|
Vartmaan Sahitya ::January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner जिज्ञासा और प्रश्न ही मानव प्रगति के मूल मंत्रा हैं
राजीव शुक्ल
भारतीय संस्कृति जिज्ञासा के मूल यक्ष प्रश्नों से निरन्तर बचती रही है, इसलिए तमाम ज्ञान-विज्ञान के होते हुए हम उसका विस्तार और विकास नहीं कर सके। हमने पहिये का निर्माण जरूर किया लेकिन उसका उपयोग केवल रथ और बैलगाडी में किया। हम पहियों को ’पुली‘ में नहीं बदल पाये जो औद्योगिक क्रान्ति का मूल मंत्रा है। इसी प्रकार बारूद का प्रयोग भी हम आमोद-प्रमोद के लिए करते रहे तोपों के गोले के रूप में नहीं कर पाये। यही मध्यकाल में भारत की पराजय का कारण बना। लोहे का प्रयोग करने वाले हम दुनिया के पहले देश हैं। लेकिन उसे हमने केवल तीर तलवार और धुरी तक ही सीमित रखा। हम उससे बंदूक और घोडे तक की रकाब नहीं बना सके। लोहे का प्रयोग जब रकाब और बंदूक के रूप में होने लगा तो युद्ध का परिदृश्य ही बदल गया। मध्यकाल तक आते-आते जिज्ञासा, ज्ञान और विवेक के स्थान पर हमारे बुद्धिजीवियों पर श्रद्धा और भक्ति हावी हो गई। भौतिकवादी दृष्टिकोण को हम निकृष्ट मानकर बहिष्कृत करते रहे। बचपन से ही लोगों को ये पढाया गया कि देवता और ईश्वरीय कार्यकलापों पर प्रश्न करना अपराध है। ब्राह्मणों की निंदा करना पाप है। यहां तक कि समुद्र यात्रााओं पर भी पाबन्दी लगा दी गई। ’आईन-ए-अकबरी‘ में महान लेखक अबुल फश्जल ने बहुत दुःख के साथ लिखा है कि हमारे यहाँ योरोप के विद्वान आते हैं तो हमारा शासक वर्ग केवल अध्यात्म और धार्मिक विषयों पर ही विचार-विमर्श करता है। योरोप में जो नये ज्ञान-विज्ञान के प्रयोग हो रहे हैं उन पर कोई भूल से भी चर्चा नहीं करता है। औद्योगिक विकास पर बात करना दूर की बात है। हमें दम्भ है-हम सब कुछ जानते हैं। हो सकता है आज के सन्दर्भ में ये सच हो, लेकिन आने वाले युगों में योरोप के लोग ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रा में बहुत आगे जायेंगे। ये बातें अबुल फश्जल ने १५९५ में कहीं थीं। एक शताब्दी बाद अबुल फश्जल की भविष्यवाणी पूरी तरह सच हो गई। अंधविश्वासों के कारण भारत के ज्ञान-विज्ञान की बहुत क्षति हुई। इन प्रवृत्तियों और पाखण्डों के विरुद्ध विदेशी यात्राी ह्वेन सांग, फाह्यान, बर्नियर, अल बरूनी ने खूब लिखा है जिसे पढकर हम अपने अतीत का सही मूल्यांकन कर सकते हैं। इसी सन्दर्भ में डॉ. विक्रम सिंह के यात्राा वृतान्त पढकर सुखद आश्चर्य हुआ। उन्होंने इन्हीं सवालों को नये शब्दों से याद किया है कि फाह्यान और मेगस्थनीज की साहसिक यात्रााओं का ही परिणाम था कि हम भारत के अतीत की वास्तविक झांकी उनके यात्राा वृतान्तों में देखते हैं। इनके यात्राा वृतान्त बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक हैं। डॉ. विक्रम सिंह ने एक यात्राी के रूप में ही नहीं बल्कि एक समाजशास्त्राी के रूप में भी स्वीडन और नार्वे के समाज का गम्भीर अध्ययन किया है। उनके निष्कर्ष महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि जिस समाज में महिलाओं और बच्चों की भावनाओं की उपेक्षा होती है वहां विकास की संभावनाएं कम हो जाती हैं। ऐसा समाज सभ्यता और मानवीय संस्कृति से दूर हो जायेगा। नार्वे और स्वीडन इस मामले में विश्व में अग्रणी राष्ट्र है जहाँ राष्ट्र के बच्चों और महिलाओं का सबसे ज्यादा ध्यान रखा जाता है। हमारे यहाँ जो कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना है इन देशों ने इसको साकार कर दिया। हमें उम्मीद है कि डॉ. विक्रम सिंह अगली बार डेनमार्क और स्वीडन की यात्राा करके हमारे सामने तीनों देशों की तस्वीर पेश करके उन देशों के समाज के उच्चतर जीवन मूल्यों को सामने रखेंगे। यात्राा वृतान्त एक कठिन विधा है लेकिन डॉ. विक्रम सिंह ने बडी सहजता से नार्वे के भूगोल, संस्कृति और इतिहास को सामने रख दिया है। ये जानकारियां हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकती हैं। आशा है पाठकगण इस यात्राा वृतान्त का स्वागत करेंगे।
Discuss this topic on KhabarExpress Forum
|
|
October, 2006 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | March, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | April, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | May, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | June, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | |
|