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रोशनी खतरे में है‘ वशिष्ठ अनूप का दूसरा गष्जष्ल-संग्रह है। वर्ष २००० में प्रकाशित प्रथम गष्जष्ल संग्रह ’बन्जारे नयन‘ से वर्ष २००६ में प्रकाशित दूसरे गष्जष्ल संग्रह ’रोशनी ख्ातरे में है‘ तक की यात्राा उन्हें समकालीन गष्जष्लकारों की अगली पंक्ति में प्रतिष्ठित करती है। ’बन्जारे नयन‘ में उन्मुक्तता थी, बेफिक्री थी, ’रोशनी खतरे में है‘ में उन्मुक्तता की जगह आसन्न जडता के संकट से व्यथित मनोदशा की अभिव्यक्ति है। रोशनी प्रतीक है-जीवन की, खुशहाली की, सुकून की। इस प्रतीक के बहुत से आयाम ह। इन सभी आयामों पर आसन्न संकट से निबटने की बेचैनी ही गष्जष्लकार की अभिव्यक्ति का विषय है। समकालीन गष्जष्लकार के रूप में अनूप जी ने गष्जष्ल को आशिक और माशूक की सपनीली दुनिया से निकालकर असलियत की दुनिया में लाने का प्रयास किया है। उनकी गष्जष्लें अमन, सुकून और खुशहाली के लिए वक्त से रूबरू होती हैं- कौन कहता कि आकाशफल है गष्जष्ल, वक्श्त के रूबरू आजकल है गष्जष्ल। *** एक सुन्दर जगत के सृजन के लिए, शब्द संसार में इक पहल है गष्जष्ल। गष्जष्लकार की सामाजिक चिन्ता उसे जनजीवन के बहुत करीब लाती है, फलस्वरूप उसकी गष्जष्लों का स्वरूप यथार्थपरक हो जाता है। जीवन के लघुतम क्षणों पर भी गष्जष्लकार की दृष्टि गयी है। सुकून के साथ क्षण को जीने की लालसा तथा क्षण के बदलाव को उसने शिद्दत से महसूस किया है। आमतौर पर गष्जष्लों में ऐसे यथार्थ क्षणों का अंकल कम होता है, ज्यादातर गष्जष्लें घिसे-पिटे ढर्रे पर लिखी जाती हैं। गष्जष्ल की भाषिक संरचना में यथार्थपरक क्षणों का अंकन कठिन भी है। इसके विपरीत अनूप जी ने गष्जष्ल की सरल भाषिक संरचना में ही सहज रूप में कठोर यथार्थ को चित्रिात किया है। यह गष्जष्लकार के सामाजिक एवं साहित्यिक कर्म की कसौटी है। क्षीण होते सामाजिक मूल्य और सामाजिक चिन्ताओं से जुडकर संवेदनहीन होते इस समय में गष्जष्लकार की पीडा स्वाभाविक है- सभ्यता इस दौर की है निर्वसन होने लगी, आदमीयत गुम रही है, आदमी खतरे में है आदमी अपने सुख साधनों से क्रूरतापूर्वक मजषक कर रहा है। तकनीकी विकास के मोह में अन्धा होकर वह स्वयं के जीवन में जहर घोल रहा है। गष्जष्लकार चिन्तित है- हवाओं में जहर घुलता रहा गर दिन ब दिन यूँ ही, तो एक दिन साँस लेने के लिए हम छटपटायेंगे। मौजूदा समय उलझन भरा है। चारों तरफ खतरे का दौर है। इन्सान से वह सब कुछ दूर हो रहा है। जो उसके जीवन में सुकून और खुशहाली ला सकता था। इस खतरे से पैदा दर्द और उलझनों को गष्जष्लकार ने पूरी शिद्दत के साथ महसूस किया है। उसकी बेचैनी पूरी व्यवस्था को कुरेदती है- ये सूरज की किरण क्यों कर हुई हैं आज हमलावर, जरा सोचो कि उससे किस तरह खुद को बचायेंगे। गष्जष्लकार की पीडा है कि यह खतरा बाहर से नहीं आया है बल्कि अपनों ने ही पैदा किया है, जब से लोग महिमामंडित करते हुए स्वीकृत प्रदान करने लगते हैं तो गष्जष्लकार की पीडा और बढ जाती है- लोग अब करने लगे हैं यूं अँधेरे को नमन, चाँदनी सहमी हुई है रोशनी खतरे में है। लेकिन गष्जष्लकार इस स्थिति से पराजित नहीं होता उसे पूरा भरोसा है- है रात गहरी ये बात सच है मगर ये सच है कि भोर होगा, फटेगी चादर ये कालिमा की, हरेक घर में अजोर होगा, *** सजाओ तुम बादलों की फौजें, या जुल्म की बिजलियाँ गिरा दो उगा ही लेंगे हम अपना सूरज, अगर भुजाओं में जोर होगा। ऐसे में मुस्कराने और टकराने का जज्बा गष्जष्लकार के मजबूत इरादे का बयान करता है- मन का सारा दर्द छिपाना पडता है, मजबूरी में भी मुस्काना पडता है, ऐसे मुश्किल के लम्हें भी आते हैं, कई बार खुद से टकराना पडता है। सामाजिक सरोकार की वजह से ही गष्जष्लकार विद्रोही हो जाता है। कहीं-कहीं वह व्यंग्य का भी सहारा लेता है, क्योंकि बिगडे सियासी माहौल को व्यंग्य ही बेनकाब कर सकता है- संसद रोजगार के अवसर ढूँढ रही, भिक्षाटन का पाठ पढाया जायेगा। ऐसे माहौल से निजात पाने वालों की तरफदारी भी गष्जष्लकार खुलकर करता है- जो भूखा है छीन झपटकर खायेगा, कब तक कोई सहमेगा शरमायेगा। मजबूरी ही नहीं जष्रूरत है युग की, कि इन हाथों में परचम लहरायेगा। गष्जष्लकार जुल्मों-सितम से पिस रही जनता को ललकारता है- कब तक जियेंगे ऐसी धुँआती सी जिन्दगी एक बार उठ और मशालों से जल पडे। गष्जष्लकार का विद्रोही तेवर और ’सब कुछ संभव है‘ का विश्वास दुष्यन्त कुमार की याद दिलाता है- कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो दुष्यन्त कुमार की उपरोक्त पंक्तियों से अनूप जी की ये पंक्तियां तुलनीय हैं- उठेंगी चिन्गारियां तो रोशनी होगी जरूर कौन कहता है कि टकराने से कुछ होगा नहीं अनूप जी की गष्जष्लों में शहरी जीवन के खोखलेपन और शहरी लोगों की बढती संवेदनहीनता के प्रति चिन्ता की अभिव्यक्ति हुई है। शहरी जीवन और सियासी दाँव-पेंच से छले जाने वाले भोले-भाले लोग उनकी मानवीय चिन्ता का विस्तार करते हैं- राजधानी में जो चमचमाते महल, नींव तो झोपडी वाले गाँवों में है, कितने भोले हैं हरदम छले जाते पर इनका विश्वास अब भी चुनावों में है। तमाम मानवीय संकटों के बावजूद अनूप जी की गष्जष्लों में इन्सानियत के प्रति विश्वास कायम है। उनकी गष्जष्लों में जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा का विश्वास मौजूद है- ये सच है आज भी दुनिया में अत्याचार कायम है, मगर सच यह भी है कि जुल्म का प्रतिकार कायम है। कई रूपों में कई नामों से नफरत बाँटते हैं वे, मगर इन्सानियत जिन्दा है अब भी प्यार कायम है। आज पूरा परिवेश एक गंभीर संकट की जकड में है, समाज की कोई भी इकाई ऐसी नहीं है जो आशंकाओं की लपटों से न झुलस रही हो, मानवीय संवेदनाएं दम तोड रही हैं। इस संवेदनहीन समय में- शहर गाँव घर भीतर बाहर सब है उनके घेरे में, पहुँच चुके हैं साँपों के फन देहरी तक अँगनाई तक। तारीखों पर तारीखें फिर तारीखों पर तारीखें, बँटा हुआ है सारा जीवन फिर अगली सुनवाई तक। ऐसे कठिन समय में भी गष्जष्लकार उम्मीद का दामन नहीं छोडता, वह मायूस और निराश नहीं होता अपितु रोशनी की उम्मीद करता है- एक उम्मीद फजाओं में जगमगाती रहे, हम आँधियों में दिये इसलिए जलाते हैं। ऐसे संकटग्रस्त समय में गष्जष्लकार अपने को अकेला पाता है, यह अकेलापन उसे तकलीफ देता है। वह अकेलेपन की हद तक पहँचता है, यह संवादहीनता का दौर है- अब तो खुद से भी कहाँ मुलाकात होती है, मुद्दतों बाद कभी खुद से बात होती है। इस अकेलेपन, संकटग्रस्त मय, संवेदनहीन दौर में अनूप जी के अन्दर का गष्जष्लकार अपनी परिवारी संवेदना को कसकर पकडे रहना चाहता है। उसे माँ की ममता और पत्नी का प्यार दोनों याद आता है। वह माँ की ममता की डोर पकडकर अंधेरे से लडना चाहता है- टूट न सकती गाँठ न पड सकती जिसमें, कोमल सी एक ऐसी डोरी होती माँ। पत्नी के प्यार के सहारे वह अपने घर को सहेजना चाहता है- बिखरी-बिखरी है सब चीजें हर सूँ यहाँ-यहाँ, बिन घरनी यह घर भूतों का डेरा लगता है। निष्कर्षतः वशिष्ठ अनूप की गष्जष्लें इस बदलते हुए बेचेन समय और बदहवास दौर में गष्जष्ल के मकसद की मुकम्मल तस्वीर पेश करती हैं। अनूप जी गष्जष्लों का मकसद है-इन्सान परस्ती, इसी इन्सानपरस्ती के लिए उनकी गष्जष्लें गुजारिश करती हैं- ये दुनिया बहुत खूबसूरत है साथी, इसे और भी खूबसूरत बनाना। हिन्दी विभाग, राजा हरपाल सिंह पी.जी.कॉलेज, सिगरामऊ, जौनपुर (उ.प्र.)
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