाय पर भी पडी जिसके कारण आदिवासी समाज में पहले से स्थित सूदखोरों, व्यापारियों और ठेकेदारों को जष्मीन हडपने की नीतियों के कारण व्यवस्था मजबूत हुई। औपनिवेशिक शासन व्यवस्था के परिणाम-स्वरूप आदिवासी समाज में सदियो ंसे प्रचलित सामूहिक भू-स्वामित्व की मजबूत परम्परा छिन्न-भिन्न होनी प्रारंभ हुई। आदिवासियों की जमीन की बिक्री प्रारंभ हुई और उनका और अधिक शोषण प्रारंभ हुआ। ब्रिटिश शासकों की नीति के फलस्वरूप ये आदिवासियों के परंपरागत सांस्कृतिक जीवन पर हमला था। इसने वन और जमीन पर आधारित आदिवासियों के सांस्कृतिक ताने-बाने को न केवल अस्त-व्यस्त कर दिया बल्कि उनके अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया। ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों से त्रास्त संथाल आदिवासियों ने अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाया। संथाल आदिवासी मुख्य रूप से बिहार के सिंहभूम, हजारीबाग, भागलपुर, मुंगेर और पूर्णिया तथा बंगाल के बीरभूम आदि क्षेत्रा में निवास करते हैं। इस क्षेत्रा के आदिवासियों ने भारत के प्रथम स्वतंत्राता संघर्ष से पूर्व ईस्ट इंडिया कंपनी, महाजनों, व्यापारियों और ठेकेदारों के शोषण और दमन के विरुद्ध प्रतिरोध का स्वर ऊँचा किया। प्रसिद्ध रचनाकार राकेश कुमार सिंह ने अपने उपन्यास ’जो इतिहास में नहीं है‘ संथाल विद्रोह के नेता सिद्धू, कानू आदि को पात्रा बनाकर सन् १८५७ से पूर्व हुए इन आन्दोलनों के साम्राज्यवाद विरोधी चरित्रा को उद्घाटित किया है। राकेश कुमार सिंह ने ’जो इतिहास में नहीं है‘ में स्वाधीनता संग्राम पर हिन्दी उपन्यास में नया दृष्टिकोण अभिव्यक्त किया है इस उपन्यास से पूर्व शायद ही हिन्दी उपन्यास साहित्य में संथाल विद्रोह को केन्द्र में रखकर किसी उपन्यास का सृजन किया गया है। राकेश कुमार सिंह ने ये पहल करके हिन्दी उपन्यास साहित्य को समृद्ध किया है। इस उपन्यास में लेखक ने अंग्रेज शासन की वास्तविकता को व्यक्त करते हुए इस तथ्य को विशेष रूप से उजागर किया है कि संथाल आदिवासी समाज बहुत जागरुक था। वह न केवल अंग्रेजी शासन की वास्तविकता को समझता था बल्कि उनके शोषण और स्वार्थपरक नीति की भी उन्हें गहरी जानकारी थी। यही कारण है कि अपनी अस्मिता, स्वायत्तता और संस्कृति की रक्षा हेतु सिद्धो, बिरसा आदि लोकनायकों की अगुवाई में संथाल आदिवासी स्वाधीनता संघर्ष का आगषज करते हैं। अतः यह उपन्यास इन्हीं आदिवासी संथाल बहादुरों की संघर्ष की सशक्त महागाथा है। विदेशी शासकों के प्रति संथालों का आक्रोश राष्ट्रीय चेतना के विकास के आरम्भिक सोपान हैं। सन् १८५७ के पूर्व इन संथाल आन्दोलनों के नायक अपनी अदम्य जिजीविषा के कारण ही साम्राज्यवादी ताकत से पराजय और यातनाऐं मिलने के बाद भी आजादी की मशाल को बुझने नहीं देते हैं। ये जननायक मरणान्त संघर्ष करते हुए अपनी जमीन अस्मिता, स्वायत्तता, वन पर अधिकार और संस्कृति के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर देते हैं। उपन्यास का प्रमुख पात्रा हारिल मुरमू भी ऐसा ही जननायक है। जो आदिवासी समाज को एकजुट करके अपनी मुक्ति के लिए सक्रिय भूमिका अदा करता है-’’कान्हू मुरमू ने पहले ही से हूल के लडाकों की छोटी-छोटी टोलियां बनाकर जंगल में बिखेर रखा था। अब सिद्धों ने जंगल में गश्त लगाते अंग्रेज सिपाहियों और सैन्य टुकडयों पर प्रभावी और निर्णायक आक्रमण करने का आदेश दिया था।‘‘ (पृष्ठ-२८५) राकेश कुमार सिंह के इन पात्राों में राजनीतिक चेतना प्रखर है। वे जहाँ अपनी सामूहिक शक्ति को पहचानते हैं वहीं उन्हें ब्रिटिश साम्राज्यवाद की शक्ति और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हितैषी, जष्मींदार, ठेकेदार आदि के चरित्रा की भी गहरी जानकारी है। यही कारण है कि वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध होने के साथ-साथ ही देशी सामंतों और ठेकेदारों के विरुद्ध भी संघर्षरत हैं। ’’कोई हाथ में तीर मत लेना रे। हमें बचाने का कोई धनुक मत उठाना। कुछ किनना है तो कुछ मोल भी देना होगा। मोल दे रहे हैं हम! कोपनी मुरमेण्ट की बन्दूक से छिपकर ताकत जुमाना रे। ’हूल‘ के बिये की करेजे में गाडकर पोसना। पुलुस पकडे भी तो कछेरी में हाकिम से कहना कि सिद्धो से तुम्हारा कोई नाता नई। जान बचा के रखना रे....।‘‘ (पृ.-३४४) उपन्यास का कथानक विद्रोही संथाल युवा मुरमू और उराँव युवती लाली की रोमांटिक भाव-भूमि पर विकसित किया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि राकेश कुमार ंसह ने मुरमू और लाली की मर्मस्पर्शी प्रेम कथा को लोक-जीवन और लोकरंग का रूप देने के साथ-साथ संथाल विद्रोह के सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ को ओझल नहीं होने दिया है। यह उपन्यास मानवीय संबंधों के मार्मिक पक्ष और गरिमा को व्यक्त करते हुए स्वाधीनता और अस्मिता के संघर्ष पर गहराई से विचार करता है। उपन्यास का कलेवर पाठकों से धैर्य की अपेक्षा करता है। राकेश कुमार सिंह जनसंघर्ष को चित्रिात कर पाने में सफल हुए हैं। इस उपन्यास के द्वारा श्री सिंह ने संथाल आदिवासी विद्रोह को इतिहास में दर्ज कराने की पहल की।
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